बाइबल पुस्तक

लूका का सुसमाचार: खोए हुओं के लिए आया करुणामय उद्धारकर्ता

परिचय

सोचिए, यरीहो की सड़क पर एक अमीर आदमी पेड़ पर चढ़ा बैठा है। वह चुंगी लेने वाला है, नगर का सबसे घृणित आदमी, और उसका कद इतना छोटा है कि भीड़ में उसे कुछ दिखता नहीं। वह बस एक झलक चाहता है। पर यीशु रुकते हैं, ऊपर देखते हैं, उसका नाम लेकर बुलाते हैं और कहते हैं कि आज मैं तेरे घर में ठहरूँगा। शाम होने से पहले वह आदमी अपनी आधी संपत्ति गरीबों में बाँट देता है, और यीशु उसकी मेज़ पर भोजन कर रहे हैं।

यह दृश्य केवल लूका के सुसमाचार में मिलता है, और यह पूरी पुस्तक का सार है। इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि लूका कौन था, उसने कब और किसके लिए लिखा, उसकी पुस्तक किस ढाँचे पर खड़ी है, उसके मुख्य विषय क्या हैं, और वे पद कौन से हैं जिन्हें याद रखना आपके विश्वास को बदल देगा।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

लूका के सुसमाचार को अक्सर "करुणा का सुसमाचार" कहकर छोड़ दिया जाता है। हम एक कदम आगे जाएँगे। इस मार्गदर्शिका में हम लूका को मेज़ के पास बैठकर पढ़ेंगे। इस पुस्तक में यीशु लगातार किसी के साथ भोजन करते हुए दिखाई देते हैं, और हर बार मेज़ पर वही लोग बैठे हैं जिन्हें धर्म ने बाहर कर दिया था। लूका में उद्धार केवल एक कानूनी घोषणा नहीं है; यह खोए हुए को ढूँढ़कर परिवार की मेज़ पर बिठाना है। खोज का अंत भोज में होता है। जब आप इस दृष्टि से पढ़ेंगे, तो लूका 15 का पिता, जक्कई का घर और इम्माऊस की रोटी एक ही कहानी के तीन पड़ाव बन जाएँगे।

बाइबल लूका के सुसमाचार के बारे में क्या कहती है?

लूका अपनी पुस्तक की शुरुआत किसी स्वर्गदूत के दर्शन से नहीं, बल्कि एक इतिहासकार की ईमानदार भूमिका से करता है। वह बताता है कि बहुतों ने इन बातों का वर्णन लिखने का प्रयास किया है, और फिर वह अपना उद्देश्य खोलकर रख देता है: "इसलिये हे श्रीमान् थियुफिलुस मुझे भी यह उचित मालूम हुआ कि मैं सब बातों का ठीक ठीक पता लगाकर उन्हें क्रमानुसार तेरे लिये लिखूं," (लूका 1:3)।

इस एक वाक्य में तीन बातें छिपी हैं। पहली, लूका ने खोजबीन की; उसने चश्मदीद गवाहों से बात की, कहानियाँ इकट्ठी कीं, तथ्य जाँचे। दूसरी, उसने क्रम से लिखा, ताकि पढ़ने वाला भटके नहीं। तीसरी, उसने एक व्यक्ति के लिए लिखा, थियुफिलुस के लिए, जो शायद एक उच्च पदस्थ अन्यजाति विश्वासी था जिसे अपने विश्वास की नींव पर भरोसा चाहिए था। लूका का सुसमाचार भावुक कल्पना नहीं, गवाही पर टिका इतिहास है। और यही इतिहास करुणा से भरा हुआ है।

अगला बड़ा स्वर बैतलहम के खेतों में सुनाई देता है, जहाँ स्वर्गदूत चरवाहों से कहता है: "क्योंकि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और वह मसीह प्रभु है।" (लूका 2:11)। ध्यान दें कि यह खबर किसे दी गई। मंदिर के याजकों को नहीं, रोम के राजदरबार को नहीं, बल्कि रात की पाली में काम करने वाले चरवाहों को, जिनकी गवाही अदालत में मान्य नहीं थी। लूका के सुसमाचार में परमेश्वर की सबसे बड़ी घोषणा समाज के सबसे छोटे लोगों के कानों में पहली बार पहुँचती है। और शब्द "तुम्हारे लिये" सबसे कीमती है: यह उद्धारकर्ता दूर खड़ा कोई विचार नहीं, वह उनका अपना है।

फिर नासरत के आराधनालय में यीशु खड़े होकर यशायाह की पुस्तक से पढ़ते हैं और अपनी सेवकाई का घोषणापत्र सुनाते हैं: "कि प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिये कि उस ने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है, और मुझे इसलिये भेजा है, कि बन्धुवों को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं।" (लूका 4:18)। यहाँ यीशु स्वयं बता देते हैं कि उनकी थाली में कौन बैठेगा: कंगाल, बंदी, अंधे, कुचले हुए। लूका के बाकी तेईस अध्याय इसी घोषणा का विस्तार हैं।

और पुस्तक के मध्य से अंत तक एक ही धड़कन सुनाई देती है, जो जक्कई के घर पर शब्दों में ढल जाती है: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।" (लूका 19:10)। यह लूका के सुसमाचार का विषय-वाक्य है। यीशु खोए हुए को खोजने आए, और लूका में खोजना कभी दूर से हाथ हिलाना नहीं होता; वह घर में घुसना, मेज़ पर बैठना और उस आदमी को परिवार में लौटाना होता है जिसे सब ने पापी कहकर लिख दिया था।

लूका में उद्धार दरवाज़े पर नहीं रुकता; वह भोजन तक जाता है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

लूका कोई नया परमेश्वर पेश नहीं कर रहा। वह दिखा रहा है कि जो परमेश्वर पुराने नियम में अपनी भेड़ों को ढूँढ़ता फिरता था, वह अब देह धारण करके सड़कों पर चल रहा है। यहेजकेल 34 में परमेश्वर इस्राएल के स्वार्थी चरवाहों के विरुद्ध बोलते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि वे स्वयं अपनी भेड़ों को खोजेंगे, खोई हुई को ढूँढ़ेंगे और घायल को बाँधेंगे। भजन 23 में वही चरवाहा अपने जन को हरी चराइयों में ले जाता है और उसके सामने मेज़ बिछाता है। यशायाह 25 में परमेश्वर सब जातियों के लिए एक भोज तैयार करते हैं और मृत्यु को सदा के लिए निगल जाते हैं। लूका इन तीनों धागों को एक साथ बुनता है: चरवाहा आया है, मेज़ लग गई है, और निमंत्रण सब जातियों तक जाएगा।

पुराने नियम की करुणा भी लूका में लौटती है। व्यवस्था में परमेश्वर बार-बार अनाथ, विधवा और परदेशी की चिंता करते हैं। लैव्यव्यवस्था 25 का जुबली वर्ष कर्ज़ माफ़ी और स्वतंत्रता का वर्ष था, और लूका 4:18 में यीशु ठीक उसी भाषा में "छुटकारे" की घोषणा करते हैं। मरियम का गीत हन्ना के गीत की गूँज है, जहाँ परमेश्वन घमंडियों को गिराते और दीनों को ऊँचा करते हैं: "उस ने बलवन्तों को सिंहासनों से गिरा दिया; और दीनों को ऊंचा किया।" शिमोन और हन्ना, जकर्याह और इलीशिबा; लूका के पहले दो अध्याय पुराने नियम की प्रार्थना करती हुई मंडली हैं, जो प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए तरस रही है।

पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। लूका अकेला सुसमाचार लेखक है जो यीशु की वंशावली को आदम तक ले जाता है, अब्राहम तक नहीं। संदेश साफ़ है: यह उद्धारकर्ता केवल एक जाति का नहीं, पूरी मानवजाति का है। शिमोन ने मंदिर में बालक को गोद में लेकर यही कहा था, कि वह अन्यजातियों को प्रकाश देने के लिए ठहराया गया है। इसलिए जब जी उठे मसीह अपने चेलों को भेजते हैं, तो संदेश यरूशलेम से शुरू होकर सब जातियों तक जाता है, और यही धारा प्रेरितों के काम में बहती हुई रोम तक पहुँचती है।

सारी बाइबल की कहानी मसीह में इकट्ठी होती है, और लूका इसे एक तस्वीर में कैद करता है: इम्माऊस के मार्ग पर यीशु मूसा और सब भविष्यद्वक्ताओं से अपने विषय में समझाते हैं, और फिर मेज़ पर बैठकर रोटी तोड़ते हैं। शास्त्र की व्याख्या और टूटी रोटी; यही वह क्षण है जब चेलों की आँखें खुलती हैं।

रचना और मुख्य विषय

लूका के सुसमाचार के लेखक का नाम पुस्तक में नहीं है, पर मसीही कलीसिया ने पहली सदी से ही एक ही नाम जाना: लूका, पौलुस का साथी। कुलुस्सियों 4:14 में पौलुस उसे "प्रिय वैद्य लूका" कहता है, फिलेमोन 1:24 में उसे अपना सहकर्मी गिनता है, और 2 तीमुथियुस 4:11 की अकेली-सी पंक्ति में लिखता है कि केवल लूका उसके साथ है। प्रेरितों के काम के कुछ हिस्सों में लेखक "हम" लिखने लगता है, जिससे पता चलता है कि वह पौलुस की यात्राओं में साथ था। लूका सम्भवतः अन्यजाति पृष्ठभूमि का था, यानी नए नियम का एकमात्र गैर-यहूदी लेखक, और यह जानना उसकी पुस्तक पढ़ते समय बहुत मायने रखता है: एक बाहरी व्यक्ति ने लिखा कि यीशु बाहरी लोगों को भीतर लाते हैं।

समय के बारे में विद्वान बाँटे हुए हैं। कुछ इसे सन् 60 से 62 के आसपास रखते हैं, क्योंकि प्रेरितों के काम पौलुस के रोम में कैद रहते हुए ही खत्म हो जाता है और यरूशलेम के विनाश का कोई ज़िक्र नहीं है; उस स्थिति में लूका ने कैसरिया या रोम में सामग्री जुटाई होगी। दूसरे इसे सन् 70 से 85 के बीच रखते हैं। दोनों मतों में यह निश्चित है कि लूका ने चश्मदीद गवाहों के जीवित रहते हुए लिखा, और उसने मरकुस के सुसमाचार जैसी सामग्री के साथ-साथ अपनी अलग खोज भी जोड़ी। पहले दो अध्यायों की बारीकियाँ ऐसी हैं कि मानो किसी ने मरियम के दिल की बातें सुनकर लिखी हों।

यह पुस्तक दो खंडों का पहला खंड है। लूका सुसमाचार बताता है कि यीशु ने क्या करना और सिखाना आरम्भ किया; प्रेरितों के काम बताता है कि जी उठे मसीह पवित्र आत्मा के द्वारा अपनी कलीसिया में वही काम जारी रखते हैं। दोनों एक ही व्यक्ति, थियुफिलुस, को समर्पित हैं।

ढाँचा साफ़ है। पहले दो अध्याय जन्म की कहानियाँ और गीत हैं, मंदिर से शुरू होकर मंदिर पर खत्म। अध्याय 3 और 4 में यूहन्ना का प्रचार, यीशु का बपतिस्मा, वंशावली और जंगल की परीक्षा आती है, फिर नासरत का घोषणापत्र। अध्याय 4 से 9 गलील की सेवकाई है: चंगाई, चेलों का बुलावा, दृष्टान्त, और पतरस का यह अंगीकार कि यीशु परमेश्वर का मसीह हैं। अध्याय 9:51 में पुस्तक मुड़ जाती है, जहाँ लिखा है कि यीशु ने यरूशलेम जाने का विचार दृढ़ किया। यहाँ से अध्याय 19 तक वह लंबी यात्रा चलती है जिसे लोग "यरूशलेम की ओर यात्रा" कहते हैं, और लूका के सबसे प्रिय दृष्टान्त इसी रास्ते पर सुनाए जाते हैं: भला सामरी, खोई हुई भेड़, खोया सिक्का, खोया पुत्र, धनवान और लाजर, फरीसी और चुंगी लेने वाला। अध्याय 19 से 21 यरूशलेम में शिक्षा है, 22 और 23 अंतिम भोज, क्रूस और मृत्यु, और अध्याय 24 पुनरुत्थान, इम्माऊस का मार्ग और स्वर्गारोहण।

मुख्य विषय इस ढाँचे में गुँथे हुए हैं: खोए हुओं के लिए करुणा, धन के प्रति तीखी चेतावनी, प्रार्थना का जीवन, पवित्र आत्मा का काम, स्त्रियों का सम्मानजनक स्थान, आनंद और स्तुति के गीत, और वह मेज़ जिस पर पापी और उद्धारकर्ता एक साथ बैठते हैं।

इस पुस्तक के मुख्य पद

पहला पद पुस्तक का दिल है: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।" (लूका 19:10)। जक्कई ने यीशु को नहीं ढूँढ़ा था, केवल देखना चाहा था; यीशु ने उसे ढूँढ़ा। ध्यान दें कि "खोया हुआ" यहाँ कोई गाली नहीं, एक निदान है। जक्कई धनी था, प्रभावशाली था, और भीतर से पूरी तरह अकेला। उद्धार उस दिन उसके घर में घुसा, उसकी मेज़ पर बैठा, और उसके बैंक खाते तक पहुँच गया। लूका के सुसमाचार में अनुग्रह हमेशा ज़मीन पर उतरता है, कुछ बदलता है, किसी को लौटाता है।

दूसरा पद वह है जिसे लोग बार-बार आँसुओं के साथ पढ़ते हैं: "तब वह उठकर अपने पिता के पास चला: और वह अभी दूर ही था, कि उसे देखकर उसके पिता को तरस आया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा।" (लूका 15:20)। यह छोटा पुत्र अपनी तैयार की हुई माफ़ी की बात कहने तक नहीं पहुँच पाता, क्योंकि पिता बीच में ही दौड़ पड़ता है। उस संस्कृति में बड़े-बूढ़े दौड़ते नहीं थे; दौड़ने के लिए उन्हें अपना लंबा वस्त्र समेटना पड़ता, और यह अपमान माना जाता। पिता अपनी इज़्ज़त की चिंता छोड़कर बेटे की इज़्ज़त बचाने दौड़ता है। और कहानी कहाँ खत्म होती है? बछड़ा काटा जाता है, बाजे बजते हैं, घर में भोज होता है। पश्चाताप की मंज़िल सुधार-गृह नहीं, मेज़ है।

तीसरा पद खाली कब्र पर स्वर्गदूतों के मुँह से निकलता है: "वह यहां नहीं, परन्तु जी उठा है; स्मरण करो कि उस ने गलील में रहते हुए तुम से कहा था," (लूका 24:6)। लूका का सुसमाचार करुणा की मीठी कहानियों पर नहीं, एक खाली कब्र पर टिका है। यदि यीशु जी न उठे होते, तो जक्कई की खुशी और पिता का गले लगाना केवल सुंदर भावनाएँ होतीं। पर वे जी उठे, और इसलिए खोए हुओं की खोज अब भी चल रही है। ध्यान दीजिए कि स्वर्गदूत स्त्रियों से कहते हैं कि यीशु के वचन स्मरण करो; पुनरुत्थान का पहला प्रमाण यह था कि उन्होंने जो कहा, वह हुआ। और उसी दिन शाम को वे जी उठे प्रभु इम्माऊस में मेज़ पर बैठकर रोटी तोड़ते हैं। ढूँढ़ना, गले लगाना, जी उठना; और हर बार भोजन।

पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

लूका के चौबीस अध्यायों को पढ़ने में लगभग ढाई से तीन घंटे लगते हैं, यानी आप इसे एक शांत दोपहर में पूरा सुन सकते हैं। पर पहली बार पढ़ते समय जल्दबाज़ी मत कीजिए। एक सरल तरीका यह है कि चार सप्ताह में छह-छह अध्याय पढ़ें, और हर सप्ताह एक सवाल साथ लेकर चलें।

पहले सप्ताह में अध्याय 1 से 6 पढ़ें और पूछें: यह उद्धारकर्ता किसके लिए आया? जन्म के गीतों पर रुकिए, मरियम की स्तुति, जकर्याह की भविष्यद्वाणी, शिमोन का आनंद। नासरत के आराधनालय के दृश्य को दो बार पढ़िए, क्योंकि वह पूरी पुस्तक का नक्शा है।

दूसरे सप्ताह में अध्याय 7 से 12 पढ़ें और देखें कि यीशु किन-किन लोगों को छूते हैं। यहाँ वह विधवा का बेटा जिलाया जाता है, वह स्त्री जो शमौन फरीसी के घर में यीशु के पाँव आँसुओं से धोती है, मार्था और मरियम का घर, और प्रार्थना की शिक्षा। इस सप्ताह हर बार जब भोजन या मेहमाननवाज़ी का ज़िक्र आए, उसे किसी नोटबुक में लिख लें। आप चौंक जाएँगे कि लूका कितनी बार आपको मेज़ पर ले जाता है।

तीसरे सप्ताह में अध्याय 13 से 19 पढ़ें, यानी यरूशलेम की यात्रा का हृदय। अध्याय 15 को अलग से, धीरे-धीरे, ज़ोर से पढ़िए। और पूछिए: इन तीन दृष्टान्तों में मैं कौन हूँ, खोई भेड़, छोटा बेटा, या वह बड़ा भाई जो भोज के बाहर खड़ा नाराज़ है?

चौथे सप्ताह में अध्याय 20 से 24 पढ़ें। क्रूस पर यीशु के शब्दों पर ठहरिए, वह प्रार्थना जिसमें वे अपने मारने वालों की क्षमा माँगते हैं, और वह वादा जो एक मरते हुए डाकू को स्वर्गलोक में जगह देता है। अंत में इम्माऊस का मार्ग पढ़कर अपनी प्रार्थना यह बना लीजिए कि पवित्र आत्मा शास्त्र में मसीह को दिखाए।

इसके बाद सीधे प्रेरितों के काम पढ़ना शुरू कर दें, क्योंकि लूका ने दोनों को एक ही कहानी की तरह लिखा है। और यदि समय कम हो, तो बस पाँच अध्याय चुनें: 2, 4, 15, 19 और 24। इन पाँच में पूरा लूका सिमटा हुआ है।

दर्पण

अब मुझे आपसे सीधे बात करने दीजिए। लूका पढ़ते समय सबसे कठिन सवाल यह नहीं है कि आप खोए हुए हैं या नहीं; कठिन सवाल यह है कि आप मेज़ पर किसे बैठा देखना सहन कर सकते हैं। लूका 15 में केवल छोटा बेटा नहीं है, एक बड़ा भाई भी है जो खेत से लौटकर बाजे की आवाज़ सुनता है और भीतर आने से इनकार कर देता है। वह ईमानदार है, मेहनती है, कभी घर से भागा नहीं, और ठीक इसी कारण अनुग्रह उसे चुभता है।

अपने आप से पूछिए: दफ़्तर में वह सहकर्मी जिसने आपके साथ बेईमानी की, यदि कल आपकी कलीसिया में हाथ उठाकर गीत गाता मिले, तो आपके भीतर क्या उठेगा? वह रिश्तेदार जिसने परिवार का पैसा डुबा दिया, यदि आँसू भरकर लौट आए, तो आप उसे गले लगाएँगे या हिसाब खोलकर बैठ जाएँगे? लूका की मेज़ इतनी बड़ी है कि वह हमारे बनाए हुए सारे दायरे तोड़ देती है, और यह सुनने में जितना मीठा है, जीने में उतना ही चुभता है।

दूसरी ओर, यदि आप वही हैं जो खुद को हिसाब से बाहर मान बैठा है, तो लूका आपके लिए ही लिखा गया। आपका बीमार शरीर, आपका खाली बैंक खाता, वह लत जिससे आप हार चुके हैं, वह अकेलापन जो रविवार की शाम सबसे भारी लगता है; यीशु इन्हीं गलियों में चलते हैं। जक्कई ने कुछ ठीक नहीं किया था जब यीशु ने उसका नाम पुकारा। कुष्ठी ने पहले सफ़ाई नहीं दी थी। क्रूस पर लटके डाकू के पास पश्चाताप के कर्मों के लिए कुछ घंटे भी नहीं थे, और उसे उसी दिन स्वर्गलोक का वचन मिला।

तो आज आप कहाँ खड़े हैं, मेज़ पर या दरवाज़े के बाहर? पिता दोनों जगह आता है। छोटे बेटे के लिए वह दौड़ता है और बड़े बेटे को मनाने बाहर निकल आता है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को लूका का सुसमाचार समझाने का सबसे अच्छा रास्ता कहानी है, क्योंकि यह पुस्तक ही कहानियों से भरी है। आप छोटे बच्चों से कह सकते हैं कि यह उस डॉक्टर की लिखी किताब है जिसने यीशु के बारे में सब बातें बहुत ध्यान से पूछ-पूछकर लिखीं, ताकि हम पक्का जान सकें कि ये सच हैं। और इस किताब में यीशु हमेशा उन लोगों के पास जाते हैं जिन्हें कोई पसंद नहीं करता: बीमार, गरीब, अकेले, और वे भी जिन्होंने गलत काम किए।

खोई हुई भेड़ की कहानी से शुरुआत कीजिए। बच्चों को यह समझ में आता है कि खो जाना कैसा लगता है और ढूँढ़ लिया जाना कितना अच्छा लगता है। फिर पूछिए कि जब चरवाहे को भेड़ मिल गई तो उसने क्या किया, और उन्हें बताइए कि उसने दोस्तों को बुलाकर खुशी मनाई। घर पर एक छोटा-सा उत्सव भी कर सकते हैं, कुछ मीठा बाँटकर, यह कहते हुए कि यीशु जब किसी को ढूँढ़ लेते हैं, तो स्वर्ग में खुशी मनाई जाती है।

बड़े बच्चों के साथ जक्कई की कहानी और खोए पुत्र का दृष्टान्त पढ़िए, और उनसे पूछिए कि उन्हें पिता का दौड़ना कैसा लगा। किशोरों के साथ आप गहरे सवाल उठा सकते हैं: क्या अनुग्रह अन्याय है? बड़ा भाई क्यों नाराज़ था?

हमारी वेबसाइट पर लूका के सुसमाचार की अलग-अलग उम्र के अनुसार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष), प्राथमिक उम्र के बच्चों (7 से 12 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार सामग्री चुनें और उसे साथ बैठकर पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लूका का सुसमाचार किसने लिखा था?

पुस्तक में लेखक का नाम नहीं है, पर कलीसिया की आरंभिक गवाही एकमत से लूका की ओर इशारा करती है, जो पौलुस का साथी और वैद्य था। पौलुस उसे कुलुस्सियों 4:14 में "प्रिय वैद्य लूका" कहकर नमस्कार भेजता है, फिलेमोन 1:24 में सहकर्मी गिनता है, और 2 तीमुथियुस 4:11 में लिखता है कि केवल लूका उसके साथ रह गया है। प्रेरितों के काम में कुछ यात्रा-वृत्तांत "हम" में लिखे गए हैं, जिससे स्पष्ट है कि लेखक पौलुस के साथ सफ़र कर रहा था।

लूका का सुसमाचार कब लिखा गया?

निश्चित तारीख किसी को मालूम नहीं। कुछ विद्वान इसे सन् 60 से 62 के बीच रखते हैं, क्योंकि लूका की दूसरी पुस्तक, प्रेरितों के काम, पौलुस के रोम में कैद रहते हुए ही समाप्त हो जाती है और सन् 70 में यरूशलेम के मंदिर के विनाश का कोई उल्लेख नहीं है। दूसरे विद्वान इसे सन् 70 से 85 के बीच रखते हैं। दोनों स्थितियों में यह उन लोगों के जीवनकाल में लिखा गया जिन्होंने यीशु को अपनी आँखों से देखा था, और लूका ने उन्हीं से जानकारी जुटाई।

थियुफिलुस कौन था और लूका ने उसके लिए क्यों लिखा?

थियुफिलुस नाम का अर्थ है "परमेश्वर का प्रेमी"। लूका 1:3 में उसे "श्रीमान्" कहकर संबोधित किया गया है, जो उस समय किसी उच्च पदस्थ व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होने वाला सम्मानसूचक शब्द था। वह सम्भवतः एक धनी अन्यजाति विश्वासी या जिज्ञासु था, और शायद उसी ने इस लेखन का खर्च उठाया। लूका का उद्देश्य साफ़ है: वह चाहता था कि थियुफिलुस को जो शिक्षा मिली है, उसकी सच्चाई का उसे पूरा भरोसा हो जाए।

लूका का सुसमाचार मत्ती और मरकुस से किस तरह अलग है?

मत्ती मुख्यतः यहूदी पाठकों के लिए लिखता है और यीशु को प्रतिज्ञा किए हुए राजा के रूप में दिखाता है; मरकुस तेज़ गति से यीशु के कामों पर ध्यान देता है। लूका सबसे लंबा सुसमाचार है और सबसे विस्तृत ऐतिहासिक भूमिका देता है। उसकी खास पहचान है करुणा का दायरा: गरीब, स्त्रियाँ, सामरी, चुंगी लेने वाले और अन्यजातियाँ उसके पन्नों पर बार-बार आते हैं। वह यीशु की वंशावली आदम तक ले जाता है और प्रार्थना, पवित्र आत्मा तथा स्तुति के गीतों पर विशेष ज़ोर देता है।

क्या लूका ने यीशु को अपनी आँखों से देखा था?

नहीं, और वह खुद यह छिपाता नहीं। लूका 1:1 से 1:4 में वह मानता है कि ये बातें उन लोगों से आई हैं जो आरंभ से चश्मदीद गवाह थे, और उसने सब बातों का ठीक-ठीक पता लगाकर क्रम से लिखा। इसीलिए उसका सुसमाचार कम भरोसेमंद नहीं, बल्कि सावधानी से जाँची गई गवाही है। पहले दो अध्यायों का अंदर का विवरण, विशेषकर मरियम के मन की बातें, बताता है कि उसने परिवार के निकट लोगों से बात की होगी।

लूका के सुसमाचार को "करुणा का सुसमाचार" क्यों कहा जाता है?

क्योंकि यहाँ यीशु लगातार उन लोगों की ओर मुड़ते हैं जिन्हें समाज ने हाशिये पर धकेल दिया था। नाइन की विधवा, कुष्ठ रोगी, लकवे का मारा हुआ, वह स्त्री जिसकी बदनामी सब जानते थे, भला सामरी, लाजर जो द्वार पर पड़ा रहता था, और वह चुंगी लेने वाला जो मंदिर में केवल यह कह पाया कि परमेश्वर मुझ पापी पर दया करें। लूका 4:18 में यीशु का घोषणापत्र ही कंगालों, बंदियों, अंधों और कुचले हुओं के नाम पर है, और पूरी पुस्तक उसी वादे को पूरा होता दिखाती है।

लूका 15 के तीन दृष्टान्तों का क्या अर्थ है?

खोई हुई भेड़, खोया सिक्का और खोया पुत्र, तीनों एक ही सवाल का जवाब हैं: फरीसी शिकायत कर रहे थे कि यीशु पापियों के साथ भोजन करते हैं। तीनों कहानियों में कुछ खो जाता है, कोई उसे खोजता है, और मिलने पर उत्सव होता है। अंतिम दृष्टान्त में दो बेटे हैं, और कहानी छोटे बेटे के लौटने पर खत्म नहीं होती, बल्कि बड़े भाई के बाहर खड़े रह जाने पर। यीशु का इशारा साफ़ था कि शिकायत करने वाले धार्मिक लोग ही असली खतरे में हैं।

लूका और प्रेरितों के काम का आपस में क्या संबंध है?

ये दोनों एक ही लेखक की दो जिल्दें हैं, और दोनों थियुफिलुस को समर्पित हैं। प्रेरितों के काम 1:1 में लूका अपनी "पहली पुस्तक" का हवाला देता है, यानी सुसमाचार। पहला खंड बताता है कि यीशु ने पृथ्वी पर क्या किया और सिखाया; दूसरा बताता है कि स्वर्गारोहण के बाद वे पवित्र आत्मा के द्वारा अपनी कलीसिया में वही काम जारी रखते हैं। इसलिए इन दोनों को लगातार पढ़ना सबसे अच्छा है, क्योंकि कहानी यरूशलेम से शुरू होकर रोम तक बहती है।

कौन-सी कहानियाँ केवल लूका के सुसमाचार में मिलती हैं?

काफ़ी सारी, और वे सबसे प्रिय कहानियों में गिनी जाती हैं। भला सामरी, खोया सिक्का, खोया पुत्र, धनवान और लाजर, फरीसी और चुंगी लेने वाले की प्रार्थना, मूर्ख धनवान, जक्कई की मुलाकात, नाइन की विधवा का बेटा, मार्था और मरियम, दस कुष्ठियों की चंगाई, क्रूस पर पछताए हुए डाकू से किया गया वादा, और इम्माऊस के मार्ग की भेंट। जन्म की विस्तृत कहानी और मरियम, जकर्याह तथा शिमोन के गीत भी केवल लूका में हैं।

लूका 19:10 का क्या मतलब है कि यीशु खोए हुओं को ढूँढ़ने आए?

इस पद में यीशु जक्कई के घर बैठकर अपनी पूरी सेवकाई का उद्देश्य बताते हैं: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।" "खोया हुआ" उस हालत का नाम है जिसमें मनुष्य परमेश्वर से अलग होकर जीता है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, धार्मिक हो या बदनाम। सबसे महत्वपूर्ण बात पहल है: खोया हुआ व्यक्ति परमेश्वर को नहीं ढूँढ़ता, परमेश्वर उसे ढूँढ़ने निकलते हैं। और ढूँढ़ना अधूरा नहीं रहता, वह उद्धार तक जाता है।

"मनुष्य का पुत्र" कहने से यीशु का क्या आशय था?

यह यीशु का अपने लिए सबसे प्रिय शीर्षक था, और यह दानिय्येल 7 से आता है, जहाँ मनुष्य के पुत्र जैसा एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने लाया जाता है और उसे राज्य, महिमा तथा अधिकार दिया जाता है। एक ओर यह शीर्षक यीशु की सच्ची मनुष्यता को दर्शाता है, कि वे हमारे बीच एक हुए; दूसरी ओर यह उनके स्वर्गीय अधिकार और आने वाले राज्य की ओर इशारा करता है। लूका में यह शीर्षक खोजने, क्षमा देने, दुख उठाने और अंत में महिमा में लौटने, इन सबके साथ जुड़ा हुआ है।

लूका का सुसमाचार पहली बार पढ़ने वाला कहाँ से शुरू करे?

शुरुआत अध्याय 1 से करना ही सबसे अच्छा है, क्योंकि लूका ने जानबूझकर क्रम से लिखा है और उसकी भूमिका आपको बता देती है कि वह क्या कर रहा है। यदि समय कम हो, तो अध्याय 15 से शुरू कीजिए, फिर 19, फिर 24, और उसके बाद पूरी पुस्तक पढ़िए। पढ़ते समय एक कलम साथ रखें और हर बार निशान लगाएँ जब यीशु किसी के साथ भोजन करते हैं या किसी को छूते हैं; यही दो धागे आपको पूरी पुस्तक के हृदय तक ले जाएँगे।

अंत में

लूका ने अपनी पुस्तक इसलिए नहीं लिखी कि हमारे पास यीशु के विषय में कुछ अच्छी कहानियाँ हो जाएँ। उसने लिखा ताकि थियुफिलुस, और उसके पीछे हम सब, पूरे भरोसे से जान लें कि जो सुना है वह सच है। और वह सच्चाई एक वाक्य में सिमटती है: मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया। मगर लूका हमें वहीं नहीं छोड़ता, वह हमें मेज़ तक ले जाता है। चरवाहा भेड़ को कंधे पर लाकर उत्सव करता है, पिता बेटे को गले लगाकर भोज रखता है, यीशु जक्कई के घर भोजन करते हैं, और जी उठा प्रभु इम्माऊस में रोटी तोड़ते हैं।

इसलिए इस पुस्तक को पढ़ना केवल जानकारी बढ़ाना नहीं है। यह उस निमंत्रण को सुनना है जो आज भी खुला है। अब आगे क्या? अपनी बाइबल खोलें और लूका 15 धीरे-धीरे पढ़ें, फिर उस एक व्यक्ति का नाम लेकर प्रार्थना करें जिसे आप खोया हुआ मानते हैं, और फिर उसे भोजन पर बुला लें। लूका के सुसमाचार का उत्तर इससे अच्छा कोई नहीं।

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