विषय

परमेश्वर के नाम: बाइबल में यहोवा के नामों का अर्थ और सामर्थ्य

परिचय

अस्पताल के गलियारे में रात के दो बजे, जब डॉक्टर की रिपोर्ट अभी आनी बाकी है और हाथ में थमा हुआ चाय का कप ठंडा हो चुका है, तब आदमी परमेश्वर के बारे में कोई सिद्धांत नहीं दोहराता। वह बस एक नाम पुकारता है। कभी "हे प्रभु", कभी "हे पिता", कभी सिर्फ़ एक सिसकी जिसमें कोई शब्द ही नहीं होता। और यही वह जगह है जहाँ बाइबल अपने परमेश्वर के नाम खोलकर रखती है, किसी पुस्तकालय में नहीं, बल्कि जलती हुई झाड़ी के सामने, चाकू उठे हुए हाथ के नीचे, रेगिस्तान के कुएँ पर, युद्ध के मैदान में।

इस पृष्ठ पर आप परमेश्वर के नामों की सिर्फ़ एक सूची नहीं पढ़ेंगे। आप देखेंगे कि हर नाम कहाँ, किसको, और किस दर्द के बीच दिया गया था; वे नाम उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक कैसे एक ही धागे में पिरोए गए हैं; और वे आज आपकी रसोई, आपके दफ़्तर और आपकी अनिद्रा भरी रातों में क्या करते हैं।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकांश लेख परमेश्वर के नामों को एक शब्दकोश की तरह पेश करते हैं: नाम, अर्थ, संदर्भ, अगला नाम। यह पृष्ठ एक अलग रास्ता लेता है। यहाँ हम मानते हैं कि परमेश्वर ने अपने नाम कभी किसी शांत कक्षा में नहीं बताए, बल्कि हमेशा किसी संकट के बीच, किसी टूटे हुए इंसान के सामने प्रकट किए। हर नाम एक जगह से जुड़ा है, एक घाव से जुड़ा है, एक ज़रूरत से जुड़ा है। इसलिए परमेश्वर के नाम जानकारी नहीं, गवाहियाँ हैं; वे उन जगहों के पत्थर हैं जहाँ परमेश्वर किसी से मिले। और यही कारण है कि ये नाम आपके संकट में भी काम आते हैं।

परमेश्वर अपना नाम कक्षा में नहीं, संकट में बताते हैं।

बाइबल परमेश्वर के नामों के बारे में क्या कहती है?

बाइबल में नाम कभी केवल पहचान का लेबल नहीं होता। नाम चरित्र होता है, नाम अधिकार होता है, नाम रिश्ता होता है। जब अब्राम का नाम बदलकर अब्राहम हुआ, तो उसका जीवन ही बदल गया। इसलिए जब परमेश्वर अपना नाम बताते हैं, तो वे अपनी पहचान का कार्ड नहीं थमाते, वे अपना हृदय खोलते हैं।

सबसे गहरा क्षण तब आता है जब मूसा मिद्यान के जंगल में एक जलती हुई झाड़ी के सामने खड़ा है। वह भगोड़ा है, हत्या का आरोपी, चालीस साल से भेड़ें चरा रहा है, और परमेश्वर उसे फ़िरौन के सामने भेज रहे हैं। मूसा का सवाल बहुत व्यावहारिक है: लोग पूछेंगे कि किसने भेजा है, मैं क्या कहूँ? उत्तर इतिहास बदल देता है। निर्गमन 3:14 कहता है, "परमेश्वर ने मूसा से कहा, 'मैं जो हूँ सो हूँ।' फिर उसने कहा, 'तू इस्राएलियों से यह कहना, कि जिसका नाम "मैं हूँ" है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।'" यह नाम किसी दर्शनशास्त्र की कक्षा में नहीं, एक डरे हुए आदमी के सामने जलती झाड़ी के पास दिया गया। इसका अर्थ है: मैं किसी पर निर्भर नहीं, मैं हमेशा से हूँ, मैं बदलता नहीं, और मैं वहाँ हूँ जहाँ तुम्हें मेरी ज़रूरत है। इसी नाम से वह चार अक्षरों वाला इब्रानी नाम निकलता है जिसे हिंदी बाइबल में "यहोवा" लिखा गया है।

पर नाम का अर्थ सिर्फ़ अस्तित्व नहीं, स्वभाव भी है। कुछ ही अध्यायों बाद, जब इस्राएल सोने के बछड़े की पूजा करके विश्वासघात कर चुका है, मूसा फिर पहाड़ पर है और परमेश्वर स्वयं अपने नाम की व्याख्या करते हैं। निर्गमन 34:6 में लिखा है, "और यहोवा उसके सामने होकर यों प्रचार करता हुआ चला, 'यहोवा, यहोवा, ईश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य।'" ध्यान दीजिए कि यह आत्म-परिचय विद्रोह के ठीक बाद आता है, पुरस्कार के रूप में नहीं, अनुग्रह के रूप में। परमेश्वर का नाम सबसे साफ़ तब चमकता है जब हमारी असफलता सबसे गहरी होती है।

वहीं से नामों की वह लम्बी श्रृंखला बहती है जिसे इस्राएल ने अपने इतिहास के मोड़ों पर गढ़ा। अब्राहम ने मोरिय्याह पर्वत पर, जहाँ मेढ़ा झाड़ी में फँसा मिला, उस जगह का नाम "यहोवा यिरे" रखा, अर्थात परमेश्वर प्रबंध करते हैं (उत्पत्ति 22:14)। अमालेकियों से युद्ध जीतने के बाद मूसा ने वेदी का नाम "यहोवा निस्सी" रखा, मेरा झंडा (निर्गमन 17:15)। गिदोन ने, जब वह डर से काँप रहा था, वेदी का नाम "यहोवा शालोम" रखा (न्यायियों 6:24)। हाजिरा, एक भागी हुई दासी, जंगल के सोते पर परमेश्वर को "एल रोई" कहकर पुकारती है, वह परमेश्वर जो मुझे देखते हैं (उत्पत्ति 16:13)। और दाऊद, खुले मैदान में भेड़ों के बीच पला हुआ चरवाहा, भजन संहिता 23:1 में लिखता है, "यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।" यह पद किसी महल की शांति में नहीं, बल्कि उस जीवन से निकला है जिसमें भालू, शेर, शाऊल का भाला और अबशालोम का विद्रोह सब कुछ शामिल था।

नाम सिर्फ़ जानने की चीज़ नहीं, भागने की जगह भी है। नीतिवचन 18:10 इसे अद्भुत चित्र में रखता है: "यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है, धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से बचता है।" गढ़ दूर से देखने के लिए नहीं बनाया जाता; उसमें घुसना पड़ता है। परमेश्वर के नाम को जानना तब तक अधूरा है जब तक आप उसमें दौड़कर घुसे नहीं।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

पुराने नियम में परमेश्वर के नाम एक-एक करके खुलते हैं, जैसे किसी लम्बे पत्र के पन्ने पलटते जाएँ। अब्राहम के लिए वे "एल शद्दै" हैं, सर्वशक्तिमान, जो बाँझ बुढ़ापे में भी वंश दे सकते हैं। यहोशू के लिए वे सेनाओं के यहोवा हैं। यिर्मयाह के लिए, जब राष्ट्र भ्रष्ट न्यायाधीशों से भरा है, वे "यहोवा सिदकेनू" हैं, हमारी धार्मिकता (यिर्मयाह 23:6)। यहेजकेल के लिए, जब मंदिर उजड़ चुका है और लोग बन्धुआई में हैं, आख़िरी शब्द यही है कि उस नगर का नाम "यहोवा शम्मा" होगा, यहोवा वहाँ है (यहेजकेल 48:35)। हर नाम उसी जगह उगता है जहाँ ज़मीन सबसे सूखी थी।

फिर नया नियम खुलता है और कुछ ऐसा होता है जो यहूदी कानों के लिए बिजली गिरने जैसा था। मंदिर के आँगन में बहस चल रही है, और यीशु कहते हैं कि अब्राहम ने उनका दिन देखा था। भीड़ भड़क उठती है। तब यूहन्ना 8:58 में लिखा है, "यीशु ने उनसे कहा, 'मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।'" उन्होंने यह नहीं कहा कि "मैं था", उन्होंने कहा "मैं हूँ"; ठीक वही नाम जो जलती झाड़ी से आया था। सुननेवाले समझ गए कि वे क्या दावा कर रहे हैं, इसीलिए उन्होंने पत्थर उठाए। जलती झाड़ी का परमेश्वर अब चप्पल पहने, धूल भरे पाँवों से यरूशलेम में चल रहा था।

यशायाह ने इसकी घोषणा सात सौ साल पहले कर दी थी। यशायाह 9:6 कहता है, "क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कंधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।" ध्यान दीजिए, ये चार नाम एक शिशु को दिए गए हैं। जो नाम पुराने नियम में आकाश से गरजते थे, वे अब एक चरनी में सो रहे हैं।

और यीशु का अपना नाम भी संकट के बीच ही दिया गया। यूसुफ़ अपनी मँगेतर को चुपचाप छोड़ने का मन बना चुका था, तब स्वर्गदूत ने कहा, "वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा" (मत्ती 1:21)। यीशु अर्थात "यहोवा उद्धार है"। उसी अध्याय में वह दूसरा नाम आता है, इम्मानुएल, परमेश्वर हमारे साथ।

यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु बार-बार "मैं हूँ" कहकर अपने को जीवन की रोटी, जगत की ज्योति, अच्छा चरवाहा, पुनरुत्थान और जीवन, मार्ग, सत्य और जीवन बताते हैं। भजन 23 का चरवाहा अब नाम लेकर सामने खड़ा है। और अंत में प्रकाशितवाक्य में वह नाम सिंहासन पर लिखा दिखता है, "राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु" (प्रकाशितवाक्य 19:16)। जो झाड़ी में जलता था, जो क्रूस पर लटका, वही महिमा में राज करता है।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति: परमेश्वर के नाम जादू के मंत्र हैं। कुछ लोग सिखाते हैं कि "यहोवा यिरे" या "यहोवा रफा" को एक निश्चित संख्या में दोहराने से आपूर्ति या चंगाई अपने आप आ जाती है। यह सोच बाइबल की नहीं, जादू-टोने की है। स्कीवा के पुत्रों ने भी यीशु का नाम एक सूत्र की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की और बुरी तरह विफल हुए (प्रेरितों के काम 19:13-16)। नाम शक्तिशाली इसलिए है क्योंकि वह व्यक्ति शक्तिशाली है, न कि उच्चारण में कोई कंपन छिपा है। नीतिवचन 18:10 में गढ़ में भागना एक रिश्ते में शरण लेना है, किसी ध्वनि को दोहराना नहीं।

दूसरी भ्रांति: सही उच्चारण जाने बिना प्रार्थना अधूरी है। इब्रानी के चार अक्षरों का असली उच्चारण "याहवे" था या कुछ और, इस पर विद्वान बहस करते हैं, और हिंदी बाइबल में "यहोवा" रूप परंपरा से आया है। पर नया नियम यूनानी में लिखा गया और वहाँ परमेश्वर के लिए "कुरिओस", यानी प्रभु, शब्द इस्तेमाल हुआ, बिना किसी हिचक के। यीशु ने शिष्यों को इब्रानी अक्षर नहीं सिखाए, उन्होंने सिखाया कि परमेश्वर को "हे हमारे पिता" कहकर पुकारो। परमेश्वर उच्चारण नहीं, हृदय सुनते हैं।

तीसरी भ्रांति: "नाम व्यर्थ लेना" का मतलब सिर्फ़ गाली देना है। निर्गमन 20:7 कहता है, "तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ न लेना; क्योंकि जो कोई उसका नाम व्यर्थ ले वह यहोवा उसको निर्दोष न ठहराएगा।" इब्रानी में "व्यर्थ" का अर्थ है खोखला, झूठा, बिना वज़न का। इसका मतलब है परमेश्वर के नाम को ऐसी चीज़ पर चिपकाना जिसके पीछे वे नहीं हैं। अपने स्वार्थ को "परमेश्वर ने मुझसे कहा" कहकर पेश करना, या उनके नाम पर ऐसा जीवन जीना जो उनके चरित्र को झुठलाए, यह उस आज्ञा का सबसे गंभीर उल्लंघन है।

चौथी भ्रांति: पुराने नियम का यहोवा कठोर है और नए नियम का यीशु कोमल। यह शायद सबसे आम गलतफ़हमी है, और निर्गमन 34:6 उसे एक ही झटके में तोड़ देता है। सोने के बछड़े के पाप के ठीक बाद परमेश्वर अपना वर्णन "दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त" के रूप में करते हैं। और दूसरी तरफ़ यीशु ने ही नरक के बारे में सबसे अधिक चेतावनी दी और मंदिर में मेज़ें उलट दीं। एक ही परमेश्वर, एक ही चरित्र, दो वाचाओं में प्रकट। जो यीशु को देखता है वह पिता को देखता है, और वही पिता मूसा के सामने अपना नाम पुकार रहे थे।

आज इसे जीवन में उतारना

अगर हर नाम किसी संकट में दिया गया था, तो आपके संकट भी उन नामों के दरवाज़े हैं। यह कोई भावुक बात नहीं, यह एक व्यावहारिक अभ्यास है।

मान लीजिए महीने के आख़िरी हफ़्ते में खाते में पैसे नहीं बचे और बच्चे की फ़ीस बाकी है। आप "यहोवा यिरे" को सिर्फ़ एक सुंदर वाक्य की तरह नहीं दोहराते; आप याद करते हैं कि अब्राहम ने यह नाम तब रखा था जब वह पहाड़ पर चढ़ चुका था, चाकू उठा चुका था, और प्रबंध आख़िरी क्षण में आया था, पहले नहीं। वह नाम आपको चिंता से मुक्त नहीं करता कि कुछ करना ही न पड़े, वह आपको उस भरोसे में टिकाता है कि चढ़ाई के अंत में परमेश्वर खाली हाथ नहीं मिलते।

या मान लीजिए दफ़्तर में कोई आपके विरुद्ध राजनीति कर रहा है और आप रात भर जवाब सोचते रहते हैं। नीतिवचन 18:10 का गढ़ यहीं काम आता है। गढ़ में भागने का अर्थ है हथियार नीचे रखकर अंदर जाना; व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है कि बदला लेने की योजना की जगह आप प्रार्थना में परमेश्वर को अपना न्यायी मानकर सौंप देते हैं, और फिर सो जाते हैं। यह कमज़ोरी नहीं, रणनीति है।

जब शरीर धोखा देता है, जब रिपोर्ट अच्छी नहीं आती, जब बुढ़ापे की थकान आत्मा तक पहुँच जाती है, तब भजन संहिता 23:1 आपको यह नहीं बताता कि रास्ता आसान होगा। यह बताता है कि रास्ते पर कोई आगे चल रहा है। चरवाहा भेड़ को हर घाटी से बचाता नहीं, वह हर घाटी में साथ चलता है।

और अकेलेपन में, जब मेसेज का कोई जवाब नहीं आता और घर सूना लगता है, हाजिरा का नाम याद कीजिए: वह परमेश्वर जो मुझे देखते हैं। किसी ने आपका जन्मदिन भुला दिया हो, पर उस परमेश्वर ने आपके आँसुओं को अपनी कुप्पी में रखा है।

एक सरल अभ्यास: इस सप्ताह जो भी चिंता आपको सबसे ज़्यादा सताती है, उसके सामने कागज़ पर परमेश्वर का वह नाम लिखिए जो ठीक उसी ज़रूरत से मेल खाता है, और उस नाम के साथ जुड़ी बाइबल की कहानी पढ़िए। नाम को कहानी से काटिए मत; कहानी ही नाम का प्रमाण है।

नाम कहानी के बिना नारा बन जाता है, प्रमाण नहीं।

दर्पण

अब सीधी बात। आप परमेश्वर के कितने नाम जानते हैं, यह सवाल उतना चुभता नहीं जितना यह: आप संकट में सबसे पहले किसका नाम लेते हैं? फ़ोन की स्क्रीन का, किसी दोस्त का, अपने अनुभव का, या उनका?

हममें से बहुत लोग परमेश्वर के नामों की सूची दिल से सुना सकते हैं और फिर भी रात भर करवटें बदलते हैं, क्योंकि जो नाम हमने याद किए हैं वे सिर में हैं, गढ़ में हम कभी घुसे ही नहीं। नीतिवचन 18:10 किसी जानकारी का वादा नहीं करता, वह दौड़ने का निमंत्रण देता है। और दौड़ने का मतलब है अपने नियंत्रण का भ्रम छोड़ना। यही सबसे कठिन है। आप पैसे को अपना गढ़ बना सकते हैं, अपनी नौकरी की सुरक्षा को, अपने बच्चों की उपलब्धियों को, अपनी सेहत को, अपनी धार्मिकता को भी। पर इनमें से कोई भी दीवार उस रात नहीं टिकेगी जब डॉक्टर कुछ और कहेगा।

दूसरी बात और भी असहज है। जब आप मसीह के नाम से बुलाए जाते हैं, तो आपका जीवन उस नाम पर लगा हुआ हस्ताक्षर है। आपका घर में बोलने का लहजा, आपका व्यापार में हिसाब, आपके फ़ोन पर रात में खुलने वाली चीज़ें, ये सब उस नाम के साथ जुड़ जाती हैं। "नाम व्यर्थ लेना" तब केवल ज़ुबान का नहीं, पूरे जीवन का मामला बन जाता है।

और फिर भी, यही पृष्ठ आपको डराने के लिए नहीं लिखा गया। निर्गमन 34:6 उसी इस्राएल को बोला गया जो अभी-अभी बछड़े के आगे नाचकर आया था। अगर आज आप टूटे हुए, शर्मिंदा, या थके हुए हैं, तो जान लीजिए कि परमेश्वर का नाम आपकी असफलता के बाद भी वही रहता है। वे बदलते नहीं। "मैं हूँ" का अर्थ यह भी है कि आपके सबसे बुरे दिन में भी वे वहीं होंगे, और वैसे ही होंगे।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को परमेश्वर के नाम समझाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप उनके अपने नामों से शुरू करें। पूछिए: "तुम्हें घर में कौन-कौन से नामों से बुलाया जाता है?" कोई "बेटा" कहता है, कोई "शरारती", कोई स्कूल में पूरा नाम लेता है। फिर समझाइए कि हर नाम कुछ बताता है, कि वह व्यक्ति आपके लिए कौन है। उसी तरह परमेश्वर के भी कई नाम हैं, क्योंकि वे हमारे लिए बहुत कुछ हैं।

फिर एक तस्वीर दीजिए जो बच्चा पकड़ सके: परमेश्वर चरवाहे हैं, और चरवाहा अपनी भेड़ों को नाम से जानता है, उन्हें पानी तक ले जाता है, और रात में उनकी रखवाली करता है। भजन संहिता 23:1 की पहली पंक्ति बच्चे आसानी से याद कर लेते हैं। और जब वे डरें, तो उन्हें सिखाइए कि परमेश्वर का नाम एक मज़बूत किले जैसा है जिसमें भागकर छिप सकते हैं। बच्चे किले के खेल समझते हैं; यह चित्र उनके मन में बैठ जाता है।

उम्र के हिसाब से गहराई अलग होनी चाहिए। छोटे बच्चों (3 से 6 साल) के लिए एक या दो चित्र ही काफ़ी हैं, जैसे चरवाहा और किला। स्कूल जाने वाले बच्चों (7 से 12 साल) के साथ आप मूसा और जलती झाड़ी की पूरी कहानी पढ़ सकते हैं और समझा सकते हैं कि "मैं हूँ" का क्या मतलब है। किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के साथ यूहन्ना 8:58 पर खुलकर बात कीजिए, क्योंकि वे यह सवाल पूछने लगते हैं कि यीशु ने अपने बारे में क्या दावा किया था।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

परमेश्वर के नाम कितने हैं?

बाइबल कोई निश्चित गिनती नहीं देती, और यही बात महत्वपूर्ण है। कुछ परंपराएँ सात प्रमुख यौगिक नामों की बात करती हैं, कुछ सोलह या उससे अधिक की, और यदि आप परमेश्वर के सभी वर्णनात्मक उपाधियों को जोड़ें तो संख्या सैकड़ों तक पहुँच जाती है। कारण सरल है: हर नाम किसी विशेष परिस्थिति में प्रकट हुआ, और परिस्थितियाँ अनगिनत हैं। परमेश्वर इतने बड़े हैं कि एक नाम उन्हें समेट नहीं सकता। इसलिए नामों को गिनने की बजाय उन्हें जानना अधिक लाभदायक है।

"यहोवा" नाम का अर्थ क्या है?

यह नाम इब्रानी के चार अक्षरों से आता है जो "होना" क्रिया से जुड़े हैं, और इसका मूल निर्गमन 3:14 के "मैं जो हूँ सो हूँ" में है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर स्वयंभू हैं, किसी पर निर्भर नहीं, हमेशा से हैं और हमेशा रहेंगे, और वे अपनी वाचा में अटल हैं। जब हिंदी बाइबल में "यहोवा" छपा दिखता है, तो वह परमेश्वर का व्यक्तिगत, वाचा का नाम है, न कि केवल "ईश्वर" जैसा सामान्य शब्द।

क्या परमेश्वर का असली नाम "यहोवा" है या "याहवे"?

इब्रानी में मूल रूप से केवल व्यंजन लिखे जाते थे, और श्रद्धा के कारण यहूदी लोग इस नाम को पढ़ते समय "अदोनाय" कहते थे, इसलिए असली उच्चारण समय के साथ अनिश्चित हो गया। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि उच्चारण "याहवे" के करीब था, जबकि "यहोवा" रूप मध्यकालीन अनुवाद परंपरा से आया और हिंदी बाइबल में स्थापित हो गया। दोनों रूप एक ही परमेश्वर को इंगित करते हैं, और बाइबल कहीं भी सही उच्चारण को उद्धार या प्रार्थना की शर्त नहीं बनाती।

एलोहीम और यहोवा में क्या अंतर है?

"एलोहीम" एक सामान्य शब्द है जिसका अर्थ है परमेश्वर या शक्तिशाली व्यक्ति, और यह सृष्टिकर्ता के रूप में उनकी शक्ति और महिमा पर ज़ोर देता है; उत्पत्ति 1:1 में यही शब्द इस्तेमाल हुआ है। "यहोवा" उनका व्यक्तिगत, वाचा का नाम है जो रिश्ते पर ज़ोर देता है। सरल शब्दों में कहें तो एलोहीम बताता है कि वे कितने बड़े हैं, और यहोवा बताता है कि वे कितने निकट हैं। बाइबल दोनों को साथ रखती है ताकि हम न तो उन्हें छोटा समझें, न दूर।

"मैं हूँ जो मैं हूँ" का मतलब क्या है?

निर्गमन 3:14 में दिया गया यह उत्तर मूसा के सवाल का जवाब है कि परमेश्वर का नाम क्या बताया जाए। इसका अर्थ कम से कम तीन बातें हैं: परमेश्वर का अस्तित्व किसी और पर निर्भर नहीं, उनका चरित्र बदलता नहीं, और वे अपनी उपस्थिति में सक्रिय हैं, यानी "मैं वहाँ हूँ जहाँ तुम्हें ज़रूरत होगी"। यह नाम किसी परिभाषा में बँधने से इनकार भी करता है; परमेश्वर स्वयं तय करते हैं कि वे कौन हैं, हम नहीं।

क्या यीशु और यहोवा एक ही हैं?

नया नियम यह संबंध बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है। यूहन्ना 8:58 में यीशु कहते हैं, "पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ", और सुननेवाले इसे परमेश्वर होने का दावा समझकर पत्थर उठाते हैं। यशायाह 9:6 उस शिशु को "पराक्रमी परमेश्वर" कहता है, और फिलिप्पियों 2 कहता है कि यीशु को वह नाम दिया गया जो सब नामों में श्रेष्ठ है। त्रिएकता की शिक्षा के अनुसार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा एक ही परमेश्वर हैं, तीन व्यक्तियों में, और यीशु पिता से अलग परमेश्वर नहीं हैं।

परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेना क्या होता है?

निर्गमन 20:7 में "व्यर्थ" का अर्थ है खोखला या झूठा। इसलिए यह आज्ञा केवल गाली या लापरवाह बोलचाल तक सीमित नहीं है। परमेश्वर के नाम का उपयोग अपने फ़ैसलों, अपने लालच या अपने पूर्वाग्रहों को उचित ठहराने के लिए करना, झूठी कसम खाना, या उनके नाम का दावा करते हुए ऐसा जीवन जीना जो उनके चरित्र को झुठलाए, ये सब उसी उल्लंघन में आते हैं। सबसे गंभीर रूप तब होता है जब उनका नाम दूसरों को चोट पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया जाए।

क्या प्रार्थना में परमेश्वर के इब्रानी नाम लेना ज़रूरी है?

नहीं। नया नियम यूनानी भाषा में लिखा गया और उसमें परमेश्वर के लिए सामान्य यूनानी शब्द इस्तेमाल हुए। यीशु ने अपने शिष्यों को सिखाया कि वे परमेश्वर को "हे हमारे पिता" कहकर पुकारें, और प्रेरितों ने प्रार्थनाएँ अपनी भाषा में कीं। इब्रानी नाम सीखना उपयोगी है क्योंकि वे परमेश्वर के चरित्र के अलग-अलग पहलू खोलते हैं, पर वे किसी आवश्यक सूत्र की तरह नहीं हैं। परमेश्वर हिंदी, भोजपुरी, तमिल और आँसुओं की भाषा भी पूरी तरह समझते हैं।

"यहोवा यिरे" का अर्थ क्या है और इसे कब पुकारें?

इसका अर्थ है "यहोवा प्रबंध करेंगे", और यह नाम उत्पत्ति 22 में अब्राहम ने उस पहाड़ पर रखा जहाँ परमेश्वर ने इसहाक के बदले मेढ़ा दिया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रबंध तब आया जब अब्राहम आज्ञा मानते हुए आख़िरी कदम तक पहुँच चुका था। इसलिए यह नाम आलस्य का बहाना नहीं, आज्ञाकारिता में भरोसे की घोषणा है। आर्थिक तंगी, अनिश्चित भविष्य या किसी बड़े समर्पण के क्षण में यह नाम आपको याद दिलाता है कि आपूर्ति परमेश्वर की ज़िम्मेदारी है।

"परमेश्वर के नाम में" प्रार्थना करने का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है उनके अधिकार और उनके चरित्र के अनुसार प्रार्थना करना, न कि प्रार्थना के अंत में जोड़ा गया कोई जादुई वाक्य। जब आप "यीशु के नाम में" कहते हैं, तो आप स्वीकार कर रहे हैं कि आपके पास परमेश्वर के सामने आने का अपना कोई अधिकार नहीं, आप मसीह के किए हुए काम के आधार पर आ रहे हैं। प्रेरितों के काम 4:12 कहता है कि स्वर्ग के नीचे कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें। यह विनम्रता की भाषा है, शक्ति की तकनीक नहीं।

क्या गलत उच्चारण से प्रार्थना अस्वीकार हो जाती है?

बिलकुल नहीं। बाइबल में चोर ने क्रूस पर केवल "हे यीशु" कहा और उसी दिन स्वर्ग का वादा पाया। भजनकार बार-बार लिखते हैं कि परमेश्वर टूटे हुए मन को तुच्छ नहीं जानते। परमेश्वर उच्चारण के विशेषज्ञ नहीं खोजते, वे भरोसा करने वाले हृदय खोजते हैं। जो शिक्षाएँ कहती हैं कि एक विशेष उच्चारण के बिना आपकी प्रार्थना अटक जाती है, वे लोगों को डर में बाँधती हैं, और यह सुसमाचार के अनुग्रह के विपरीत है।

बाइबल में परमेश्वर के नामों की सूची कहाँ से शुरू करूँ?

सूची से नहीं, कहानियों से शुरू कीजिए। उत्पत्ति 16 में हाजिरा, उत्पत्ति 22 में अब्राहम, निर्गमन 3 और 34 में मूसा, निर्गमन 17 में अमालेकियों से युद्ध, न्यायियों 6 में गिदोन, भजन संहिता 23 में दाऊद, यिर्मयाह 23 और यहेजकेल 48 में भविष्यवक्ता, और फिर यूहन्ना का सुसमाचार जहाँ यीशु के "मैं हूँ" वचन आते हैं। हर जगह पहले संदर्भ पढ़िए, फिर नाम पर ठहरिए। इस तरह नाम याद नहीं रहते, वे आपके भीतर बस जाते हैं।

अंत में

परमेश्वर के नाम कोई शब्दावली नहीं जिसे रटकर परीक्षा पास की जाए। वे उन जगहों के निशान हैं जहाँ परमेश्वर किसी डरे हुए, भागे हुए, टूटे हुए इंसान से मिले, और उस मुलाकात के बाद उस इंसान के पास अपने परमेश्वर को पुकारने के लिए एक नया शब्द था। जलती झाड़ी, मोरिय्याह पर्वत, जंगल का सोता, युद्ध की वेदी, भेड़ों की घाटी, बन्धुआई का शहर, और अंत में एक चरनी और एक क्रूस। हर जगह एक नाम उगा।

हर नाम उस जगह का पत्थर है जहाँ परमेश्वर मिले।

इसलिए यह पृष्ठ पढ़ने के बाद सबसे अच्छी बात यह नहीं होगी कि आप और नाम याद कर लें, बल्कि यह कि आप अपने आज के संकट को लेकर उनमें से किसी एक नाम में घुस जाएँ, जैसे नीतिवचन 18:10 कहता है। एक बाइबल खोलिए, निर्गमन 3 और 34 धीरे-धीरे पढ़िए, फिर यूहन्ना 8 पढ़िए और देखिए कि वही आवाज़ अब मनुष्य बनकर बोल रही है। और जब आज रात आप प्रार्थना में बैठें, तो किसी लंबी भूमिका की ज़रूरत नहीं। बस उनका नाम पुकारिए। वे सुनते हैं, और वे बदलते नहीं।

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अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 1 शमूएल 18:24

दाऊद के शब्द कर्मचारियों के मुँह से शाऊल तक पहुँचे: "मैं तो निर्धन और तुच्छ मनुष्य हूँ।" गोलियत को मार…

प्रार्थना संपादकीय पर यहेजकेल 17:12

पिता, जब सब कुछ छिन जाता है और समझ नहीं आता कि इसका अर्थ क्या है, तब मुझे अपनी आवाज़…

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