विषय

उपवास कैसे करें: बाइबल के अनुसार उपवास का सही तरीका

परिचय

सुबह साढ़े दस बजे हैं। पेट में एक हल्का-सा खिंचाव शुरू हो चुका है, और मन बार-बार रसोई की तरफ़ भाग रहा है। आपने आज उपवास रखा है, किसी बड़े संकट के लिए, या शायद बस इसलिए कि परमेश्वर के साथ आपका रिश्ता ठंडा-ठंडा लग रहा था। और तभी वह सवाल उठता है जो लगभग हर उपवास करने वाले के मन में उठता है: अब आगे क्या? क्या यह भूख ही सब कुछ है?

बहुत लोग उपवास को एक तरह का आध्यात्मिक दबाव मानते हैं, मानो परमेश्वर की मुट्ठी खुलवाने का तरीका। कुछ लोग इसे शरीर की सफ़ाई समझते हैं। कुछ ने बचपन में देखा कि लोग उपवास के दिन चिड़चिड़े हो जाते हैं और सोच लिया कि यह भक्ति है।

इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि पवित्रशास्त्र उपवास को कैसे समझाता है, उत्पत्ति से प्रकाशितवाक्य तक यह सूत्र कहाँ-कहाँ दिखता है, कौन-सी गलतफ़हमियाँ इसे बिगाड़ देती हैं, और व्यवहार में उपवास कैसे किया जाए, कब, कितना, किस मन से, और उसे तोड़ने के बाद क्या करना है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

यह पृष्ठ उपवास को "आत्मिक पराक्रम" के रूप में नहीं, बल्कि शरीर की प्रार्थना के रूप में पढ़ता है। उपवास परमेश्वर से सौदा नहीं है; यह वह प्रार्थना है जो जीभ नहीं, पेट बोलता है। जब खाना हट जाता है, तब भूख एक आवाज़ बन जाती है: "प्रभु, मुझे रोटी से ज़्यादा आपकी ज़रूरत है।"

और यह भूख हमें अपने भीतर बन्द नहीं करती, बल्कि पड़ोसी की मेज़ तक ले जाती है। यशायाह 58 में परमेश्वर उपवास को दान, न्याय और खुले घर से जोड़ते हैं। इसलिए हम पूछेंगे: आपके उपवास ने आपकी थाली किसके लिए खाली की?

बाइबल उपवास के बारे में क्या कहती है?

पवित्रशास्त्र में उपवास कहीं भी एक तकनीक की तरह नहीं सिखाया गया। यह हमेशा किसी टूटे हुए, तड़पते, या समर्पित हृदय का स्वाभाविक व्यवहार है। सबसे बुनियादी अर्थ में उपवास का मतलब है: एक निश्चित समय के लिए भोजन (और कभी-कभी पानी भी) स्वेच्छा से छोड़ देना, ताकि परमेश्वर की खोज पहले नम्बर पर आ जाए।

पुराने नियम में इसका दिल योएल 2:12 में खुलता है, जहाँ परमेश्वर एक ऐसी जाति से बात करते हैं जिसका सब कुछ बिखर चुका है: "तौभी यहोवा की यह वाणी है, अब भी सुनो; उपवास के साथ रोते-पीटते अपने पूरे मन से फिरकर मेरे पास आओ।" ध्यान दीजिए, आज्ञा उपवास की नहीं, "पूरे मन से फिरकर मेरे पास आओ" की है। उपवास उस मन-फिराव का साथी है, उसका विकल्प नहीं। और अगले पद में परमेश्वर कहते हैं कि कपड़े नहीं, मन फाड़ो। यही पूरे विषय की चाबी है।

फिर यशायाह 58:6-7 आता है, जहाँ परमेश्वर उन लोगों को टोकते हैं जो उपवास करके भी अपने मज़दूरों को दबा रहे थे: "जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूँ, वह यह है कि अन्याय से बनाए हुए बन्धनों को तोड़ना, जूए की पट्टियों को खोल देना, अन्धेर खाए हुओं को छुड़ाना, और सब जूओं को तोड़ देना है। क्या वह यह नहीं है कि अपनी रोटी भूखों को बाँट देना, और अनाथों और मारे-मारे फिरते हुओं को अपने घर ले आना, किसी को नंगा देखकर वस्त्र पहिनाना, और अपने जाति भाइयों से अपने को न छिपाना?"

यह पद उपवास को बदल देता है। परमेश्वर यह नहीं कह रहे कि भूखा रहना बेकार है; वे कह रहे हैं कि भूख का मक़सद संवेदना है। जो अपनी मर्ज़ी से भूखा रहता है, वह उसे समझने लगता है जो मजबूरी में भूखा है। उपवास का पेट खाली होता है ताकि हाथ खुल जाएँ।

नए नियम में प्रभु यीशु उपवास को न बढ़ाते हैं, न मिटाते हैं; वे उसे शुद्ध करते हैं। मत्ती 6:16-18 में वे कहते हैं: "और जब तुम उपवास करो, तो कपटियों के समान तुम्हारे मुँह पर उदासी न छाई रहे, क्योंकि वे अपना मुँह बनाए रहते हैं ताकि लोग उन्हें उपवासी जानें; मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। परन्तु जब तू उपवास करे तो अपने सिर पर तेल मल और मुँह धो, ताकि लोग नहीं परन्तु तेरा पिता जो गुप्त में है, तुझे उपवासी जाने; इस प्रकार तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा।"

यहाँ प्रभु "यदि तुम उपवास करो" नहीं कहते, "जब तुम उपवास करो" कहते हैं। यह उनके चेलों के जीवन का सामान्य हिस्सा माना गया है, ठीक दान देने और प्रार्थना करने की तरह। लेकिन शर्त एक है: यह गुप्त रहे। जैसे ही उपवास दर्शक ढूँढ़ने लगता है, वह प्रार्थना से प्रदर्शन बन जाता है, और उसका प्रतिफल तालियों के साथ ही ख़त्म हो जाता है।

आरम्भिक कलीसिया में उपवास फ़ैसलों और भेजने के साथ जुड़ा दिखता है। प्रेरितों के काम 13:2-3 कहता है: "जब वे उपवास के साथ प्रभु की उपासना कर रहे थे, तो पवित्र आत्मा ने कहा, मेरे लिये बरनबास और शाऊल को अलग करो, उस काम के लिये जिसके लिये मैं ने उन्हें बुलाया है। तब उन्होंने उपवास और प्रार्थना करके और उन पर हाथ रखकर उन्हें विदा किया।" यहाँ उपवास शोक का नहीं, सुनने का साधन है। जब मेज़ की आवाज़ धीमी होती है, तो आत्मा की आवाज़ साफ़ सुनाई देती है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

उपवास का सूत्र मनुष्य के इतिहास के पहले पन्नों से जुड़ा है, हालाँकि उत्पत्ति में शब्द "उपवास" नहीं आता। अदन में परमेश्वर ने एक ही परहेज़ माँगा था: एक वृक्ष का फल न खाना। पहला पाप खाने से जुड़ा था, भूख के ज़रिये भरोसा तोड़ने से। इसलिए यह अचानक नहीं कि छुटकारे का इतिहास बार-बार भोजन और परहेज़ के इर्द-गिर्द घूमता है।

मूसा सीनै पर चालीस दिन बिना रोटी और पानी रहा, और वहाँ वाचा मिली। लैव्यव्यवस्था 16:29 में प्रायश्चित के दिन इस्राएल को कहा गया कि "अपने-अपने प्राण को दुःख देना", जिसे यहूदी परम्परा ने सदा उपवास के रूप में समझा। यही एकमात्र उपवास था जिसकी व्यवस्था ने आज्ञा दी; बाक़ी सब स्वैच्छिक थे, और इसीलिए वे हृदय की सच्ची हालत दिखाते थे।

न्यायियों 20:26 और 1 शमूएल 7:6 में हारी हुई जाति उपवास करके यहोवा की ओर मुड़ती है। दाऊद अपने बीमार बच्चे के लिए उपवास करता है (2 शमूएल 12:16), और जब बच्चा मर जाता है, तो वह उठकर खाना खाता है, यह मानते हुए कि उपवास परमेश्वर को मजबूर करने का यन्त्र नहीं था। एस्तेर 4:16 में उपवास मृत्यु के मुँह में जाने की तैयारी बन जाता है: "तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम सब मिलकर मेरे लिये उपवास करो, तीन दिन रात न खाओ, न पीओ; और मैं भी अपनी सहेलियों समेत उपवास करूँगी। और ऐसे ही नियम के विरुद्ध मैं राजा के पास जाऊँगी। और यदि मैं नाश हो जाऊँ तो हो जाऊँ।" यहाँ उपवास पूरे समुदाय का साझा साहस है, एक पूरी जाति की सामूहिक सिसकी।

नहेमायाह खण्डहर हुई शहरपनाह की खबर सुनकर उपवास करता है, एज्रा यात्रा से पहले उपवास की घोषणा करता है, दानिय्येल भविष्यवाणियों को समझने के लिए उपवास करता है, और नीनवे का राजा राख में बैठकर उपवास की घोषणा करता है, और परमेश्वर तरस खाते हैं। साथ ही जकर्याह 7 में परमेश्वर उन्हीं लोगों से चुभता सवाल पूछते हैं: क्या तुमने मेरे लिये उपवास किया, या अपने लिये?

और फिर सूत्र मसीह पर आकर टिकता है। जंगल में यीशु चालीस दिन उपवास करते हैं और शैतान की पहली परीक्षा ठीक रोटी पर आती है। जहाँ आदम भरे बाग़ में गिरा, वहाँ मसीह खाली जंगल में खड़े रहे। जब लोगों ने पूछा कि उनके चेले उपवास क्यों नहीं करते, तो उन्होंने उत्तर दिया कि जब तक दूल्हा साथ है, बारातियों का शोक करना अजीब है, पर वे दिन आएँगे जब दूल्हा उठा लिया जाएगा, और तब वे उपवास करेंगे। यही आज हमारी जगह है: हम उठे हुए मसीह के लोग हैं, पर उनके आने की बाट जोहते हुए। इसलिए हमारा उपवास निराशा का नहीं, लालसा का उपवास है।

पवित्रशास्त्र का अन्त एक मेज़ पर होता है। प्रकाशितवाक्य में मेम्ने के विवाह का भोज है, और वहाँ लिखा है कि लोग फिर भूखे और प्यासे न होंगे। हर मसीही उपवास उसी भोज की ओर इशारा करता है। हम खाली रहते हैं क्योंकि एक मेज़ आ रही है।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रान्ति: उपवास परमेश्वर पर दबाव डालने का तरीका है। मन कहता है कि अगर मैं दो दिन भूखा रहूँ, तो प्रार्थना का वज़न बढ़ जाएगा। पर यशायाह 58 उन लोगों की शिकायत से शुरू होता है जो कहते हैं, हमने उपवास किया, फिर आपने ध्यान क्यों नहीं दिया? परमेश्वर का उत्तर यह है कि उनका उपवास झगड़े और शोषण के साथ चल रहा था। उपवास कोई सिक्का नहीं जो आप स्वर्ग की मशीन में डालें। यह सौदा नहीं, समर्पण है। अनुग्रह ख़रीदा नहीं जाता; वह मसीह के क्रूस पर पहले ही दिया जा चुका है।

दूसरी भ्रान्ति: उपवास से पाप धुलते हैं या शरीर पवित्र होता है। इब्रानियों की पूरी दलील यही है कि पाप के लिए एक ही बलिदान पर्याप्त है, यीशु मसीह का। भूखा रहना प्रायश्चित नहीं है। हाँ, उपवास पश्चाताप के साथ चल सकता है, जैसे योएल 2:12 में, पर वहाँ भी क्षमा परमेश्वर की करुणा से आती है, न कि खाली पेट से। जो सोचता है कि उपवास से वह अपने आप को साफ़ कर रहा है, वह अनजाने में क्रूस को छोटा कर देता है।

तीसरी भ्रान्ति: आत्मिक लोग उपवास करते हैं, कमज़ोर लोग नहीं। लूका 18 का फरीसी ठीक यही सोचता था; वह प्रार्थना में गिनाता है कि वह सप्ताह में दो बार उपवास करता है, और घर बिना धर्मी ठहराए जाता है। मत्ती 6:16-18 इसी बीमारी की दवा है। यदि आपके उपवास का कोई हिस्सा भी चाहता है कि लोग जानें, तो वह हिस्सा उपवास नहीं, विज्ञापन है। इसका इलाज छिपाव है: सिर पर तेल, धुला मुँह, सामान्य चेहरा।

चौथी भ्रान्ति: कुछ ख़ास दुष्टात्माएँ या समस्याएँ केवल उपवास से हटती हैं, इसलिए उपवास एक हथियार-तकनीक है। यहाँ लोग मत्ती 17:21 का हवाला देते हैं: "परन्तु यह जाति बिना प्रार्थना और उपवास के नहीं निकलती।" (कई प्राचीन हस्तलिपियों में यह पद नहीं है और मरकुस 9:29 में केवल प्रार्थना का उल्लेख है, इसलिए विनम्र रहना अच्छा है।) पर यीशु के जवाब की जड़ पहले ही खुल जाती है, जहाँ वे चेलों के "अल्प विश्वास" की बात करते हैं। यह पद कहता है कि कुछ लड़ाइयाँ ऊपरी उत्साह से नहीं, बल्कि उस गहरे, टिके हुए, परमेश्वर पर निर्भर जीवन से जीती जाती हैं जिसमें प्रार्थना और उपवास आम बात हैं। उपवास मन्त्र नहीं है; यह निर्भरता का अभ्यास है। कुलुस्सियों 2 चेताता है कि "मत खा, मत चख" वाले नियम शरीर की अभिलाषाओं को रोक नहीं सकते; बदलाव मसीह के साथ जुड़े रहने से आता है।

आज इसे जीवन में उतारना

तो व्यवहार में उपवास कैसे करें? पहला कदम है कारण चुनना, क्योंकि बिना कारण का उपवास जल्दी ही डाइट बन जाता है। बाइबल में उपवास चार तरह के मौक़ों पर दिखता है: पश्चाताप (योएल 2:12), संकट और विनती (एस्तेर 4:16), मार्गदर्शन और भेजना (प्रेरितों के काम 13:2-3), और परमेश्वर की तड़प (लूका 2 में हन्ना, जो उपवास और प्रार्थना करती रही)। अपनी परिस्थिति को इनमें से किसी एक के सामने रखिए और लिखकर तय कीजिए कि आप किस बात के लिए परमेश्वर के सामने खाली हाथ खड़े होना चाहते हैं।

दूसरा, मात्रा तय कीजिए, हिम्मत के हिसाब से नहीं, समझदारी के हिसाब से। शुरुआत के लिए एक भोजन छोड़ना काफ़ी है, फिर सुबह से शाम तक, फिर पूरे चौबीस घण्टे। पानी पीते रहिए; बाइबल में पानी छोड़ने वाले उपवास अपवाद हैं, संकट की चरम घड़ियों के लिए (जैसे एस्तेर 4:16), और वे तीन दिन से आगे नहीं जाते। जिसे मधुमेह, गर्भावस्था, दुर्बलता, दवाओं की निर्भरता या खाने से जुड़ी बीमारी है, वह भोजन के बजाय कुछ और छोड़ सकता है, मोबाइल, मनोरंजन, ख़रीदारी, सोशल मीडिया। परमेश्वर आपकी सेहत के विरुद्ध कुछ नहीं माँगते।

तीसरा, और यही सबसे ज़्यादा नज़रअन्दाज़ होता है: खाली हुए समय को भर दीजिए। उपवास की ताक़त भूख में नहीं, बदले हुए समय में है। भोजन के जिस आधे घण्टे में आप खाते थे, उसी में बाइबल खोलिए, कोई भजन धीरे-धीरे पढ़िए, या बस चुप बैठिए। जब पेट कुड़बुड़ाए, तो उसे घंटी की तरह लीजिए और एक वाक्य की प्रार्थना कीजिए। इस तरह भूख शिकायत नहीं, प्रार्थना बन जाती है। यह इस पृष्ठ का दिल है: उपवास शरीर की प्रार्थना है।

चौथा, यशायाह 58 वाला कदम मत छोड़िए। जो पैसा उस दिन के भोजन पर ख़र्च होता, वह किसी ज़रूरतमन्द को दे दीजिए। किसी अकेले पड़ोसी को फ़ोन कीजिए। जिस कर्मचारी या घरेलू सहायक के साथ आपका व्यवहार कठोर रहा है, उससे क्षमा माँगिए। अगर उपवास आपको नरम नहीं करता, तो वह सिर्फ़ भूख है।

पाँचवाँ, छिपाइए। घर के लोगों को बताना पड़े तो सादगी से बता दीजिए, पर उसे बातचीत का विषय न बनाइए। मत्ती 6:16-18 का सिद्धांत यही है कि दर्शक बदलने से इनाम बदल जाता है।

और अन्त में, उपवास तोड़ना भी हिस्सा है। हल्के भोजन से शुरू कीजिए, फल, दाल का पानी, दही। और मेज़ पर बैठकर धन्यवाद दीजिए, क्योंकि जिस रोटी को आपने कुछ घण्टे छोड़ा, वह भी उसी हाथ से आती है जिसने आपको मसीह दिया।

दर्पण

अब सीधे आपसे। आपके फ़्रिज में जो कुछ है, वह आपकी हिम्मत का सहारा बन चुका है या नहीं? जब दफ़्तर में अपमान होता है, जब बच्चा जवाब नहीं देता, जब रात को अकेलापन बहुत भारी लगता है, तो आपका हाथ किस चीज़ की तरफ़ जाता है? खाना, स्क्रीन, ख़रीदारी, या परमेश्वर? उपवास इस सवाल को छिपने नहीं देता। यह उस सुन्न पड़ी जगह पर उँगली रखता है जहाँ हम दिलासे के लिए परमेश्वर के बजाय किसी और चीज़ पर टिके हुए हैं।

और यह और गहरा चुभता है। अगर आप उपवास करके भी उसी दिन अपने पति या पत्नी से कठोरता से बोलते हैं, अगर आप भूखे रहकर भी उस आदमी का हिसाब नहीं चुकाते जिसका पैसा आपने रोक रखा है, तो यशायाह 58 आपके बारे में बात कर रहा है, मेरे बारे में भी। परमेश्वर को हमारी भूख की ज़रूरत नहीं है; उन्हें हमारा खुला हाथ चाहिए।

पर इसी बात में आज़ादी भी है। आपको उपवास करके अपने आप को साबित नहीं करना है। आपको परमेश्वर का प्रेम कमाना नहीं है; क्रूस पर वह पहले ही उतर आया है। इसलिए आप डरे हुए नहीं, बल्कि प्यासे आदमी की तरह उपवास कर सकते हैं। यह ऐसा अनुशासन नहीं जो आपको ऊपर चढ़ाए; यह वह खिड़की है जो आप उस हवा के लिए खोलते हैं जो पहले से बाहर बह रही है।

तो एक ईमानदार सवाल: पिछली बार आपने कब कोई चीज़ इसलिए छोड़ी थी कि परमेश्वर का सामीप्य उससे ज़्यादा प्यारा लगा? अगर याद न आए, तो अपने आप को दोष देने की ज़रूरत नहीं। बस एक भोजन चुन लीजिए, इस सप्ताह का कोई एक, और उसकी जगह उनके सामने बैठ जाइए। वे किसी बड़े प्रदर्शन का इंतज़ार नहीं कर रहे। वे आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को उपवास समझाना मुश्किल लगता है, क्योंकि उनके लिए खाना प्रेम की भाषा है। इसलिए शुरुआत भूख से नहीं, प्रेम से करें। आप कह सकते हैं: "जब हमें कोई बहुत प्यारा लगता है, तो हम उसके लिए कुछ छोड़ देते हैं। जैसे तुम अपने दोस्त के साथ खेलने के लिए अपनी पसंद का कार्टून छोड़ देते हो। उपवास का मतलब है, परमेश्वर के साथ समय बिताने के लिए कुछ देर खाना छोड़ देना, ताकि हमारा मन कहे, प्रभु, आप मेरे लिए खाने से भी ज़्यादा ज़रूरी हैं।"

छोटे बच्चों से भोजन छोड़ने की अपेक्षा न करें। उनके लिए "उपवास" मिठाई छोड़ना, कोई खिलौना किसी और को देना, या टीवी का समय प्रार्थना में बदलना हो सकता है। यशायाह 58:6-7 को उनकी भाषा में लाना बहुत असर करता है: उपवास के दिन घर में इकट्ठा किया हुआ पैसा किसी ज़रूरतमन्द बच्चे को देना, या पड़ोस में किसी को खाना पहुँचाना। बच्चे जब देते हैं, तब समझते हैं।

बड़े बच्चों और किशोरों के साथ एस्तेर 4:16 पढ़िए और पूछिए कि एस्तेर डर के मारे क्या करती है और उसका उपवास किसके लिए था। यहीं से यह बात खुलती है कि उपवास डर में परमेश्वर पर टिकने का तरीका है, जादू नहीं।

Faith.network पर इस विषय की उम्र के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए, जिनके सवाल अक्सर शरीर, आत्म-नियन्त्रण और सोशल मीडिया से जुड़े होते हैं। उन पृष्ठों को साथ पढ़िए, ताकि घर की बातचीत उम्र के हिसाब से चले।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उपवास कैसे शुरू करें, अगर मैंने पहले कभी उपवास नहीं किया?

छोटा और स्पष्ट शुरू कीजिए। कोई एक दिन चुनिए और उस दिन का एक भोजन छोड़ दीजिए, मान लीजिए दोपहर का, और उस समय को प्रार्थना और बाइबल पढ़ने में लगाइए। पहले से तय कीजिए कि आप किस बात के लिए परमेश्वर के सामने आ रहे हैं और उसे एक वाक्य में लिख लीजिए। पानी पीते रहिए और किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। जब यह आसान लगने लगे, तो सुबह से शाम तक, और फिर पूरे दिन का उपवास आज़मा सकते हैं।

उपवास में पानी पी सकते हैं या नहीं?

हाँ, और आमतौर पर पीना ही चाहिए। बाइबल में सामान्य उपवास भोजन छोड़ने का है, पानी छोड़ने का नहीं। एस्तेर 4:16 जैसे बिना पानी वाले उपवास अपवाद हैं, जीवन-मरण की घड़ियों में, और वे तीन दिन तक सीमित रहते हैं। पानी छोड़ना शरीर के लिए तेज़ी से ख़तरनाक हो जाता है, इसलिए इसे किसी की नक़ल में या साहस दिखाने के लिए मत कीजिए। परमेश्वर को आपकी निर्भरता चाहिए, आपका नुक़सान नहीं।

उपवास कितने दिन का करना चाहिए?

बाइबल कोई निर्धारित अवधि नहीं देती, और यही आज़ादी है। पवित्रशास्त्र में एक दिन का उपवास सबसे आम है, कहीं तीन दिन (एस्तेर 4:16), कहीं सात दिन, कहीं इक्कीस दिन का सीमित आहार (दानिय्येल 10), और चालीस दिन केवल मूसा, एलिय्याह और यीशु के जीवन में, जो असाधारण बुलावे थे। अपनी सेहत, काम और ज़िम्मेदारियों को देखकर तय कीजिए। लम्बा उपवास लम्बाई के कारण अधिक आत्मिक नहीं होता; मन का झुकाव उसे आत्मिक बनाता है।

क्या उपवास से प्रार्थना जल्दी सुनी जाती है?

उपवास परमेश्वर की इच्छा को मोड़ता नहीं, पर हमारी प्रार्थना को गहरा करता है। दाऊद ने अपने बच्चे के लिए उपवास किया और बच्चा फिर भी मर गया (2 शमूएल 12), और उसने इसे परमेश्वर की सम्प्रभुता में स्वीकार किया। दूसरी तरफ़ प्रेरितों के काम 13:2-3 दिखाता है कि उपवास के समय आत्मा ने स्पष्ट बोला। यानी उपवास सुनने की क्षमता बढ़ाता है, दबाव नहीं। वह प्रार्थना को तीव्र करता है, यन्त्र नहीं बनाता।

मत्ती 17:21 का क्या अर्थ है, क्या कुछ दुष्टात्माएँ उपवास के बिना नहीं निकलतीं?

यह पद कहता है, "परन्तु यह जाति बिना प्रार्थना और उपवास के नहीं निकलती।" यह जादुई फ़ार्मूला नहीं देता। सन्दर्भ में यीशु चेलों के अल्प विश्वास की बात करते हैं, यानी उनकी समस्या तकनीक की कमी नहीं, निर्भरता की कमी थी। प्रार्थना और उपवास उस जीवन के चिह्न हैं जो अपनी ताक़त से नहीं, परमेश्वर की सामर्थ्य से चलता है। ध्यान रहे कि कई प्राचीन हस्तलिपियों में यह पद नहीं है और मरकुस 9:29 में केवल प्रार्थना का ज़िक्र है, इसलिए इस पर पूरा सिद्धांत खड़ा करना ठीक नहीं।

क्या उपवास करना हर मसीही के लिए आज्ञा है?

नए नियम में उपवास की कोई सीधी आज्ञा या निश्चित कैलेण्डर नहीं है, पर यीशु स्पष्ट रूप से मानते हैं कि उनके लोग उपवास करेंगे। मत्ती 6:16-18 में वे "यदि तुम उपवास करो" नहीं, "जब तुम उपवास करो" कहते हैं, जैसे दान और प्रार्थना की बात करते हैं। इसलिए इसे बोझ मत बनाइए, पर विकल्प भी मत समझिए। यह उन साधनों में से एक है जिनसे परमेश्वर हमें अपने पास खींचते हैं, और अनुग्रह की शर्त नहीं, अनुग्रह का उत्तर है।

उपवास तोड़ने का सही तरीका क्या है?

धीरे-धीरे और धन्यवाद के साथ। लम्बे उपवास के बाद सीधे भारी, तेल-मसाले वाला खाना खाने से पेट में तकलीफ़ हो सकती है, इसलिए फल, दही, दाल का पानी या हल्के भोजन से शुरू कीजिए और पानी पीते रहिए। आत्मिक पक्ष भी अहम है: जो पैसा बचा है, उसे यशायाह 58:6-7 के अनुसार किसी ज़रूरतमन्द को दे दीजिए, और मेज़ पर बैठकर परमेश्वर को धन्यवाद दीजिए, क्योंकि रोटी और मसीह, दोनों उन्हीं के हाथ से आते हैं।

क्या बीमार लोग, गर्भवती स्त्रियाँ, बच्चे या बुज़ुर्ग उपवास कर सकते हैं?

परमेश्वर हमारे शरीर के विरुद्ध कोई भक्ति नहीं माँगते। मधुमेह, रक्तचाप की गम्भीर समस्या, गर्भावस्था, स्तनपान, कमज़ोरी, नियमित दवाइयाँ, या खाने से जुड़ी बीमारी वाले लोगों को भोजन छोड़ने से पहले डॉक्टर से बात करनी चाहिए, और ज़रूरत हो तो भोजन के बजाय कुछ और छोड़ना चाहिए, जैसे मोबाइल, मनोरंजन, या ख़रीदारी। बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए भी यही रास्ता बेहतर है। उपवास का दिल त्याग है, भूख नहीं।

उपवास और प्रार्थना में क्या अंतर है?

प्रार्थना शब्दों से परमेश्वर की ओर मुड़ना है; उपवास शरीर से वही बात कहना है। इसलिए बाइबल में ये दोनों लगभग हमेशा साथ चलते हैं, जैसे प्रेरितों के काम 13:2-3 में। बिना प्रार्थना का उपवास केवल भूख है, और भूख अपने आप में किसी को परमेश्वर के पास नहीं लाती। इसलिए उपवास की योजना बनाते समय पहले तय कीजिए कि आप उस बचे हुए समय में परमेश्वर से क्या कहेंगे और क्या सुनेंगे।

क्या उपवास के बारे में दूसरों को बताना गलत है?

सब हालतों में नहीं। मत्ती 6:16-18 दिखावे को मना करता है, ज़रूरी जानकारी को नहीं। घर में खाना बनाने वालों को बताना, या कलीसिया के साथ मिलकर उपवास करना, दोनों बाइबल के अनुरूप हैं, क्योंकि एस्तेर 4:16 और योएल 2 में सामूहिक उपवास दिखता है। सवाल नीयत का है: आप बता रहे हैं ताकि व्यवस्था बने, या ताकि लोग प्रभावित हों? अगर मन में तालियों की भूख है, तो चुप रहना ही सुरक्षित है।

"डैनियल उपवास" क्या है, क्या यह बाइबल में है?

दानिय्येल 1 में दानिय्येल और उसके साथी राजा का भोजन और दाखमधु ठुकराकर साग-पात और पानी लेते हैं, और दानिय्येल 10 में वह इक्कीस दिन स्वादिष्ट भोजन, माँस और दाखमधु से परहेज़ करता है। इसी से "डैनियल उपवास" का चलन आया, यानी सीमित, सादा आहार। यह एक उपयोगी रूप है, विशेष रूप से उनके लिए जो पूरी तरह भोजन नहीं छोड़ सकते, पर याद रखिए कि बाइबल इसे कोई नियम या निश्चित विधि के रूप में नहीं देती। सादगी साधन है, स्वयं लक्ष्य नहीं।

क्या उपवास से पाप क्षमा होते हैं या शरीर आत्मिक रूप से शुद्ध होता है?

नहीं। पाप की क्षमा केवल यीशु मसीह के बलिदान और उनके अनुग्रह से मिलती है, और वह विश्वास से ग्रहण की जाती है। उपवास पश्चाताप के साथ चल सकता है, जैसे योएल 2:12 में परमेश्वर कहते हैं कि उपवास के साथ पूरे मन से लौट आओ, पर वहाँ भी क्षमा उनकी करुणा से आती है, न कि खाली पेट से। यही बात शरीर की "सफ़ाई" पर भी लागू होती है; उपवास के शारीरिक लाभ हो सकते हैं, पर वे आत्मिक पवित्रता नहीं हैं।

उपवास के दिन समय कैसे बिताएँ, ताकि वह बस भूख न रह जाए?

पहले से एक साधारण योजना बना लीजिए। जिस समय आप खाते थे, उसी समय बाइबल का कोई हिस्सा पढ़िए, अच्छा होगा कि यशायाह 58 या भजन संहिता के कुछ भजन। दिन में दो या तीन बार दस-दस मिनट रुककर उस एक बात के लिए प्रार्थना कीजिए जिसके लिए आपने उपवास रखा है। जब भूख उठे, उसे प्रार्थना की घंटी मानिए और एक छोटा वाक्य कहिए। और दिन में कम से कम एक ठोस काम कीजिए किसी दूसरे के भले के लिए, कोई दान, कोई फ़ोन, कोई क्षमा।

अंत में

उपवास हमें बड़ा नहीं बनाता; यह हमें छोटा और सच्चा बनाता है। जब थाली हट जाती है, तो वे सारे सहारे दिख जाते हैं जिन पर हम चुपचाप टिके हुए थे, और उनकी जगह एक ऐसी आवाज़ सुनाई देने लगती है जो शोर में दब गई थी। इसीलिए यह पृष्ठ शुरू से यही कहता आया है कि उपवास शरीर की प्रार्थना है, कोई आत्मिक सौदेबाज़ी नहीं। परमेश्वर का प्रेम मसीह में पहले ही हमारी ओर बह चुका है; उपवास उस प्रेम को कमाने की कोशिश नहीं, उसकी प्यास है।

और यह प्यास हमेशा दो दिशाओं में जाती है, ऊपर परमेश्वर की ओर और बाहर पड़ोसी की ओर। यशायाह 58:6-7 इसे छोड़ने नहीं देता। जो उपवास हमें नरम, उदार और न्यायप्रिय नहीं बनाता, वह अभी अधूरा है।

आगे पढ़ने के लिए मत्ती 6 पूरा पढ़िए, फिर यशायाह 58 और योएल 2 को साथ रखिए, और अन्त में प्रेरितों के काम 13 और एस्तेर 4 देखिए। और पढ़ने के बाद सिर्फ़ एक काम कीजिए: इस सप्ताह का कोई एक भोजन चुनिए और उसे परमेश्वर के साथ बिताइए। वे गुप्त में देखते हैं, और वही प्रतिफल देते हैं।

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धन्यवाद संपादकीय पर दानिय्येल 2:11

ज्योतिषियों ने कहा था कि देवताओं का निवास मनुष्यों के संग नहीं है, पर पिता, आप हमारे बीच उतर आए…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर आमोस 4:9

तो भी तुम मेरी ओर न फिरे," यहोवा की यह वाणी है। यही एक वाक्य अध्याय में बार-बार लौटता है,…

प्रार्थना संपादकीय पर भजन संहिता 12:4

पिता, कई बार मुझे लगता है कि मेरे शब्द मेरे अपने हैं और मैं जो चाहूँ कह सकता हूँ। पर…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 राजाओं 20:19

यशायाह अभी अभी कह चुका था कि सब कुछ बाबेल ले जाया जाएगा, यहाँ तक कि तेरे बेटे भी। और…

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