कलीसिया क्या है: बाइबल के अनुसार मण्डली का अर्थ और उद्देश्य
परिचय
रविवार की सुबह सात बजे। एक किराए के हॉल में प्लास्टिक की कुर्सियाँ लग रही हैं, कोई माइक की तार सुलझा रहा है, एक बहन चाय के लिए पानी गरम कर रही है, और कोने में एक आदमी बैठा है जिसकी नौकरी पिछले हफ़्ते चली गई। उसी समय शहर के दूसरे छोर पर काँच और संगमरमर की एक भव्य इमारत में घंटी बज रही है। और उसी समय किसी गाँव में छह लोग एक टीन की छत के नीचे घुटनों पर हैं, बाइबल खुली हुई, आवाज़ धीमी, क्योंकि पड़ोसी सुन सकते हैं।
इन तीनों में से कौन "कलीसिया" है? या तीनों? और अगर तीनों हैं, तो फिर कलीसिया को बनाता क्या है, इमारत, भीड़, कार्यक्रम, या कुछ और?
इस पृष्ठ पर हम बाइबल के भीतर से इस प्रश्न का उत्तर खोजेंगे: कलीसिया का सही अर्थ क्या है, वह उत्पत्ति से प्रकाशितवाक्य तक कैसे बुनी गई है, कौन-सी आम गलतफ़हमियाँ हमें थका देती हैं, और सोमवार की सुबह इसका आपके जीवन से क्या लेना-देना है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
आज बहुत लोग कलीसिया को एक सेवा-प्रदाता की तरह देखते हैं: अच्छी आराधना, अच्छा प्रचार, बच्चों के लिए अच्छी व्यवस्था, और पसंद न आए तो दूसरी जगह चले जाओ। यह पृष्ठ जानबूझकर एक दूसरी दिशा से चलता है। बाइबल में कलीसिया कोई ऐसी सेवा नहीं जिसे हम चुनते हैं, बल्कि वह देह है जिसमें मसीह हमें जोड़ देते हैं। "एक्लेसिया" का अर्थ ही है "बुलाई गई सभा", यानी पहल हमारी नहीं, परमेश्वर की है। इसलिए हम यह नहीं पूछेंगे, "मुझे कलीसिया से क्या मिलता है?" बल्कि, "परमेश्वर ने मुझे किस देह में रख दिया है, और एक अंग के रूप में मेरा स्थान क्या है?"
कलीसिया वह नहीं जहाँ हम जाते हैं; वह वही है जो हम हैं।
बाइबल कलीसिया के बारे में क्या कहती है?
नए नियम में "कलीसिया" के लिए यूनानी शब्द है एक्लेसिया, जो दो हिस्सों से बना है: "बाहर" और "बुलाना"। यूनानी शहरों में यह शब्द उन नागरिकों की सभा के लिए इस्तेमाल होता था जिन्हें नाम लेकर बुलाया जाता था ताकि वे नगर के मामलों पर निर्णय लें। यह कोई भीड़ नहीं थी जो संयोग से जमा हो गई; यह एक बुलाई गई सभा थी। जब यीशु मसीह ने पहली बार यह शब्द इस्तेमाल किया, तो उन्होंने इसी भार के साथ किया। मत्ती 16:18 में वे पतरस के अंगीकार के बाद कहते हैं, "और मैं भी तुझ से कहता हूँ कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के द्वार उस पर प्रबल न होंगे।"
इस एक वाक्य में कलीसिया के बारे में चार बातें छिपी हैं। पहली, कलीसिया मसीह की है, "अपनी कलीसिया", किसी पासबान, किसी समाज या किसी परिवार की नहीं। दूसरी, वही उसे बनाते हैं; हम उसे संगठित कर सकते हैं, पर खड़ी वे करते हैं। तीसरी, उसकी नींव पतरस का वह अंगीकार है कि यीशु मसीह जीवते परमेश्वर के पुत्र हैं। चौथी, उसका भविष्य सुरक्षित है, क्योंकि मृत्यु के द्वार भी उसे हरा नहीं सकते।
इस बुलाई गई सभा का पहला सजीव चित्र हमें पिन्तेकुस्त के बाद मिलता है। प्रेरितों 2:42 कहता है, "और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में, और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे।" यह पद कलीसिया का सबसे पुराना "स्वास्थ्य परीक्षण" है। चार चीज़ें: प्रेरितों की शिक्षा, यानी परमेश्वर के वचन के अधीन रहना; संगति, यानी एक-दूसरे के जीवन में साझेदारी; रोटी तोड़ना, यानी प्रभु भोज और साझा भोजन; और प्रार्थना। ध्यान दीजिए कि वहाँ कोई इमारत नहीं है, कोई मंच नहीं, कोई साउंड सिस्टम नहीं। और ध्यान दीजिए कि "लौलीन रहे" का अर्थ है वे इनसे चिपके रहे, जैसे कोई डूबता हुआ व्यक्ति तख़्ते से चिपकता है।
फिर पौलुस हमें एक जीवित तस्वीर देते हैं। 1 कुरिन्थियों 12:27 में वे लिखते हैं, "इसी प्रकार तुम मिलकर मसीह की देह हो, और अलग अलग उसके अंग हो।" यह उपमा सिर्फ़ सुंदर नहीं, बल्कि चुभने वाली है। देह में कोई अंग स्वेच्छा से नहीं जुड़ता, और कोई अंग अपने आप अलग होकर जीवित नहीं रहता। हाथ यह नहीं कह सकता कि मुझे पाँव की ज़रूरत नहीं। और कुरिन्थ की कलीसिया, जहाँ गुटबाज़ी थी, नैतिक गिरावट थी, वरदानों पर झगड़े थे, उसी से पौलुस कहते हैं, "तुम मसीह की देह हो।" कलीसिया परिपूर्ण लोगों का क्लब नहीं, बल्कि चंगे हो रहे लोगों का अस्पताल है जिसका मुखिया चिकित्सक स्वयं मसीह हैं।
इफिसियों 2:20 एक तीसरी उपमा लाता है, भवन की: "और प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर, जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु आप ही है, बनाए गए हो।" यहाँ कलीसिया एक मंदिर है, पर पत्थर की नहीं, लोगों की। प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव का अर्थ है वह प्रकाशन जो उन्हें दिया गया, यानी हमारी बाइबल। और कोने का पत्थर वह है जो पूरी इमारत की दिशा और नाप तय करता है। जहाँ मसीह केंद्र में नहीं, वहाँ इमारत टेढ़ी उठेगी, चाहे वह कितनी ही ऊँची हो।
कुलुस्सियों 1:18 इस सारी बात को एक वाक्य में बाँध देता है: "वही देह, अर्थात् कलीसिया का सिर है; वही आदि है और मरे हुओं में से जी उठने वालों में पहिलौठा, कि सब बातों में प्रधान हो जाए।" इसलिए कलीसिया का सबसे छोटा और सबसे सच्चा वर्णन यही है: वह लोग जिन्हें मसीह ने संसार से बुलाकर अपनी देह में जोड़ा, जिनका सिर वही है, जिनकी नींव वचन है, और जिनका उद्देश्य है कि "सब बातों में" वे प्रधान ठहरें।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
कलीसिया नए नियम का अचानक आया विचार नहीं है। बुलाहट का सूत्र बहुत पहले से चल रहा है। जब परमेश्वर ने अब्राहम को ऊर नगर से बुलाया, तो उन्होंने केवल एक व्यक्ति को नहीं, एक समुदाय को जन्म दिया, जिसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँ। मिस्र में इस्राएल एक भीड़ थी; लाल समुद्र के पार वे एक सभा बन गए। सीनै पर्वत पर परमेश्वर ने कहा कि तुम मेरी दृष्टि में याजकों का राज्य और पवित्र जाति ठहरोगे (निर्गमन 19:6)। इस्राएल के लिए इब्रानी शब्द काहाल और एदाह का ग्रीक अनुवाद पुराने नियम के यूनानी संस्करण में वही एक्लेसिया है जिसे यीशु मसीह ने उठाया। यानी जब प्रभु ने कहा "मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा", तो उनके सुनने वालों के कानों में सीनै की गूँज थी: परमेश्वर एक बार फिर अपने लिए एक जन इकट्ठा कर रहे हैं।
पुराने नियम में यह सभा खून और सीमा से बँधी थी: एक जाति, एक देश, एक मंदिर, एक याजकपद। परन्तु भविष्यद्वक्ताओं के पास परमेश्वर का हृदय पहले ही बहने लगा था। यशायाह ने कहा कि परमेश्वर का भवन सब देशों के लोगों के लिए प्रार्थना का घर कहलाएगा, और यिर्मयाह ने उस नई वाचा की बात की जिसमें व्यवस्था पत्थर पर नहीं, हृदय पर लिखी जाएगी। योएल ने कहा कि आत्मा हर प्राणी पर उँडेली जाएगी। यह सब पिन्तेकुस्त के दिन एक कमरे में उतर आया, जहाँ पन्द्रह भाषाओं के लोग एक ही सुसमाचार अपनी-अपनी बोली में सुनते हैं। बाबेल में भाषाएँ बाँटी गई थीं; पिन्तेकुस्त में भाषाएँ जोड़ दी गईं।
बुलाहट पहले आती है, हमारी पसंद बाद में।
यही कारण है कि पतरस बिना झिझक इस्राएल के लिए कहे गए शब्द अब मसीह की कलीसिया पर लगा देते हैं: "पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और परमेश्वर की निज सम्पत्ति हो" (1 पतरस 2:9)। जो इस्राएल को बुलाहट में दिया गया था, वह मसीह में पूरा हुआ है, और अब यहूदी और अन्यजाति दोनों एक ही देह में जोड़ दिए गए हैं। इफिसियों की पूरी पुस्तक इसी आश्चर्य के चारों ओर घूमती है: दो दीवारों के बीच की बैर की दीवार क्रूस पर ढह गई।
और यह सूत्र कहाँ जाकर खुलता है? प्रकाशितवाक्य में, जहाँ कलीसिया को दुल्हन कहा गया है और परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच उतर आता है: "देखो, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्वर होगा" (प्रकाशितवाक्य 21:3)। अदन में परमेश्वर मनुष्य के साथ चलते थे; पाप ने वह संगति तोड़ी; मसीह ने उसे खरीद लिया; और अन्त में वही संगति एक नगर के रूप में, एक जन के रूप में, सदा के लिए खड़ी होती है। कलीसिया इस कहानी का बीच का अध्याय नहीं, उसका लक्ष्य है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: कलीसिया एक इमारत है। हिन्दी में हम सहज ही कहते हैं "चर्च जा रहा हूँ", और मन में छवि बनती है छत, क्रूस और बेंच की। परन्तु नए नियम में कलीसिया के लिए कभी कोई इमारत नहीं कही गई। पौलुस "घर की कलीसिया" का ज़िक्र करते हैं, आकिला और प्रिस्किल्ला के घर में इकट्ठा होने वाले विश्वासियों का। 1 कुरिन्थियों 12:27 के अनुसार विश्वासी स्वयं देह हैं, और इफिसियों 2:20 के अनुसार वे स्वयं जीवित पत्थर हैं जिन पर भवन उठता है। इमारत उपयोगी है, आवश्यक नहीं। पहली तीन शताब्दियों में कलीसिया के पास लगभग कोई इमारत नहीं थी, और वह सबसे तेज़ी से बढ़ी।
दूसरी भ्रांति: "मैं अकेला भी कलीसिया हूँ, मुझे किसी सभा की ज़रूरत नहीं।" यह आज की सबसे मीठी और सबसे हानिकारक सोच है। बाइबल में कोई अकेला अंग नहीं मिलता। इब्रानियों 10:25 सीधे इसी पर हाथ रखता है: "और जैसे कितनों की रीति है, हम इकट्ठा होना न छोड़ें, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और जैसे जैसे उस दिन को निकट होते देखते हो, वैसे वैसे और भी अधिक यह किया करें।" ध्यान दीजिए, यह आज्ञा उन लोगों को दी गई थी जिनके लिए इकट्ठा होना खतरनाक था, जिनकी सम्पत्ति लूटी जा चुकी थी। और कारण भी देखिए: हम इसलिए जमा होते हैं कि "एक दूसरे को समझाते रहें", यानी सभा का मकसद केवल लेना नहीं, देना भी है। जो व्यक्ति कहता है कि मुझे संगति की ज़रूरत नहीं, वह अक्सर उसी पल में सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद होता है।
तीसरी भ्रांति: कलीसिया एक धार्मिक सेवा-प्रदाता है, और मैं उसका ग्राहक हूँ। इसी सोच से वे वाक्य निकलते हैं जो हम सब सुनते हैं: प्रचार बोझिल था, गीत मेरे मन के नहीं थे, वहाँ मेरे जैसे लोग नहीं हैं। ग्राहक तुलना करता है; अंग सेवा करता है। कुलुस्सियों 1:18 के अनुसार कलीसिया का सिर मसीह हैं, न कि वह भीड़ जिसकी रुचियाँ संतुष्ट करनी हैं। जब मसीह सिर हैं, तो मेरा प्रश्न बदल जाता है: मेरी कौन-सी क्षमता, कौन-सा समय, कौन-सा पैसा इस देह के किसी कमज़ोर अंग को सँभाल सकता है?
चौथी भ्रांति: कलीसिया वहीं सच्ची है जहाँ सब पवित्र और परिपूर्ण हों। यीशु मसीह ने स्वयं अपने बारह चेलों में एक विश्वासघाती रखा, और कुरिन्थ की गन्दी, लड़ाकू, घमंडी मण्डली को पौलुस ने "पवित्र किए हुए लोग" कहकर पत्र लिखा। कलीसिया पवित्रता का संग्रहालय नहीं, अनुग्रह का कार्यस्थल है। इसका अर्थ यह नहीं कि पाप पर आँखें मूँद ली जाएँ; मत्ती 18 और 1 कुरिन्थियों 5 में अनुशासन की स्पष्ट शिक्षा है। परन्तु इसका अर्थ यह है कि किसी मण्डली में अपूर्ण लोग मिलना उसके झूठे होने का प्रमाण नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि वहाँ अभी भी सचमुच के पापी आ रहे हैं।
आज इसे जीवन में उतारना
यदि कलीसिया एक देह है जिसमें परमेश्वर ने मुझे रखा है, तो सबसे पहली व्यावहारिक बात यह है कि मैं कहीं जड़ पकड़ूँ। हर रविवार नई जगह घूमने वाला विश्वासी कभी नहीं जान पाता कि उसका वरदान क्या है, क्योंकि वरदान अपने आप में नहीं, संबंधों में प्रकट होता है। एक स्थानीय मण्डली चुनिए जहाँ बाइबल सिखाई जाती है, मसीह ऊँचे किए जाते हैं, प्रभु भोज और बपतिस्मा का सम्मान है, और अगुवे जवाबदेह हैं। फिर वहाँ नाम लिखाइए, और टिक जाइए, तब भी जब मन न करे।
दूसरी बात बहुत साधारण है: आइए और समय पर आइए। प्रेरितों 2:42 में चार आदतें हैं, और चारों अभ्यास की माँग करती हैं। वचन सुनना, संगति रखना, प्रभु भोज में भाग लेना, और प्रार्थना। अगर आप केवल प्रचार सुनकर निकल जाते हैं, तो आपने चार में से एक पाया है। चाय के कप के पास होने वाली बातचीत कार्यक्रम के बाद की औपचारिकता नहीं, वह "संगति" का असली मैदान है। वहीं पता चलता है कि किसकी बेटी बीमार है, किसकी नौकरी लटकी है, किसे इस महीने राशन नहीं मिला।
तीसरी बात देने की है, और यह तीन तरह का देना है। अपना समय दीजिए: कुर्सियाँ लगाइए, बच्चों की कक्षा में बैठिए, किसी अकेली विधवा को घर छोड़ दीजिए। अपना पैसा दीजिए, नियम से और खुशी से, क्योंकि देह का खर्च आत्मा नहीं उठाती, अंग उठाते हैं। और अपना सच दीजिए: किसी एक या दो भरोसेमंद विश्वासियों को अपने संघर्ष बताइए। जो पाप अंधेरे में शक्तिशाली है, वह उजाले में छोटा पड़ने लगता है।
चौथी बात क्षमा की है। जहाँ लोग हैं, वहाँ चोट है। मण्डली में आपको ठेस लगेगी, कोई आपकी सेवा को अनदेखा करेगा, कोई आपकी पीठ पीछे बोलेगा। उस दिन आपके सामने दो रास्ते होंगे: चुपचाप निकल जाना, या जाकर बात करना और क्षमा करना। पहला रास्ता आसान है और आपको अकेला छोड़ देता है; दूसरा कठिन है और आपको मसीह जैसा बनाता है। देह में अंग का इलाज होता है, उसे काटा नहीं जाता, जब तक और कोई चारा न बचे।
और अन्त में, मिशन। कलीसिया अपने लिए इकट्ठा नहीं होती; वह भेजे जाने के लिए इकट्ठा होती है। प्रेरितों 2:47 कहता है कि प्रभु प्रतिदिन उद्धार पाने वालों को उनमें मिला देते थे। जो मण्डली अपने पड़ोस के लिए नहीं रोती, वह धीरे-धीरे एक क्लब बन जाती है।
दर्पण
अब सीधे आपसे। आपने इस पृष्ठ को खोला, क्योंकि कहीं भीतर एक प्रश्न था। शायद प्रश्न यह था: "क्या मुझे वाकई जाना ज़रूरी है?" आपने छह दिन मशीन की तरह काम किया है, रविवार ही एकमात्र दिन है जब देर तक सोया जा सकता है, और आपका फ़ोन आपको दुनिया के सबसे अच्छे प्रचारक सुना सकता है। तो फिर उन अटपटे लोगों के बीच, उस बेसुरे गीत में, उस लंबी घोषणा के दौरान बैठने का तुक क्या है?
तुक यह है कि परमेश्वर आपको सिर्फ़ जानकारी नहीं, एक परिवार देना चाहते हैं। और परिवार असुविधाजनक होता है। आपकी तनख़ाह, आपका कैलेंडर, आपका अकेलापन, आपकी शादी, आपका मोबाइल, ये सब देह में आकर खुल जाते हैं, और यही आपको डराता है। कहीं कोई पूछ बैठे कि पिछले महीने जो बात आपने बताई थी, वह अब कैसी है। कहीं किसी को पता चल जाए कि आपके घर में शान्ति नहीं है, या कि आपने कर्ज़ में फँस गए हैं, या कि आप रात में क्या देखते हैं।
पर सोचिए, कौन-सी चीज़ आपको अधिक अकेला करती है: खुल जाना, या छिपे रहना? मैंने ऐसे लोग देखे हैं जो बीस साल तक पिछली पंक्ति में बैठे, किसी का नाम तक नहीं जाना, और अन्त में कहा कि कलीसिया में कुछ नहीं मिलता। उनकी शिकायत सच्ची थी। पर कारण यह था कि वे ग्राहक बनकर आए थे, अंग बनकर नहीं।
आपका स्थान खाली है। आपके बिना वह देह वाकई कुछ खोती है, यह कोई प्रोत्साहन देने वाला वाक्य नहीं, यह 1 कुरिन्थियों 12:27 का अर्थ है। और सबसे बड़ी बात यह कि कलीसिया मसीह ने अपने लहू से मोल ली है। जिस चीज़ के लिए उन्होंने अपना प्राण दिया, उसे हम सुविधा के तराजू पर तोलते हैं।
मसीह सिर हैं; बाकी सब अंग हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों के मन में कलीसिया का अर्थ लगभग हमेशा एक इमारत होता है, क्योंकि हम उनसे कहते हैं "चर्च चलो"। इस छवि को बदलने का सबसे आसान तरीका शरीर की उपमा है। बच्चे से कहिए कि अपना हाथ हिलाए, आँख झपकाए, फिर पूछिए, क्या हाथ अकेले काम कर सकता है? फिर समझाइए कि प्रभु यीशु का भी एक शरीर है, और वह शरीर इमारत नहीं, लोग हैं। प्रभु यीशु सिर हैं, और जो उन पर भरोसा करते हैं वे हाथ, पाँव, आँख और कान हैं। इसीलिए जब हम इकट्ठा होते हैं, तो इमारत में नहीं जाते, परिवार में जाते हैं।
दूसरी बात जो बच्चों को तुरंत समझ आती है वह यह है कि कलीसिया वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने नाम लेकर बुलाया है। उन्हें कक्षा की हाज़िरी का उदाहरण दीजिए: जब शिक्षक नाम पुकारता है, तो बच्चा "उपस्थित" कहता है। परमेश्वर भी बुलाते हैं, और जो "हाँ" कहते हैं, वे मिलकर उनकी मण्डली बनते हैं।
छोटे बच्चों के लिए मत्ती 18:20 बहुत सुंदर है, क्योंकि उसमें वादा है कि जहाँ दो या तीन उनके नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ प्रभु बीच में होते हैं। इसका अर्थ है कि घर की प्रार्थना भी कलीसिया का स्वाद है।
उम्र के अनुसार यह बातचीत बदलनी चाहिए। तीन से छह साल के बच्चों के लिए हमारे पास बहुत सरल, चित्र जैसी व्याख्या उपलब्ध है; सात से बारह साल के बच्चों के लिए कहानी और प्रश्न-उत्तर के साथ; और बारह वर्ष से बड़े किशोरों के लिए वह सामग्री जो उनके असली सवालों से टकराती है, जैसे "अगर कलीसिया में पाखंड है तो मैं क्यों जाऊँ"। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वह व्याख्या चुनिए और एक छोटी बातचीत से शुरुआत कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कलीसिया का मतलब क्या है?
कलीसिया नए नियम के यूनानी शब्द एक्लेसिया का अनुवाद है, जिसका अर्थ है "बुलाई गई सभा" या "बाहर बुलाए गए लोगों का समूह"। बाइबल में यह शब्द कभी किसी इमारत के लिए नहीं, बल्कि हमेशा उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता है जिन्हें परमेश्वर ने संसार से बुलाकर अपने लिए अलग किया है। इसलिए कलीसिया का मूल अर्थ संगठन या स्थान नहीं, बल्कि संबंध है: मसीह के साथ और एक-दूसरे के साथ। 1 कुरिन्थियों 12:27 के शब्दों में, "तुम मिलकर मसीह की देह हो, और अलग अलग उसके अंग हो।"
कलीसिया और चर्च में क्या अंतर है?
व्यावहारिक रूप से कोई अंतर नहीं है; "चर्च" अंग्रेज़ी शब्द है और "कलीसिया" हिन्दी बाइबल का शब्द है, और दोनों उसी यूनानी एक्लेसिया की ओर इशारा करते हैं। फ़र्क़ बस रोज़मर्रा की भाषा में आ गया है, जहाँ "चर्च" से अक्सर इमारत समझी जाती है और "कलीसिया" से लोगों की सभा। इसीलिए बोलने में सावधानी काम की है: "हम कलीसिया में जा रहे हैं" के बजाय कहना "हम कलीसिया के रूप में इकट्ठे हो रहे हैं" आपके मन की तस्वीर धीरे-धीरे बदल देता है।
क्या कलीसिया एक इमारत है या लोग?
बाइबल के अनुसार निश्चित रूप से लोग। नए नियम में विश्वासी स्वयं परमेश्वर का मंदिर कहे गए हैं, और इफिसियों 2:20 कहता है कि वे "प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर, जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु आप ही है, बनाए गए हो।" पहली सदी के विश्वासी घरों में, कमरों में और कभी-कभी कब्रिस्तानों में इकट्ठे होते थे। इमारत एक उपयोगी साधन है, जैसे छत, कुर्सी या माइक, परन्तु वह कलीसिया को नहीं बनाती। इमारत गिर सकती है; कलीसिया नहीं गिरती।
क्या मैं कलीसिया के बिना, घर पर ही मसीही जीवन जी सकता हूँ?
बाइबल में अकेले चलने वाले विश्वासी की कोई तस्वीर नहीं है, इसलिए इसका उत्तर ना है। इब्रानियों 10:25 स्पष्ट कहता है, "हम इकट्ठा होना न छोड़ें, पर एक दूसरे को समझाते रहें।" आप घर पर बाइबल पढ़ सकते हैं और प्रार्थना कर सकते हैं, और यह अच्छा है, परन्तु प्रभु भोज, बपतिस्मा, आत्मिक अगुवाई, आपसी अनुशासन और वरदानों की सेवा केवल संगति में सम्भव है। जो अंग देह से कटा है, वह जीवित दिख सकता है, पर वह सूख रहा है।
मत्ती 16:18 में "इस पत्थर पर" का क्या अर्थ है?
मत्ती 16:18 में प्रभु कहते हैं, "तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा"। पतरस के नाम का अर्थ ही पत्थर है, और यह वचन उस क्षण कहा गया जब पतरस ने अंगीकार किया कि यीशु मसीह जीवते परमेश्वर के पुत्र हैं। परम्परागत प्रोटेस्टेंट समझ यह है कि नींव पतरस का व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह अंगीकार है जो उसने किया, और वही सत्य प्रेरितों की सारी शिक्षा का आधार बना। इफिसियों 2:20 इसी को पुष्ट करता है, जहाँ कोने का पत्थर मसीह स्वयं हैं।
कलीसिया की शुरुआत कब हुई?
बुलाहट के अर्थ में परमेश्वर के लोग अब्राहम और इस्राएल से चले आ रहे हैं, पर मसीह की देह के रूप में कलीसिया की शुरुआत पिन्तेकुस्त के दिन हुई, जब पवित्र आत्मा उतरे और लगभग तीन हज़ार लोग विश्वास में जुड़े। प्रेरितों 2:42 उसी नई मण्डली का पहला चित्र है, जहाँ वे शिक्षा, संगति, रोटी तोड़ने और प्रार्थना में लौलीन रहे। यानी कलीसिया मनुष्य के किसी निर्णय या सम्मेलन से नहीं, बल्कि मसीह के पुनरुत्थान और आत्मा के उतरने से जन्मी।
कलीसिया का उद्देश्य क्या है?
बाइबल में कलीसिया के चार मुख्य उद्देश्य दिखते हैं: परमेश्वर की आराधना, विश्वासियों की उन्नति, एक-दूसरे की देखभाल, और संसार में सुसमाचार का प्रचार। प्रेरितों 2:42 इन्हें आदतों के रूप में दिखाता है, और कुलुस्सियों 1:18 हमें उद्देश्य का केंद्र बताता है, "कि सब बातों में प्रधान हो जाए"। इसका मतलब है कलीसिया की सफलता भीड़, इमारत या बजट से नहीं नापी जाती, बल्कि इससे कि मसीह वहाँ कितने ऊँचे किए जाते हैं और लोग कितना उनके समान बनते जाते हैं।
क्या किसी कलीसिया का सदस्य बनना ज़रूरी है?
नए नियम में "सदस्यता फ़ॉर्म" नहीं मिलता, परन्तु सदस्यता का मूल विचार साफ़ दिखता है। पौलुस कलीसियाओं को नाम से पत्र लिखते हैं, मण्डली के अगुवे जानते हैं कि किसकी देखभाल उनके जिम्मे है, मण्डली विधवाओं की सूची रखती है, और अनुशासन के लिए यह जानना आवश्यक है कि कौन भीतर है। इसलिए औपचारिक सदस्यता एक बुद्धिमान और प्रेमपूर्ण व्यवस्था है, जो कहती है: ये मेरे लोग हैं, और मैं उनके प्रति जवाबदेह हूँ।
स्थानीय कलीसिया और विश्वव्यापी कलीसिया में क्या फ़र्क़ है?
विश्वव्यापी कलीसिया में हर युग, हर देश और हर भाषा के वे सब लोग शामिल हैं जो मसीह के हैं, जीवित और स्वर्ग में गए हुए। स्थानीय कलीसिया उसी देह का दिखाई देने वाला रूप है, एक विशेष जगह पर इकट्ठा होने वाले विश्वासी जिनके अगुवे, आदतें और ज़िम्मेदारियाँ हैं। दोनों सच्चे हैं और दोनों ज़रूरी हैं। विश्वव्यापी कलीसिया पर भरोसा हमें गर्व और संकीर्णता से बचाता है; स्थानीय कलीसिया में जुड़ाव उस भरोसे को रोटी, आँसू और समय में उतार देता है।
अगर कलीसिया में पाखंड या चोट मिले तो क्या करूँ?
पहले यह मान लीजिए कि आपकी चोट असली है; बाइबल कभी अन्याय को धार्मिक बहाने से ढकने को नहीं कहती। मत्ती 18 हमें रास्ता देता है: पहले अकेले में जाकर बात करें, फिर गवाहों के साथ, फिर कलीसिया के सामने। जहाँ अगुवे पश्चात्ताप से इनकार करें या दुर्व्यवहार को छिपाएँ, वहाँ से हटना पाप नहीं, समझदारी है। परन्तु एक मण्डली की विफलता से यह निष्कर्ष निकालना कि अब कलीसिया की ज़रूरत ही नहीं, घाव पर दूसरा घाव जोड़ना है। चंगाई अकेलेपन में नहीं, सुरक्षित संगति में मिलती है।
कलीसिया में अगुवों की भूमिका क्या है?
नए नियम में दो मुख्य पद दिखते हैं, प्राचीन या अध्यक्ष, और सेवक या दीकन। प्राचीनों का काम वचन सिखाना, प्रार्थना करना और झुंड की रखवाली करना है, और उनसे चरित्र की ऊँची माँग की गई है। सेवकों का काम व्यावहारिक ज़रूरतों को सँभालना है, ताकि संगति में कोई अनदेखा न रह जाए। अगुवाई स्वामित्व नहीं, भेड़ चराना है, क्योंकि कुलुस्सियों 1:18 के अनुसार कलीसिया का सिर मसीह हैं और हर अगुवा अन्त में उन्हीं को लेखा देगा।
क्या बपतिस्मा और प्रभु भोज कलीसिया के लिए ज़रूरी हैं?
हाँ, क्योंकि ये दोनों प्रभु यीशु द्वारा स्वयं ठहराए गए चिह्न हैं। बपतिस्मा प्रवेश का चिह्न है, जो सार्वजनिक रूप से कहता है कि यह व्यक्ति मसीह का है, उनकी मृत्यु और पुनरुत्थान में सहभागी है। प्रभु भोज चलते रहने का चिह्न है, जो हर बार हमें क्रूस की याद दिलाता और एक देह के रूप में जोड़ता है। प्रेरितों 2:42 में "रोटी तोड़ने" का ज़िक्र संयोग नहीं; यह शुरुआती कलीसिया का नियमित अभ्यास था और आज भी संगति का हृदय है।
अंत में
कलीसिया के बारे में सबसे मुक्त करने वाली बात यही है कि वह हमारी परियोजना नहीं है। "मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा", यह मत्ती 16:18 में प्रभु का वादा है, और इसीलिए उसका भविष्य हमारी योग्यता पर नहीं टिका। हम उसे बचाने के लिए नहीं बुलाए गए; हम उसमें जीने के लिए बुलाए गए। जब आप खुद को ग्राहक की कुर्सी से उठाकर अंग के स्थान पर रख देते हैं, तो आश्चर्यजनक रूप से बोझ हल्का हो जाता है, क्योंकि देह में कोई अंग अकेले सब कुछ नहीं करता।
अगर इस पृष्ठ से एक ही वाक्य साथ लेकर जाना हो, तो यह लें: कलीसिया वह सेवा नहीं जिसे हम चुनते हैं, वह देह है जिसमें मसीह हमें जोड़ते हैं, और उसका सिर वही हैं।
आगे के लिए दो सुझाव। पहला, इस हफ़्ते प्रेरितों 2:41 से 47 और इफिसियों 2:11 से 22 को धीरे-धीरे पढ़िए और एक कॉपी में लिखिए कि आपकी मण्डली में इनमें से क्या जीवित है और क्या मर गया है। दूसरा, किसी एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आप इस महीने संगति में जोड़ सकते हैं, या जिसे फ़ोन कर सकते हैं। बुलाहट हमेशा दूसरों तक पहुँचती है, वरना वह बुलाहट नहीं रह जाती।
