यहेजकेल की पुस्तक: सूखी हड्डियाँ, परमेश्वर की महिमा और नया हृदय
परिचय
बाबेल की एक सिंचाई-नहर के किनारे, मिट्टी के घरों की एक बस्ती में, एक तीस साल का याजक बैठा है। उसे मंदिर में सेवा शुरू करनी थी; यही वह उम्र थी। पर मंदिर सात सौ मील दूर है, और वह खुद एक बंदी है, एक शरणार्थी शिविर का निवासी, जिसका देश अभी पूरी तरह गिरा भी नहीं और उम्मीद पहले ही मर चुकी है। उसी दिन आकाश फट जाता है।
"तीसवें वर्ष के चौथे महीने के पाँचवें दिन, जब मैं कबार नदी के तीर पर बन्धुओं के बीच में था, तब स्वर्ग खुल गया, और मुझे परमेश्वर के दर्शन हुए" (यहेजकेल 1:1)।
इस पृष्ठ पर आप यहेजकेल की पुस्तक को उसके लेखक, समय, बनावट और मुख्य विषयों सहित समझेंगे, और यह भी देखेंगे कि सूखी हड्डियों की घाटी, पत्थर का हृदय और मंदिर से बहती नदी आपके अपने जीवन से कैसे जुड़ती हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकांश परिचय यहेजकेल को "निर्वासन के भविष्यद्वक्ता" के रूप में पढ़ते हैं और वहीं रुक जाते हैं। हम एक कदम आगे जाते हैं: यहेजकेल मरम्मत की पुस्तक नहीं, नई सृष्टि की पुस्तक है। परमेश्वर यहाँ टूटे हुए इस्राएल को जोड़कर पुराना रूप नहीं लौटाते; वे पत्थर का हृदय निकालकर नया देते हैं, हड्डियों को जिलाते हैं, और एक नए मंदिर से नदी बहा देते हैं। और इस सबके पीछे एक और सच्चाई चलती है: परमेश्वर की महिमा पहियों पर है। वे खंडहरों में पीछे छूट जाने से इनकार करते हैं, वे अपने लोगों के पीछे-पीछे शिविर तक आते हैं। इसी दोहरे सूत्र से हम पूरी पुस्तक पढ़ेंगे।
बाइबल यहेजकेल की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?
पुस्तक की शुरुआत किसी उपदेश से नहीं, एक दर्शन से होती है जो पाठक को लगभग चक्कर में डाल देता है: उत्तर से आती आँधी, आग, चार जीवधारी, पहिए के भीतर पहिए, और उन सबके ऊपर नीलमणि जैसा एक सिंहासन और उस पर मनुष्य-सदृश एक आकृति। यहेजकेल इसका वर्णन करने के लिए सावधानी से शब्द चुनते हैं, "जैसा", "समान", "रूप" कहकर, क्योंकि वे जानते हैं कि वे जो देख रहे हैं उसे भाषा पकड़ नहीं सकती। और फिर वह पद आता है जो पूरी पुस्तक की कुंजी है:
"वर्षा के दिन बादल में जैसे धनुष दिखाई पड़ता है, वैसे ही चारों ओर का प्रकाश दिखाई पड़ता था। यहोवा के तेज का रूप ऐसा ही था। इसे देखकर मैं मुँह के बल गिरा, तब मैंने एक शब्द सुना जैसे कोई बातें करता है" (यहेजकेल 1:28)।
ध्यान दीजिए कि यह सिंहासन यरूशलेम में नहीं, बाबेल में दिखता है। याजक के सारे धर्मशास्त्र में परमेश्वर की महिमा का पता मंदिर का परम पवित्र स्थान था। अब वही महिमा निर्वासितों की बस्ती के ऊपर खड़ी है। बंदी लोग सोच रहे थे कि परमेश्वर यरूशलेम में रह गए, या बाबेल के देवताओं से हार गए। यहेजकेल को दिखाया जाता है कि उनका सिंहासन चलता-फिरता है और वे हार नहीं सकते।
इस दर्शन के तुरंत बाद बुलाहट आती है, और वह कोमल नहीं है:
"और उसने मुझसे कहा, हे मनुष्य के सन्तान, मैं तुझे इस्राएलियों के पास अर्थात् उस बलवा करनेवाली जाति के पास भेजता हूँ, जिन्होंने मुझसे बलवा किया है" (यहेजकेल 2:3)।
यहेजकेल को ऐसे लोगों के पास भेजा जाता है जो सुनेंगे नहीं। उन्हें "मनुष्य के सन्तान" कहा जाता है, यह संबोधन पुस्तक में लगभग सौ बार आता है और हर बार याद दिलाता है कि सिंहासन पर बैठने वाले के सामने भविष्यद्वक्ता भी केवल एक नश्वर मनुष्य है। तीसरे अध्याय में उन्हें पहरुए का काम सौंपा जाता है: उन्हें शहर की दीवार पर खड़े होकर चेतावनी देनी है, चाहे कोई माने या न माने।
फिर भी यह पुस्तक केवल न्याय की घोषणा नहीं है। इसके बीचोंबीच परमेश्वर का हृदय खुलकर सामने आता है:
"क्योंकि जो मरे, उसके मरने से मैं प्रसन्न नहीं होता, इसलिए पश्चाताप करो, तभी तुम जीवित रहोगे, परमेश्वर यहोवा की यही वाणी है" (यहेजकेल 18:32)।
यह वाक्य उन लोगों से कहा गया जो कह रहे थे कि वे अपने बाप-दादों के पापों की सज़ा भुगत रहे हैं और कुछ नहीं कर सकते। परमेश्वर उत्तर देते हैं कि वे मौत के व्यापारी नहीं हैं; वे जीवन चाहते हैं, और हर व्यक्ति के सामने आज ही पश्चाताप का दरवाज़ा खुला है।
पुस्तक का दूसरा आधा भाग इसी जीवन को तीन चित्रों में खोलता है। पहला, बदला हुआ भीतर का मनुष्य: "मैं तुमको नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुमको माँस का हृदय दूँगा" (यहेजकेल 36:26)। दूसरा, मुर्दों में से जी उठी एक जाति: "परमेश्वर यहोवा इन हड्डियों से यह कहता है : देखो, मैं आप तुम में साँस समाऊँगा, और तुम जी उठोगी" (यहेजकेल 37:5)। और तीसरा, मंदिर की दहलीज़ के नीचे से निकलकर मरुभूमि और खारे समुद्र को जिला देती एक नदी: "और जहाँ कहीं यह नदी बहेगी, वहाँ सब बहुत से जलजन्तु जीएँगे" (यहेजकेल 47:9)।
इन तीनों चित्रों में एक ही क्रिया बार-बार लौटती है: परमेश्वर सुधारते नहीं, वे नया रचते हैं।
लेखक, समय और परिस्थिति
पुस्तक अपने लेखक का परिचय स्वयं देती है: "बूजी का पुत्र यहेजकेल याजक", जिसे कसदियों के देश में कबार नदी के किनारे यहोवा का वचन मिला (यहेजकेल 1:3)। नाम का अर्थ है "परमेश्वर बल देते हैं", और यह नाम उस व्यक्ति पर पूरा उतरा जिसे एक ऐसी पीढ़ी के सामने खड़ा होना था जिसके पास न मंदिर था, न राजा, न देश।
यहेजकेल 597 ईसा पूर्व में राजा यहोयाकीन के साथ बंदी बनाकर बाबेल ले जाए गए थे, उस पहले बड़े निर्वासन में जिसमें यरूशलेम के अगुवे, कारीगर और याजक उठा लिए गए। उनकी बस्ती का नाम "तेल-अबीब" था, कबार नहर के किनारे, जो बाबेल के पास एक बड़ी सिंचाई-नहर थी। पुस्तक में तेरह बार तारीखें दी गई हैं, और यही इसे पूरे पुराने नियम की सबसे सटीक तिथियों वाली भविष्यद्वाणी-पुस्तक बनाता है। पहली तारीख यहोयाकीन के बंधुआई के पाँचवें वर्ष की है, लगभग 593 ईसा पूर्व, और अंतिम तारीख लगभग 571 ईसा पूर्व की। यानी यहेजकेल की सेवकाई बाईस वर्षों तक चली।
इन बाईस वर्षों के ठीक बीच में एक तारीख है जो सब कुछ बदल देती है। 586 ईसा पूर्व में यरूशलेम गिरता है, मंदिर जल जाता है, और यहेजकेल 33:21 में एक भगोड़ा आकर कहता है, "नगर ले लिया गया।" उस खबर से पहले यहेजकेल का संदेश लगभग पूरी तरह न्याय का है, क्योंकि निर्वासित झूठे भविष्यद्वक्ताओं पर भरोसा करके कह रहे थे कि दो साल में सब ठीक हो जाएगा। खबर के बाद उनका स्वर बदल जाता है और आशा का विस्फोट होता है। जब सबसे बुरा घट चुका होता है, तब परमेश्वर भविष्य की बात शुरू करते हैं।
इस भविष्यद्वक्ता की सेवकाई असामान्य रूप से शारीरिक और महँगी थी। उन्हें ईंट पर यरूशलेम की घेराबंदी का नक्शा बनाना पड़ा, महीनों एक करवट लेटना पड़ा, अपने बाल मूँड़कर तीन हिस्सों में बाँटने पड़े, और सबसे कठिन, जब उनकी पत्नी, जिसे पुस्तक "तेरी आँखों की प्रिय" कहती है, अचानक मर गई, तो उन्हें शोक मनाने से मना किया गया, ताकि उनका सूना चेहरा उस दिन का चिह्न बने जब मंदिर के विनाश पर लोग विलाप तक न कर पाएँगे (यहेजकेल 24:15-24)।
मसीही कलीसिया ने सदा इस पुस्तक को यहेजकेल की ही रचना माना है; पूरी पुस्तक पहले पुरुष में लिखी गई है, इसकी शब्दावली और याजकीय दृष्टि आरंभ से अंत तक एक समान है। प्राचीन यहूदी शिक्षकों ने अंतिम अध्यायों के मंदिर-नियमों पर बहस ज़रूर की, पर पुस्तक को कभी अलग नहीं किया गया, क्योंकि इसमें परमेश्वर की वाणी को पहचानने से इनकार करना कठिन था।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यहेजकेल अचानक आसमान से नहीं टपकता। उसका हर बड़ा चित्र पुराने नियम में पहले से बोया हुआ है। सिंहासन और महिमा का दर्शन सीनै पर्वत की आग और निर्गमन के बादल को याद दिलाता है; पवित्रता, अशुद्धता और बलिदान की भाषा सीधे लैव्यव्यवस्था से आती है, क्योंकि यहेजकेल याजक थे; हृदय के बदलने की प्रतिज्ञा व्यवस्थाविवरण 30:6 के "मन का खतना" और यिर्मयाह 31:31 की नई वाचा की जुड़वाँ बहन है। यहाँ तक कि यहेजकेल 34 में झूठे चरवाहों की निंदा और परमेश्वर की यह घोषणा कि "मैं आप अपनी भेड़-बकरियों की सुधि लूँगा", भजन 23 की गूँज है, पर अब उसे राष्ट्र के स्तर पर कहा जा रहा है।
और फिर नया नियम खुलता है, और लगता है जैसे किसी ने यहेजकेल की किताब खोलकर सामने रख दी हो।
जो महिमा मंदिर छोड़कर पूरब की ओर चली गई थी, वह देह धारण करके लौटती है: "और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी" (यूहन्ना 1:14)। यीशु मसीह स्वयं को "अच्छा चरवाहा" कहते हैं और यहेजकेल 34 की प्रतिज्ञा अपने ऊपर ले लेते हैं। जब नीकुदेमुस नए जन्म की बात पर चौंकता है, तो प्रभु उससे कहते हैं कि इस्राएल का गुरु होकर वह यह कैसे नहीं जानता; क्योंकि यहेजकेल 36 में जल और आत्मा से नए हृदय की प्रतिज्ञा सदियों पहले लिखी जा चुकी थी। पिन्तेकुस्त के दिन आँधी जैसा शब्द और आत्मा का उतरना सूखी हड्डियों पर साँस के फूँके जाने का वही दृश्य है, अब घाटी में नहीं, ऊपरी कोठरी में। पौलुस कुरिन्थियों से कहते हैं कि वे पत्थर की पटियाओं पर नहीं, हृदय की माँस रूपी पटियाओं पर लिखी हुई चिट्ठी हैं, और यह वाक्य यहेजकेल के बिना अर्थहीन है।
अंत तक पहुँचिए और पुस्तक फिर खुल जाती है। प्रकाशितवाक्य 4 में सिंहासन, इंद्रधनुष और जीवधारी वही हैं जो यहेजकेल 1 में थे। प्रकाशितवाक्य 22 में सिंहासन से निकलकर बहती जीवन के जल की नदी और दोनों किनारों पर महीने-महीने फलने वाले वृक्ष यहेजकेल 47 का सीधा विस्तार हैं। और जिस नगर का नाम यहेजकेल 48:35 में "यहोवा शम्मा", अर्थात "यहोवा वहाँ है" रखा गया, वही नगर अंत में उतरता है, जहाँ घोषणा होती है कि परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच है।
इसलिए यहेजकेल को मसीह के बिना पढ़ना संभव नहीं। नया हृदय क्रूस और पुनरुत्थान के बिना नहीं मिलता; साँस पवित्र आत्मा के बिना नहीं आती; नदी उस मंदिर से निकलती है जिसके बारे में प्रभु ने कहा कि वे इसे तीन दिन में उठा देंगे।
रचना और मुख्य विषय
पुस्तक की बनावट लगभग स्थापत्य-कला जैसी है, और एक बार इसका नक्शा दिख जाए तो अड़तालीस अध्याय उलझन नहीं रह जाते।
पहले तीन अध्याय बुलाहट के हैं: महिमा का दर्शन, पुस्तक का खाया जाना जो मुँह में मधु सा मीठा लगा, और पहरुए की नियुक्ति। फिर अध्याय 4 से 24 तक यरूशलेम पर न्याय की घोषणा है, जो उसके गिरने से पहले दी गई। यहीं चिह्न-कर्म आते हैं, यहीं अध्याय 8 से 11 का वह भयानक दर्शन है जिसमें यहेजकेल को आत्मा में यरूशलेम ले जाया जाता है और मंदिर के भीतर मूर्तिपूजा दिखाई जाती है, और फिर वह दृश्य जिसे पूरी बाइबल में सबसे दुखद कहा जा सकता है: परमेश्वर की महिमा करूबों के ऊपर से उठती है, दहलीज़ पर रुकती है, नगर के पूर्वी फाटक पर ठहरती है, और अंत में जैतून पर्वत पर जाकर ऊपर उठ जाती है। मंदिर इसलिए नहीं गिरा कि बाबेल बलवान था, बल्कि इसलिए कि भीतर रहने वाले पहले ही निकल चुके थे।
अध्याय 25 से 32 तक जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणियाँ हैं: अम्मोन, मोआब, एदोम, पलिश्ती, सोर, सीदोन और मिस्र। इनका उद्देश्य राजनीतिक नहीं है। ये दिखाती हैं कि जिस परमेश्वर ने अपने ही घराने का न्याय किया, वे उन घमंडी शक्तियों को भी नहीं छोड़ते जो गिरे हुए पर हँसीं।
अध्याय 33 से 48 तक पुनर्स्थापना है। 33 में पहरुए की बुलाहट नए सिरे से दोहराई जाती है, 34 में सच्चा चरवाहा, 36 में नया हृदय, 37 में सूखी हड्डियाँ और दो लकड़ियों का एक हो जाना, 38 और 39 में गोग के विरुद्ध अंतिम विजय, और 40 से 48 में एक विशाल दर्शन: नापा हुआ मंदिर, लौटती हुई महिमा, दहलीज़ से बहती नदी, बँटा हुआ देश और वह नगर जिसका नाम ही परमेश्वर की उपस्थिति है।
इस ढाँचे पर कुछ विषय बार-बार लौटते हैं। सबसे पहला है परमेश्वर की पवित्रता और महिमा; यहेजकेल कभी परमेश्वर को छोटा नहीं करता। दूसरा है वह वाक्य जो लगभग सत्तर बार आता है, "तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ"; न्याय हो या अनुग्रह, परमेश्वर का लक्ष्य यह है कि उन्हें पहचाना जाए। तीसरा, परमेश्वर अपने नाम के निमित्त काम करते हैं, इसलिए पुनर्स्थापना इस्राएल की योग्यता पर नहीं, परमेश्वर के चरित्र पर टिकी है। चौथा, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, जो अध्याय 18 में खुलकर सामने आता है। और पाँचवाँ, वही सूत्र जिससे हम यह पृष्ठ पढ़ रहे हैं: परमेश्वर की प्रतिक्रिया मरम्मत नहीं, नई सृष्टि है। पुराना मंदिर लौटाया नहीं जाता, नया नापा जाता है। पुराना हृदय सुधारा नहीं जाता, निकाल दिया जाता है।
इस पुस्तक के मुख्य पद
"मैं तुमको नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुमको माँस का हृदय दूँगा" (यहेजकेल 36:26)। यहाँ सारी क्रियाएँ परमेश्वर की हैं। लोग कहते हैं कि बदलाव के लिए पूरी कोशिश करो; यह पद कहता है कि पत्थर खुद को माँस में नहीं बदल सकता। पत्थर का हृदय अर्थात वह भीतर का मनुष्य जो सत्य के सामने कठोर है, जिस पर उपदेश फिसल जाते हैं। परमेश्वर उसे चमकाने का वादा नहीं करते, निकालने का वादा करते हैं। और अगले पद में वे अपना आत्मा भीतर रखने की बात करते हैं, ताकि आज्ञा मानना बाहरी दबाव नहीं, भीतरी स्वभाव बन जाए। यही अनुग्रह का हृदय है: परमेश्वर वह दे देते हैं जिसकी वे माँग करते हैं।
"परमेश्वर यहोवा इन हड्डियों से यह कहता है : देखो, मैं आप तुम में साँस समाऊँगा, और तुम जी उठोगी" (यहेजकेल 37:5)। घाटी में पड़ी हड्डियाँ केवल मुर्दा नहीं, सूखी थीं, यानी बहुत पहले मर चुकी थीं और किसी को उनकी चिंता भी नहीं रही। जब परमेश्वर पूछते हैं कि क्या ये जी सकती हैं, तो यहेजकेल न "हाँ" कहते हैं न "नहीं", बल्कि कहते हैं कि यह आप ही जानते हैं। उत्तर अध्याय 37:11 में मिलता है, जहाँ परमेश्वर समझाते हैं कि ये हड्डियाँ इस्राएल का सारा घराना हैं जो कह रहा था कि हमारी हड्डियाँ सूख गईं और हमारी आशा जाती रही। परमेश्वर उनकी निराशा को झूठा नहीं कहते; वे उनकी कब्र में बोलना शुरू कर देते हैं। परमेश्वर का वचन मुर्दों से बात करने से नहीं डरता।
"और जहाँ कहीं यह नदी बहेगी, वहाँ सब बहुत से जलजन्तु जीएँगे; और मछलियाँ बहुत हो जाएँगी" (यहेजकेल 47:9)। अंतिम दर्शन में एक छोटी धारा मंदिर की दहलीज़ के नीचे से निकलती है और हर हज़ार हाथ पर गहरी होती जाती है, टखनों तक, घुटनों तक, कमर तक, और फिर इतनी गहरी कि तैरना पड़े। वह सूखे अराबा से होकर उस मृत सागर में गिरती है जहाँ नमक के कारण कुछ नहीं जीता, और उसे मीठा कर देती है। जिस याजक ने महिमा को मंदिर से निकलते देखा था, वही अब उसे लौटते और वहाँ से जीवन बहते देखता है। जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति पहुँचती है, वहाँ मरा हुआ जी उठता है।
दर्पण
आप शायद इसलिए नहीं थके कि आपके साथ कुछ बहुत बुरा हुआ, बल्कि इसलिए कि कुछ भी नहीं बदला। वही नौकरी, वही झगड़ा जो हर दूसरे हफ़्ते दोहराता है, वही आदत जिसे आपने दस बार छोड़ा और ग्यारहवीं बार फिर पकड़ लिया। आपने संकल्प लिए, उपवास रखे, डायरी में आयतें लिखीं, और फिर एक दिन चुपचाप मान लिया कि बस इतना ही होगा। यही निर्वासितों की भाषा थी: हमारी हड्डियाँ सूख गईं और हमारी आशा जाती रही।
यहेजकेल आपको सांत्वना नहीं देता, वह आपसे झूठ नहीं बोलता। वह आपकी घाटी में उतरकर कहता है कि हाँ, ये हड्डियाँ सच में सूखी हैं। पर फिर वह वहीं खड़ा होकर परमेश्वर का वचन बोलता है।
पूछिए अपने आप से: कहाँ आप अब भी अपने पत्थर के हृदय को खुरचकर माँस बनाने की कोशिश कर रहे हैं? आप अपने पैसे के बारे में डर को तर्क कहकर छिपाते हैं; आप अपने शरीर से या तो नफ़रत करते हैं या उसकी पूजा; आप अपने परिवार में वही चुप्पी दोहराते हैं जो आपने अपने पिता से सीखी; आप अकेलेपन को व्यस्तता से ढकते हैं और फिर रात को पूछते हैं कि परमेश्वर इतने दूर क्यों लगते हैं। यहेजकेल 18:32 आपको यह कहकर निरुत्तर कर देता है कि परमेश्वर आपकी मृत्यु से प्रसन्न नहीं होते। वे आपको पकड़ने की ताक में नहीं बैठे हैं। वे जीवन चाहते हैं, आपके लिए, आज।
और वह दूसरा सच भी सुनिए, जो डराता भी है और छुड़ाता भी: महिमा मंदिर से निकल सकती है। धर्म के ढाँचे वहाँ भी खड़े रह सकते हैं जहाँ से परमेश्वर चले गए हों। अपनी प्रार्थना, अपनी सेवा, अपनी कलीसिया की आदतों को ईमानदारी से देखिए और पूछिए कि क्या भीतर अब भी कोई है, या सिर्फ़ दीवारें बची हैं।
अच्छी खबर यह है कि वही महिमा लौटती है, और जहाँ वह बसती है वहाँ से नदी निकलती है। आपको जीवन पैदा नहीं करना है। आपको बस उस धारा में उतरना है, टखनों से शुरू करके, जब तक पैर ज़मीन छोड़ न दें।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों के साथ यहेजकेल पढ़ना डरावना नहीं, रोमांचक हो सकता है, बशर्ते आप सही दरवाज़े से भीतर जाएँ। अध्याय 37 से शुरू कीजिए। बच्चों से कहिए कि कल्पना करो, एक बहुत बड़ा मैदान है जहाँ चारों ओर सिर्फ़ पुरानी, सूखी हड्डियाँ पड़ी हैं, और परमेश्वर एक आदमी से कहते हैं, "इनसे बात कर।" फिर खड़खड़ाहट होती है, हड्डियाँ जुड़ती हैं, माँस चढ़ता है, और जब परमेश्वर की साँस आती है तो वे सब जीवित होकर खड़े हो जाते हैं। छोटे बच्चे इस कहानी को शरीर से भी खेल सकते हैं, लेटकर और फिर उठकर।
इसके बाद सबसे ज़रूरी बात सरल शब्दों में कहिए: परमेश्वर उन चीज़ों को भी जिला सकते हैं जिन्हें हम पूरी तरह ख़त्म समझ चुके हैं, और वे हमें "नया हृदय" देना चाहते हैं, यानी भीतर से नया मन, जो उन्हें प्यार करना चाहता है। पत्थर और स्पंज दिखाकर समझाइए कि पत्थर पानी नहीं सोखता, स्पंज सोख लेता है; परमेश्वर हमारा पत्थर जैसा मन बदलकर नरम मन देते हैं।
पहियों और जीवधारियों के दर्शन में गहराई से मत उलझिए। बच्चों को बस इतना कहिए कि यहेजकेल ने परमेश्वर की चमक देखी और वह इतनी बड़ी थी कि वह मुँह के बल गिर पड़ा, और परमेश्वर कहीं भी जा सकते हैं, क्योंकि उनका सिंहासन चलता है।
Faith.network पर इसी विषय पर अलग-अलग उम्र के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष) के लिए एक सरल कहानी, स्कूल जाने वाले बच्चों (7 से 12 वर्ष) के लिए चित्रों और प्रश्नों सहित पाठ, और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए एक गहरी चर्चा जिसमें निर्वासन, पहचान और नए हृदय का अर्थ खुलकर सामने आता है।
पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
यहेजकेल को शुरू से अंत तक एक ही सप्ताह में पढ़ने की कोशिश अक्सर अध्याय 7 के आसपास दम तोड़ देती है। इसलिए एक आसान रास्ता यह है कि चार हिस्सों में, लगभग चार सप्ताह में चलें।
पहले सप्ताह अध्याय 1 से 3 पढ़िए और सिर्फ़ एक प्रश्न साथ रखिए: यह परमेश्वर कैसे हैं? दर्शन के हर विवरण का अर्थ निकालने की कोशिश मत कीजिए; उसका मकसद समझाना नहीं, झुकाना है। यहेजकेल 1:28 पर रुककर उसी मुद्रा में प्रार्थना कीजिए जिसमें भविष्यद्वक्ता गिरा था।
दूसरे सप्ताह अध्याय 4 से 24 में से चुनकर पढ़िए, विशेष रूप से 8 से 11 तक महिमा के जाने का दर्शन, अध्याय 16 और 18, और अध्याय 24 में पत्नी की मृत्यु। यहाँ अपने भीतर की प्रतिक्रिया नोट कीजिए। कुछ अध्याय आपको कठोर लगेंगे; उन्हें नरम करने की जल्दी मत कीजिए, बल्कि पूछिए कि परमेश्वर किस चीज़ से इतनी गहराई से दुखी हैं।
तीसरे सप्ताह जातियों वाले अध्याय 25 से 32 तेज़ी से पढ़ लीजिए, पर सोर के राजा वाले अध्याय 27 और 28 पर ठहरिए, जहाँ घमंड और सुंदरता का विनाश सबसे मार्मिक ढंग से लिखा गया है।
चौथे सप्ताह अध्याय 33 से 48 धीरे-धीरे पढ़िए। यहीं हृदय है: 34 का चरवाहा, 36 की प्रतिज्ञा, 37 की घाटी, और 40 से 48 का मंदिर। अंतिम अध्यायों के नाप-जोख से घबराइए मत; उन्हें ऐसे पढ़िए जैसे कोई किसी घर का विस्तृत नक्शा दिखाकर कह रहा हो, "यह सब सच में होगा, और मैं इसमें रहूँगा।" 47:9 और 48:35 पर पहुँचकर पुस्तक बंद कीजिए और परमेश्वर की उपस्थिति के लिए धन्यवाद दीजिए।
कुछ सहायक आदतें: हर दर्शन के बाद पूछिए कि इसमें परमेश्वर किसको जानने के लिए कह रहे हैं, क्योंकि "तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ" पूरी पुस्तक का लक्ष्य है। हर कठिन भविष्यद्वाणी को नया नियम के प्रकाश में रखिए, विशेषकर यूहन्ना 1, यूहन्ना 10, यूहन्ना 3 और प्रकाशितवाक्य 21 और 22। और यदि कोई अंश समझ में न आए, तो उसे खुला छोड़कर आगे बढ़िए; यहेजकेल ऐसी पुस्तक है जो दूसरी और तीसरी बार पढ़ने पर खुलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यहेजकेल की पुस्तक किसने लिखी?
पुस्तक स्वयं बताती है कि इसका लेखक बूजी का पुत्र यहेजकेल था, जो एक याजक था और बाबेल में कबार नदी के किनारे निर्वासितों के बीच रहता था। पूरी पुस्तक पहले पुरुष में लिखी गई है, यानी "मैंने देखा", "मुझसे कहा गया", और इसकी याजकीय भाषा, पवित्रता संबंधी शब्दावली तथा तिथियों की सटीकता आरंभ से अंत तक एक जैसी है। यहूदी और मसीही परंपरा दोनों ने सदा यहेजकेल को ही इसका लेखक माना है, यद्यपि अंतिम रूप देने में उनके शिष्यों या साथियों का हाथ रहा हो सकता है।
यहेजकेल की पुस्तक कब लिखी गई?
पुस्तक में दी गई तिथियाँ लगभग 593 ईसा पूर्व से 571 ईसा पूर्व तक फैली हुई हैं, यानी यहेजकेल की सेवकाई लगभग बाईस वर्ष चली। वे 597 ईसा पूर्व में राजा यहोयाकीन के साथ बंदी बनाकर बाबेल लाए गए थे, और उनकी पहली भविष्यद्वाणी उस बंधुआई के पाँचवें वर्ष में आई। पुस्तक का केंद्रीय मोड़ 586 ईसा पूर्व में यरूशलेम का पतन है, जिसकी खबर अध्याय 33 में पहुँचती है। उससे पहले का संदेश मुख्यतः न्याय का है और उसके बाद का आशा और पुनर्स्थापना का।
सूखी हड्डियों के दर्शन का क्या अर्थ है?
अध्याय 37 में यहेजकेल को हड्डियों से भरी एक घाटी दिखाई जाती है, और परमेश्वर स्वयं इसका अर्थ खोलते हैं: ये हड्डियाँ इस्राएल का सारा घराना हैं, जो निर्वासन में कह रहा था कि उसकी आशा जाती रही और वह पूरी तरह कट चुका है। परमेश्वर वचन और साँस के द्वारा उस मरी हुई जाति को फिर जीवित करने, उसे देश में लौटाने और उसमें अपना आत्मा रखने का वादा करते हैं। यह मुख्यतः राष्ट्र की पुनर्स्थापना का चित्र है, पर यह पुनरुत्थान और पवित्र आत्मा के नए जीवन की ओर भी स्पष्ट रूप से इशारा करता है।
यहेजकेल 36:26 में "नया मन" का क्या मतलब है?
बाइबल में हृदय या मन केवल भावनाओं का नहीं, पूरे भीतरी व्यक्तित्व का केंद्र है, जहाँ से इच्छाएँ, निर्णय और निष्ठाएँ निकलती हैं। पत्थर का हृदय उस कठोरता को दर्शाता है जो परमेश्वर के वचन के सामने नहीं पिघलती, और माँस का हृदय उस जीवित, संवेदनशील भीतरी मनुष्य को जो सुनता और उत्तर देता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस पद में हर क्रिया परमेश्वर की है; वे बदलने में सहायता करने का नहीं, स्वयं निकालने और देने का वादा करते हैं। यही नए जन्म का पुराना नियम वाला रूप है।
यहेजकेल को बार-बार "मनुष्य के सन्तान" क्यों कहा गया है?
यह संबोधन पुस्तक में लगभग सौ बार आता है और इसका सीधा अर्थ है "मनुष्य", यानी नश्वर और सीमित प्राणी। जिस व्यक्ति ने सिंहासन, इंद्रधनुष और महिमा देखी हो, उसके लिए यह लगातार याद दिलाना ज़रूरी था कि वह स्वयं कोई महान हस्ती नहीं, केवल भेजा हुआ मनुष्य है। नए नियम में यीशु मसीह अपने लिए "मनुष्य का पुत्र" पदवी चुनते हैं, पर वहाँ उसका अर्थ दानिय्येल 7 के उस आकाश से आने वाले व्यक्ति से जुड़कर और गहरा हो जाता है, जिसे राज्य और अधिकार सौंपा जाता है।
यहेजकेल 1 के पहिए और जीवधारी क्या दर्शाते हैं?
यह दर्शन परमेश्वर के सिंहासन का है, और इसका मुख्य संदेश विवरणों में नहीं, कुल प्रभाव में है। चार मुखों वाले जीवधारी, जिन्हें अध्याय 10 में करूब कहा गया है, परमेश्वर की सेवा में खड़ी स्वर्गीय सृष्टि हैं, और आँखों से भरे पहिए दिखाते हैं कि यह सिंहासन स्थिर नहीं है, वह हर दिशा में जा सकता है और सब कुछ देखता है। निर्वासितों के लिए यह चित्र क्रांतिकारी था: परमेश्वर यरूशलेम के खंडहरों में बंद नहीं रह गए, वे बाबेल में अपने लोगों के पास आए हैं।
क्या यहेजकेल 40 से 48 का मंदिर सचमुच बनेगा?
मसीही लोग इस प्रश्न पर आदर के साथ अलग-अलग राय रखते आए हैं। कुछ इसे भविष्य में बनने वाले वास्तविक मंदिर की भविष्यद्वाणी मानते हैं, कुछ इसे लौटकर आए निर्वासितों के लिए एक आदर्श नक्शा, और कई इसे मसीह और उनकी कलीसिया में पूरी होने वाली प्रतिज्ञा का चित्र समझते हैं, जिसकी अंतिम पूर्ति प्रकाशितवाक्य 21 और 22 में नए यरूशलेम में दिखती है, जहाँ कोई मंदिर नहीं क्योंकि परमेश्वर स्वयं वहाँ हैं। जो बात सब मानते हैं वह यह है कि दर्शन का हृदय लौटती हुई महिमा और "यहोवा वहाँ है" नाम है।
गोग और मागोग कौन हैं?
अध्याय 38 और 39 में गोग मागोग देश का एक अगुवा है जो उत्तर से इस्राएल पर आक्रमण करता है और परमेश्वर के हाथों पूरी तरह पराजित होता है। कई व्याख्याकार इसे किसी प्राचीन उत्तरी शक्ति की ओर संकेत मानते हैं, पर पाठ में ज़ोर व्यक्ति की पहचान पर नहीं, परमेश्वर की विजय पर है: अंत में परमेश्वर के लोगों के विरुद्ध उठने वाली हर शक्ति टूटती है और सब जातियाँ जान लेती हैं कि यहोवा पवित्र हैं। प्रकाशितवाक्य 20 इन्हीं नामों का उपयोग अंतिम विद्रोह और उसके निर्णायक अंत के लिए करता है।
यहेजकेल और यिर्मयाह में क्या अंतर है?
दोनों समकालीन थे, पर उनकी जगह और स्वर अलग थे। यिर्मयाह यरूशलेम में ही रहकर पतन की चेतावनी देते रहे और नगर के गिरने तक वहीं रोते रहे, जबकि यहेजकेल पहले ही बाबेल ले जाए जा चुके थे और वहाँ निर्वासितों के बीच सेवकाई करते थे। यिर्मयाह की पुस्तक में व्यक्तिगत पीड़ा और आँसू अधिक खुलकर सामने आते हैं; यहेजकेल में दर्शन, चिह्न-कर्म और मंदिर, पवित्रता तथा महिमा की याजकीय भाषा प्रमुख है। दोनों एक ही प्रतिज्ञा पर मिलते हैं: नई वाचा और बदला हुआ हृदय।
क्या यहेजकेल की पुस्तक प्रकाशितवाक्य से जुड़ी है?
हाँ, और बहुत गहराई से। प्रकाशितवाक्य 4 का सिंहासन, इंद्रधनुष और जीवधारी सीधे यहेजकेल 1 से आते हैं; यूहन्ना का पुस्तक खा लेना यहेजकेल 3 की प्रतिध्वनि है; गोग और मागोग प्रकाशितवाक्य 20 में लौटते हैं; और जीवन के जल की नदी तथा चंगाई देने वाले वृक्ष यहेजकेल 47 का विस्तार हैं। यहेजकेल को जाने बिना प्रकाशितवाक्य अक्सर उलझा हुआ लगता है, और यहेजकेल को प्रकाशितवाक्य के बिना पढ़ने पर उसकी प्रतिज्ञाएँ अधूरी लगती हैं। दोनों एक ही अंत की ओर देखते हैं: परमेश्वर अपने लोगों के बीच बसते हैं।
यहेजकेल 18 पीढ़ियों के पाप के बारे में क्या सिखाता है?
निर्वासित एक कहावत दोहरा रहे थे कि बापों ने खट्टे अंगूर खाए और बच्चों के दाँत खट्टे हो गए, यानी हम अपने पूर्वजों के पापों की सज़ा भुगत रहे हैं। परमेश्वर इस बहाने को सीधे तोड़ देते हैं और कहते हैं कि हर प्राणी उनका है और जो प्राणी पाप करे वही मरेगा। यह पद परिवार के प्रभावों को नकारता नहीं, पर यह घोषणा करता है कि कोई भी अपने अतीत या अपने खानदान में कैद नहीं है। इसी अध्याय का अंत परमेश्वर के हृदय को खोलता है: वे किसी की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होते।
यहेजकेल की पुस्तक पढ़ना कठिन क्यों लगता है और कहाँ से शुरू करें?
कठिनाई तीन कारणों से आती है: लंबे दर्शन जिनकी भाषा प्रतीकात्मक है, अपरिचित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, और कुछ अंशों की कठोरता जो आधुनिक पाठक को असहज करती है। सबसे अच्छा रास्ता यह है कि अध्याय 1 से 3, फिर 34, 36 और 37 पढ़कर पुस्तक का हृदय पकड़ लिया जाए, और उसके बाद शुरू से क्रम में पढ़ा जाए। हर अध्याय में यह प्रश्न साथ रखिए कि परमेश्वर यहाँ अपने विषय में क्या प्रकट कर रहे हैं, क्योंकि पुस्तक का अपना घोषित लक्ष्य यही है कि लोग जान लें कि यहोवा ही परमेश्वर हैं।
अंत में
यहेजकेल की पुस्तक उन लोगों के लिए लिखी गई जिनके पास खोने को कुछ नहीं बचा था: न मंदिर, न देश, न भविष्य। और ठीक उसी जगह परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि "मैं तुम्हारी पुरानी ज़िंदगी लौटा दूँगा।" उन्होंने कहा कि वे पत्थर का हृदय निकालकर माँस का देंगे, सूखी हड्डियों में साँस फूँकेंगे, और एक ऐसे घर से नदी बहाएँगे जहाँ से होकर मरा हुआ समुद्र भी जी उठेगा। यही इस पुस्तक का स्वर है: परमेश्वर दूसरा मौका नहीं, नया जीवन देते हैं।
इसलिए इस पुस्तक को डरकर नहीं, आशा से पढ़िए। इसके दर्शन कठिन हैं, पर उनके बीच से वही महिमा चमकती है जो बाद में देह धारण करके हमारे बीच डेरा करने आई, जो अच्छे चरवाहे के रूप में खोई हुई भेड़ ढूँढ़ने निकली, और जो क्रूस और खाली कब्र के बाद अपने आत्मा के द्वारा हमारे भीतर बसने आई।
अगली बार जब आपकी अपनी घाटी सूखी लगे, तो यहेजकेल 37 खोलिए और उसी प्रश्न को अपने ऊपर पड़ने दीजिए: क्या ये हड्डियाँ जी सकती हैं? उत्तर आपके पास नहीं है, और होना भी नहीं चाहिए। उत्तर उनके पास है जो आज भी कहते हैं, "देखो, मैं आप तुम में साँस समाऊँगा।"
