गलातियों की पत्री: व्यवस्था से नहीं, विश्वास से मिलनेवाली स्वतंत्रता
परिचय
कल्पना कीजिए कि आपने एक छोटे से शहर में कुछ लोगों को यीशु मसीह के बारे में बताया। वे विश्वास लाए, उनके चेहरे बदल गए, उनके घरों में गीत गूँजने लगे। फिर आप आगे बढ़ गए। कुछ महीनों बाद खबर आती है कि कुछ शिक्षक वहाँ पहुँचे हैं और कह रहे हैं, "विश्वास तो ठीक है, पर पूरा नहीं। असली परमेश्वर के लोग बनने के लिए कुछ और भी करना पड़ेगा।" और वे लोग, जो कल तक अनुग्रह के आनंद में थे, आज फिर से डर के साथ अपने आप को तौल रहे हैं।
यही वह घड़ी है जिसमें गलातियों की पत्री लिखी गई। यह शांत कमरे में बैठकर लिखा गया धर्मशास्त्र का ग्रंथ नहीं है; यह काँपते हाथों से लिखी गई एक आपातकालीन चिट्ठी है। इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पत्री किसने, कब और क्यों लिखी, इसकी बनावट क्या है, इसके मुख्य पद क्या कहते हैं, और सबसे बढ़कर यह कि इसकी स्वतंत्रता आज आपकी थकी हुई ज़िंदगी में कैसे उतर सकती है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
ज़्यादातर लोग गलातियों को "पौलुस की गुस्से वाली चिट्ठी" कहकर पढ़ते हैं। हम इसे दूसरी तरह पढ़ेंगे: यह प्रसव-पीड़ा की चिट्ठी है। पौलुस खुद लिखता है, "हे मेरे बालकों, जब तक तुम में मसीह का रूप न बन जाए, तब तक मैं तुम्हारे लिये फिर जच्चा की सी पीड़ाएँ सहता हूँ" (गलातियों 4:19)। इस दृष्टिकोण से सब कुछ बदल जाता है। इस पत्री का लक्ष्य केवल एक गलत सिद्धांत को हराना नहीं, बल्कि एक नया जीवन जन्म लेते देखना है। इसलिए यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ "नियमों से छुट्टी" नहीं, बल्कि "नई सृष्टि" है। व्यवस्था आपको सुधार सकती है; केवल मसीह आपको जन्म दे सकते हैं।
लेखक, तिथि और वह संकट जिसने यह पत्र लिखवाया
पत्री अपने पहले ही वाक्य में अपना लेखक बता देती है: पौलुस, प्रेरित। और वह तुरंत जोड़ता है कि उसकी नियुक्ति किसी मनुष्य की समिति ने नहीं, स्वयं यीशु मसीह और पिता परमेश्वर ने की है। यह कोई औपचारिक शिष्टाचार नहीं था। गलातिया की कलीसियाओं में जो शिक्षक घुस आए थे, वे पौलुस के संदेश के साथ-साथ उसके अधिकार पर भी चोट कर रहे थे। उनका तर्क सीधा था: यह आदमी यरूशलेम के असली प्रेरितों में से नहीं है, इसने तुम्हें आसान सुसमाचार सुनाया ताकि तुम खुश रहो। इसीलिए पत्री के पहले दो अध्याय लगभग आत्मकथा जैसे हैं। पौलुस बताता है कि वह कैसे कलीसिया को सताता था, कैसे मसीह ने उसे पकड़ा, कैसे वह वर्षों बाद यरूशलेम गया, और वहाँ के अगुवों ने उसके सुसमाचार में कुछ भी जोड़ने की ज़रूरत नहीं समझी।
पत्री किन लोगों को लिखी गई, इस पर दो मुख्य समझें हैं। एक समझ के अनुसार "गलातिया" से मतलब रोमी प्रांत गलातिया के दक्षिणी नगर हैं, यानी पिसिदिया का अंताकिया, इकुनियुम, लुस्त्रा और दिरबे, जहाँ पौलुस और बरनबास अपनी पहली मिशन यात्रा में गए थे (प्रेरितों के काम 13 और 14)। इस समझ के अनुसार यह पत्री लगभग सन् 48 या 49 में, यरूशलेम की महासभा (प्रेरितों के काम 15) से ठीक पहले लिखी गई, और तब यह नए नियम की सबसे पहली लिखी गई पुस्तक ठहरती है। दूसरी समझ के अनुसार पौलुस उत्तर के उन कुल जातियों के लोगों को लिख रहा है जिन्हें ऐतिहासिक रूप से गलाती कहा जाता था, और तब तिथि लगभग सन् 53 से 57 के बीच, इफिसुस या मकिदुनिया से, आती है।
इस बहस का फैसला किए बिना भी पत्री का अर्थ पूरी तरह साफ रहता है, पर पहली समझ एक बात को खूबसूरती से समझा देती है। यदि यह पत्री यरूशलेम की महासभा से पहले लिखी गई, तो समझ में आता है कि पौलुस उस महासभा के फैसले का हवाला क्यों नहीं देता; वह फैसला तब तक हुआ ही नहीं था। और जब वह फैसला आया, तो पतरस ने वहाँ ठीक वही कहा जो पौलुस गलातिया वालों को समझा रहा था: "परन्तु हमारा यह तो निश्चय है, कि जिस रीति से वे प्रभु यीशु के अनुग्रह से उद्धार पाएँगे; उसी रीति से हम भी पाएँगे" (प्रेरितों के काम 15:11)। ध्यान दीजिए, पतरस यह नहीं कहता कि अन्यजाति हमारी तरह बचेंगे; वह कहता है कि हम उनकी तरह बचेंगे। अनुग्रह सबके लिए एक ही दरवाज़ा है।
संकट क्या था? कुछ यहूदी मसीही शिक्षक, जिन्हें आमतौर पर "व्यवस्था के पक्षधर" कहा जाता है, यह सिखा रहे थे कि अन्यजातियों के विश्वासियों को परमेश्वर के परिवार में पूरी तरह शामिल होने के लिए खतना कराना और मूसा की व्यवस्था के रीति-रिवाज़ मानने होंगे। सतह पर यह बात धार्मिक और गंभीर लगती थी। पौलुस के लिए यह सुसमाचार की हत्या थी, क्योंकि इसका मतलब था कि मसीह का क्रूस काफी नहीं है। अंताकिया में तो यह ज़हर इतना फैल गया कि पतरस भी अन्यजाति भाइयों के साथ भोजन करना छोड़ बैठा, और पौलुस को उसे सबके सामने टोकना पड़ा (गलातियों 2:11-14)। जो दो लोग एक ही प्रभु की मेज़ पर साथ नहीं बैठ सकते, वे चाहे जो कहें, एक ही सुसमाचार नहीं मानते।
बाइबल गलातियों की पत्री के बारे में क्या कहती है?
पत्री की धड़कन उसके पहले अध्याय में ही सुनाई देने लगती है। पौलुस सामान्य धन्यवाद की प्रार्थना छोड़ देता है और सीधे चौंकने लगता है कि गलातिया वाले इतनी जल्दी "किसी और सुसमाचार" की ओर मुड़ गए। फिर वह वह वाक्य कहता है जो आज भी हिलाकर रख देता है: "परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हमने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो" (गलातियों 1:8)। यहाँ कोई कड़वाहट नहीं, एक माँ जैसी घबराहट है। जो बच्चा जन्म ले रहा है, कोई उसकी साँस रोक रहा है।
इसके बाद पौलुस अपनी बात का केंद्र रखता है: "तौभी यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हमने आप भी मसीह यीशु पर विश्वास किया" (गलातियों 2:16)। यही बात वह बाद में रोमियों में शांत स्वर में दोहराएगा: "इसलिये हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं, कि मनुष्य व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरता है" (रोमियों 3:28)। गलातियों और रोमियों में फर्क विषय का नहीं, तापमान का है। गलातियों आग है, रोमियों उसी आग की नपी-तुली रोशनी।
पर पौलुस केवल कानूनी भाषा में नहीं रुकता। वह व्यक्तिगत हो जाता है: "मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है; और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया" (गलातियों 2:20)। यह सिद्धांत नहीं, जन्म का विवरण है। पुराना पौलुस मर चुका; जो अब जी रहा है वह एक नया प्राणी है जिसकी साँस मसीह हैं।
तीसरे अध्याय में वह पवित्रशास्त्र खोलता है और अब्राहम तक जाता है। धर्मी ठहरने का तरीका कोई नई खोज नहीं है; यह आरंभ से वही रहा है। "उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना" (उत्पत्ति 15:6)। अब्राहम के पास न व्यवस्था थी, न खतना, न मंदिर; उसके पास केवल एक वादा और उस वादे पर भरोसा था। फिर पौलुस भविष्यद्वक्ता हबक्कूक को बुलाता है: "पर यह बात प्रगट है, कि व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर के यहाँ कोई धर्मी नहीं ठहरता क्योंकि धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा" (गलातियों 3:11)। ध्यान दीजिए कि यह केवल शुरुआत की बात नहीं है। धर्मी जन विश्वास से "जीवित रहेगा", यानी पूरी ज़िंदगी, हर दिन, आखिरी साँस तक।
तो व्यवस्था किसलिए थी? पौलुस कहता है कि वह हमें मसीह तक पहुँचाने वाली शिक्षक थी (गलातियों 3:24), और मसीह ने स्वयं हमारी जगह लेकर उसका श्राप उठा लिया (गलातियों 3:13)। इसका नतीजा है एक नया परिवार जिसमें पुरानी दीवारें गिर जाती हैं: "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी; क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो" (गलातियों 3:28)।
और फिर पाँचवें अध्याय में वह पुकार आती है जो इस पूरी पत्री का शीर्षक बन सकती है: "मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; इसलिये इसमें स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो" (गलातियों 5:1)। पर यह स्वतंत्रता खाली मैदान नहीं है, यह एक जीवित वृक्ष है जिस पर फल लगते हैं: "पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, और कृपा, भलाई, विश्वास," (गलातियों 5:22)। जो जन्म लेता है, वह बढ़ता भी है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
गलातियों को समझने के लिए पहले पन्ने तक पीछे जाना पड़ता है। अदन में मनुष्य ने परमेश्वर पर भरोसा खो दिया और अपने प्रयास से, अपने पत्तों से, अपनी नग्नता ढकने की कोशिश की। तब से यह मानव हृदय की स्थायी बीमारी रही है: हम स्वीकार किए जाने के लिए कुछ बनाना चाहते हैं। अब्राहम की कहानी इस बीमारी के बीच परमेश्वर का जवाब है। बिना किसी योग्यता के एक बूढ़े, निःसंतान आदमी को वादा मिलता है, और उत्पत्ति 15:6 में वह क्षण आता है जिसे पौलुस पूरी बाइबल की कुंजी मानता है। धार्मिकता कमाई नहीं गई, गिनी गई।
व्यवस्था चार सौ तीस साल बाद आई, और पौलुस ज़ोर देकर कहता है कि बाद में आई हुई व्यवस्था पहले दिए हुए वादे को रद्द नहीं कर सकती (गलातियों 3:17)। सीनै पर्वत की व्यवस्था बुरी नहीं थी; वह पवित्र, न्यायी और भली थी। पर उसका काम बचाना नहीं, आईना दिखाना था। लैव्यव्यवस्था कहती है कि जो इन्हें मानेगा वह जीएगा, और व्यवस्थाविवरण कहता है कि जो इन्हें पूरा नहीं करता वह श्रापित है। इन दोनों के बीच इस्राएल की पूरी कहानी फँसी हुई है: बार-बार वाचा तोड़ना, बार-बार बंधुआई, बार-बार भविष्यद्वक्ताओं की पुकार।
इसीलिए भविष्यद्वक्ता एक नई वाचा का सपना देखते हैं जिसमें व्यवस्था पत्थर पर नहीं, हृदय पर लिखी जाएगी, और परमेश्वर अपना आत्मा अपने लोगों में डालेंगे। यिर्मयाह और यहेजकेल इसी की घोषणा करते हैं। हबक्कूक, जब सब कुछ ढह रहा था, तब वह वाक्य बोल गया जिसे पौलुस दो बार उठाता है और जिसने सदियों बाद मार्टिन लूथर की आँखें खोलीं: धर्मी अपने विश्वास से जीवित रहेगा।
फिर समय पूरा होता है। "परन्तु जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ। ताकि व्यवस्था के अधीनों को मोल लेकर छुड़ा ले, और हम को लेपालक होने का पद मिले" (गलातियों 4:4-5)। यीशु मसीह व्यवस्था के नीचे जन्मे, उसे पूरी तरह पूरा किया, और फिर उसका श्राप अपने ऊपर ले लिया ताकि हम उसका आशीर्वाद पा सकें। यह अदला-बदली ही सुसमाचार का हृदय है।
नए नियम में यही सूत्र आगे बहता है। प्रेरितों के काम 15 में कलीसिया आधिकारिक रूप से यही स्वीकार करती है कि अन्यजातियों पर व्यवस्था का बोझ न डाला जाए। रोमियों में पौलुस इसी बात को व्यवस्थित रूप से खोलता है। इब्रानियों की पत्री दिखाती है कि पुराने बलिदान केवल परछाईं थे और असली शरीर मसीह हैं। और याकूब, जो कहता है कि विश्वास बिना कामों के मरा हुआ है, पौलुस का विरोध नहीं करता; वह उसी सिक्के का दूसरा पहलू दिखाता है, क्योंकि गलातियों 5:22 में वर्णित आत्मा का फल ठीक वही जीवित विश्वास है जिसकी बात याकूब कर रहा है।
पूरी बाइबल एक ही दिशा में बहती है: वादा, विश्वास, जीवन।
रचना और मुख्य विषय
गलातियों के छह अध्याय तीन साफ हिस्सों में बँटे हैं, और दिलचस्प बात यह है कि ये तीनों हिस्से उस जन्म की तरह आगे बढ़ते हैं जिसकी बात पौलुस 4:19 में करता है। पहले वह उस खतरे को हटाता है जो नए जीवन की गर्दन दबा रहा है, फिर वह नींव दिखाता है जिस पर नया जीवन टिका है, और अंत में वह बताता है कि यह नया जीवन चलता-फिरता कैसा दिखता है।
पहला हिस्सा, अध्याय एक और दो, व्यक्तिगत और ऐतिहासिक है। पौलुस अपने प्रेरिताई की रक्षा करता है, पर अपने अहंकार के लिए नहीं। उसका तर्क यह है कि यदि यह सुसमाचार उसने गढ़ा होता तो उसे बदला भी जा सकता था; पर यह उसे प्रकाशन से मिला, इसलिए इसमें एक इंच की भी छूट नहीं है। वह अपनी पुरानी कट्टरता, अपने बुलावे, अरब में बिताए समय, यरूशलेम की यात्राओं, और अंताकिया में पतरस के साथ हुए टकराव का विवरण देता है। यह सब एक ही निष्कर्ष की ओर जाता है, जो 2:16 और 2:20 में फूट पड़ता है: धर्मी ठहरना विश्वास से है, और मसीह के साथ मरकर जी उठना ही मसीही जीवन है।
दूसरा हिस्सा, अध्याय तीन और चार, धर्मशास्त्रीय दलील है, पर सूखी नहीं। पौलुस छह तरह से एक ही बात सिद्ध करता है। वह उनके अपने अनुभव से पूछता है कि उन्हें पवित्र आत्मा व्यवस्था के कामों से मिला या विश्वास के सुनने से। वह अब्राहम का उदाहरण देता है। वह व्यवस्था के श्राप और मसीह के द्वारा उस श्राप से छुटकारे की बात करता है। वह याद दिलाता है कि वाचा व्यवस्था से पहले आई। वह दास और पुत्र का अंतर दिखाता है और बताता है कि आत्मा हमारे भीतर से "हे अब्बा, हे पिता" पुकारता है। और अंत में वह हाजिरा और सारा का रूपक देता है: एक दासत्व जनती है, दूसरी स्वतंत्रता।
तीसरा हिस्सा, अध्याय पाँच और छह, व्यावहारिक है। यहाँ 5:1 का नारा गूँजता है और फिर एक ज़रूरी संतुलन आता है: "हे भाइयों, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो; परन्तु ऐसा न हो, कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन् प्रेम से एक दूसरे के दास बनो" (गलातियों 5:13)। शरीर के कामों की सूची और आत्मा के फल का वर्णन आमने-सामने रखे गए हैं। छठे अध्याय में यह सब कलीसिया के ठोस जीवन में उतरता है: गिरे हुए भाई को नम्रता से सँभालना, "तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो" (गलातियों 6:2), और यह चेतावनी कि मनुष्य जो बोता है वही काटता है।
पत्री का अंत पौलुस अपने हाथ से बड़े अक्षरों में लिखता है, और वहाँ वह सब कुछ एक वाक्य में समेट देता है: "पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का" (गलातियों 6:14)। और ठीक उसके बाद वह शब्द आता है जो इस पूरी मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण है: न खतना कुछ है, न खतनारहित, परन्तु नई सृष्टि। धर्म सुधार करता है; मसीह जन्म देते हैं।
इस पुस्तक के मुख्य पद
गलातियों 2:20 इस पत्री का आत्म-चित्र है। "मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है; और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।" ध्यान दीजिए कि पौलुस यह नहीं कहता कि उसने अपनी ज़िंदगी सुधार ली। वह कहता है कि वह मर चुका है। धार्मिकता की सारी कोशिशों का अंत मृत्यु में होता है, और उसी कब्र से एक नया जीवन उठता है जिसका स्रोत भीतर नहीं, मसीह में है। और देखिए वाक्य का अंत कितना निजी है: "मुझसे प्रेम किया", "मेरे लिये अपने आप को दे दिया"। यह सामूहिक धर्मशास्त्र नहीं, व्यक्तिगत सौदा है।
गलातियों 3:11 दलील की रीढ़ है। "पर यह बात प्रगट है, कि व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर के यहाँ कोई धर्मी नहीं ठहरता क्योंकि धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा।" पौलुस इसे "प्रगट" कहता है, यानी यह कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं; पुराना नियम खुद इसकी गवाही देता है। यहाँ दो बातें एक साथ कही जा रही हैं। पहली, व्यवस्था का रास्ता बंद है, इसलिए नहीं कि व्यवस्था बुरी है, बल्कि इसलिए कि हम उसे पूरा नहीं कर सकते। दूसरी, विश्वास का रास्ता केवल प्रवेश-द्वार नहीं, चलने का पूरा मार्ग है। जो आदमी अनुग्रह से शुरू करके अपनी मेहनत से पूरा करना चाहता है, वह आधे रास्ते पर ही थक कर गिर जाएगा।
गलातियों 5:1 वह दरवाज़ा है जिससे सिद्धांत ज़िंदगी में उतरता है। "मसीह ने स्वतंत्रता के लिये हमें स्वतंत्र किया है; इसलिये इसमें स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो।" यहाँ दो क्रियाएँ हैं, एक मसीह की और एक हमारी। मसीह ने हमें स्वतंत्र किया; हमें उसमें स्थिर रहना है। स्वतंत्रता अपने आप नहीं टिकती, उसे थामे रखना पड़ता है, क्योंकि मनुष्य का मन अजीब तरह से जूए को तरसता है। जूआ जाना-पहचाना होता है, नपा-तुला होता है, और उसमें आप जानते हैं कि आप कहाँ खड़े हैं। अनुग्रह डरावना है, क्योंकि उसमें सारा भरोसा किसी और पर टिकाना पड़ता है।
और इन तीनों को जोड़कर रखता है गलातियों 5:22। आत्मा का फल प्रेम से शुरू होता है और आगे आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई और विश्वास तक जाता है। यह "फल" है, "उपलब्धि" नहीं। फल पेड़ के ज़ोर लगाने से नहीं, उसके जड़ों से जुड़े रहने से आता है।
इस पत्री को पढ़ने की व्यावहारिक योजना
गलातियों पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले इसे एक ही बैठक में, शुरू से आखिर तक, ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाए। इसमें लगभग पच्चीस मिनट लगते हैं, और यही वह अनुभव है जो पहले पाठकों को हुआ था, क्योंकि यह पत्री कलीसिया की सभा में खड़े होकर पढ़ी जाती थी। आप एक ही सुर, एक ही बहाव और एक ही बेचैनी महसूस करेंगे जो अध्यायों में बाँटकर पढ़ने से खो जाती है।
इसके बाद छह दिनों की एक योजना बनाइए, हर दिन एक अध्याय। पहले दिन अध्याय एक पढ़कर पूछिए: पौलुस किस बात से इतना घबराया हुआ है, और क्या आज भी हमारे बीच "दूसरा सुसमाचार" सुनाई देता है? दूसरे दिन अध्याय दो पढ़िए और 2:20 को कागज़ पर अपने हाथ से लिखिए, फिर उसमें "मैं" और "मुझे" की जगह अपना नाम रखकर धीरे-धीरे पढ़िए। तीसरे दिन अध्याय तीन के साथ उत्पत्ति 15 भी खोलिए और देखिए कि पौलुस अब्राहम की कहानी को कैसे पढ़ता है। चौथे दिन अध्याय चार में पुत्र होने के अधिकार पर ठहरिए और अपने आप से पूछिए कि आप परमेश्वर के पास दास की तरह जाते हैं या बच्चे की तरह। पाँचवें दिन अध्याय पाँच में आत्मा के फल की सूची लेकर प्रार्थना कीजिए, एक-एक गुण पर रुककर। छठे दिन अध्याय छह पढ़िए और किसी एक व्यक्ति का नाम सोचिए जिसका भार आप इस हफ्ते सचमुच उठा सकते हैं।
साथ में पढ़ने के लिए सबसे उपयोगी हिस्से हैं प्रेरितों के काम 13 से 15 तक, जहाँ आपको वे ही शहर, वे ही लोग और वही बहस मिलेगी। इसके बाद रोमियों 3 और 4 पढ़िए, जहाँ वही बात शांत स्वर में खुलती है, और याकूब 2 भी, ताकि आप समझ सकें कि विश्वास और काम आपस में लड़ते नहीं।
अंत में एक अभ्यास जो इस पत्री को किताब से निकालकर आपके दिल में डाल देगा। एक कागज़ पर ईमानदारी से लिखिए कि आप किन चीज़ों से अपनी स्वीकृति नापते हैं: कितनी प्रार्थना की, कितना चढ़ावा दिया, कितनी सेवा की, लोगों ने क्या कहा। फिर उस कागज़ के नीचे गलातियों 5:1 लिखकर उसे अपनी बाइबल में रख दीजिए। जब भी वह पुराना जूआ कंधे पर चढ़ने लगे, उस पन्ने पर लौट आइए।
दर्पण
आप यह पढ़ रहे हैं और शायद भीतर कहीं एक थकान बैठी है जिसका नाम आपने कभी नहीं रखा। वह थकान हर रविवार सुबह उठती है जब आप खुद को तौलते हैं कि इस हफ्ते आप "अच्छे मसीही" रहे या नहीं। वह दफ्तर में भी आती है, जब आपका मन इसलिए बेचैन रहता है क्योंकि आपकी पहचान आपकी उत्पादकता से बँधी है। वह घर पर भी आती है, जब आप एक माँ या पिता के रूप में अपने आप को दूसरों से तुलना करके फेल घोषित कर देते हैं। और वह रात में, अकेलेपन में, सबसे ज़ोर से बोलती है: "तुम काफी नहीं हो।"
गलातियों आपसे यह नहीं कहती कि ज़्यादा मेहनत करो। वह कहती है कि जिस तराज़ू पर आप खड़े हैं, वह तराज़ू ही तोड़ दिया गया है। मसीह ने उसे क्रूस पर तोड़ा। यदि आपकी धार्मिकता आपके प्रदर्शन से आती है, तो आपका हर अच्छा दिन घमंड पैदा करेगा और हर बुरा दिन निराशा। अनुग्रह दोनों से आज़ाद करता है।
पर यह पत्री आराम ही नहीं देती, चुभती भी है। आप शायद दूसरों पर वही जूआ रखते हैं जिससे आप खुद कराहते हैं: अपने बच्चों पर, अपने जीवनसाथी पर, कलीसिया के उन लोगों पर जो आपके मानकों पर खरे नहीं उतरते। जो आदमी अनुग्रह से जीता है, वह दूसरों को नापना बंद कर देता है। और शायद आपने स्वतंत्रता को उल्टी दिशा में मोड़ लिया है, पैसे के मामले में, शरीर के मामले में, समय के मामले में, यह कहकर कि अब तो सब माफ है। पौलुस ऐसे आदमी से भी यही कहता है: तुम स्वतंत्र किए गए हो, पर प्रेम में एक दूसरे के दास बनने के लिए।
सवाल यह नहीं कि आप कितने नियम निभाते हैं। सवाल यह है कि आपके भीतर कुछ नया जन्म ले रहा है या नहीं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को गलातियों समझाना उतना कठिन नहीं जितना लगता है, क्योंकि बच्चे इस पत्री की मूल भावना रोज़ जीते हैं। वे लगातार यह जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें वैसे ही प्यार किया जाता है जैसे वे हैं, या सिर्फ तब जब उनके नंबर अच्छे आएँ और कमरा साफ हो।
एक सीधी तस्वीर काम आती है। कल्पना कीजिए कि एक बच्चा किसी परिवार में गोद लिया गया है। अब वह घर के काम इसलिए नहीं करता कि उसे परिवार में बने रहने की जगह कमानी है, बल्कि इसलिए कि वह पहले से ही इस परिवार का है और उसे अपने माता-पिता से प्यार है। गलातियों यही कहती है: हम परमेश्वर के बच्चे बनने के लिए अच्छे काम नहीं करते, हम परमेश्वर के बच्चे हैं इसलिए अच्छे काम करते हैं। दूसरी तस्वीर पेड़ और फल की है, जो गलातियों 5:22 से सीधे आती है। आम का पेड़ ज़ोर लगाकर आम नहीं उगाता; उसकी जड़ें पानी तक पहुँचती हैं और फल अपने आप आता है। वैसे ही प्रेम, आनंद और धीरज हमारे भीतर पवित्र आत्मा उगाते हैं।
बड़े बच्चों के साथ आप पौलुस और पतरस की टकराहट की कहानी भी पढ़ सकते हैं और पूछ सकते हैं कि किसी दोस्त को छोड़ देना कब गलत होता है।
अलग-अलग उम्र के लिए अलग भाषा चाहिए होती है। छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह साल) बहुत सरल चित्रमय कहानी, प्राथमिक कक्षा के बच्चों के लिए (सात से बारह साल) थोड़ी गहराई के साथ पौलुस की यात्रा, और किशोरों के लिए (बारह साल से ऊपर) पहचान, दबाव और दूसरों की स्वीकृति पाने की जद्दोजहद से जोड़कर समझाना सबसे असरदार रहता है। इन तीनों उम्र-स्तरों के लिए अलग-अलग व्याख्याएँ हमारे यहाँ उपलब्ध हैं, और आप उन्हें परिवार की उपासना या बाल-कक्षा में सीधे इस्तेमाल कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गलातियों की पत्री किसने लिखी?
यह पत्री प्रेरित पौलुस ने लिखी, और इस पर विद्वानों में लगभग कोई मतभेद नहीं है; यहाँ तक कि नए नियम के बारे में संदेह रखने वाले विद्वान भी इसे पौलुस की निश्चित रूप से असली पत्रियों में गिनते हैं। पत्री की शुरुआत में ही वह अपना नाम लिखता है और जोर देता है कि उसका प्रेरिताई का अधिकार किसी मनुष्य से नहीं, स्वयं यीशु मसीह और पिता परमेश्वर से आया है। छठे अध्याय के अंत में वह बताता है कि अंतिम पंक्तियाँ उसने अपने हाथ से बड़े अक्षरों में लिखी हैं, जो उसकी निजी भागीदारी और भावना की गहराई दिखाता है।
गलातियों की पत्री कब लिखी गई?
इसका उत्तर इस पर निर्भर करता है कि "गलातिया" से किन कलीसियाओं का मतलब है। यदि पौलुस रोमी प्रांत गलातिया के दक्षिणी नगरों, यानी पिसिदिया के अंताकिया, इकुनियुम, लुस्त्रा और दिरबे को लिख रहा है, तो यह पत्री लगभग सन् 48 या 49 में, यरूशलेम की महासभा से ठीक पहले लिखी गई और तब यह नए नियम की सबसे पहली पुस्तक है। यदि वह उत्तरी गलातिया के जातीय गलातियों को लिख रहा है, तो तिथि लगभग सन् 53 से 57 के बीच आती है। दोनों ही स्थितियों में पत्री का संदेश और परिस्थिति वही रहती है।
गलातियों की पत्री का मुख्य विषय क्या है?
मुख्य विषय यह है कि मनुष्य परमेश्वर के सामने व्यवस्था के कामों से नहीं, बल्कि यीशु मसीह पर विश्वास से धर्मी ठहरता है, और इसी सच्चाई से असली स्वतंत्रता निकलती है। पौलुस उन शिक्षकों का विरोध कर रहा है जो अन्यजाति विश्वासियों से खतना और मूसा की व्यवस्था की माँग कर रहे थे। उसका तर्क है कि यदि धार्मिकता व्यवस्था से मिल सकती तो मसीह का मरना व्यर्थ होता। पत्री का अंत यह दिखाकर होता है कि यह स्वतंत्रता आलस्य नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा से उपजा प्रेमपूर्ण जीवन पैदा करती है।
क्या गलातियों की पत्री कहती है कि व्यवस्था बुरी है?
नहीं। पौलुस कहीं नहीं कहता कि परमेश्वर की व्यवस्था बुरी है; रोमियों में वह साफ कहता है कि व्यवस्था पवित्र और भली है। गलातियों में उसका निशाना व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यवस्था का गलत इस्तेमाल है, यानी उसे उद्धार कमाने का ज़रिया बना लेना। वह व्यवस्था को वह शिक्षक कहता है जो हमें मसीह तक पहुँचाती है (गलातियों 3:24), क्योंकि वह हमें हमारा पाप और हमारी असमर्थता दिखाती है। आईना गंदा नहीं होता, वह बस सच दिखाता है; पर आईने से चेहरा धोया नहीं जाता।
गलातियों 2:20 का क्या अर्थ है?
इस पद में पौलुस कहता है कि वह मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया है और अब जो जीवन वह जी रहा है, उसका स्रोत वह खुद नहीं बल्कि मसीह हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पौलुस का व्यक्तित्व मिट गया, बल्कि यह कि उसका पुराना स्वार्थी और आत्म-निर्भर जीवन न्यायपूर्वक समाप्त हो चुका है। मसीह की मृत्यु में वह भी मरा और मसीह के जी उठने में वह भी जीवित हुआ। और वह जीवन रोज़ विश्वास से जिया जाता है, किसी ऐसे व्यक्ति पर भरोसा करके जिसने उससे प्रेम किया और अपने आप को दे दिया।
"आत्मा का फल" और "आत्मा के वरदान" में क्या अंतर है?
आत्मा का फल, जिसकी सूची गलातियों 5:22 में दी गई है, हर विश्वासी के चरित्र में पवित्र आत्मा द्वारा उगाया जाने वाला जीवन है, और यह सबके लिए एक जैसा है। आत्मा के वरदान, जिनकी चर्चा मुख्यतः 1 कुरिन्थियों 12 और रोमियों 12 में है, कलीसिया की सेवा के लिए अलग-अलग लोगों को अलग-अलग दिए जाते हैं। वरदान सेवा के औज़ार हैं; फल परिपक्वता का सबूत है। इसीलिए पौलुस "फल" एकवचन में कहता है, मानो एक ही गुच्छा हो, जिसमें प्रेम सबसे पहले आता है।
क्या मसीही विश्वासी को दस आज्ञाएँ मानने की ज़रूरत है?
मसीही विश्वासी दस आज्ञाओं को उद्धार कमाने के लिए नहीं, बल्कि बचाए जाने के बाद प्रेम से मानता है। नया नियम स्पष्ट है कि हम व्यवस्था के अधीन नहीं, अनुग्रह के अधीन हैं, पर वही नया नियम मूर्तिपूजा, झूठ, चोरी, हत्या और व्यभिचार को गलत कहता रहता है। अंतर प्रेरणा का है। पौलुस इसे "मसीह की व्यवस्था" कहता है (गलातियों 6:2), जिसका सार प्रेम है। जो हृदय अनुग्रह से छुआ गया है, वह आज्ञा को बोझ नहीं, पिता की इच्छा समझता है।
गलातियों और याकूब की पत्री एक दूसरे का विरोध क्यों करती दिखती हैं?
क्योंकि दोनों अलग-अलग गलतियों का सामना कर रही हैं। पौलुस उन लोगों से बात कर रहा है जो कामों के ज़रिए परमेश्वर की स्वीकृति कमाना चाहते थे, इसलिए वह रोमियों 3:28 जैसे पदों में कहता है कि मनुष्य व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहरता है। याकूब उन लोगों से बात कर रहा है जो केवल मुँह से विश्वास कहते थे पर उनका जीवन नहीं बदला था। पौलुस बताता है कि पेड़ कैसे लगाया जाता है, याकूब बताता है कि जीवित पेड़ पर फल ज़रूर आता है। दोनों एक ही सच्चाई के दो पहलू हैं।
पौलुस ने पतरस को सबके सामने क्यों डाँटा?
अंताकिया में पतरस पहले अन्यजाति विश्वासियों के साथ खुलकर भोजन करता था, पर जब यरूशलेम से कुछ लोग आए तो वह डर के मारे अलग हो गया, और उसकी देखादेखी बरनबास भी बहक गया। पौलुस ने इसे व्यक्तिगत कमज़ोरी नहीं, बल्कि सुसमाचार के सच्चाई से हटना माना, क्योंकि इस व्यवहार से यह संदेश जा रहा था कि अन्यजाति विश्वासी दूसरे दर्जे के हैं। इसीलिए उसने सबके सामने बात उठाई। यह घटना दिखाती है कि अनुग्रह का सत्य केवल उपदेश में नहीं, मेज़ पर बैठने के तरीके में भी दिखना चाहिए।
"दूसरा सुसमाचार" क्या है जिसकी चेतावनी पौलुस देता है?
गलातियों 1:8 में पौलुस कहता है कि यदि वह खुद या स्वर्ग से कोई दूत भी कोई और सुसमाचार सुनाए तो वह श्रापित हो। गलातिया में "दूसरा सुसमाचार" था मसीह में विश्वास के साथ-साथ व्यवस्था के कामों को उद्धार की शर्त बना देना। आज भी इसके कई रूप हैं, जैसे यह कहना कि किसी खास परंपरा, नियम, अनुभव या उपलब्धि के बिना आप वास्तव में परमेश्वर के नहीं हैं। कसौटी सरल है: जो भी बात मसीह के काम में कुछ जोड़ने को ज़रूरी बताती है, वह सुसमाचार नहीं रह जाती।
क्या गलातियों 3:28 का मतलब है कि कलीसिया में कोई भेद ही नहीं?
इस पद का मुख्य अर्थ यह है कि परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरने और उनके परिवार में सदस्य होने के मामले में कोई भी श्रेणी दूसरी से ऊँची या नीची नहीं है। यहूदी और अन्यजाति, दास और स्वतंत्र, पुरुष और स्त्री, सब एक ही दरवाज़े से, एक ही विश्वास से भीतर आते हैं और सबको एक ही पुत्रता मिलती है। पौलुस यह नहीं कह रहा कि मनुष्यों के बीच सारे स्वाभाविक अंतर मिट गए, पर वह ज़रूर कह रहा है कि इन अंतरों को आत्मिक दर्जे का आधार बनाना सुसमाचार का अपमान है।
उत्पत्ति 15:6 गलातियों में इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि यह पद साबित करता है कि विश्वास से धर्मी ठहरना कोई नई व्यवस्था नहीं, परमेश्वर का आरंभ से चला आ रहा तरीका है। अब्राहम के पास न व्यवस्था थी, न खतना हुआ था, न कोई मंदिर या याजक; उसके पास सिर्फ परमेश्वर का वादा था और उसने उस पर भरोसा किया, और परमेश्वर ने उसे धर्म गिना। पौलुस इस तर्क से व्यवस्था के पक्षधरों के हाथ से उनका सबसे बड़ा हथियार छीन लेता है, क्योंकि वे खुद को अब्राहम की संतान कहते थे। असली संतान वे हैं जो उसके विश्वास में चलते हैं।
गलातियों की पत्री को पढ़ना कहाँ से शुरू करें?
सबसे अच्छा तरीका है पूरी पत्री को एक ही बैठक में ऊँची आवाज़ में पढ़ना, क्योंकि यह मूल रूप से कलीसिया की सभा में पढ़े जाने के लिए लिखी गई थी और इसमें लगभग पच्चीस मिनट लगते हैं। इसके बाद प्रतिदिन एक अध्याय लेकर छह दिनों में धीरे-धीरे पढ़िए। साथ में प्रेरितों के काम 13 से 15 तक पढ़ने से पृष्ठभूमि साफ हो जाती है, और रोमियों 3 और 4 पढ़ने से वही सत्य और खुल जाता है। हर अध्याय के बाद एक सवाल पूछिए: यहाँ मसीह ने क्या किया, और मुझसे क्या कहा जा रहा है?
अंत में
गलातियों की पत्री को पढ़ते हुए सबसे आसान गलती यह होती है कि हम इसे पुराने ज़माने के एक धार्मिक विवाद की रिपोर्ट मान लें। खतना अब हमारी बहस नहीं है, पर जिस बीमारी से पौलुस लड़ रहा था, वह आज भी हर दिल में जीवित है: परमेश्वर के प्रेम को किसी तरह कमाने की ज़िद। इसीलिए यह पत्री हर पीढ़ी में आग पकड़ती रही है, चाहे वह लूथर का कमरा हो या किसी गाँव की छोटी कलीसिया।
इस पृष्ठ पर हमने इसे गुस्से की नहीं, प्रसव-पीड़ा की चिट्ठी के रूप में पढ़ा। पौलुस केवल एक तर्क जीतना नहीं चाहता था; वह चाहता था कि उन लोगों में मसीह का रूप बन जाए। और उसका निष्कर्ष यही था कि न नियम पालन कुछ है, न नियमों से आज़ादी, परन्तु नई सृष्टि। व्यवस्था आपको सुधारती है; मसीह आपको जन्म देते हैं।
अब अगला कदम आपका है। बाइबल खोलिए, गलातियों के छह अध्याय धीरे-धीरे पढ़िए, और हर बार 5:1 पर रुककर साँस लीजिए। फिर रोमियों 3 और 4 की ओर बढ़िए, या प्रेरितों के काम 15 पढ़कर देखिए कि यह लड़ाई कलीसिया ने कैसे लड़ी और जीती। और जहाँ भी आपका मन आपको तौलने लगे, याद रखिए कि आपका नाम किसी तराज़ू पर नहीं, क्रूस पर लिखा गया है।
