जीवनसाथी कैसे चुनें: बाइबल के अनुसार सही साथी और रिश्ते का मार्गदर्शन
परिचय
रात के दो बजे हैं। मोबाइल की नीली रोशनी में एक लड़की किसी वैवाहिक वेबसाइट की चौथी प्रोफ़ाइल खोल चुकी है। बगल के कमरे में माँ की चिंता सो रही है, और उसके अपने मन में एक ही सवाल बार-बार लौट रहा है, "परमेश्वर, आप मुझे बता क्यों नहीं देते कि कौन सा व्यक्ति सही है?" कहीं दूसरे शहर में एक नौजवान अपने पास्टर से पूछने की हिम्मत जुटा रहा है कि जिस लड़की से वह प्रेम करता है, वह कलीसिया नहीं जाती, पर दिल अच्छा है, तो क्या यह चलेगा?
ये सवाल किताबी नहीं हैं। ये रिश्तेदारों की बातों, पारिवारिक दबाव, अकेलेपन और सच्ची भक्ति के बीच पिसते हुए दिलों के सवाल हैं। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि पवित्रशास्त्र जीवनसाथी के चुनाव को किस नज़र से देखता है, किन बातों पर वह चुप है, किन पर स्पष्ट है, और वह स्पष्टता आपके फैसले को डर से नहीं बल्कि विश्वास से भर सकती है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लेख इस विषय को "खोज" की तरह देखते हैं, मानो परमेश्वर ने आकाश में कहीं एक ही व्यक्ति छिपा रखा हो और आपका काम उसे ढूँढ़ निकालना हो। यह मार्गदर्शिका एक दूसरा रास्ता लेती है। बाइबल जीवनसाथी के चुनाव को गुप्त खज़ाने की तलाश नहीं, बल्कि एक वाचा में प्रवेश करने का निर्णय मानती है। परमेश्वर ने आपको एक नाम नहीं, एक ढाँचा दिया है: चरित्र, पवित्रता, विश्वास की एकता और आजीवन निष्ठा। इसलिए असली प्रश्न यह नहीं कि "क्या यही वह व्यक्ति है?" बल्कि यह कि "क्या हम दोनों इस वाचा को निभाने के लिए मसीह में तैयार हैं?"
विवाह खोज नहीं, वाचा है।
बाइबल जीवनसाथी चुनने के बारे में क्या कहती है?
पवित्रशास्त्र में कहीं भी जीवनसाथी चुनने की कोई चरणबद्ध विधि नहीं दी गई, और यह चुप्पी अपने आप में एक संदेश है। परमेश्वर हमें बच्चों की तरह हर कदम पर उँगली पकड़कर नहीं चलाते; वे हमें अपनी बुद्धि, अपना वचन, अपना आत्मा और अपनी कलीसिया देकर जिम्मेदार निर्णय लेने के लिए बड़ा करते हैं। फिर भी इस निर्णय के चारों ओर उन्होंने कुछ मज़बूत दीवारें खड़ी की हैं, और उन दीवारों के भीतर आश्चर्यजनक स्वतंत्रता है।
पहली दीवार है विश्वास की एकता। पौलुस विधवाओं के पुनर्विवाह के बारे में लिखते हुए एक सिद्धांत छोड़ जाते हैं जो हर विश्वासी पर लागू होता है। 1 कुरिन्थियों 7:39 कहता है, "जब तक किसी स्त्री का पति जीवित रहता है, तब तक वह उस से बन्धी हुई है, परन्तु जब उसका पति मर जाए, तो जिस से चाहे विवाह कर सकती है, परन्तु केवल प्रभु में।" इन दो हिस्सों को साथ पढ़िए: "जिस से चाहे" और "केवल प्रभु में"। यही बाइबल का संतुलन है। आपकी पसंद असली है, आपकी इच्छा का सम्मान है, पर उस पसंद की एक सीमा है, और वह सीमा है मसीह।
इसी बात को 2 कुरिन्थियों 6:14 और गहरा करता है: "अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो, क्योंकि धर्म और अधर्म का क्या मेल जोल? या ज्योति और अन्धकार का क्या सम्बन्ध?" यहाँ चित्र खेत का है, दो बैल एक ही जूए में जुते हुए। यदि दोनों की चाल, ताक़त और दिशा अलग हो, तो हल टेढ़ा चलेगा और दोनों के कंधे छिलेंगे। यह पद अविश्वासियों से घृणा नहीं सिखाता; यह जीवन की सबसे गहरी साझेदारी में दिशा की एकता माँगता है।
दूसरी दीवार है पवित्रता। 1 थिस्सलुनीकियों 4:3 सीधी बात कहता है, "क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो।" ध्यान दीजिए, लोग अक्सर पूछते हैं, "परमेश्वर की इच्छा क्या है?" और सोचते हैं कि उत्तर किसी व्यक्ति का नाम होगा। पर पवित्रशास्त्र स्वयं कहता है कि परमेश्वर की इच्छा आपकी पवित्रता है। जो रिश्ता आपको शुद्धता से दूर खींचता है, वह चाहे कितना ही "सही" लगे, वह परमेश्वर की प्रकट इच्छा के विरुद्ध चल रहा है।
तीसरी दीवार है चरित्र की परख। नीतिवचन 31:30 हमारी आँखों पर पट्टी खोलता है: "शोभा तो झूठी और सुन्दरता व्यर्थ है, परन्तु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है, उसी की प्रशंसा की जाएगी।" यह पद सुन्दरता को पाप नहीं कहता, वह उसे नींव कहने से मना करता है। रूप ढलता है, आमदनी बदलती है, स्वास्थ्य गिरता है; परमेश्वर का भय वह जड़ है जो सूखे में भी पानी खींचती है।
और चौथी बात: विवाह अपने आप में परमेश्वर का वरदान है, बोझ नहीं। नीतिवचन 18:22 घोषित करता है, "जिस ने स्त्री ब्याह ली, उसने उत्तम पदार्थ पाया, और यहोवा का अनुग्रह उस पर हुआ है।" यहाँ शब्द "पाया" है, जैसे कोई अनमोल चीज़ मिल गई हो। विवाह कोई सौदा या सामाजिक मजबूरी नहीं, वह अनुग्रह है, और अनुग्रह कमाया नहीं जाता, पाया जाता है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यह विषय उत्पत्ति के दूसरे अध्याय में ही शुरू हो जाता है। सृष्टि की हर चीज़ पर "अच्छा" कहने के बाद परमेश्वर पहली बार कहते हैं, "आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए" (उत्पत्ति 2:18)। साथी परमेश्वर का विचार है, मनुष्य की माँग नहीं। और फिर वह वाक्य आता है जिस पर सारा विवाह टिका है: "इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बनेंगे" (उत्पत्ति 2:24)। छोड़ना, मिले रहना, एक तन होना; यही वाचा का ढाँचा है, और यही कारण है कि चुनाव हल्के मन से नहीं किया जा सकता।
उत्पत्ति 24 में हमें पहली बार कोई जीवनसाथी के लिए प्रार्थना करता दिखाई देता है। इब्राहीम का सेवक मेसोपोटामिया के कुएँ पर खड़ा होकर कहता है, "हे मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर यहोवा, आज मेरे कार्य को सिद्ध कर, और मेरे स्वामी इब्राहीम पर करुणा कर" (उत्पत्ति 24:12)। यह प्रार्थना कितनी सुंदर है, और कितनी व्यावहारिक भी। वह सेवक घर बैठकर संकेत का इंतज़ार नहीं कर रहा था; वह यात्रा कर चुका था, सही जगह पहुँच चुका था, और वहाँ प्रार्थना कर रहा था। उसने जो लक्षण माँगा, वह भी दिलचस्प है: ऊँटों को पानी पिलाने की तत्परता, यानी परिश्रम और उदारता का चरित्र। प्रार्थना और परख साथ चलते हैं।
आगे की कहानियाँ चेतावनी भी देती हैं। याकूब ने राहेल को देखकर चुना और परिवार में वर्षों का तनाव भुगता। शिमशोन ने अपनी आँखों के पीछे चलकर अपनी बुलाहट खो दी। सुलैमान, जो सबसे बुद्धिमान था, उसका मन उसकी विदेशी पत्नियों ने परमेश्वर से फेर दिया (1 राजा 11:4)। दूसरी ओर रूत की कहानी है, जहाँ एक मोआबी विधवा और बोअज़ का रिश्ता भावनाओं पर नहीं, वाचा-विश्वासयोग्यता पर बनता है, और उसी से दाऊद और अंततः मसीह की वंशावली निकलती है।
भविष्यवक्ताओं के पास पहुँचते-पहुँचते विवाह एक रूपक बन जाता है। होशे को एक बेवफ़ा पत्नी से प्रेम करने को कहा जाता है, ताकि इस्राएल समझ सके कि परमेश्वर का प्रेम कैसा है। यशायाह कहता है कि तेरा कर्ता ही तेरा पति है। यानी विवाह कभी भी केवल दो लोगों का निजी मामला नहीं था; वह शुरू से परमेश्वर और उनकी प्रजा के रिश्ते की तस्वीर था।
नए नियम में प्रभु यीशु मसीह अपनी पहली सार्वजनिक निशानी एक विवाह में दिखाते हैं, और जब विवाह पर प्रश्न उठता है तो वे सीधे उत्पत्ति पर लौटते हैं: "इसलिये वे अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं: इस कारण जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे" (मत्ती 19:6)। पौलुस इफिसियों 5:25 में पर्दा पूरी तरह हटा देते हैं: "हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया।" और सब कुछ प्रकाशितवाक्य 19:7 में जाकर पूरा होता है: "आओ, हम आनन्दित और मगन हों, और उसकी स्तुति करें, क्योंकि मेम्ने का ब्याह आ पहुँचा: और उस की पत्नी ने अपने आप को तैयार कर लिया है।"
सूत्र साफ़ है। बाइबल बगीचे की एक शादी से शुरू होती है और स्वर्ग के विवाहभोज पर समाप्त होती है। आपका विवाह उस बड़ी वाचा की छोटी-सी छाया है, और इसीलिए जीवनसाथी चुनते समय आप केवल अपना सुख नहीं, मसीह और कलीसिया की तस्वीर चुन रहे हैं।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति यह है कि परमेश्वर ने हर व्यक्ति के लिए एक ही "ठहराया हुआ" साथी बनाया है, और यदि आप चूक गए तो आपका पूरा जीवन दूसरे दर्जे का हो जाएगा। यह सोच बहुतों को लकवा मार देती है; वे निर्णय ही नहीं ले पाते क्योंकि हर विकल्प में गलती का डर है। पर 1 कुरिन्थियों 7:39 कहता है "जिस से चाहे विवाह कर सकती है, परन्तु केवल प्रभु में"। परमेश्वर ने नाम नहीं, मापदंड दिया है। इसका अर्थ यह नहीं कि चुनाव मामूली है; इसका अर्थ यह है कि आपके पास बुद्धि से चुनने की सच्ची स्वतंत्रता है, और एक बार वाचा बाँध लेने पर वही व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा बन जाता है।
दूसरी भ्रांति है कि भावना ही परमेश्वर की आवाज़ है। "मेरा दिल कहता है, इसलिए यह परमेश्वर की ओर से है।" यिर्मयाह 17:9 इस भरोसे को हिला देता है: "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन जान सकता है?" आकर्षण परमेश्वर की देन है और विवाह में उसका स्थान है, पर आकर्षण गवाह है, न्यायाधीश नहीं। भजन संहिता 37:4 इसे ठीक करता है: "यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा।" ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है। पहले परमेश्वर में आनन्द, फिर इच्छाओं का पूरा होना; क्योंकि जब दिल परमेश्वर में आनन्दित होता है, तो उसकी इच्छाएँ स्वयं शुद्ध होने लगती हैं। यह पद इच्छा-पूर्ति की मशीन नहीं, मन की सर्जरी है।
तीसरी भ्रांति मिशनरी विवाह की है: "मैं उससे विवाह करके उसे मसीह तक ले आऊँगा।" नीयत नेक है, पर पवित्रशास्त्र इसे समर्थन नहीं देता। 2 कुरिन्थियों 6:14 का जूआ वाला चित्र और सुलैमान का उदाहरण बताते हैं कि गहरे रिश्तों में प्रायः कमज़ोर नहीं, बल्कि समझौता करने वाला खिंचता है। परमेश्वर अवश्य कभी-कभी ऐसे विवाहों में भी अनुग्रह करते हैं, पर अपवाद को नियम बनाकर कोई अपना जीवन नहीं बाँधता।
चौथी भ्रांति है कि बाहरी योग्यताएँ, रूप, वेतन, विदेश का वीज़ा, जाति, सब मिल जाएँ तो रिश्ता सुरक्षित है। नीतिवचन 31:30 इस भ्रम को तोड़ता है: "शोभा तो झूठी और सुन्दरता व्यर्थ है।" इसमें एक छिपी हुई पाँचवीं भ्रांति भी जुड़ी है, कि अविवाहित रहना अभिशाप है। पौलुस स्वयं अविवाहित थे और उन्होंने अविवाहित जीवन को वरदान कहा। विवाह अनुग्रह है, पर वह मुक्ति नहीं; आपकी पूर्णता किसी जीवनसाथी में नहीं, मसीह में है। जो व्यक्ति अकेलेपन के डर से विवाह करता है, वह अक्सर विवाह के भीतर और गहरा अकेलापन खोजता है।
आज इसे जीवन में उतारना
कल्पना कीजिए कि घर में एक रिश्ता आया है। परिवार खुश है, लड़का सरकारी नौकरी में है, पर कलीसिया से उसका कोई लेना-देना नहीं। यहाँ वाचा का दृष्टिकोण आपको ठोस प्रश्न देता है। पूछिए, "क्या यह व्यक्ति मेरे साथ घुटनों पर बैठ सकेगा? क्या हमारे बच्चे किसके पीछे चलेंगे, इस पर हमारा एक मन होगा? रविवार की सुबह हमारे घर में तनाव होगा या आराधना?" ये सवाल बेरुख़ी नहीं, समझदारी हैं। 2 कुरिन्थियों 6:14 को भावुक पल में नहीं, शांत मन में पढ़िए, और ईमानदारी से उत्तर दीजिए।
दूसरी स्थिति: आप किसी को पसंद करते हैं जो विश्वासी तो है, पर उसका चरित्र आपने केवल अच्छे दिनों में देखा है। इब्राहीम के सेवक की तरह व्यावहारिक बनिए। उसने ऊँटों को पानी पिलाने जैसा साधारण काम देखा, क्योंकि चरित्र छोटे कामों में दिखता है। देखिए कि वह व्यक्ति अपनी माँ से कैसे बोलता है, पैसे कैसे सँभालता है, गुस्से में क्या करता है, माफ़ी माँगना जानता है या नहीं, और कलीसिया में जवाबदेह है या अकेला चलता है। चरित्र वह है जो दबाव में बचा रहता है।
तीसरी स्थिति: रिश्ता आगे बढ़ रहा है और शारीरिक सीमाएँ धुँधली हो रही हैं। 1 थिस्सलुनीकियों 4:3 को अपनी सगाई का नियम बनाइए। अकेले कमरे में घंटों वीडियो कॉल, देर रात की मुलाक़ातें और "हम तो शादी ही करने वाले हैं" का तर्क, ये सब वाचा से पहले वाचा के अधिकार लेने की कोशिश है। शुद्धता आपके प्रेम की दुश्मन नहीं, उसकी सुरक्षा है।
और प्रार्थना को रस्म मत बनाइए। उत्पत्ति 24:12 की शैली सीखिए: परमेश्वर के चरित्र को याद कीजिए, फिर स्पष्ट रूप से माँगिए, फिर जाकर काम कीजिए। साथ ही अकेले निर्णय मत लीजिए। माता-पिता की सलाह, पास्टर की परख और दो-तीन परिपक्व विश्वासियों की राय परमेश्वर के मार्गदर्शन का साधारण पर शक्तिशाली माध्यम है। अंत में, स्वयं पर काम कीजिए। जिस तरह का साथी आप चाहते हैं, उस तरह का साथी बनने में अपना समय लगाइए; क्योंकि विवाह चरित्र बनाता नहीं, चरित्र उजागर करता है।
दर्पण
अब थोड़ी देर के लिए पवित्रशास्त्र को आईना बनने दीजिए। आप शायद वर्षों से प्रार्थना कर रहे हैं और आपका धैर्य घिस चुका है। हर शादी के निमंत्रण-पत्र पर आपका मन कसकता है, रिश्तेदारों के सवाल चुभते हैं, और रात को सन्नाटा आपसे कहता है कि परमेश्वर ने आपको भूल दिया। मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि आपका दर्द छोटा है। पर यह पूछूँगा: क्या आपने चुपचाप यह मान लिया है कि एक जीवनसाथी मिल जाने से आपका खालीपन भर जाएगा? यदि हाँ, तो आप एक इंसान के कंधों पर वह बोझ रख रहे हैं जिसे केवल क्रूस उठा सकता है।
या शायद आपकी स्थिति उलटी है। आप जानते हैं कि जिस व्यक्ति से आप जुड़े हैं, वह आपको परमेश्वर से दूर खींच रहा है। आप यह बात अपने आप से भी छिपा रहे हैं, पास्टर से बचकर निकल रहे हैं, और अपने आप को समझा रहे हैं कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। ईमानदारी से पूछिए: पिछले छह महीनों में आपकी प्रार्थना, आपकी शुद्धता और आपकी आराधना बढ़ी है या घटी?
कुछ पाठक इससे भी अलग जगह पर खड़े होंगे। आपने पहले ही निर्णय ले लिया है, शायद गलत भी, और अब अपराधबोध आपकी छाती पर बैठा है। सुनिए: मसीह का अनुग्रह आपके अतीत से बड़ा है। वे टूटी वाचाओं के बीच से ही अपनी कहानी लिखते आए हैं, राहाब से लेकर रूत तक। आपकी आज्ञाकारिता आज से शुरू हो सकती है, वहीं से जहाँ आप हैं।
और जो विवाहित हैं, उनके लिए एक शब्द: सही साथी चुनने का सवाल अब पीछे छूट चुका है। अब सवाल यह है कि क्या आप रोज़ उसी को फिर से चुन रहे हैं, थकान में, बीमारी में, पैसों की तंगी में, बच्चों के शोर में। वाचा इसी तरह जीवित रहती है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चे विवाह के बारे में हमसे कहीं ज़्यादा सोचते हैं जितना हम मानते हैं। वे शादियों में जाते हैं, घर में माता-पिता का रिश्ता देखते हैं, और टीवी और मोबाइल से प्रेम की बहुत उलझी हुई तस्वीरें उठा लेते हैं। इसलिए उनसे बात करने से पहले उस तस्वीर को सीधा करना ज़रूरी है।
छोटे बच्चों से सरल भाषा में इतना कहा जा सकता है: परमेश्वर ने परिवार बनाया क्योंकि वे चाहते हैं कि कोई अकेला न रहे। जब दो लोग शादी करते हैं, तो वे परमेश्वर के सामने एक वादा करते हैं कि वे हमेशा साथ रहेंगे और एक-दूसरे का ध्यान रखेंगे, जैसे प्रभु यीशु अपने लोगों से हमेशा प्रेम करते हैं और उन्हें कभी नहीं छोड़ते। बड़े बच्चों से यह भी कहा जा सकता है कि अच्छा साथी वह नहीं जो सबसे सुन्दर या सबसे अमीर हो, बल्कि वह जो परमेश्वर से प्रेम करता हो और सच बोलता हो, और इसीलिए नीतिवचन 31:30 कहता है कि सुन्दरता व्यर्थ है पर परमेश्वर का भय मानने वाले की प्रशंसा होती है।
किशोरों के साथ बातचीत और गहरी होनी चाहिए, क्योंकि वहाँ आकर्षण, दोस्ती, मोबाइल और दबाव सब एक साथ आते हैं। उनसे डर की नहीं, गरिमा की भाषा में बात कीजिए।
इस विषय पर हमारे पास अलग-अलग आयु के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों के लिए तीन से छह वर्ष, स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए सात से बारह वर्ष, और किशोरों के लिए बारह वर्ष से ऊपर। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार उपयुक्त व्याख्या चुनिए और बातचीत को एक ही बार की "बड़ी बात" न बनाकर कई छोटे, सहज संवादों में बाँटिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाइबल के अनुसार जीवनसाथी कैसे चुनें?
बाइबल कोई नाम नहीं बताती, वह मापदंड देती है: साथी विश्वास में एक हो, जैसा 1 कुरिन्थियों 7:39 कहता है, "केवल प्रभु में", उसका चरित्र परमेश्वर के भय से बना हो, जैसा नीतिवचन 31:30 सिखाता है, और सारा रिश्ता पवित्रता में चले, जैसा 1 थिस्सलुनीकियों 4:3 माँगता है। इन सीमाओं के भीतर आप प्रार्थना, परिपक्व लोगों की सलाह और समझदारी से स्वतंत्र होकर चुन सकते हैं। परमेश्वर आपसे अंधेरे में तुक्का लगवाना नहीं चाहते, वे आपको बुद्धि से चलना सिखाना चाहते हैं।
क्या किसी अविश्वासी से विवाह करना पाप है?
2 कुरिन्थियों 6:14 स्पष्ट चेतावनी देता है, "अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो", और 1 कुरिन्थियों 7:39 विवाह को "केवल प्रभु में" सीमित करता है, इसलिए जानबूझकर अविश्वासी से विवाह करना परमेश्वर की प्रकट इच्छा के विरुद्ध चलना है। यह आपके जीवन के सबसे गहरे हिस्से, आराधना और दिशा, को स्थायी रूप से बाँट देता है। यदि आपने विश्वास में आने से पहले ही विवाह कर लिया है, तो यह बात अलग है; 1 कुरिन्थियों 7 में पौलुस ऐसे विश्वासी को अपने साथी के साथ विश्वासयोग्य बने रहने और पवित्र जीवन से गवाही देने को कहते हैं।
परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए क्या मुझे कोई चिह्न माँगना चाहिए?
इब्राहीम के सेवक ने उत्पत्ति 24:12 में प्रार्थना की और एक लक्षण भी माँगा, पर ध्यान दीजिए कि उसने जो माँगा वह जादुई संकेत नहीं, चरित्र का प्रमाण था, यानी परिश्रम और उदारता। नए नियम में हमें पवित्र आत्मा, पूरा लिखित वचन और कलीसिया की संगति मिली है, इसलिए हमारा मार्गदर्शन मुख्यतः वचन, प्रार्थना, विवेक और परिपक्व सलाह से आता है। चिह्न माँगने की बजाय चरित्र जाँचिए; परमेश्वर आम तौर पर स्वप्न से नहीं, समझ को पवित्र करके चलाते हैं।
क्या बाइबल में "आत्मीय साथी" यानी एक ही बना-बनाया जोड़ा जैसा कुछ है?
पवित्रशास्त्र कहीं नहीं कहता कि हर व्यक्ति के लिए केवल एक ही संभावित साथी है जिसे ढूँढ़ना अनिवार्य है। 1 कुरिन्थियों 7:39 का "जिस से चाहे" इस विचार को खोल देता है। हाँ, जब आप वाचा बाँध लेते हैं, तो वही व्यक्ति आपके लिए परमेश्वर का ठहराया हुआ साथी बन जाता है, और उसके प्रति निष्ठा अब आज्ञा है, विकल्प नहीं। इसलिए दबाव इस बात का नहीं कि "सही व्यक्ति कौन है", बल्कि इस बात का है कि आप सही आधार पर चुनें और फिर जीवन भर निभाएँ।
माता-पिता की पसंद और मेरी पसंद में टकराव हो तो क्या करूँ?
बाइबल माता-पिता के आदर को बहुत ऊँचा स्थान देती है और सलाह की बहुलता को बुद्धि कहती है, इसलिए उनकी बात को हल्के में खारिज करना ठीक नहीं; अक्सर वे वह देख लेते हैं जो प्रेम में डूबी आँखें नहीं देखतीं। पर उत्पत्ति 2:24 का "छोड़कर" यह भी बताता है कि विवाह एक नया घर बनाता है, इसलिए माता-पिता की इच्छा भी परमेश्वर के वचन से ऊपर नहीं हो सकती। धैर्य, आदर, खुली बातचीत और कलीसिया के अगुवों की मध्यस्थता से अधिकतर टकराव सुलझ जाते हैं।
क्या जाति, भाषा या समाज देखकर विवाह करना बाइबल के अनुसार सही है?
नए नियम में कलीसिया की नींव ही यह है कि मसीह में यहूदी और अन्यजाति, दास और स्वतंत्र, सब एक हैं, इसलिए जाति या भाषा को आत्मिक मापदंड बनाना सुसमाचार के विरुद्ध है। बाइबल ने इस्राएल को जिन विवाहों से मना किया था, उसका कारण नस्ल नहीं बल्कि मूर्तिपूजा थी, जैसा सुलैमान के जीवन में दिखा। व्यावहारिक रूप से भाषा और संस्कृति की समानता तालमेल आसान बना सकती है, पर वह कभी भी विश्वास और चरित्र की जगह नहीं ले सकती।
विवाह से पहले शारीरिक संबंध के बारे में बाइबल क्या कहती है?
1 थिस्सलुनीकियों 4:3 सीधा उत्तर देता है, "परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो।" शारीरिक एकता वाचा की मुहर है, उसका परीक्षण नहीं, क्योंकि उत्पत्ति 2:24 में "एक तन" होना "मिले रहने" के बाद आता है। इसलिए सगाई भी उस सीमा को नहीं खोलती। यदि इस क्षेत्र में आप पहले ही गिर चुके हैं, तो मसीह में सच्चा पश्चाताप पूरी क्षमा लाता है; अनुग्रह आपको शर्म में छोड़ता नहीं, वह आपको नई शुरुआत देता है।
क्या तलाकशुदा व्यक्ति से विवाह किया जा सकता है?
यह प्रश्न संवेदनशील है और हर मामला अलग है, इसलिए इसे अकेले नहीं, अपनी कलीसिया के अगुवों के साथ मिलकर देखना चाहिए। प्रभु यीशु मत्ती 19 में विवाह की स्थायित्व पर ज़ोर देते हैं और सीमित परिस्थितियों की बात करते हैं, और पौलुस 1 कुरिन्थियों 7 में एक और स्थिति को छूते हैं। सिद्धांत यह है कि जहाँ पवित्रशास्त्र के अनुसार विवाह वास्तव में समाप्त हो चुका है, वहाँ पुनर्विवाह की संभावना है, पर वहाँ भी "केवल प्रभु में" का नियम लागू रहता है।
मैं कैसे जानूँ कि सामने वाला व्यक्ति सचमुच विश्वासी है?
केवल यह कहना कि "मैं भी मसीही हूँ" पर्याप्त नहीं; फल देखिए। क्या वह व्यक्ति किसी स्थानीय कलीसिया का जीवित हिस्सा है, क्या वह स्वयं वचन पढ़ता और प्रार्थना करता है, क्या वह अपनी गलती मानकर क्षमा माँग सकता है, और क्या वह किसी के प्रति जवाबदेह है? समय इसका सबसे ईमानदार परीक्षक है, इसलिए जल्दबाज़ी मत कीजिए और उसे उसके अपने परिवार और संगति के बीच देखिए, केवल आपके साथ अकेले में नहीं।
क्या प्रेम विवाह बाइबल के विरुद्ध है?
नहीं। बाइबल में दोनों तरह के उदाहरण हैं; इसहाक का विवाह परिवार की पहल से हुआ और याकूब ने राहेल को स्वयं चुना, और श्रेष्ठगीत तो प्रेमियों के आपसी आकर्षण का पूरा गीत है। पवित्रशास्त्र विवाह की प्रक्रिया पर नहीं, उसकी नींव और सीमाओं पर ज़ोर देता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि रिश्ता कैसे शुरू हुआ, बल्कि यह कि वह प्रभु में है या नहीं, पवित्रता में चल रहा है या नहीं, और परिवार और कलीसिया की सलाह उसमें शामिल है या नहीं।
अगर उम्र बढ़ रही है और अब तक कोई साथी नहीं मिला तो क्या करूँ?
पहले यह सुनिए कि आपका मूल्य आपकी वैवाहिक स्थिति से तय नहीं होता; मसीह में आप पहले से पूरे हैं। भजन संहिता 37:4 कहता है, "यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा", और यह प्रतीक्षा के समय को खाली नहीं, गहरा बनाता है। व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय मत रहिए; संगति में जुड़िए, लोगों को जानिए, अपनी बात ईमानदारी से परिपक्व विश्वासियों के सामने रखिए, और साथ ही अविवाहित जीवन की उस स्वतंत्रता का उपयोग कीजिए जिसकी प्रशंसा पौलुस करते हैं।
मुझे लगता है मैंने गलत व्यक्ति से विवाह कर लिया है, अब क्या करूँ?
यह भावना बहुत आम है और प्रायः यह गलत चुनाव का नहीं, बल्कि अवास्तविक अपेक्षाओं या अनसुलझे घावों का संकेत होती है। मत्ती 19:6 कहता है, "जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे", यानी अब आपकी बुलाहट खोज नहीं, निष्ठा है। मदद माँगिए, परामर्श लीजिए, क्षमा का अभ्यास कीजिए, और इफिसियों 5:25 के उस प्रेम को सीखिए जो भावना पर नहीं, आत्म-समर्पण पर टिका है। जहाँ हिंसा या गंभीर खतरा हो, वहाँ तुरंत कलीसिया के अगुवों और जिम्मेदार लोगों की सहायता लीजिए।
अंत में
जीवनसाथी का चुनाव एक रहस्यमय खज़ाने की खोज नहीं, बल्कि एक पवित्र वाचा में सोच-समझकर प्रवेश करना है। परमेश्वर ने आकाश में कोई नाम नहीं छिपाया जिसे आपको जादू से पढ़ना है; उन्होंने अपने वचन में एक साफ़ ढाँचा रखा है, प्रभु में एकता, पवित्रता में चाल, परमेश्वर के भय से गढ़ा चरित्र, और आजीवन निष्ठा। इस ढाँचे के भीतर आप स्वतंत्र हैं, और वही स्वतंत्रता आपको डर से छुड़ाती है।
पहले सही व्यक्ति बनिए, फिर सही व्यक्ति पहचानिए।
आगे बढ़ने के लिए उत्पत्ति 24 को पूरा पढ़िए और देखिए कि प्रार्थना और व्यावहारिक समझ कैसे साथ चलते हैं। फिर रूत की पुस्तक पढ़िए और गौर कीजिए कि वाचा-विश्वासयोग्यता कैसी दिखती है। उसके बाद इफिसियों 5 पर रुकिए और पूछिए कि क्या आपका रिश्ता मसीह और कलीसिया की उस तस्वीर को दिखा पाएगा। और जब प्रतीक्षा लंबी लगे, तब याद रखिए कि जिस मेम्ने का विवाहभोज अभी आना बाकी है, वही आपकी सबसे गहरी प्यास का उत्तर हैं। हर पार्थिव विवाह उसी दिन की ओर इशारा करने वाली एक छोटी-सी, सुंदर छाया है।
