प्रभु भोज क्या है: बाइबल के अनुसार अर्थ और महत्व
परिचय
एक छोटी सी थाली में टूटी हुई रोटी के कुछ टुकड़े, और एक कटोरे में लाल रस। कलीसिया में गीत धीमा हो जाता है, लोग शांत हो जाते हैं, और कोई पंक्ति दर पंक्ति आगे बढ़ता है। और उसी क्षण किसी के मन में एक कँपकँपाता सवाल उठता है: "क्या मैं इसे लेने के लायक हूँ? इस हफ़्ते तो मेरा मन साफ़ नहीं रहा। कहीं मैं दोष में न पड़ जाऊँ।" कोई और सोचता है: "यह तो हर महीने की एक रस्म है, इससे होता क्या है?"
दोनों सवाल ईमानदार हैं, और दोनों एक ही ग़लतफ़हमी से निकलते हैं कि मेज़ पर जो रखा है वह हमारी योग्यता की परीक्षा है। बाइबल कुछ और कहती है। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि प्रभु भोज कहाँ से शुरू होता है, मिस्र की उस रात से लेकर मेम्ने के विवाह भोज तक यह सूत्र कैसे चलता है, कौन सी ग़लतफ़हमियाँ हमें मेज़ से दूर रखती हैं, और यह छोटा सा भोजन आपके सोमवार की सुबह को कैसे बदल सकता है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
इस मार्गदर्शिका का एक ही केंद्रबिंदु है: प्रभु भोज योग्य लोगों को दिया गया पुरस्कार नहीं, भूखों के लिए बिछाई गई वाचा की मेज़ है। मिस्र में लहू इसराइल की अच्छाई के कारण नहीं, बल्कि मेम्ने की मृत्यु के कारण बचाता था। ऊपरी कोठरी में रोटी उस हाथ में थी जो जानता था कि मेज़ पर बैठा एक चेला उसे पकड़वाएगा और दूसरा उसका इनकार करेगा, और फिर भी उसने रोटी तोड़कर बाँटी। इसलिए हम इस विषय को "मैं कितना पवित्र हूँ" के कोण से नहीं, बल्कि "मेज़बान कौन है" के कोण से देखेंगे। यह फ़र्क डर और आनंद का फ़र्क है।
बाइबल प्रभु भोज के बारे में क्या कहती है?
प्रभु भोज वह भोजन है जिसे यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु से पहली रात अपने चेलों के साथ ठहराया, जिसमें टूटी हुई रोटी उनकी दी गई देह का और कटोरा उनके बहाए गए लहू का चिन्ह है, और जिसे कलीसिया उनके स्मरण में, उनकी उपस्थिति में और उनके लौट आने की आशा में बार बार लेती है।
यह परिभाषा हवा में नहीं टिकी है। मत्ती 26:26 में लिखा है: "जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष माँगकर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, 'लो, खाओ; यह मेरी देह है।'" ध्यान दीजिए कि यह किसी मंदिर के गर्भगृह में नहीं हो रहा है, बल्कि खाने की मेज़ पर हो रहा है, "जब वे खा रहे थे।" परमेश्वर ने अपने अनुग्रह का सबसे गहरा चिन्ह रोज़मर्रा की रोटी में रखा। जिस चीज़ को हर ग़रीब घर में भी तोड़ा जाता है, उसी को प्रभु ने अपनी देह का चिन्ह बना दिया।
लूका इसमें एक शब्द और जोड़ते हैं जो सब कुछ खोल देता है। लूका 22:19 कहता है: "फिर उसने रोटी ली, और धन्यवाद करके तोड़ी, और उन्हें देकर कहा, 'यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये दी जाती है; मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।'" "तुम्हारे लिये दी जाती है।" यह वाक्य प्रभु भोज को केवल एक स्मारक से बदलकर एक प्रतिस्थापन की घोषणा बना देता है। देह किसी और के लिए दी गई; लाभ किसी और को मिला। और वह "कोई और" वे लोग थे जो कुछ घंटों में भाग जाने वाले थे।
पौलुस ने जब कुरिन्थ की कलीसिया को यही परंपरा दोहराई, तो उन्होंने 1 कुरिन्थियों 11:24 में लिखा: "और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा, 'यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है; मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।'" यहाँ "स्मरण" का अर्थ केवल दिमाग़ी याद नहीं है। इब्रानी सोच में स्मरण का मतलब है किसी घटना को इतना जीवित करके सामने रखना कि आज की मंडली उसमें शामिल हो जाए। जैसे फसह में हर पीढ़ी कहती थी कि परमेश्वर ने हमें मिस्र से निकाला, वैसे ही प्रभु भोज में हम कहते हैं कि मसीह की देह मेरे लिए तोड़ी गई।
और यह केवल याद नहीं, सहभागिता भी है। 1 कुरिन्थियों 10:16 पूछता है: "वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या वह मसीह के लोहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह की देह की सहभागिता नहीं?" पौलुस दो प्रश्नों में पूरी धर्मशिक्षा रख देते हैं। मेज़ खाली रस्म नहीं है; वहाँ जीवित मसीह के साथ और उनके लोगों के साथ वास्तविक भागीदारी होती है। पवित्र आत्मा के द्वारा विश्वास से खाने वाला व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता।
यूहन्ना अपने सुसमाचार में अंतिम भोज का विवरण नहीं देते, लेकिन कफ़रनहूम के आराधनालय में यीशु के वे शब्द दर्ज करते हैं जो प्रभु भोज की गहराई खोलते हैं। यूहन्ना 6:53 में वे कहते हैं: "मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ, और उसका लोहू न पीओ, तुम में जीवन नहीं है।" यह वाक्य उस दिन सुनने वालों को चौंका गया और आज भी चौंकाता है। यीशु यहाँ नरभक्षण की बात नहीं कर रहे, बल्कि यह कह रहे हैं कि उनके साथ हमारा रिश्ता ऊपरी सहमति का नहीं, भोजन जैसा भीतरी और जीवनदायी होना चाहिए। जैसे रोटी बाहर रखी रहकर किसी का पेट नहीं भरती, वैसे ही मसीह को केवल सराहने से कोई नहीं जीता; उन्हें ग्रहण करना पड़ता है।
इन पदों को एक साथ रखिए तो चार बातें उभरती हैं। प्रभु भोज पीछे देखता है, क्रूस की ओर। यह ऊपर देखता है, जीवित प्रभु की ओर। यह चारों ओर देखता है, उस देह की ओर जिसे मसीह ने एक किया। और यह आगे देखता है, क्योंकि 1 कुरिन्थियों 11:26 कहता है कि "जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते रहते हो।"
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यह सूत्र बहुत पहले शुरू होता है। मनुष्य का पतन एक भोजन पर हुआ; एक फल लिया गया जो नहीं लेना था। उसके बाद से पूरी बाइबल में परमेश्वर बार बार अपने लोगों को मेज़ पर बुलाते हैं। उत्पत्ति 14:18 में मलिकिसिदक अब्राहम के लिए रोटी और दाखरस लेकर आता है, और वही मलिकिसिदक इब्रानियों की पत्री में मसीह के याजकपद का चित्र बनता है।
लेकिन असली नींव मिस्र की उस रात पड़ती है। निर्गमन 12:13 में परमेश्वर कहते हैं: "और वह लोहू तुम्हारे लिये उन घरों पर, जिन में तुम रहते हो, चिन्ह ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लोहू को देखकर तुम को छोड़ता जाऊँगा, और वह विपत्ति जिस से मैं मिस्रियों को मारूँगा तुम पर न पड़ेगी।" इस पद में हमारे दृष्टिकोण की जड़ है। परमेश्वर यह नहीं कहते, "मैं तुम्हारे विश्वास की मात्रा देखकर छोड़ता जाऊँगा," न "तुम्हारे चरित्र को देखकर।" वे कहते हैं, "मैं उस लोहू को देखकर।" घर के भीतर के लोग डरे हुए थे, जल्दी में थे, उनकी कमर बँधी थी और जूते पैरों में थे; उनकी योग्यता कहीं गिनी नहीं गई। दरवाज़े पर मेम्ने का लहू था, और वही पर्याप्त था। और उस रात उन्होंने केवल लहू लगाया ही नहीं, मेम्ने को खाया भी। बचाव और भोजन एक ही मेम्ने से आया।
फिर निर्गमन 24 में एक और दृश्य है, जहाँ वाचा लहू से बाँधी जाती है और इसराइल के पुरनिये पहाड़ पर परमेश्वर के सामने खाते और पीते हैं। वाचा और भोजन बाइबल में साथ साथ चलते हैं, क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों से केवल क़ानूनी अनुबंध नहीं करते, वे उनके साथ बैठकर खाते हैं। भजन 23:5 का "तू मेरे सामने मेज़ बिछाता है" इसी विचार की कविता है, और यशायाह 25:6 इसे भविष्य तक खींच देता है, जहाँ परमेश्वर सब जातियों के लिए पहाड़ पर चिकनी चिकनी वस्तुओं का भोज तैयार करते हैं।
यिर्मयाह 31:31 में परमेश्वर एक नई वाचा की प्रतिज्ञा करते हैं। सदियों तक इसराइल इंतज़ार करता रहा कि वह नई वाचा कब बाँधी जाएगी और किस लहू से। उत्तर ऊपरी कोठरी में आया। यीशु ने कटोरा उठाकर कहा कि यह नई वाचा का लहू है जो बहुतों के लिए बहाया जाता है। जिस रात वे यह कह रहे थे, वह फसह की रात थी। हज़ारों मेमने यरूशलेम में काटे जा रहे थे, और सच्चा मेम्ना मेज़ पर बैठा रोटी तोड़ रहा था। अगले दिन दोपहर वह मेम्ना बाहर, शहर के फाटक के बाहर, बलिदान हो गया।
फसह पूरा नहीं हुआ था; वह अपने मेम्ने की प्रतीक्षा कर रहा था।
पुनरुत्थान के बाद सूत्र आगे बढ़ता है। इम्माऊस के रास्ते पर दो निराश चेले यीशु को पहचान नहीं पाए, पर लूका 24 बताता है कि जब उन्होंने रोटी लेकर धन्यवाद किया और तोड़ी, तब उनकी आँखें खुल गईं। और आदि कलीसिया का जीवन प्रेरितों के काम 2:42 में यूँ बताया गया है कि वे शिक्षा, संगति, रोटी तोड़ने और प्रार्थना में लगे रहे। रोटी तोड़ना कोई सालाना समारोह नहीं था, यह कलीसिया की धड़कन थी।
और यह सूत्र इतिहास के आख़िरी पन्ने तक जाता है। प्रकाशितवाक्य 19:9 कहता है: "धन्य हैं वे, जो मेम्ने के ब्याह के भोज में बुलाए गए हैं।" जो कहानी एक निषिद्ध फल से बिगड़ी थी, वह एक विवाह भोज में पूरी होती है। आज की छोटी थाली उस बड़ी मेज़ की अग्रिम झलक है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति यह है कि प्रभु भोज उन लोगों के लिए है जिनका जीवन साफ़ हो चुका है। यह डर 1 कुरिन्थियों 11:27 के "अयोग्य रीति से" शब्दों से पैदा होता है, लेकिन पौलुस वहाँ अयोग्य व्यक्ति की बात नहीं, अयोग्य रीति की बात कर रहे हैं। कुरिन्थ में अमीर लोग पहले आकर खा पी लेते थे और मज़दूर भाई भूखे रह जाते थे। मसीह की देह की मेज़ पर वे मसीह की देह को अपमानित कर रहे थे। दोष उनके पापी होने में नहीं था, बल्कि पाप को मेज़ पर लाकर उसे सही ठहराने में था। अगर मेज़ पापरहित लोगों के लिए होती, तो उस पहली रात मेज़ खाली रहती; पतरस भी वहाँ था और यहूदा भी। मेज़ अस्पताल है, पुरस्कार वितरण समारोह नहीं।
दूसरी भ्रांति यह है कि यह "केवल एक प्रतीक" है, एक भावनात्मक याद जिसका कोई वास्तविक असर नहीं। 1 कुरिन्थियों 10:16 इस सोच को टूटने नहीं देता, क्योंकि पौलुस "सहभागिता" शब्द इस्तेमाल करते हैं। चिन्ह ख़ाली नहीं होता; वह उस वास्तविकता तक ले जाता है जिसकी वह ओर इशारा करता है। शादी की अंगूठी सोने का टुकड़ा है, पर उसे उतारकर फेंक देना कोई मामूली बात नहीं होती। जब विश्वास के साथ रोटी ली जाती है, तब पवित्र आत्मा हमारे मन को मसीह से पोषित करते हैं। यूहन्ना 6:53 का "मांस खाना और लोहू पीना" यही गहराई बताता है।
तीसरी भ्रांति उलटी दिशा में जाती है: कि रोटी और दाखरस अपने आप में जादुई शक्ति रखते हैं, और उन्हें खा लेना ही मुक्ति की गारंटी है। पर उसी अध्याय में यीशु स्पष्ट करते हैं कि आत्मा ही जीवनदाता है और उनके कहे वचन आत्मा और जीवन हैं। जो व्यक्ति विश्वास और पश्चाताप के बिना केवल पदार्थ ग्रहण करता है, उसे मसीह नहीं मिलते। इसराइल के जिन घरों में लहू लगा था, उन्हें दरवाज़े पर लगा लहू बचाता था, न कि दरवाज़े की लकड़ी।
चौथी भ्रांति यह है कि प्रभु भोज एक निजी, अकेला अनुभव है, जहाँ मैं आँख बंद करके अपने और परमेश्वर के बीच कुछ सुलझा लेता हूँ। पौलुस कहते हैं कि हम सब एक ही रोटी में सहभागी होकर एक देह हैं। इसलिए मत्ती 5:23 की बात यहाँ भी लागू होती है कि भेंट चढ़ाने से पहले भाई से मेल करो। जिस मेज़ पर आप बैठे हैं, उसी मेज़ पर वह व्यक्ति भी बैठा है जिससे आपने महीनों से बात नहीं की। पाँचवीं छोटी सी ग़लतफ़हमी यह है कि यह भोज केवल शोक का समय है। यह मृत्यु की घोषणा है, हाँ, लेकिन एक जीवित प्रभु की मृत्यु की, और घोषणा "जब तक वह न आए" तक चलती है। इसलिए इसमें आँसू भी हैं और उत्सव भी।
आज इसे जीवन में उतारना
सोचिए आप रविवार की सुबह देर से उठे, घर में झगड़ा हुआ, और आप कलीसिया में इस भावना से बैठे हैं कि आज मुझे पीछे बैठना चाहिए। जब थाली आगे बढ़े, तो अपने आप से यह न पूछिए कि "क्या मैं इस लायक हूँ?" पूछिए कि "क्या मुझे मसीह की ज़रूरत है?" यही सही सवाल है, और इसका उत्तर हमेशा हाँ है। हाथ बढ़ाकर लेना ही विश्वास की स्वीकारोक्ति है कि मेरे पास अपना कुछ नहीं, मुझे तोड़ी हुई देह चाहिए।
तैयारी का अर्थ अपने आप को योग्य बनाना नहीं, अपने आप को ईमानदारी से जाँचना है। शनिवार की रात या रविवार की सुबह दस मिनट बैठिए, अपने पापों को नाम लेकर परमेश्वर के सामने रखिए, और जहाँ किसी से मेल करना बाक़ी है वहाँ फ़ोन उठाइए। यह जाँच आपको मेज़ से दूर करने के लिए नहीं है; यह भूख जगाने के लिए है।
घर के स्तर पर इसका असर होता है। जिस दिन आप प्रभु भोज लेकर घर लौटें, उस दिन अपनी पत्नी या पति से कठोर बात करना बहुत मुश्किल हो जाएगा, अगर आपको याद हो कि आपने अभी अभी क्षमा की रोटी खाई है। जिस माँ को लगता है कि उसका पूरा जीवन कटकर बँट रहा है, बच्चों के लिए, थकान में, अनदेखे कामों में, वह इस मेज़ पर पहचान सकती है कि उसका प्रभु भी तोड़ा गया और बाँटा गया, और वह उससे परिचित है।
पैसे और वर्ग के मामले में यह मेज़ आज भी वैसी ही चुनौती है जैसी कुरिन्थ में थी। अगर हमारी कलीसिया में कोई इसलिए किनारे बैठता है कि उसके कपड़े साधारण हैं, उसकी जाति या पृष्ठभूमि अलग है, या उसकी अंग्रेज़ी नहीं चलती, तो हम एक ही रोटी की गवाही को झूठा कर रहे हैं। प्रभु भोज हमें व्यवहारिक रूप से मजबूर करता है कि हम उन्हीं लोगों के साथ बैठें जिन्हें मसीह ने अपनाया है।
और समय के मामले में यह मेज़ हमें साँस देती है। हम प्रदर्शन की दुनिया में जीते हैं जहाँ हर चीज़ कमानी पड़ती है। सप्ताह के बीच में कहीं यह याद कीजिए कि परमेश्वर के सामने आपकी जगह किसी उपलब्धि पर नहीं, बल्कि उस लहू पर टिकी है जिसे देखकर वे आपको छोड़ते जाते हैं। और अगर आप अकेले हैं, दूर देश में, बिना परिवार, तो प्रकाशितवाक्य 19:9 का भोज याद रखिए। जो अकेला खाता है, उसे भी एक दिन भरी हुई मेज़ पर बुलाया जाएगा।
दर्पण
अब सीधे आपसे। जब आपने पिछली बार रोटी ली थी, तो आपके मन में क्या चल रहा था? अगर ईमानदारी से देखें, तो हममें से बहुत लोग उस समय अपनी ही एक अदालत लगा लेते हैं, जिसमें हम एक ही समय पर वकील, गवाह और न्यायी बन जाते हैं। हम अपने हफ़्ते के पाप तौलते हैं, फ़ैसला सुनाते हैं, और फिर अपनी ही सज़ा भुगतते हुए रोटी लेते हैं। पर उस मेज़ पर न्यायी आप नहीं हैं। जो आपको बुला रहे हैं, वे वही हैं जो आपके लिए तोड़े गए।
और एक दूसरा सवाल, जो और चुभता है। क्या यह मेज़ आपकी ज़िंदगी में कुछ बदल रही है, या यह एक ऐसी रस्म बन गई है जिसे आप निपटा देते हैं? आप उसी मुँह से रोटी लेते हैं जिससे सोमवार को आप अपने दफ़्तर के सहकर्मी के बारे में ज़हर उगलते हैं। आप वही हाथ बढ़ाकर कटोरा लेते हैं जो घर में पैसों की गिनती में बेईमान है, या जो देर रात मोबाइल पर वह देखता है जिसे आप किसी को दिखा नहीं सकते। प्रभु भोज इन दोनों बातों को साथ रहने नहीं देता। वह हमें कहीं तो झुकाता है।
लेकिन इस दर्पण का काम आपको तोड़ना नहीं है। दर्पण दिखाता है कि चेहरा गंदा है, ताकि आप पानी की तरफ़ जाएँ, न कि दरवाज़ा बंद कर लें। यीशु ने उसी रात रोटी तोड़ी जब उन्हें पूरी तरह पता था कि यहूदा क्या करने जा रहा है और पतरस कितनी बार इनकार करेगा। उन्होंने उन दोनों को भी मेज़ पर बैठने दिया। यह आपके लिए भी सच है। आपकी सबसे बड़ी ज़रूरत अपने पापों को छिपाना नहीं, उन्हें उस मेज़ पर ले आना है जहाँ उनका दाम चुकाया गया।
तो अगली बार जब थाली आपके सामने आए, तो अपने हाथ की सफ़ाई मत देखिए। मेज़बान का चेहरा देखिए।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चे प्रभु भोज को बड़ी गंभीरता से देखते हैं, और अक्सर उनके सवाल सबसे साफ़ होते हैं: "यह लाल वाला क्या है?", "मुझे क्यों नहीं मिलता?", "क्या यह सच में यीशु का ख़ून है?" इन सवालों को टालने की ज़रूरत नहीं है; यही सीखने का सबसे अच्छा समय है।
छोटे बच्चों के लिए सबसे सरल तरीक़ा एक कहानी और एक चीज़ है। बताइए कि जब लोग किसी को बहुत प्यार करते हैं और उसे याद रखना चाहते हैं, तो वे एक ख़ास चीज़ रखते हैं, जैसे कोई तस्वीर या कोई तोहफ़ा। यीशु ने अपने दोस्तों को तस्वीर नहीं दी; उन्होंने रोटी दी और कहा कि जब भी तुम इसे खाओ, याद रखो कि मैंने तुम्हें कितना प्यार किया कि तुम्हारे लिए मैंने अपनी जान दे दी। रोटी बताती है कि उनका शरीर हमारे लिए दिया गया, और कटोरा बताता है कि उनका लहू हमारे पापों की माफ़ी के लिए बहाया गया। और यह भी बताइए कि यह जादू नहीं है, यह एक ख़ास याद और एक ख़ास मुलाक़ात है, जिसमें यीशु अपने परिवार के साथ बैठते हैं।
अगर आपका बच्चा पूछे कि उसे कब मिलेगा, तो शर्मिंदा किए बिना कहिए कि जब वह अपने मन से यीशु पर भरोसा करेगा और कलीसिया के साथ इस वाचा में जुड़ेगा, तब यह मेज़ उसकी भी होगी। यह इंतज़ार सज़ा नहीं, तैयारी है।
Faith.network पर इस विषय के लिए उम्र के अनुसार अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए बहुत सरल भाषा और चित्रों जैसी कहानी, सात से बारह साल के बच्चों के लिए फसह और क्रूस का जुड़ाव, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए वाचा, आत्मपरीक्षण और कलीसिया की सदस्यता जैसे गहरे सवाल। परिवार की आराधना में इन्हें साथ पढ़िए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रभु भोज क्या है और यह क्यों लिया जाता है?
प्रभु भोज वह पवित्र भोजन है जिसे यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु से पहली रात ठहराया, जिसमें रोटी उनकी दी गई देह का और कटोरा नई वाचा में बहाए गए उनके लहू का चिन्ह है। इसे इसलिए लिया जाता है क्योंकि प्रभु ने स्वयं आज्ञा दी: लूका 22:19 में वे कहते हैं, "मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।" यह क्रूस को याद करने, जीवित मसीह के साथ सहभागिता पाने, कलीसिया की एकता को व्यक्त करने और उनके लौट आने की आशा की घोषणा करने का साधन है।
प्रभु भोज और सहभागिता में क्या अंतर है?
व्यवहार में कोई अंतर नहीं है; ये एक ही चीज़ के अलग अलग नाम हैं, जो बाइबल के भिन्न पहलुओं को उभारते हैं। "प्रभु भोज" इस बात पर ज़ोर देता है कि मेज़बान प्रभु हैं और भोजन उनका है। "सहभागिता" शब्द 1 कुरिन्थियों 10:16 से आता है, जहाँ पौलुस पूछते हैं कि कटोरा और रोटी मसीह के लहू और देह की सहभागिता नहीं तो क्या हैं। कुछ कलीसियाएँ इसे "रोटी तोड़ना" कहती हैं, जो प्रेरितों के काम की भाषा है, और कुछ "धन्यवाद का भोज" कहती हैं।
क्या रोटी और दाखरस वास्तव में यीशु की देह और लहू बन जाते हैं?
इस प्रश्न पर मसीही परंपराओं में मतभेद रहा है, पर बाइबल का बल इस बात पर है कि चिन्ह वास्तविक मसीह तक ले जाता है, बिना अपनी प्रकृति बदलने के। जिस रात यीशु ने कहा "यह मेरी देह है," उनकी देह उनके सामने ही बैठी थी और रोटी उनके हाथ में थी, इसलिए वे चिन्ह की भाषा बोल रहे थे, जैसे उन्होंने अपने आप को द्वार और दाखलता भी कहा। पर यह ख़ाली प्रतीक भी नहीं है: विश्वास से खाने वाला व्यक्ति पवित्र आत्मा के द्वारा वास्तव में मसीह से पोषित होता है।
प्रभु भोज कितनी बार लेना चाहिए?
बाइबल कोई निश्चित संख्या नहीं बताती। 1 कुरिन्थियों 11:26 में पौलुस कहते हैं, "जब कभी तुम यह रोटी खाते," जिससे लगता है कि यह नियमित था, पर उसकी गिनती तय नहीं की गई। प्रेरितों के काम 2:42 और 20:7 से पता चलता है कि आदि कलीसिया प्रभु के दिन इकट्ठी होकर रोटी तोड़ती थी, संभवतः हर हफ़्ते। इसलिए हर कलीसिया स्वतंत्रता से निर्णय ले सकती है, बशर्ते यह इतनी दुर्लभ न हो जाए कि भूल जाए, और इतनी यंत्रवत न हो जाए कि बेअसर हो जाए।
क्या बपतिस्मा लिए बिना प्रभु भोज ले सकते हैं?
नए नियम का क्रम स्पष्ट है: पहले विश्वास और बपतिस्मा, फिर कलीसिया की संगति और रोटी तोड़ना, जैसा प्रेरितों के काम 2:41 और 2:42 में दिखता है। बपतिस्मा मसीह के साथ जुड़ने का सार्वजनिक चिन्ह है, और प्रभु भोज उस जुड़े हुए जीवन का पोषण है। इसलिए अधिकांश कलीसियाएँ बपतिस्मा प्राप्त विश्वासियों को मेज़ पर बुलाती हैं। यदि आप विश्वास कर चुके हैं पर बपतिस्मा नहीं लिया, तो इसे टालिए मत; अपनी कलीसिया के अगुवों से बात कीजिए।
बच्चे प्रभु भोज ले सकते हैं या नहीं?
कलीसियाओं में इस पर भिन्न प्रथाएँ हैं, पर मूल कसौटी उम्र नहीं, समझ और विश्वास है। 1 कुरिन्थियों 11:28 कहता है कि मनुष्य अपने आप को जाँचकर खाए, और यह जाँच एक ऐसे बच्चे से अपेक्षित नहीं की जा सकती जो अभी अर्थ ही न समझे। इसलिए जब बच्चा अपने पाप को पहचानकर मसीह पर व्यक्तिगत भरोसा रखता है, बपतिस्मा लेता है और मेज़ का अर्थ समझा सकता है, तब उसे शामिल करना उचित है। तब तक उसे शर्मिंदा किए बिना सिखाइए और आशीष दीजिए।
"अयोग्य रीति से" प्रभु भोज लेने का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 11:27 में पौलुस अयोग्य व्यक्तियों की बात नहीं, अयोग्य ढंग की बात कर रहे हैं। कुरिन्थ में धनी लोग पहले खा पी लेते थे और ग़रीब भाई भूखे रह जाते थे, इसलिए वे मसीह की देह को, अर्थात कलीसिया को, अपमानित करते हुए मेज़ पर आ रहे थे। अयोग्य रीति का अर्थ है बिना पश्चाताप, बिना विश्वास, बिना प्रेम और बिना मसीह की मृत्यु की गंभीरता को समझते हुए खाना। अपने पाप को स्वीकार करके आने वाला व्यक्ति कभी अयोग्य रीति से नहीं आता।
यूहन्ना 6:53 में मांस खाने और लहू पीने का क्या अर्थ है?
यीशु के शब्द हैं, "जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ, और उसका लोहू न पीओ, तुम में जीवन नहीं है।" वे यहाँ प्रभु भोज की विधि की नहीं, बल्कि उस विश्वास की बात कर रहे हैं जो मसीह को पूरी तरह ग्रहण करता है, जैसे भूखा आदमी रोटी को अपने भीतर ले लेता है। उसी अध्याय में वे कहते हैं कि जो उन पर विश्वास करता है वह अनन्त जीवन पाता है, और आत्मा ही जीवन देता है। यह पद हमें बताता है कि मसीह के साथ हमारा रिश्ता सतही सहमति नहीं, जीवनदायी निर्भरता है।
प्रभु भोज में दाखरस चाहिए या अंगूर का रस?
बाइबल में उस रात जो कटोरा उठाया गया वह फसह का दाखरस था, इसलिए इतिहास में कलीसिया ने दाखरस का प्रयोग किया। पर पद का बल पेय के प्रकार पर नहीं, उसके अर्थ पर है: वह मसीह के बहाए हुए लहू का चिन्ह है। जहाँ नशे की लत से जूझ रहे भाई बहन हैं, या जहाँ सांस्कृतिक कारणों से ठोकर लगती है, वहाँ अंगूर का रस लेना प्रेम का निर्णय है। मुख्य बात यह है कि मेज़ पर मसीह की मृत्यु की घोषणा साफ़ हो और कोई ठोकर न खाए।
क्या घर पर प्रभु भोज लिया जा सकता है?
आदि कलीसिया घरों में ही रोटी तोड़ती थी, इसलिए इमारत का सवाल नहीं है। पर 1 कुरिन्थियों 11 पूरी चर्चा को कलीसिया के "इकट्ठे होने" के संदर्भ में रखता है, क्योंकि यह भोजन देह की एकता को व्यक्त करता है। इसलिए यह अकेले, निजी रूप से लिया जाने वाला भोजन नहीं है। बीमार या बंदी विश्वासियों के लिए अगुवों की देखरेख में घर पर प्रभु भोज ठहराना उचित और सुंदर है, पर उसे कलीसिया से कटकर अपनी अलग परंपरा बना लेना बाइबल के ढंग से हटना है।
अगर किसी से मनमुटाव हो तो प्रभु भोज लेना चाहिए?
यह ठीक वही स्थिति है जिसे पौलुस कुरिन्थ में संबोधित करते हैं, और यीशु मत्ती 5:23 में कहते हैं कि भेंट चढ़ाने से पहले भाई से मेल कर लो। इसलिए सबसे अच्छा रास्ता यह है कि प्रभु भोज से पहले जो कदम आपके हाथ में है वह उठाइए: क्षमा माँगिए, संदेश भेजिए, कड़वाहट छोड़िए। यदि दूसरा पक्ष तैयार न हो, तो अपने हृदय में क्षमा करके मेज़ पर आइए। मनमुटाव आपको मेज़ से दूर करने का कारण नहीं, बल्कि मेल करने की पुकार है।
फसह और प्रभु भोज में क्या संबंध है?
प्रभु भोज फसह की गोद में जन्मा। निर्गमन 12:13 में परमेश्वर कहते हैं कि लहू देखकर वे छोड़ते जाएँगे, और यीशु ने उसी फसह की मेज़ पर रोटी और कटोरा लेकर अपने आप को वह सच्चा मेम्ना घोषित किया। पौलुस 1 कुरिन्थियों 5:7 में कहते हैं कि हमारा फसह का मेम्ना, मसीह, बलिदान हुआ है। जो फसह मिस्र से छुड़ाने का चिन्ह था, वह अब पाप और मृत्यु से छुड़ाने का चिन्ह बन गया। इसलिए प्रभु भोज लेना उस नई निर्गमन यात्रा में अपनी जगह पहचानना है।
क्या प्रभु भोज लेने से पाप क्षमा होते हैं?
क्षमा प्रभु भोज से नहीं, मसीह के उस बलिदान से मिलती है जिसकी ओर प्रभु भोज इशारा करता है, और वह हमें विश्वास के द्वारा अनुग्रह से मिलती है। रोटी और कटोरा उस क्षमा को हमारे सामने रखते हैं, हमारे विश्वास को मज़बूत करते हैं और हमें आश्वासन देते हैं कि जो कुछ मसीह ने किया वह हमारे लिए ही किया। इसलिए मेज़ पर आना क्षमा कमाना नहीं, बल्कि मिली हुई क्षमा को चखना है। 1 यूहन्ना 1:9 के अनुसार पाप मान लेने पर परमेश्वर विश्वासयोग्य होकर क्षमा करते हैं।
अंत में
एक बार फिर उसी थाली पर लौटिए, जिससे यह पृष्ठ शुरू हुआ था। उसमें जो रखा है, वह आपकी उपलब्धियों की सूची नहीं है। वह उस मेम्ने का चिन्ह है जिसका लहू देखकर परमेश्वर आपको छोड़ते जाते हैं, उस देह का चिन्ह जो "तुम्हारे लिये दी जाती है," और उस भोज का अग्रिम स्वाद जिसमें एक दिन हर जाति और हर भाषा के लोग बैठेंगे। इसलिए इस मेज़ के पास डरते हुए नहीं, भूखे होकर आइए।
अब आगे कहाँ जाएँ? निर्गमन 12 को धीरे धीरे पढ़िए और उस रात को अपने मन में बैठने दीजिए। फिर लूका 22 और 1 कुरिन्थियों 11 को साथ पढ़िए, यह देखते हुए कि पौलुस ने प्रभु से मिली परंपरा को कैसे सँभालकर आगे दिया। यूहन्ना 6 को एक बार पूरा पढ़िए, क्योंकि वही अध्याय सिखाता है कि मसीह को ग्रहण करने का अर्थ क्या है। और अगले रविवार जब कलीसिया इकट्ठी हो, तो पीछे न बैठिए। हाथ बढ़ाइए, रोटी लीजिए, और अपने भीतर यह कहिए कि यह मेरे लिए तोड़ी गई। जो मेज़बान बुला रहे हैं, वे किसी को लौटाते नहीं।
