विषय

दशमांश क्या है: बाइबल के अनुसार देने का सिद्धांत

परिचय

महीने की पहली तारीख है। तनख़्वाह खाते में आ चुकी है, और आपके फ़ोन पर पहले से ही तीन सूचनाएँ हैं: बिजली का बिल, बच्चे की स्कूल फ़ीस, और गाड़ी की ईएमआई। तभी आपको रविवार का वह उपदेश याद आता है जिसमें पास्टर ने दशमांश की बात की थी। मन में एक हिसाब चलने लगता है। दस प्रतिशत? कुल आमदनी पर या टैक्स कटने के बाद? और अगर इस महीने न दे सकूँ तो क्या परमेश्वर नाराज़ हो जाएँगे?

अगर यह उलझन आपकी है, तो आप अकेले नहीं हैं। दशमांश उन विषयों में से है जिन पर सबसे ज़्यादा बात होती है और सबसे कम समझ पाई जाती है। कुछ लोग इसे एक नियम बना देते हैं, कुछ इसे पूरी तरह पुराना घोषित कर देते हैं, और बहुत से लोग बस अपराध-बोध के साथ लिफ़ाफ़ा थैली में डाल देते हैं।

इस पृष्ठ पर हम उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक दशमांश की पूरी यात्रा देखेंगे, चार आम भ्रांतियों को बाइबल से जाँचेंगे, और अंत में यह पाएँगे कि देना बोझ नहीं, बल्कि एक आज़ादी है जो मसीह में मिलती है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

यह पृष्ठ दशमांश को "परमेश्वर का हिस्सा" मानकर नहीं समझाता। यही सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है, कि दस प्रतिशत उनका है और नब्बे प्रतिशत मेरा। बाइबल उलटी दिशा से बोलती है: दशमांश कोई सीमा नहीं, बल्कि एक गवाही है। वह छोटा हिस्सा जो हम खोलकर रख देते हैं, यह घोषित करता है कि पूरा सौ प्रतिशत परमेश्वर का है और मैं उसका मालिक नहीं, भण्डारी हूँ। इसलिए यहाँ हम दशमांश को गणित के सवाल की तरह नहीं, बल्कि एक स्वीकारोक्ति की तरह पढ़ेंगे। जब यह बात मन में बैठ जाती है, तो सवाल बदल जाता है। "मुझे कितना देना पड़ेगा" की जगह "परमेश्वर ने मुझे कितना सौंपा है" पूछा जाने लगता है।

बाइबल दशमांश के बारे में क्या कहती है?

"दशमांश" शब्द का अर्थ बिलकुल सीधा है: दसवाँ भाग। इब्रानी भाषा में इसे मासेर कहा गया और यूनानी में देकाते। यह किसी धार्मिक रहस्य का नाम नहीं, बस एक गिनती है। लेकिन बाइबल में यह गिनती हमेशा किसी बड़ी बात की ओर इशारा करती है।

पहली बार यह शब्द व्यवस्था के आने से बहुत पहले, एक युद्ध से लौटते व्यक्ति के मुँह से नहीं बल्कि उसके हाथ से प्रकट होता है। अब्राम अपने भतीजे लूत को छुड़ाकर लौट रहा है, और शालेम का राजा मलिकिसिदक उससे मिलता है। वह अब्राम को आशीष देता है और कहता है, "और धन्य है परमप्रधान परमेश्वर, जिसने तेरे द्रोहियों को तेरे वश में कर दिया है।" तब अब्राम ने उसको सब वस्तुओं का दशमांश दिया (उत्पत्ति 14:20)। इस दृश्य का क्रम ध्यान देने योग्य है। पहले आशीष, फिर दशमांश। अब्राम कुछ ख़रीद नहीं रहा; वह जवाब दे रहा है। जीत उसकी तलवार से नहीं, परमप्रधान परमेश्वर के हाथ से आई थी, और दसवाँ भाग देकर वह यही मान रहा है।

कुछ पीढ़ी बाद याकूब बेतेल में मन्नत मानता है कि जो कुछ परमेश्वर उसे देंगे, उसका दसवाँ भाग वह उन्हें देगा (उत्पत्ति 28:22)। यानी दशमांश का बीज व्यवस्था से पहले ही पड़ चुका था, और वह एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के रूप में आया, न कि किसी कानून के दबाव में।

फिर मूसा की व्यवस्था आती है और इस प्रतिक्रिया को इस्राएल के जीवन का ढाँचा बना देती है। लैव्यव्यवस्था 27:30 में वह वाक्य मिलता है जो पूरे विषय की जड़ है: "फिर भूमि की उपज का सारा दशमांश, चाहे वह खेत का बीज हो चाहे वृक्ष का फल, वह यहोवा ही का है; वह यहोवा के लिये पवित्र ठहरे।" यहाँ परमेश्वर यह नहीं कहते कि दशमांश उन्हें दे दिया जाए, वे कहते हैं कि वह उनका है ही। देना उत्पन्न नहीं करता; देना स्वीकार करता है। और अगर दसवाँ भाग उनका है क्योंकि भूमि उनकी है, तो बाक़ी नौ भाग किसकी भूमि से आए?

दशमांश मालिकाना नहीं बदलता, वह मालिक की याद दिलाता है।

इस्राएल में यह व्यवस्था केवल एक ही दशमांश तक सीमित नहीं थी। लेवियों के भरण-पोषण के लिए एक दशमांश था, क्योंकि उन्हें भूमि का भाग नहीं मिला था। एक दशमांश परिवार के साथ मिलकर परमेश्वर के सामने आनन्द मनाने और उत्सव में खाने के लिए था (व्यवस्थाविवरण 14:22 से 26)। और तीसरे वर्ष एक दशमांश अनाथ, विधवा और परदेशी के लिए नगर में रखा जाता था (व्यवस्थाविवरण 14:28 और 29, 26:12)। इन सबको जोड़ें तो हिसाब दस प्रतिशत से कहीं आगे निकल जाता है। जो लोग कहते हैं कि बाइबल दस प्रतिशत की माँग करती है, वे असल में बाइबल की माँग को घटा रहे होते हैं।

नीतिवचन इस पूरे विषय को हृदय की भाषा में ले आता है: "अपनी संपत्ति से और अपनी सारी बढ़ती के पहले फल से यहोवा की प्रतिष्ठा करना; तब तेरे खत्ते भरे और पूरे रहेंगे, और तेरे रसकुण्डों से नया दाखमधु उमड़ता रहेगा" (नीतिवचन 3:9 और 10)। यहाँ शब्द "प्रतिष्ठा" है, "भुगतान" नहीं। और "पहले फल" कहना समय की बात है, मात्रा की नहीं। पहला फल वह है जो चखने से पहले, बचाने से पहले, ख़र्च करने से पहले अलग रख दिया जाता है, क्योंकि बाक़ी फ़सल आएगी या नहीं, यह परमेश्वर के हाथ में है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

दशमांश की कहानी सीधी रेखा में नहीं चलती, वह एक नदी की तरह बहती है जो हर मोड़ पर गहरी होती जाती है।

पुराने नियम के आख़िर में यह नदी एक चेतावनी और एक चुनौती बन जाती है। मलाकी के दिनों में मन्दिर चल रहा था, बलिदान हो रहे थे, पर लोग बीमार और लंगड़े पशु चढ़ा रहे थे और दशमांश रोक रहे थे। परमेश्वर कहते हैं, "सारे दशमांशों को भण्डार में ले आओ, कि मेरे भवन में भोजनवस्तु रहे; और इसी से मेरी परीक्षा करो कि मैं आकाश के झरोखे तुम्हारे लिये खोलकर तुम्हारे ऊपर अपरम्पार आशीष की वर्षा करता हूँ कि नहीं, यह सेनाओं के यहोवा का वचन है" (मलाकी 3:10)। ध्यान दें, यह चुनौती एक ऐसी जाति को दी जा रही है जिसने वाचा तोड़ी थी। परमेश्वर उनका पैसा नहीं माँग रहे; वे उनका भरोसा माँग रहे हैं। और "भण्डार में भोजनवस्तु रहे" का अर्थ है कि सेवकों और ज़रूरतमंदों की मेज़ ख़ाली न रहे। दशमांश कभी भी परमेश्वर की ज़रूरत नहीं था, वह परमेश्वर के लोगों की देखभाल का साधन था।

चार सौ साल की ख़ामोशी के बाद यीशु मसीह आते हैं, और वे दशमांश को रद्द नहीं करते, उसे उसकी सही जगह पर रख देते हैं। "हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवाँ अंश देते हो, परन्तु तुमने व्यवस्था की गम्भीर बातों अर्थात् न्याय और दया और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिए तो था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते" (मत्ती 23:23)। फरीसी रसोई के मसालों तक हिसाब रखते थे, पर उनका पड़ोसी भूखा मर सकता था। यीशु का फ़ैसला संतुलित है: दशमांश देना बुरा नहीं, अधूरा है। उन्होंने यह नहीं कहा कि दसवाँ अंश देना छोड़ दो; उन्होंने कहा कि दसवाँ अंश देकर यह मत सोचो कि परमेश्वर का हिसाब चुक गया।

यहीं हमारा दृष्टिकोण फिर सिर उठाता है। जब दशमांश "परमेश्वर का हिस्सा" बन जाता है, तो बाक़ी जीवन उनकी पहुँच से बाहर घोषित हो जाता है। फरीसियों की त्रासदी यही थी। उनका पैसा चढ़ा हुआ था और उनका हृदय बचा हुआ था।

सूत्र मसीह में अपनी चोटी पर पहुँचता है। इब्रानियों 7 में लेखक अब्राम और मलिकिसिदक की उस पुरानी घटना को उठाता है और दिखाता है कि मलिकिसिदक का पौरोहित्य लेवी के पौरोहित्य से बड़ा है, और यीशु मसीह उसी क्रम के महायाजक हैं। यानी उत्पत्ति 14 का वह दशमांश एक छाया था, और छाया अब शरीर पा चुकी है। हमारे पास एक ऐसा याजक है जिसे हमारी भेंट की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उसने स्वयं को दे दिया।

और यही नए नियम के देने का इंजन है। "क्योंकि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो, कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिये निर्धन बन गया, कि उसके निर्धन हो जाने से तुम धनी हो जाओ" (2 कुरिन्थियों 8:9)। जो धनी था, उसने दस प्रतिशत नहीं दिया। उसने सब दिया।

प्रेरितों की कलीसिया में इसका असर दिखता है। कोई दशमांश की दर तय करता नहीं दिखता, मगर लोग खेत और घर बेचकर ले आ रहे हैं और किसी को घटी नहीं होती (प्रेरितों के काम 4:34 और 35)। पौलुस कुरिन्थ की कलीसिया को सिखाता है कि हर सप्ताह के पहले दिन हर कोई अपनी आमदनी के अनुसार कुछ अलग रखे (1 कुरिन्थियों 16:2)। नियमितता बनी रही, माप हृदय पर छोड़ दिया गया।

और अंत में प्रकाशितवाक्य में जो चित्र खुलता है, वह देने की पूरी कहानी का अंत है: जातियाँ अपना तेज और अपना वैभव नए यरूशलेम में ले आती हैं (प्रकाशितवाक्य 21:24 से 26)। इतिहास का अंत ख़ाली हाथ नहीं, भरे हाथों से होता है। जो हमने यहाँ खोलकर रखा था, वहाँ मेम्ने के सिंहासन के आगे रखा जाएगा।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति यह है कि दशमांश एक कर है, और उसे चुकाने के बाद बाक़ी पैसा पूरी तरह मेरा है। लैव्यव्यवस्था 27:30 इस सोच की जड़ काट देता है, क्योंकि वहाँ आधार यह है कि भूमि और उसकी उपज यहोवा की है। भजन 24:1 भी कहता है कि पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, वह यहोवा का है। जब मैं दस प्रतिशत देकर सोचता हूँ कि हिसाब बराबर हो गया, तो मैंने परमेश्वर को एक लेनदार बना दिया और स्वयं को मालिक। सच इसका उलट है। मैं भण्डारी हूँ, और भण्डारी से यह नहीं पूछा जाता कि उसने मालिक को कितना दिया, बल्कि यह कि उसने मालिक की सम्पत्ति का क्या किया। इसलिए दशमांश शुरुआत है, अंत नहीं।

दूसरी भ्रांति है कि दशमांश पुराने नियम की बात है, अनुग्रह में इसकी कोई जगह नहीं। यह अधूरा सच है और इसलिए ख़तरनाक है। यह ठीक है कि नए नियम में कहीं विश्वासियों को दस प्रतिशत का आदेश नहीं दिया गया, और मसीह में हम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं। लेकिन अनुग्रह ने माँग घटाई नहीं, बढ़ाई है। जिस मन ने कलवरी देखी है, वह कैलकुलेटर से मोल-भाव नहीं करता। जो व्यक्ति अनुग्रह के नाम पर देना छोड़ देता है, उसने अनुग्रह समझा नहीं, उसे बहाना बना लिया। यीशु ने मत्ती 23:23 में दसवाँ अंश देने की सराहना की और साथ ही न्याय, दया और विश्वास की माँग की। अनुग्रह उस दस को मिटाता नहीं, उसे हृदय से भर देता है।

तीसरी भ्रांति सबसे लोकप्रिय और सबसे नुक़सानदेह है: देना एक निवेश है, जिसमें जितना डालो उतना कई गुना वापस आता है। लूका 6:38 को अक्सर इसी तरह इस्तेमाल किया जाता है: "दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा; लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।" पर इस वचन का संदर्भ पैसा नहीं है। इससे ठीक पहले यीशु दोष लगाने, क्षमा करने और शत्रुओं से प्रेम करने की बात कर रहे हैं। यह उदारता के उस पूरे स्वभाव की बात है जो परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है, और उसका प्रतिफल परमेश्वर के हाथ में है, हमारे बैंक विवरण में नहीं। परमेश्वर सचमुच उदार हैं और सचमुच जवाब देते हैं, पर वे कोई मशीन नहीं जिसमें सिक्का डालो और आशीष निकले। मलाकी 3:10 का वादा भी वाचा के संदर्भ में है, और वहाँ भी परमेश्वर की महिमा केन्द्र में है, हमारा मुनाफ़ा नहीं।

चौथी भ्रांति है कि देने का मूल्य रक़म से तय होता है। मरकुस 12 में यीशु मन्दिर के भण्डार के सामने बैठकर देखते हैं। धनी बड़ी रक़म डालते हैं, और एक कंगाल विधवा दो दमड़ियाँ डालती है, और यीशु कहते हैं कि उसने सबसे बढ़कर डाला, क्योंकि उसने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका दे दी। स्वर्ग का बहीखाता प्रतिशत नहीं, हृदय गिनता है। इसीलिए पौलुस लिखता है, "हर एक जन जैसा मन में ठाने, वैसा ही दान करे, न कुढ़ कुढ़ाकर, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है" (2 कुरिन्थियों 9:7)। तीन शब्द ध्यान दें: ठानकर, बिना कुढ़न, बिना दबाव। योजना से, ख़ुशी से, आज़ादी से।

आज इसे जीवन में उतारना

तो व्यवहार में यह कैसा दिखता है? सबसे पहले, तय कीजिए, टालिए नहीं। "जैसा मन में ठाने" का अर्थ है कि देना आख़िरी बचे पैसे का काम नहीं, पहले लिए गए निर्णय का काम है। महीने की शुरुआत में एक रक़म या प्रतिशत तय कर लीजिए और उसे उसी तरह अलग रखिए जैसे आप ईएमआई के लिए रखते हैं। नीतिवचन 3:9 और 10 का "पहले फल" इसी क्रम की बात करता है। जो बाद में बचता है उससे हम शायद परमेश्वर की प्रतिष्ठा कर लें, पर जो पहले अलग होता है वह हमारे भरोसे की घोषणा करता है।

दूसरा, अगर आप शुरुआत कर रहे हैं और डर लग रहा है, तो दस प्रतिशत को पहाड़ मत बनाइए। किसी ईमानदार अंक से शुरू कीजिए, चाहे वह दो प्रतिशत हो, और हर साल उसे बढ़ाइए। जो व्यक्ति कुढ़ते हुए दस देता है, उससे परमेश्वर उतने प्रसन्न नहीं जितने उस व्यक्ति से जो हर्ष से तीन देता है और आगे बढ़ने की ठान लेता है। और जिन्हें परमेश्वर ने अधिक सौंपा है, उनके लिए दस प्रतिशत सम्भवतः एक न्यूनतम है, न कि लक्ष्य।

तीसरा, किसे दें, यह सोच-समझकर तय कीजिए। मलाकी में भण्डार का उद्देश्य था कि परमेश्वर के भवन में भोजनवस्तु रहे, यानी सेवकों और ज़रूरतमंदों का पोषण हो। इसलिए पहली ज़िम्मेदारी उस स्थानीय कलीसिया की है जहाँ आपको वचन सिखाया जाता है, जहाँ आपके बच्चों की देखभाल होती है, जहाँ आपके बीमार पड़ने पर कोई प्रार्थना करने आता है। उसके साथ अनाथों, विधवाओं, प्रवासी मज़दूरों और अकेली माँओं के लिए भी हाथ खुला रखिए, क्योंकि व्यवस्थाविवरण का तीसरे वर्ष का दशमांश ठीक इन्हीं के लिए था।

चौथा, कर्ज़ और परिवार के बारे में ईमानदार रहिए। देना ज़िम्मेदारी से भागने का नाम नहीं है। अगर आप पर भारी कर्ज़ है, तो जीवनसाथी के साथ बैठिए, एक बजट बनाइए, कर्ज़ घटाने की योजना बनाइए, और साथ ही नियमित रूप से कुछ देना जारी रखिए ताकि पैसा आपके हृदय का मालिक न बन जाए। किसी सेवक के दबाव में क़र्ज़ लेकर भेंट देना बाइबल का सिद्धांत नहीं, बल्कि 2 कुरिन्थियों 9:7 का उल्लंघन है, क्योंकि वहाँ स्पष्ट लिखा है "न दबाव से"।

देना पैसे की नहीं, भरोसे की परीक्षा है।

दर्पण

अब मैं सीधे आपसे बात करना चाहता हूँ, क्योंकि यह विषय आँकड़ों का नहीं, आपके और मेरे हृदय का है।

आपकी जेब खोलने से पहले परमेश्वर आपका दर्पण खोलते हैं। ज़रा सोचिए, पिछली बार आपने जब यह सोचा कि "इस महीने नहीं हो पाएगा", तो उसी महीने और कहाँ पैसा गया? यह सवाल आपको शर्मिंदा करने के लिए नहीं है। यह सवाल इसलिए है कि हमारा बैंक विवरण हमारी सबसे सच्ची डायरी है। हम कहते हैं कि हम परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, पर हमारा ख़र्च अक्सर बताता है कि हम नौकरी पर, बचत पर या अपने हुनर पर भरोसा करते हैं। यीशु ने बिना घुमाए कहा था कि जहाँ हमारा धन है, वहीं हमारा मन भी होगा (मत्ती 6:21)।

और यहीं वह बात है जो चुभती भी है और छुड़ाती भी है: अगर दस प्रतिशत परमेश्वर का हिस्सा नहीं, बल्कि इस बात का चिन्ह है कि सब कुछ उनका है, तो यह विषय आपकी तनख़्वाह पर रुक नहीं सकता। आपका समय उनका है, इसलिए आपका थका हुआ रविवार भी सवाल के दायरे में है। आपका शरीर उनका है, इसलिए आपकी नींद और आपकी सेहत भी। आपका घर उनका है, इसलिए वह मेहमान भी जिसे आप बुलाने से कतराते हैं। आपकी नौकरी उनकी है, इसलिए वह ईमानदारी भी जिसे आप दफ़्तर में महँगी समझते हैं।

पर ठहरिए, क्योंकि यह ख़बर भारी नहीं है। जब सब कुछ उनका है, तो सब कुछ बचाने की ज़िम्मेदारी भी आपकी नहीं रही। जो आदमी अपने पैसे का मालिक होता है, वह हर मंदी में काँपता है। जो आदमी भण्डारी होता है, वह जानता है कि तिजोरी किसी और की है और उस किसी और के पास कमी नहीं। अगर आप आज अकेलेपन, कर्ज़ या डर के बीच खड़े हैं, तो दशमांश आपके ऊपर एक और बोझ नहीं। वह उन उँगलियों को खोलने का निमंत्रण है जिन्हें हमने ज़िंदगी भर मुट्ठी बनाना सिखाया है। और खुली हथेली ही एकमात्र ऐसी हथेली है जो कुछ पा भी सकती है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को दशमांश समझाना आसान है, बशर्ते हम इसे नियम की तरह न पढ़ाएँ। बच्चे "देना पड़ता है" से डरते हैं, पर "धन्यवाद देना" उन्हें बहुत अच्छा लगता है।

सबसे सरल तरीक़ा यह है कि उन्हें दस चीज़ों की एक ढेरी दिखाई जाए, चाहे दस टॉफ़ी हों या दस सिक्के। उनसे पूछिए कि ये सब कहाँ से आए। बात घूमकर वहीं पहुँचेगी: किसी ने दिए। फिर बताइए कि हमारे पास जो कुछ है, वह सब परमेश्वर से मिला है, और जब हम उनमें से एक उठाकर ख़ुशी से लौटाते हैं, तो हम कहते हैं, "धन्यवाद, मुझे याद है कि यह सब आपका है।" यह किराया नहीं, धन्यवाद है। अब्राम और मलिकिसिदक की कहानी यहाँ बहुत काम आती है, क्योंकि वहाँ अब्राम पहले आशीष पाता है और फिर देता है।

बड़े बच्चों के साथ आप मरकुस की उस विधवा की कहानी पढ़ सकते हैं जिसने दो दमड़ियाँ डाली थीं, और उनसे पूछ सकते हैं कि यीशु ने उसे सबसे बड़ा दान क्यों कहा। यह बातचीत उन्हें जीवनभर के लिए यह सिखा देती है कि परमेश्वर रक़म नहीं, हृदय गिनते हैं।

घर पर तीन डिब्बों की आदत डालना भी असरदार है: देने के लिए, बचाने के लिए, और ख़र्च करने के लिए। जो बच्चा दस साल की उम्र में अपनी पॉकेट मनी से देना सीख लेता है, वह तीस साल की उम्र में पैसे का दास बनने से बच जाता है।

अलग-अलग उम्र के लिए हमारे यहाँ अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह वर्ष), प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए (सात से बारह वर्ष), और किशोरों के लिए (बारह वर्ष से ऊपर)। हर उम्र के साथ भाषा बदलती है, पर सन्देश वही रहता है: हमारा परमेश्वर उदार हैं, और उदार लोग उन्हीं के जैसे दिखते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दशमांश का अर्थ क्या है?

दशमांश का शाब्दिक अर्थ है दसवाँ भाग, यानी आमदनी या उपज का दस प्रतिशत जो परमेश्वर के काम के लिए अलग किया जाता है। इब्रानी में इसे मासेर और यूनानी में देकाते कहा गया है। बाइबल में यह पहली बार उत्पत्ति 14:20 में दिखता है, जहाँ अब्राम मलिकिसिदक को सब वस्तुओं का दशमांश देता है। लैव्यव्यवस्था 27:30 इसे और गहरा करता है, क्योंकि वहाँ कहा गया है कि दशमांश यहोवा का ही है। यानी देना परमेश्वर को कुछ सौंपना नहीं, उनका अधिकार स्वीकार करना है।

क्या नए नियम में दशमांश देना अनिवार्य है?

नए नियम में कहीं भी विश्वासियों को दस प्रतिशत का आदेश स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया, और मसीही जन मूसा की व्यवस्था के अधीन नहीं हैं। लेकिन इससे यह नतीजा निकालना ग़लत होगा कि देना वैकल्पिक है। पौलुस नियमित, सोच-समझकर और हर्ष से देने की शिक्षा देता है (1 कुरिन्थियों 16:2 और 2 कुरिन्थियों 9:7), और यीशु ने मत्ती 23:23 में दसवाँ अंश देने की निंदा नहीं की। दस प्रतिशत को एक अच्छा, बाइबल आधारित शुरुआती मानक समझिए, न कि वह रेखा जिसके बाद हिसाब पूरा हो जाता है।

दशमांश कुल आमदनी पर दें या टैक्स कटने के बाद की आमदनी पर?

बाइबल इस सवाल का सीधा उत्तर नहीं देती, और यही अपने आप में एक संकेत है कि परमेश्वर हमसे हिसाब की बारीकियों से ज़्यादा हृदय की ईमानदारी चाहते हैं। "पहले फल" का सिद्धांत कहता है कि जो हमें मिलता है, उसमें से पहला हिस्सा अलग रखा जाए, इसलिए बहुत से विश्वासी कुल आमदनी पर देना चुनते हैं। जो लोग व्यापार करते हैं, वे अक्सर शुद्ध लाभ पर हिसाब लगाते हैं। तय कीजिए, लिख लीजिए, और उस निर्णय पर टिके रहिए, क्योंकि टालमटोल आम तौर पर गणित की समस्या नहीं होती।

दशमांश किसे देना चाहिए, कलीसिया को या ग़रीबों को?

मलाकी 3:10 में दशमांश भण्डार में लाया जाता था ताकि परमेश्वर के भवन में भोजनवस्तु रहे, यानी सेवा करने वालों का पोषण हो। इसलिए प्राथमिक ज़िम्मेदारी उस स्थानीय कलीसिया की है जहाँ आप वचन सुनते हैं और देखभाल पाते हैं। साथ ही व्यवस्थाविवरण 14:28 और 29 दिखाता है कि दशमांश का एक हिस्सा अनाथ, विधवा और परदेशी के लिए भी था। सन्तुलन यही है: कलीसिया की सेवा को नियमित रूप से सहारा दीजिए, और ज़रूरतमंदों के लिए हाथ अलग से खुला रखिए।

क्या दशमांश न देना पाप है?

इस सवाल का उत्तर सावधानी माँगता है। नए नियम में दस प्रतिशत का कोई कानून नहीं है, इसलिए किसी विश्वासी पर यह कहकर अपराध-बोध लादना ठीक नहीं कि उसने कोई नियम तोड़ दिया। लेकिन जानबूझकर कंजूसी, परमेश्वर के काम के प्रति उदासीनता और ज़रूरतमंद भाई की अनदेखी को बाइबल हल्के में नहीं लेती (1 यूहन्ना 3:17)। असली सवाल "मैंने नियम तोड़ा या नहीं" नहीं, बल्कि "मेरा पैसा किसकी सेवा कर रहा है" है। यहीं से पश्चाताप और आज़ादी दोनों शुरू होते हैं।

मलाकी 3:10 में आशीष का वादा आज भी लागू होता है?

मलाकी का वचन इस्राएल को वाचा के संदर्भ में दिया गया था, जहाँ भूमि, फ़सल और वर्षा वाचा की आशीष का हिस्सा थे। इसलिए इसे आज एक आर्थिक गारंटी की तरह पढ़ना ग़लत होगा, जैसे कि देने से मुनाफ़ा निश्चित हो जाता है। परमेश्वर का चरित्र नहीं बदला, वे आज भी उदार हैं और अपने लोगों की सुधि लेते हैं, पर उनकी आशीष केवल रुपये में नहीं आती। कभी वह शान्ति, सन्तोष, बचा हुआ परिवार या सेवा का अवसर होती है। परमेश्वर की परीक्षा भरोसे से कीजिए, सौदेबाज़ी से नहीं।

दशमांश और भेंट में क्या अंतर है?

दशमांश एक तय अनुपात है, दसवाँ भाग, जो नियमित और अनुशासित होता है। भेंट या दान उसके ऊपर, किसी विशेष ज़रूरत या प्रेरणा के जवाब में दिया जाता है, जैसे किसी मिशनरी के लिए, किसी आपदा में या किसी बीमार परिवार की सहायता के लिए। पुराने नियम में स्वेच्छा-बलि दशमांश से अलग गिनी जाती थी। सरल शब्दों में, दशमांश आपके अनुशासन को आकार देता है और भेंट आपके हृदय की स्वतंत्रता को अभिव्यक्त करती है। दोनों एक ही जड़ से निकलते हैं: सब कुछ परमेश्वर का है।

अगर मैं कर्ज़ में हूँ तो क्या दशमांश दूँ?

कर्ज़ चुकाना बाइबल के अनुसार एक नैतिक ज़िम्मेदारी है, और उसे टालकर भेंट देना आत्मिकता नहीं है। पर कर्ज़ के कारण देना पूरी तरह रोक देना भी ख़तरनाक है, क्योंकि तब पैसा हमारे जीवन का केन्द्र बन जाता है। एक संतुलित रास्ता यह है कि जीवनसाथी के साथ मिलकर एक स्पष्ट बजट बनाइए, कर्ज़ घटाने की योजना चलाइए, और छोटी पर नियमित रक़म देते रहिए। कभी किसी दबाव में क़र्ज़ लेकर भेंट न दीजिए, क्योंकि 2 कुरिन्थियों 9:7 साफ़ कहता है "न दबाव से"।

क्या यीशु ने दशमांश के बारे में कुछ कहा था?

हाँ, और उनका शब्द बहुत सन्तुलित है। मत्ती 23:23 में वे फरीसियों को डाँटते हैं क्योंकि वे पोदीने, सौंफ और जीरे तक का दसवाँ अंश गिनते थे पर न्याय, दया और विश्वास को छोड़ बैठे थे। यीशु ने उन्हें दसवाँ अंश देना बंद करने के लिए नहीं कहा, बल्कि यह कहा कि इन्हें भी करते और उन्हें भी न छोड़ते। इसके अलावा उन्होंने धनी युवक, कंगाल विधवा और ज़क्कई के ज़रिए बार-बार दिखाया कि परमेश्वर रक़म से नहीं, समर्पित हृदय से प्रभावित होते हैं।

क्या लूका 6:38 का अर्थ यह है कि देने से पैसा कई गुना वापस आता है?

लूका 6:38 एक सुन्दर वादा है, पर उसका संदर्भ पैसा नहीं है। उसके ठीक पहले यीशु दोष न लगाने, क्षमा करने और शत्रुओं से प्रेम करने की शिक्षा दे रहे हैं, इसलिए "दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा" पूरे उदार स्वभाव की बात करता है। परमेश्वर सच में उदारता का प्रतिफल देते हैं, पर वे इस बात के पाबंद नहीं कि हर रुपया कई गुना होकर उसी रूप में लौटे। इस वचन को निवेश योजना बनाना उसका अर्थ छोटा कर देना है।

पति-पत्नी में दशमांश कैसे दें, अलग-अलग या मिलाकर?

बाइबल विवाह को एक इकाई की तरह देखती है, इसलिए सबसे स्वस्थ तरीक़ा यह है कि पति और पत्नी साथ बैठकर एक साझा निर्णय लें, चाहे दोनों कमाते हों या एक। जब देना एक साथ तय किया जाता है, तो वह घर में कड़वाहट की जगह एकता बनाता है और बच्चे भी देखकर सीखते हैं। अगर जीवनसाथी विश्वासी नहीं है या असहमत है, तो झगड़े की जगह धैर्य और प्रार्थना चुनिए और अपने हिस्से से ईमानदारी से देना शुरू कीजिए। समय के साथ ख़ुशी से दिया गया दान अपनी गवाही स्वयं देता है।

दशमांश देना शुरू कैसे करूँ?

एक तारीख़ तय कीजिए और उसी महीने से शुरुआत कीजिए, क्योंकि "जब हालात सुधरेंगे तब" वाला दिन अपने आप कभी नहीं आता। पहले हिसाब लगाइए कि आपकी नियमित आमदनी क्या है, फिर एक अनुपात तय कीजिए जिसे आप हर्ष से निभा सकें, और उसे तनख़्वाह आने के दिन ही अलग रख दीजिए, अंत में नहीं। इसे लिख लीजिए और साल में एक बार दोबारा देखिए। नीतिवचन 3:9 और 10 का "पहले फल" इसी क्रम की माँग करता है, और यह क्रम ही हमारे भरोसे को आकार देता है।

अंत में

दशमांश की चर्चा अक्सर वहीं अटक जाती है जहाँ से उसे शुरू ही नहीं होना चाहिए था: प्रतिशत पर। पर उत्पत्ति से प्रकाशितवाक्य तक का सूत्र एक अलग बात कहता है। अब्राम ने आशीष पाने के बाद दिया। इस्राएल ने इसलिए दिया क्योंकि भूमि यहोवा की थी। मलाकी में परमेश्वर ने पैसा नहीं, भरोसा माँगा। यीशु ने दसवाँ अंश रद्द नहीं किया, उसे न्याय, दया और विश्वास से जोड़ दिया। और जब वह धनी होकर हमारे लिए निर्धन बन गया, तो देने की सारी गणित ख़त्म हो गई और कृतज्ञता शुरू हो गई।

इसलिए यह पृष्ठ आपसे एक नियम मनवाने नहीं आया। यह आपको एक स्वीकारोक्ति के लिए बुला रहा है: सब कुछ उनका है, और मैं उसका भण्डारी हूँ। जिस दिन यह बात हृदय में बैठ जाती है, उस दिन लिफ़ाफ़ा हल्का नहीं होता, मन हल्का हो जाता है।

आगे बढ़ने के लिए इस सप्ताह 2 कुरिन्थियों के आठवें और नौवें अध्याय धीरे-धीरे पढ़िए, और हर अनुच्छेद के बाद एक ही प्रश्न पूछिए: "प्रभु, मेरा पैसा किसकी सेवा कर रहा है?" और फिर उतना दीजिए जितना आप हर्ष से दे सकें, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखते हैं।

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अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर मलाकी 1:6

यदि मैं पिता हूँ, तो मेरा आदर कहाँ?" परमेश्वर याजकों से यह नहीं पूछ रहा कि बलिदान चढ़ाया या नहीं।…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर हाग्गै 1:9

तुम ने बहुत उपज की आशा रखी, परन्तु देखो थोड़ी ही है," यहोवा कहता है, और फिर कारण बताता है:…

प्रार्थना संपादकीय पर यिर्मयाह 40:1

पिता, जब मैं ज़ंजीरों में जकड़े लोगों के बीच खड़ा होता हूँ और लगता है कि तू मुझे भूल गया,…

धन्यवाद संपादकीय पर निर्गमन 17:7

पिता, धन्यवाद कि मस्सा और मरीबा में जब लोगों ने पूछा, "क्या यहोवा हमारे बीच है या नहीं?" तब भी…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर मत्ती 10:32

यीशु ने यह बात तब कही जब वे अपने चेलों को भेड़ियों के बीच भेजे जा रहे थे। यानी "मान…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर व्यवस्थाविवरण 25:12

तब तू उस स्त्री का हाथ काट डालना; उस पर तरस न खाना।" कठोर लगता है। पर सोचो, वह स्त्री…

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