विषय

यीशु के चमत्कार: उनके सामर्थी कामों का अर्थ और संदेश

परिचय

गलील की झील पर रात का चौथा पहर। नावें लहरों से लड़ रही हैं, चेलों के हाथ चप्पुओं पर छिल चुके हैं, और अँधेरे में कोई आकृति पानी पर चलती हुई पास आ रही है। वे चिल्ला उठते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह भूत है। ठीक उसी क्षण एक जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई देती है: "ढाढ़स बाँधो, मैं हूँ; डरो मत।"

यह दृश्य हमें एक असहज सवाल के सामने खड़ा कर देता है। क्या यीशु ने चमत्कार इसलिए किए कि लोग हैरान रह जाएँ? क्या वे शक्ति का प्रदर्शन थे, एक तरह के दिव्य करतब? या उनके पीछे कुछ और ही चल रहा था, कुछ जो उस रात की झील से कहीं आगे तक जाता है?

इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि यीशु का हर चमत्कार एक दरवाज़ा है, और उस दरवाज़े के पीछे वह दुनिया दिखती है जिसे परमेश्वर फिर से नया बनाने आए हैं। हम चारों सुसमाचारों से होकर चलेंगे, पुराने नियम की जड़ों तक जाएँगे, चार आम गलतफ़हमियों का सामना करेंगे, और अंत में पूछेंगे: इसका मेरी सोमवार की सुबह से क्या लेना-देना है?

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लेख यीशु के चमत्कारों को "प्रमाण" की तरह पेश करते हैं: देखिए, उन्होंने यह किया, इसलिए वे परमेश्वर हैं। यह सच है, पर अधूरा है। यह पृष्ठ एक अलग कोण से चलता है: यीशु के चमत्कार सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं, बल्कि नई सृष्टि की पहली किरणें हैं। हर चंगाई, हर रोटी, हर शान्त हुई आँधी, हर खुली कब्र उस संसार का छोटा-सा नमूना है जहाँ आँसू, बीमारी और मृत्यु का राज खत्म हो चुका होगा। और यह नमूना मुफ़्त नहीं मिला: जो हाथ कोढ़ी को छूता है, वही हाथ आगे चलकर कील से बिंधता है। चमत्कार क्रूस की ओर इशारा करने वाले चिन्ह हैं, उससे बचने का रास्ता नहीं।

बाइबल यीशु के चमत्कारों के बारे में क्या कहती है?

नया नियम "चमत्कार" के लिए एक नहीं, तीन शब्द इस्तेमाल करता है, और तीनों एक ही पद में इकट्ठे मिलते हैं। पिन्तेकुस्त के दिन पतरस भीड़ से कहता है, "हे इस्राएलियों, ये बातें सुनो: कि यीशु नासरी एक मनुष्य था जिसका परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण, उन सामर्थ्य के कामों और अद्भुत चिन्हों और लक्षणों से प्रगट है, जो परमेश्वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखाए, जिसे तुम आप ही जानते हो" (प्रेरितों के काम 2:22)। "सामर्थ्य के काम" बताते हैं कि इनमें शक्ति है, "अद्भुत काम" बताते हैं कि ये चकित करते हैं, और "चिन्ह" बताते हैं कि ये अपनी ओर नहीं, किसी और की ओर इशारा करते हैं। तीसरा शब्द ही सबसे ज़रूरी है। सड़क का साइनबोर्ड खुद मंज़िल नहीं होता; वह मंज़िल की ओर उँगली उठाता है।

यूहन्ना तो "चमत्कार" शब्द इस्तेमाल करता ही नहीं, वह लगातार "चिन्ह" कहता है। काना के विवाह में पानी से दाखरस बनाने के बाद वह लिखता है, "यीशु ने गलील के काना में अपना यह पहला चिन्ह दिखाकर अपनी महिमा प्रगट की और उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया" (यूहन्ना 2:11)। ध्यान दीजिए, लक्ष्य प्यासे मेहमान नहीं थे, लक्ष्य थी महिमा का प्रगट होना और चेलों का विश्वास। एक सूखती हुई शादी में अचानक बहुतायत आ जाती है, और यह उस भोज की झलक है जिसका वादा भविष्यद्वक्ताओं ने किया था।

यीशु के चिन्ह चार दायरों में फैले हैं, और चारों मिलकर एक ही कहानी कहते हैं। पहला दायरा है प्रकृति। गलील की झील पर आँधी के बीच वे जागते हैं, "तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, 'शान्त रह, थम जा!' और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया" (मरकुस 4:39)। जिस लहज़े में वे दुष्टात्माओं को डाँटते हैं, उसी लहज़े में वे आँधी को डाँटते हैं, मानो यह सृष्टि का कोई बिगड़ा हुआ हिस्सा हो जिसे फिर से उसकी जगह पर बिठाया जा रहा हो। चेलों का सवाल ही सही सवाल है: "यह कौन है, कि आँधी और पानी भी उसकी आज्ञा मानते हैं?" (मरकुस 4:41)। उसी झील पर एक और रात, "और वह रात के चौथे पहर झील पर चलते हुए उनके पास आया" (मत्ती 14:25)। यह सिर्फ़ भौतिकी का उल्लंघन नहीं है; अय्यूब 9:8 परमेश्वर के विषय में कहता है, "वह आकाश को अकेला ही फैलाता है, और समुद्र की ऊँची ऊँची लहरों पर चलता है।" जो काम बाइबल सिर्फ़ परमेश्वर का बताती है, वही काम करते हुए यीशु चेलों के पास आते हैं।

दूसरा दायरा है बीमारी। कोढ़ी, अंधे, लकवे के मारे, बहरे, लहू बहने वाली स्त्री। मत्ती इन चंगाइयों को यशायाह से जोड़ता है: "उसने आप हमारी दुर्बलताओं को ले लिया और हमारी बीमारियों को उठा लिया" (मत्ती 8:17)। यहाँ "उठा लिया" शब्द पर रुकिए। चंगाई मुफ़्त बाँटी नहीं जा रही, उठाई जा रही है, अपने ऊपर ली जा रही है।

तीसरा दायरा है दुष्टात्माओं से छुटकारा, जिसके बारे में यीशु खुद कहते हैं, "परन्तु यदि मैं परमेश्वर के आत्मा की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूँ, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है" (मत्ती 12:28)। चमत्कार राज्य का विज्ञापन नहीं, उसका आगमन है।

और चौथा दायरा है मृत्यु। नाईन नगर के फाटक पर एक विधवा अपने इकलौते बेटे की अर्थी के पीछे चल रही है, और यीशु रुक जाते हैं: "तब उसने पास आकर अर्थी को छुआ; और उठानेवाले ठहर गए, तब उसने कहा, 'हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!'" (लूका 7:14)। अर्थी को छूना उस समय अशुद्ध होना था, पर यहाँ अशुद्धता यीशु को नहीं लगती, जीवन लाश को लग जाता है। बैतनिय्याह में चार दिन की कब्र के सामने वे और भी आगे जाते हैं: "यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, 'हे लाज़र, निकल आ!'" (यूहन्ना 11:43)।

और फिर, जब सब कुछ कह दिया गया, यूहन्ना मानो कलम रोककर स्वीकार करता है: "यीशु ने और भी बहुत चिन्ह चेलों के सामने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए" (यूहन्ना 20:30)। जो लिखा गया है, वह चुना गया है, और किस मक़सद से चुना गया है यह अगला पद बताता है: "परन्तु ये इसलिए लिखे गए हैं कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ" (यूहन्ना 20:31)।

चिन्ह दिखाने के लिए नहीं, पहुँचाने के लिए होते हैं।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

यीशु के चमत्कार आसमान से अचानक नहीं टपके। वे एक लंबी कहानी का चरम हैं जो उत्पत्ति के पहले पन्ने से शुरू होती है। वहाँ परमेश्वर अपने वचन से अंधकार और गहरे जल को व्यवस्था देते हैं, और जो कुछ बनाते हैं उसे "अच्छा" कहते हैं। फिर मनुष्य का पतन आता है, और उसके साथ काँटे, पसीना, बीमारी, बिखराव और मृत्यु। बाइबल की बाक़ी पूरी कहानी इसी टूटन की मरम्मत की कहानी है।

निर्गमन में परमेश्वर अपने लोगों को गुलामी से निकालने के लिए सामर्थ्य के काम करते हैं। समुद्र दो भाग हो जाता है, जंगल में मन्ना बरसता है, चट्टान से पानी निकलता है, पीतल का साँप देखने वालों को जीवन मिलता है। अब सुसमाचारों को इसी पृष्ठभूमि पर रखिए: यीशु जंगल में भीड़ को रोटी खिलाते हैं, पानी पर चलते हैं, और अपने विषय में कहते हैं कि जैसे मूसा ने साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, वैसे ही मनुष्य के पुत्र को भी ऊँचे पर चढ़ाया जाना है। एलिय्याह और एलीशा के दिनों में विधवा का आटा नहीं घटता, मरा हुआ लड़का जीवित होता है, नामान का कोढ़ धुल जाता है, थोड़ी रोटियों से सौ लोग खा लेते हैं। यीशु इन सबको दोहराते हैं, पर बड़े पैमाने पर और अपने ही अधिकार से। एलीशा प्रार्थना करके लड़के पर लेटता है; यीशु सिर्फ़ कहते हैं, "हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!"

भविष्यद्वक्ताओं ने इस दिन का चित्र खींचा था। यशायाह 35:5-6 कहता है, "तब अंधों की आँखें खोली जाएँगी और बहिरों के कान भी खोले जाएँगे; तब लँगड़ा हरिण की सी चौकड़िया भरेगा और गूँगे अपनी जीभ से जयजयकार करेंगे।" इसीलिए जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला जेल से पूछता है कि क्या आप ही आने वाले हैं, तो यीशु कोई धर्मशास्त्रीय परिभाषा नहीं देते। वे कहते हैं: जो तुम देखते और सुनते हो, जाकर कह दो, अंधे देखते हैं, लँगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं, और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है। उत्तर चिन्हों में छिपा है, और चिन्ह यशायाह की ओर लौट जाते हैं।

पर सूत्र यहीं खत्म नहीं होता। प्रेरितों के काम में वही सामर्थ्य कलीसिया में बहती है, मगर एक नए नाम से: अब चंगाई "यीशु मसीह नासरी के नाम से" होती है। चिन्ह अब प्रेरितों की ओर नहीं, जी उठे हुए प्रभु की ओर इशारा करते हैं। और बाइबल के आख़िरी पन्नों पर वह पूरा हो जाता है जिसकी झलक गलील में मिली थी: "और वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; क्योंकि पहली बातें जाती रहीं" (प्रकाशितवाक्य 21:4)। लाज़र की कब्र के सामने जो हुआ, वह उस दिन की पहली किरण थी। नाईन की विधवा के आँसू जो उस दिन पोंछे गए, वे अंतिम दिन के आँसू पोंछने का बयाना थे।

इसलिए यीशु के चमत्कारों को समझने का सही तरीक़ा यह नहीं पूछना है, "क्या यह सचमुच हो सकता है?" बल्कि यह पूछना है, "अगर सृष्टिकर्ता स्वयं अपनी टूटी हुई सृष्टि में उतर आएँ, तो और क्या होने की उम्मीद की जाए?"

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति: चमत्कार इसलिए थे कि संदेह करने वाले मान जाएँ। अगर ऐसा होता, तो यह योजना बुरी तरह नाकाम रही। जिन्होंने लाज़र को कब्र से निकलते देखा, उनमें से कुछ सीधे जाकर यीशु को मरवाने की साज़िश में शामिल हो गए। फरीसी चंगाइयाँ अपनी आँखों से देखते थे और फिर भी और चिन्ह माँगते थे, जिस पर यीशु ने कहा कि इस दुष्ट पीढ़ी को कोई चिन्ह न दिया जाएगा। चिन्ह कठोर हृदय को नहीं तोड़ते; वे खुले हृदय को रास्ता दिखाते हैं। यही कारण है कि यूहन्ना 20:30 के बाद का पद "प्रमाण" नहीं, "विश्वास करके जीवन पाओ" कहता है। चमत्कार अदालत में पेश किया गया सबूत नहीं, प्रेम से बढ़ाया गया निमंत्रण हैं।

दूसरी भ्रांति: अगर पर्याप्त विश्वास हो, तो चंगाई ज़रूर मिलेगी। यह सिखावन लाखों दुखी लोगों पर दोहरा बोझ डाल देती है: पहले बीमारी, फिर यह ताना कि "तुम्हारा विश्वास कमज़ोर है।" बाइबल ऐसा कहीं नहीं कहती। पौलुस ने दूसरों को चंगा किया, पर अपने शरीर के काँटे के साथ जीना सीखा, और परमेश्वर का उत्तर था कि "मेरा अनुग्रह तेरे लिए बहुत है।" तीमुथियुस का पेट बार-बार खराब रहता था, त्रुफिमुस बीमार छोड़ा गया, इपफ्रुदीतुस मरते-मरते बचा। बैतहसदा के कुंड पर बहुत से बीमार पड़े थे, पर यीशु ने उस दिन एक को चंगा किया। चिन्ह चुने हुए नमूने हैं, सबका तुरंत इलाज नहीं। पूरी चंगाई का वादा पुनरुत्थान के दिन के लिए है, और वह वादा किसी के विश्वास की मात्रा पर नहीं, मसीह की विश्वसनीयता पर टिका है।

तीसरी भ्रांति: चमत्कार का मतलब है प्रकृति के नियमों का टूटना, इसलिए आधुनिक आदमी उन पर विश्वास नहीं कर सकता। जिन्होंने आँधी को थमते देखा, वे भी जानते थे कि आँधी यूँ नहीं थमती; इसीलिए तो वे डर गए। प्राचीन लोग भोले नहीं थे, वे यह भली भाँति जानते थे कि लाशें कब्र से नहीं निकलतीं और कुँवारियाँ गर्भवती नहीं होतीं। सवाल नियमों का नहीं, नियम बनाने वाले का है। जो स्वर उन नियमों को हर पल थामे हुए है, वह स्वर अगर देहधारी होकर कहे "शान्त रह, थम जा," तो यह नियम का उल्लंघन नहीं, लेखक का अपनी कहानी में उतर आना है।

चौथी भ्रांति: असली विश्वास वह है जो हर रोज़ चमत्कार ढूँढ़ता रहे, या फिर वह जो मानता है कि चमत्कार अब होते ही नहीं। बाइबल दोनों छोरों से हमें हटाती है। एक ओर यीशु ने उन्हें धन्य कहा "जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया," और वचन को चिन्हों से ऊपर रखा। दूसरी ओर परमेश्वर आज भी जीवित हैं और याकूब 5 कलीसिया को बीमारों के लिए प्रार्थना करने और तेल मलने को कहता है। जो चमत्कार का पीछा करता है, वह अक्सर मसीह से चूक जाता है; और जो चमत्कार की संभावना से ही इनकार कर देता है, वह प्रार्थना करना भूल जाता है। चिन्हों के पीछे मत भागिए, चिन्ह देने वाले के पीछे चलिए।

आज इसे जीवन में उतारना

अगर यीशु के चमत्कार नई सृष्टि की पहली किरणें हैं, तो उनका असर आपके आज पर बहुत ठोस होगा।

जब आपकी रिपोर्ट अस्पताल से आती है और शब्द ठंडे पड़ जाते हैं, तब मत्ती 8:17 आपके हाथ में एक चीज़ देता है जो आँकड़े नहीं दे सकते: आपका प्रभु बीमारी को बाहर से नहीं देखते, उन्होंने उसे अपने ऊपर उठाया है। इसलिए प्रार्थना में चंगाई माँगना कोई बचकानी बात नहीं। हिम्मत से माँगिए, पूरे मन से माँगिए, और साथ ही गतसमनी की तरह कहिए कि "फिर भी आपकी इच्छा पूरी हो।" यह हार नहीं, भरोसा है। और अगर चंगाई इस जीवन में न मिले, तो प्रकाशितवाक्य 21:4 रद्द नहीं होता, सिर्फ़ टल जाता है।

जब नौकरी छूट जाए और महीने का हिसाब मिलता न हो, तो काना का चिन्ह याद कीजिए। वहाँ कोई जानलेवा संकट नहीं था, सिर्फ़ एक परिवार की शर्मिंदगी थी, और यीशु ने उसे इतना महत्व दिया कि अपनी महिमा का पहला चिन्ह वहीं दिखाया। आपकी छोटी ज़रूरतें उनके लिए छोटी नहीं हैं। माँगने में संकोच मत कीजिए।

जब घर में तनाव हो और आप बीच रात बिस्तर पर जागते हुए छत को घूर रहे हों, तो मत्ती 14:25 पर लौटिए। यीशु तूफ़ान शुरू होने से पहले नहीं आए, चौथे पहर आए, यानी जब रात अपनी सबसे गहरी घड़ी में थी। देर का मतलब अनुपस्थिति नहीं। वे चलकर तूफ़ान के बीच ही आते हैं।

जब किसी अपने की कब्र पर मिट्टी डाली जाती है, तो यूहन्ना 11:43 आपको झूठी तसल्ली नहीं देता कि "मृत्यु तो बस एक दरवाज़ा है।" यीशु उस कब्र के सामने रोए और क्रोधित हुए, क्योंकि मृत्यु उनके पिता की दुनिया में घुस आया एक दुश्मन है। फिर उन्होंने पुकारा। मसीही शोक इसी दोहरेपन में जीता है: हम सचमुच रोते हैं, पर उनके समान नहीं जिन्हें कोई आशा नहीं।

और जब आप अपनी ही कमज़ोरी से थक जाएँ, लत से, क्रोध से, उस आदत से जो सालों से नहीं टूटी, तो याद रखिए कि यीशु के चिन्हों में दुष्टात्माओं से छुड़ाना भी शामिल था। उन्होंने कभी किसी से नहीं कहा कि "पहले खुद को ठीक करके आओ।" वे अशुद्ध को छूते हैं, और छूने से शुद्ध हो जाते हैं। यही अनुग्रह का तरीक़ा है, कल भी और आज भी।

दर्पण

अब थोड़ी देर के लिए लेख बंद कीजिए और अपने भीतर झाँकिए।

आप शायद उन लोगों में से हैं जो कहते हैं, "अगर मुझे एक चमत्कार दिख जाता, तो मैं विश्वास कर लेता।" पर क्या सच में? आपने अपनी ज़िंदगी में कम से कम एक बार प्रार्थना का उत्तर पाया है, एक बार ऐसा दरवाज़ा खुला है जो किसी तरह खुलना नहीं चाहिए था, एक बार ऐसी शान्ति मिली है जिसकी कोई व्याख्या आपके पास नहीं। और फिर भी अगले संकट में आपने वैसे ही हाथ-पैर मारे जैसे पहले मारते थे। समस्या प्रमाण की कमी नहीं है। समस्या यह है कि हमारा मन चिन्ह देखकर भी अपने ही हाथों पर भरोसा करना नहीं छोड़ता।

या शायद आप दूसरी तरफ़ खड़े हैं। आपने माँगा था, बहुत माँगा था, और वह चंगाई नहीं आई। वह रिश्ता नहीं जुड़ा। वह नौकरी नहीं मिली। और तब से आपने माँगना बंद कर दिया है, क्योंकि निराशा से बेहतर लगता है उम्मीद ही न रखना। मैं आपके दर्द को छोटा नहीं करूँगा। पर यह पूछूँगा: क्या आपने परमेश्वर को इसलिए छोड़ा है कि उन्होंने आपको ठुकराया, या इसलिए कि उन्होंने उस तरह जवाब नहीं दिया जैसा आपने तय किया था? जो प्रभु अर्थी रोकने के लिए रुक गए, वे आपकी प्रार्थना सुनकर मुँह नहीं फेरते।

और शायद आप सबसे आम जगह पर हैं: आप चमत्कारों पर विश्वास करते हैं, थियोलॉजी में भी, और फिर भी अपनी ज़िंदगी ऐसे चलाते हैं जैसे सब कुछ आपके बजट, आपकी मेहनत और आपकी सेहत पर टिका हो। आपकी प्रार्थना की सूची वहीं खत्म हो जाती है जहाँ आपकी क्षमता खत्म होती है। लेकिन गलील की झील पर चलते हुए प्रभु ठीक उसी सीमा को पार करते हैं। सवाल यह नहीं कि वे कर सकते हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या आप उन्हें नाव में आने देंगे।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चे चमत्कारों की कहानियाँ बहुत जल्दी पकड़ लेते हैं, पर उनमें एक जोखिम भी है: अगर हम सावधान न रहें, तो यीशु उनके मन में सुपरहीरो बन जाते हैं, एक ऐसा जादूगर जो कुछ भी कर सकता है। इसलिए कहानी सुनाते समय "क्या हुआ" के साथ-साथ "क्यों हुआ" भी जोड़िए।

सबसे सरल तरीक़ा यह है कि चमत्कार को एक "संदेश" कहकर समझाया जाए। जैसे किसी के जन्मदिन पर घर के बाहर लगी गुब्बारों की लड़ी बताती है कि अंदर कुछ खास हो रहा है, वैसे ही यीशु के चमत्कार बताते हैं कि परमेश्वर का राज्य आ गया है। आप बच्चे से पूछ सकते हैं: "अगर तुम्हारे पास ऐसी ताक़त होती, तो तुम क्या करते?" और फिर दिखाइए कि यीशु ने अपनी ताक़त कभी अपने लिए इस्तेमाल नहीं की, हमेशा दूसरों के लिए की। भूखों को खाना, रोती हुई माँ को बेटा, डरे हुए दोस्तों को शान्ति।

यह भी ईमानदारी से बताइए कि यीशु ने हर बीमार को उसी दिन चंगा नहीं किया, और हमारी हर प्रार्थना का उत्तर "हाँ" नहीं होता। बच्चे इस सच्चाई को संभाल सकते हैं, बशर्ते इसके साथ यह भी कहा जाए कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा, क्योंकि यीशु जी उठे हैं।

Faith.network पर इस विषय पर अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (3 से 6 वर्ष) चित्र जैसी सरल कहानियाँ, स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए (7 से 12 वर्ष) सवाल-जवाब के साथ गहराई, और किशोरों के लिए (12 वर्ष से ऊपर) वे कठिन प्रश्न जो वे अक्सर पूछना चाहते हैं पर पूछते नहीं। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार उपयुक्त पृष्ठ चुनिए और साथ बैठकर पढ़िए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यीशु ने कुल कितने चमत्कार किए?

सुसमाचारों में लगभग पैंतीस चमत्कार विस्तार से दर्ज हैं, हालाँकि गिनती इस पर निर्भर करती है कि आप सामूहिक चंगाइयों को एक मानते हैं या अनेक। पर यह पूरी सूची नहीं है, और यूहन्ना यह साफ़ कहता है: "यीशु ने और भी बहुत चिन्ह चेलों के सामने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए" (यूहन्ना 20:30)। सुसमाचार लेखक इतिहास की पूरी फ़ाइल नहीं दे रहे, वे चुने हुए चिन्ह दे रहे हैं ताकि पाठक यीशु को पहचाने और उन पर विश्वास करके जीवन पाए।

यीशु का पहला चमत्कार कौन-सा था?

गलील के काना में एक विवाह के दौरान पानी का दाखरस बन जाना। यूहन्ना इसे खास तौर पर चिह्नित करता है: "यीशु ने गलील के काना में अपना यह पहला चिन्ह दिखाकर अपनी महिमा प्रगट की और उसके चेलों ने उस पर विश्वास किया" (यूहन्ना 2:11)। दिलचस्प बात यह है कि यह चमत्कार किसी जानलेवा संकट में नहीं, एक सामाजिक शर्मिंदगी को टालने के लिए हुआ, और उसकी मात्रा ज़रूरत से कहीं ज़्यादा थी। यह बहुतायत उस आने वाले भोज की ओर इशारा करती है जिसका वादा भविष्यद्वक्ताओं ने किया था।

चिन्ह और चमत्कार में क्या अंतर है?

"चमत्कार" शब्द उस घटना पर ज़ोर देता है जो हैरान कर देती है, जबकि "चिन्ह" उस अर्थ पर ज़ोर देता है जिसकी ओर घटना इशारा करती है। प्रेरितों के काम 2:22 में पतरस तीनों पहलू एक साथ रखता है: सामर्थ्य के काम, अद्भुत काम और चिन्ह। यूहन्ना जानबूझकर लगभग हमेशा "चिन्ह" ही कहता है, क्योंकि उसके लिए असली सवाल यह नहीं है कि कितना अद्भुत काम हुआ, बल्कि यह कि वह काम किसकी पहचान खोलता है। चमत्कार देखकर रुक जाना साइनबोर्ड के नीचे डेरा डाल देने जैसा है।

क्या यीशु ने सबको चंगा किया?

नहीं। बैतहसदा के कुंड पर "बहुत से बीमार" पड़े थे, और यूहन्ना 5 में यीशु ने उस दिन एक व्यक्ति को चंगा किया। अपने ही नगर नासरत में उन्होंने लोगों के अविश्वास के कारण बहुत सामर्थ्य के काम नहीं किए। इसका मतलब कठोरता नहीं, बल्कि उद्देश्य है: चंगाइयाँ उस पूर्ण नई सृष्टि के नमूने हैं जो पुनरुत्थान के दिन आएगी, इस जीवन में उसकी पूरी डिलीवरी नहीं। इसलिए जिन्हें आज चंगाई नहीं मिली, वे कम प्रिय नहीं हैं; उनका वादा अभी आना बाकी है।

क्या चमत्कार आज भी होते हैं?

बाइबल कहीं नहीं कहती कि परमेश्वर ने चमत्कार करना बंद कर दिया है, और याकूब 5 कलीसिया को आज भी बीमारों के लिए प्रार्थना करने को कहता है। साथ ही नया नियम हमें चमत्कारों का पीछा करने से सावधान करता है, क्योंकि विश्वास की नींव चिन्ह नहीं, मसीह का वचन है। समझदारी भरा रास्ता बीच का है: पूरे भरोसे से प्रार्थना कीजिए, उत्तर परमेश्वर की बुद्धि पर छोड़िए, और हर असाधारण अनुभव को वचन की कसौटी पर परखिए, क्योंकि हर अद्भुत बात परमेश्वर की ओर से नहीं होती।

यीशु ने पानी पर चलकर क्या दिखाना चाहा?

"और वह रात के चौथे पहर झील पर चलते हुए उनके पास आया" (मत्ती 14:25) सिर्फ़ चेलों को बचाने की घटना नहीं है। अय्यूब 9:8 परमेश्वर के बारे में कहता है कि वे "समुद्र की ऊँची ऊँची लहरों पर चलता है," और प्राचीन सोच में समुद्र अराजकता का प्रतीक था। जब यीशु लहरों को पाँव के नीचे रौंदते हुए आते हैं और कहते हैं "मैं हूँ; डरो मत," तो वे अपनी पहचान खोल रहे हैं। जो अराजकता हमें डुबोती है, वह उनके लिए रास्ता मात्र है।

मरकुस 4:39 में यीशु ने आँधी को "डाँटा" क्यों?

यह वही शब्द है जो सुसमाचारों में दुष्टात्माओं को झिड़कने के लिए इस्तेमाल होता है: "तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, 'शान्त रह, थम जा!' और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया" (मरकुस 4:39)। इससे पता चलता है कि यीशु तूफ़ान को महज़ मौसम नहीं, बल्कि उस टूटी हुई सृष्टि का हिस्सा मानते हैं जो पतन के बाद से कराह रही है। उनका आदेश प्रकृति को फिर से व्यवस्था में लाता है, और चेलों का सवाल इसी ओर इशारा करता है: यह कौन है?

लूका 7:14 में यीशु ने अर्थी को छूकर क्या किया?

व्यवस्था के अनुसार लाश या अर्थी छूने वाला अशुद्ध हो जाता था, इसलिए यह हरकत चौंकाने वाली थी। "तब उसने पास आकर अर्थी को छुआ; और उठानेवाले ठहर गए, तब उसने कहा, 'हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!'" (लूका 7:14)। यहाँ अशुद्धता यीशु पर नहीं चढ़ती, बल्कि जीवन मृत्यु पर चढ़ जाता है। नाईन की उस विधवा ने न विश्वास की घोषणा की थी, न कुछ माँगा था; यीशु ने उसे रोते देखा और रुक गए। यह शुद्ध अनुग्रह का चित्र है।

लाज़र को जिलाना इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

क्योंकि यह यूहन्ना के सुसमाचार का आख़िरी और सबसे बड़ा चिन्ह है, और सीधे क्रूस की ओर ले जाता है। चार दिन बीत चुके थे, सब उम्मीद खत्म हो चुकी थी, और तब "यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, 'हे लाज़र, निकल आ!'" (यूहन्ना 11:43)। इससे पहले यीशु ने मार्था से कहा था कि "पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ।" यानी वे जीवन देने वाले नहीं, स्वयं जीवन हैं। विडंबना यह है कि एक आदमी को कब्र से निकालने की क़ीमत यीशु को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

क्या चमत्कार यीशु के परमेश्वर होने का प्रमाण हैं?

वे इशारा ज़रूर करते हैं, पर पतरस का शब्द "प्रमाण" अदालती सबूत से थोड़ा अलग अर्थ रखता है: "यीशु नासरी एक मनुष्य था जिसका परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण, उन सामर्थ्य के कामों और अद्भुत चिन्हों और लक्षणों से प्रगट है" (प्रेरितों के काम 2:22)। चमत्कार यह दिखाते हैं कि परमेश्वर यीशु के साथ थे और उनके द्वारा काम कर रहे थे। पर अंतिम और निर्णायक चिन्ह उनका अपना पुनरुत्थान है, क्योंकि बाक़ी सब जिलाए गए लोग फिर मरे; यीशु नहीं मरे।

क्या मुझे चंगाई के लिए प्रार्थना करनी चाहिए या बस समर्पण कर देना चाहिए?

दोनों, और इसी क्रम में। बाइबल में कोई संकोच नहीं है: लोग चिल्लाकर माँगते हैं, घुटनों पर गिरते हैं, छत खोदकर बिस्तर उतारते हैं, और यीशु इसे कभी धृष्टता नहीं कहते। इसलिए साफ़ शब्दों में माँगिए। फिर गतसमनी की तरह जोड़िए कि आपकी इच्छा पूरी हो। समर्पण का मतलब माँगना छोड़ देना नहीं, बल्कि परमेश्वर की बुद्धि को अपनी समझ से ऊपर रखना है। जो उत्तर आज नहीं मिला, वह प्रकाशितवाक्य 21:4 में रद्द नहीं, पूरा होता है।

क्या शैतान भी चमत्कार कर सकता है?

बाइबल इससे इनकार नहीं करती। निर्गमन में मिस्र के जादूगरों ने कुछ चिन्हों की नकल की, और नया नियम झूठे मसीहों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं की चेतावनी देता है जो "बड़े चिन्ह और अद्भुत काम" दिखाएँगे। इसलिए किसी अनुभव की सच्चाई की कसौटी उसकी भव्यता नहीं है। कसौटी यह है: क्या वह यीशु मसीह को देहधारी, क्रूस पर चढ़े और जी उठे प्रभु के रूप में ऊँचा उठाता है, और क्या वह पवित्र आत्मा का फल पैदा करता है? जो चिन्ह मसीह से हटाकर इंसान पर ध्यान खींचे, उससे दूरी बनाइए।

अंत में

गलील की झील, काना का विवाह मंडप, नाईन का फाटक, बैतनिय्याह की कब्र: ये जगहें एक-दूसरे से बहुत अलग हैं, पर इनमें एक ही बात हुई। एक-एक करके, टुकड़ों में, उस दुनिया का परदा उठा जिसे परमेश्वर आख़िर में बनाने वाले हैं। भूख मिटी, शर्म ढकी, आँधी थमी, कोढ़ धुला, आँसू पोंछे गए, और कब्र ने अपना शिकार लौटा दिया। हर चिन्ह यही कहता है: यह अस्थायी है, यह आख़िरी शब्द नहीं है, राजा आ गए हैं।

पर यह मत भूलिए कि यह सब किस क़ीमत पर मिला। जिन हाथों ने अर्थी छुई और अंधों की आँखों पर मिट्टी लगाई, वही हाथ कीलों से बिंधे। यीशु ने हमारी बीमारियाँ उठाईं, और आख़िर में हमारा पाप भी। इसीलिए उनका सबसे बड़ा चमत्कार कोई चंगाई नहीं, बल्कि एक खाली कब्र है।

आगे के अध्ययन के लिए यूहन्ना के सुसमाचार को सात चिन्हों के क्रम में पढ़िए और हर चिन्ह के बाद रुककर पूछिए: यह मुझे यीशु के बारे में क्या बता रहा है? और फिर एक छोटी-सी प्रार्थना कीजिए, वही जो चेलों ने उस नाव में सीखी: प्रभु, आप इस तूफ़ान में भी चलकर मेरे पास आ सकते हैं, आइए।

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