दस आज्ञाएँ क्या हैं: परमेश्वर की व्यवस्था का अर्थ और आज का महत्व
परिचय
कल्पना कीजिए: सुबह का धुंधलका है, और लाखों लोग एक पहाड़ की तलहटी में खड़े हैं। उनकी पीठ पर अभी कुछ ही हफ्ते पहले तक कोड़ों के निशान थे। उनके हाथों में ईंटों की धूल अब भी बाकी है। वे दास थे, और अब दास नहीं हैं। और उसी सुबह, गरजते बादल और धुएँ के बीच, परमेश्वर बोलते हैं। वे जो पहला वाक्य कहते हैं, वह कोई आज्ञा नहीं है। वह एक गवाही है: "मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है।"
यह छोटी सी बात सब कुछ बदल देती है। दस आज्ञाएँ उन लोगों को नहीं दी गईं जो उन्हें मानकर परमेश्वर तक पहुँचना चाहते थे, बल्कि उन लोगों को जिन्हें परमेश्वर पहले ही छुड़ा चुके थे। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि ये दस वचन कहाँ से आए, बाइबल में उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक कैसे बुने गए हैं, कौन-सी गलतफहमियाँ इन्हें बोझ बना देती हैं, और आज आपके काम, पैसे, परिवार और मन में इनका क्या अर्थ है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकांश लेख दस आज्ञाओं को नियमों की एक सूची की तरह पेश करते हैं, जिसे नापकर हम खुद को अच्छा या बुरा घोषित करते हैं। यह पृष्ठ उन्हें दूसरी जगह से पढ़ता है: मिस्र के खाली पड़े दास-घर के दरवाज़े से। परमेश्वर ने पहले छुड़ाया, फिर व्यवस्था दी। इसलिए ये आज्ञाएँ स्वतंत्रता की कीमत नहीं, स्वतंत्रता का आकार हैं। वे बताती हैं कि छुड़ाया हुआ जीवन दिखता कैसा है। इस दृष्टिकोण से आज्ञाकारिता कमाई नहीं, कृतज्ञता बन जाती है; और मसीह किसी पिछले अध्याय का पूरक नहीं, बल्कि उसी छुटकारे की पूर्णता ठहरते हैं।
बाइबल दस आज्ञाओं के बारे में क्या कहती है?
बाइबल में ये आज्ञाएँ दो बार पूरी तरह लिखी गई हैं। पहली बार निर्गमन 20:1-17 में, सीनै पहाड़ पर, छुटकारे के तुरन्त बाद। दूसरी बार व्यवस्थाविवरण 5:6-21 में, चालीस साल बाद, जब नई पीढ़ी वादा किए हुए देश की सीमा पर खड़ी थी और मूसा उन्हें दोहराकर याद दिला रहा था। इबरानी भाषा में इन्हें "दस वचन" कहा गया है, और यही कारण है कि ये केवल कानून नहीं, परमेश्वर का व्यक्तिगत संबोधन हैं।
क्रम पर ध्यान दें। निर्गमन 20:1-2 कहता है, "तब परमेश्वर ने ये सब वचन कहे, 'मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है।'" इसके बाद ही आता है, "मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।" यानी पहचान पहले, माँग बाद में। परमेश्वर यह नहीं कहते, "ये आज्ञाएँ मानो तो मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँगा।" वे कहते हैं, "मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, अब ऐसे जियो।"
पहले छुटकारा, फिर आज्ञा; यही बाइबल का क्रम है।
पहली चार आज्ञाएँ परमेश्वर के साथ हमारे संबंध को सँवारती हैं: उन्हीं की उपासना, मूर्ति न बनाना, उनके नाम का सम्मान, और विश्रामदिन। अगली छह आज्ञाएँ पड़ोसी के साथ हमारे संबंध को सँवारती हैं: माता-पिता का आदर, जीवन की रक्षा, वैवाहिक निष्ठा, सम्पत्ति का आदर, सच्ची गवाही, और मन की संतुष्टि। निर्गमन 20:12 कहता है, "तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना," और 20:17 में सूची मन के भीतर उतर जाती है: "तू किसी के घर का लालच न करना।" यह अन्तिम आज्ञा सबसे खुलासा करने वाली है, क्योंकि लालच को कोई अदालत पकड़ नहीं सकती। परमेश्वर की व्यवस्था हाथों पर रुकती नहीं, हृदय तक जाती है।
दोनों संस्करणों में एक सुन्दर अंतर है। निर्गमन में विश्रामदिन का कारण सृष्टि है, क्योंकि परमेश्वर ने छह दिन में सब बनाया और सातवें दिन विश्राम किया। परन्तु व्यवस्थाविवरण 5:15 में कारण छुटकारा है: "और स्मरण रख कि तू मिस्र देश में दास था, और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे वहाँ से बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा निकाल लाया; इस कारण तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे विश्रामदिन मानने की आज्ञा देता है।" जो व्यक्ति दास था, वह हर सातवें दिन रुककर घोषणा करता है कि अब उसका मालिक फिरौन नहीं है। विश्राम स्वतंत्रता का साप्ताहिक उत्सव है।
फिर सदियों बाद एक भक्त इन वचनों के साथ जीते हुए गाता है, "तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है" (भजन संहिता 119:105)। यह पद व्यवस्था के प्रति इस्राएल के सच्चे रुख को खोलता है। व्यवस्था चाबुक नहीं, दीपक है। दीपक अंधकार में ठोकर से बचाता है; वह पाँव को डराता नहीं, दिशा देता है। जो लोग व्यवस्था को केवल बोझ समझते हैं, वे भजन संहिता 119 पढ़कर चौंक जाते हैं, क्योंकि वहाँ व्यवस्था प्रेम का विषय है, शहद से मीठी और सोने से बहुमूल्य।
और यीशु मसीह ने इन दस वचनों का सार दो वाक्यों में बाँध दिया। मत्ती 22:37-40 में वे कहते हैं, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का आधार हैं।" दो पटियाएँ, दो प्रेम। ऊपर की ओर और बगल की ओर। दस आज्ञाएँ इसी दोहरे प्रेम का व्याकरण हैं।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
दस आज्ञाएँ सीनै पर आसमान से अचानक नहीं गिरीं। उनकी जड़ें उत्पत्ति में हैं। सृष्टि के सातवें दिन परमेश्वर ने विश्राम किया, और वहीं विश्रामदिन की नींव पड़ी। अदन में पहली ठोकर यही थी कि मनुष्य ने वह चाहा जो उसका नहीं था, यानी लालच। कैन ने अपने भाई का खून किया, और जीवन की पवित्रता टूटी। नूह के बाद परमेश्वर ने कहा कि मनुष्य का लहू बहाना गंभीर बात है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया। अब्राहम को परमेश्वर ने नाम, वाचा और वंश दिए। यानी नैतिकता व्यवस्था से पहले भी थी; सीनै पर परमेश्वर ने उसे शब्दों में लिखकर एक राष्ट्र के हाथ में सौंप दिया।
सीनै के बाद पटियाओं की कहानी अपने आप में उपदेश है। मूसा जब पहाड़ से उतरा, लोग सोने के बछड़े के आगे नाच रहे थे, और उसने पटियाएँ तोड़ दीं। परमेश्वर ने दूसरी पटियाएँ लिखवाईं, और वे वाचा के सन्दूक के भीतर रखी गईं, ठीक उस कृपासन के नीचे जिस पर प्रायश्चित के दिन लहू छिड़का जाता था।
व्यवस्था कृपासन के नीचे रखी गई थी।
पूरे पुराने नियम का धड़कता हुआ प्रश्न यही है: ये पत्थर की पटियाएँ मनुष्य के पत्थर जैसे हृदय को कैसे बदलेंगी? न्यायियों की पुस्तक बताती है कि नहीं बदलेंगी। राजाओं का इतिहास बताता है कि नहीं बदलेंगी। तब यिर्मयाह भविष्यद्वाणी करता है, "मैं अपनी व्यवस्था उनके मन में समवाऊँगा, और उसे उनके हृदय पर लिखूँगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे" (यिर्मयाह 31:33)। यहेजकेल भी नए हृदय और नए आत्मा का वादा सुनाता है।
नए नियम में यह वादा एक व्यक्ति में पूरा होता है। यीशु मसीह पहाड़ पर चढ़कर कहते हैं, "यह न समझो कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ; लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ" (मत्ती 5:17)। और फिर वे आज्ञाओं को घटाते नहीं, गहरा करते हैं: हत्या की जड़ क्रोध में है, व्यभिचार की जड़ आँख की लालसा में है। वे व्यवस्था को हल्का नहीं करते, वे उसे हृदय तक खींच लाते हैं और फिर स्वयं उसे पूरी निष्ठा से जीते हैं, हमारी जगह।
पौलुस इसी को समझाता है। रोमियों 13:8-10 में वह लिखता है, "आपस के प्रेम को छोड़ और किसी बात में किसी के कर्जदार न हो; क्योंकि जो दूसरे से प्रेम रखता है, उसी ने व्यवस्था पूरी की है... प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता, इसलिये प्रेम व्यवस्था को पूरा करना है।" ध्यान दें, पौलुस आज्ञाओं के नाम गिनाता है, उन्हें रद्द नहीं करता। वह कहता है कि प्रेम उन्हें भीतर से पूरा कर देता है। और 2 कुरिन्थियों 3 में वह विश्वासियों को मसीह की पत्री कहता है, जो पत्थर की पटियाओं पर नहीं, हृदय की पटियों पर पवित्र आत्मा से लिखी गई है।
अंत में प्रकाशितवाक्य में स्वर्ग खुलता है और परमेश्वर के मन्दिर में वाचा का सन्दूक दिखाई देता है, और पवित्र लोगों के विषय में कहा जाता है कि वे परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते और यीशु पर विश्वास रखते हैं (प्रकाशितवाक्य 14:12)। जो सीनै पर धुएँ और भय के बीच शुरू हुआ, वह नए यरूशलेम में आराधना और आनंद बनकर पूरा होता है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति यह है कि दस आज्ञाएँ उद्धार पाने का रास्ता हैं। यह सोच बहुत मासूम लगती है, पर यह सुसमाचार को उलट देती है। रोमियों 3:20 साफ कहता है, "क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी न ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है।" व्यवस्था दर्पण है, साबुन नहीं। वह गन्दगी दिखाती है, धोती नहीं। और याद रखें, सीनै पर व्यवस्था लाल समुद्र के बाद आई, पहले नहीं। इस्राएल ने आज्ञाएँ मानकर मिस्र से निकलने का हक नहीं कमाया था; वे तो उकाब के पंखों पर उठाकर लाए गए थे। हमारे साथ भी वही क्रम है: पहले कृपा, फिर आज्ञाकारिता।
दूसरी भ्रांति इसके ठीक उलट है: कि मसीह के आने के बाद दस आज्ञाएँ बेकार हो गईं। पर यीशु ने उन्हें रद्द नहीं किया, पूरा किया, और अपने चेलों से कहा, "यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे" (यूहन्ना 14:15)। नए नियम की पत्रियाँ हत्या, व्यभिचार, चोरी, झूठ और लालच को बार-बार पाप कहती हैं। जो बदला है, वह हमारा रिश्ता है। पहले व्यवस्था हमारे सामने न्यायी की तरह खड़ी थी; अब वह पिता के घर का नियम है, जिसे हम डर से नहीं, प्रेम से मानते हैं। 1 यूहन्ना 5:3 कहता है, "और परमेश्वर का प्रेम यह है कि हम उसकी आज्ञाओं को मानें; और उसकी आज्ञाएँ कठिन नहीं।"
तीसरी भ्रांति है कि "मैं तो कोई बड़ी आज्ञा नहीं तोड़ता, इसलिए ठीक हूँ।" इसी आत्मसंतोष को याकूब 2:10 तोड़ देता है: "क्योंकि जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु एक ही बात में चूक जाए तो वह सब बातों में दोषी ठहरा।" व्यवस्था दस अलग-अलग परीक्षाओं की सूची नहीं है जिसमें आठ में पास होकर आप अच्छे अंक पा लें। यह एक ही वाचा का वस्त्र है; एक जगह फाड़ने पर पूरा वस्त्र फटा हुआ कहलाता है। और यीशु के अनुसार जिस आज्ञा को हम सबसे आसान समझते हैं, वहीं हमारी असली हालत खुलती है, क्योंकि लालच और क्रोध भीतर पलते हैं।
चौथी भ्रांति यह है कि प्रेम और व्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी हैं, यानी "मैं प्रेम करता हूँ, इसलिए नियमों की ज़रूरत नहीं।" पर मत्ती 22:37-40 और रोमियों 13:8-10 दोनों में प्रेम आज्ञाओं का शत्रु नहीं, उनका सारांश है। प्रेम को आकार चाहिए, वरना वह हमारी इच्छाओं का दूसरा नाम बन जाता है। कोई पति यह नहीं कह सकता कि मैं अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता हूँ, इसलिए निष्ठा का नियम मुझ पर लागू नहीं। दस आज्ञाएँ प्रेम की दीवारें नहीं, उसकी हड्डियाँ हैं।
आज इसे जीवन में उतारना
मान लीजिए आपके दफ्तर में महीने के आँकड़े ठीक नहीं हैं और आपका बॉस चाहता है कि रिपोर्ट में थोड़ी चतुराई दिखाई जाए। "तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना" अचानक एक प्राचीन वाक्य से निकलकर आपकी कुर्सी के सामने आ खड़ा होता है। यहाँ मुद्दा नौकरी बचाना बनाम नियम मानना नहीं है; मुद्दा यह है कि आपकी सुरक्षा किसके हाथ में है। जिस परमेश्वर ने मिस्र से निकाला, वही आज भी सत्य बोलने वाले को सँभालना जानते हैं।
पैसे के मामले में आठवीं और दसवीं आज्ञाएँ साथ चलती हैं। चोरी केवल जेब काटना नहीं है; दफ्तर के समय की चोरी, टैक्स की चोरी, अधूरे काम के पूरे पैसे लेना, यह सब उसी में आते हैं। और लालच वह भीतरी आग है जो हाथ को चोरी तक ले जाती है। आज लालच का सबसे बड़ा बाज़ार आपकी जेब में पड़े फोन में है, जहाँ हर स्क्रॉल आपको दिखाता है कि किसी और की ज़िंदगी आपकी ज़िंदगी से अच्छी है। दसवीं आज्ञा मानने का सबसे व्यावहारिक तरीका है धन्यवाद देना सीखना, क्योंकि कृतज्ञ हृदय में लालच के लिए जगह कम पड़ जाती है।
विश्रामदिन की आज्ञा आज सबसे अधिक अनदेखी और सबसे अधिक ज़रूरी है। हम फिरौन को तो छोड़ आए हैं, पर हमने अपने भीतर एक नया फिरौन बैठा लिया है जो कहता है कि रुकना मतलब पिछड़ना। हफ्ते में एक दिन काम से हाथ खींचकर आराधना, विश्राम और परिवार को देना यह घोषित करना है कि दुनिया आपके परिश्रम से नहीं, परमेश्वर की सामर्थ्य से चलती है। और ध्यान दें, निर्गमन 20:10 में यह विश्राम दास, दासी, परदेशी और पशुओं तक फैलता है। इसका आज का अर्थ है: आपका आराम आपके घर में काम करने वाली बहन या ड्राइवर भाई की थकान पर खड़ा न हो।
परिवार में पाँचवीं आज्ञा तब कठिन होती है जब माता-पिता बूढ़े, चिड़चिड़े या माँग करने वाले हो जाते हैं। आदर का अर्थ हर बात मान लेना नहीं, बल्कि उनकी गरिमा की रक्षा करना, उनका वक्त पर ध्यान रखना, और उन्हें अपनी सुविधा के हिसाब से किनारे न कर देना है। शरीर के मामले में सातवीं आज्ञा फोन की स्क्रीन पर भी लागू है, क्योंकि यीशु ने आँख और मन को भी इसी दायरे में ले लिया। और जब आप फिसलते हैं, तो व्यवस्था आपको मसीह के पास धकेलती है, आपके चेहरे पर पत्थर मारने के लिए नहीं, क्योंकि गलातियों 3:24 के अनुसार व्यवस्था मसीह तक पहुँचाने वाली शिक्षक है।
दर्पण
अब एक पल रुकिए। आप इस पृष्ठ को पढ़ते हुए किसी और के बारे में सोच रहे हैं या अपने बारे में? हम आमतौर पर दस आज्ञाओं का इस्तेमाल दूसरों को नापने के लिए करते हैं, और यही सबसे सुरक्षित तरीका है अपने आप से बचने का।
तो सीधे पूछता हूँ। पिछले हफ्ते आपने कितनी बार ऐसी बात कही जो पूरी सच नहीं थी, बस थोड़ी सहूलियत वाली थी? जब आपके साथी को पदोन्नति मिली, तो आपके भीतर बधाई के साथ क्या और उठा था? आपकी थकान का असली कारण काम की मात्रा है, या यह डर है कि रुकने पर आपकी कीमत घट जाएगी? आपका फोन रात को आपको कहाँ ले जाता है? आपके बूढ़े माता-पिता का फोन देखकर आपके मन की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है?
अगर ये सवाल चुभते हैं, तो अच्छा है, क्योंकि दीपक का काम यही है। भजन संहिता 119:105 कहता है, "तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।" दीपक गड्ढा दिखाता है, पर वह आपको गड्ढे में धकेलता नहीं।
और यहीं इस पृष्ठ का सबसे मुक्त करने वाला वाक्य दोहराना ज़रूरी है: परमेश्वर ने आपको आज्ञाएँ मानने के बाद प्रेम करना शुरू नहीं किया। वे पहले ही क्रूस तक गए, आपके पूरे रिकॉर्ड को जानते हुए। मसीह ने वह व्यवस्था पूरी की जो आप नहीं पूरी कर पाए, और उस दण्ड को उठाया जो आपका था। इसलिए आप इन आज्ञाओं के सामने एक कैदी की तरह नहीं, एक छुड़ाए हुए बेटे या बेटी की तरह खड़े हैं।
आज्ञाकारिता कीमत नहीं, कृतज्ञता है।
अब सवाल यह नहीं है कि "मुझे कितना मानना पड़ेगा", बल्कि "जिसने मुझे इतनी कीमत देकर छुड़ाया, उसके लिए मैं आज कहाँ से शुरुआत करूँ?" एक जगह चुनिए, आज ही। एक सच बोलिए, एक माफी माँगिए, एक दिन रुकिए, एक फोन कीजिए।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को दस आज्ञाएँ सिखाते समय सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम उन्हें "मत करो" की लंबी सूची बना देते हैं। बच्चे फिर परमेश्वर को एक सख्त निरीक्षक के रूप में देखने लगते हैं। इसके बजाय कहानी से शुरू कीजिए। बताइए कि परमेश्वर के लोग मिस्र में गुलाम थे, रोज़ पिटते थे, और परमेश्वर ने उन्हें छुड़ाकर समुद्र के पार निकाला। जब वे आज़ाद हो गए, तब परमेश्वर ने उन्हें दस बातें बताईं, जैसे एक पिता नए घर में आए अपने बच्चों को बताता है कि इस घर में हम एक-दूसरे से कैसे रहते हैं।
छोटी भाषा में इसे इस तरह रखा जा सकता है: पहली चार बातें सिखाती हैं कि हम परमेश्वर से प्रेम कैसे करें, और बाकी छह सिखाती हैं कि हम लोगों से प्रेम कैसे करें। यीशु ने भी बिल्कुल यही कहा था। दस उंगलियों पर गिनने का खेल बच्चों के लिए बहुत मददगार होता है, और हर उंगली के साथ एक छोटा-सा रोज़मर्रा का उदाहरण जोड़ा जा सकता है, जैसे खिलौना बिना पूछे न लेना, या भाई-बहन के बारे में झूठ न बोलना।
यह भी ज़रूर जोड़िए कि कोई भी इन सबको पूरी तरह नहीं मान पाता, और इसीलिए यीशु मसीह आए। बच्चे को यह सुनने की ज़रूरत है कि जब वह गिरता है, तब भी परमेश्वर उससे प्रेम करते हैं।
फेथ नेटवर्क पर इस विषय की उम्र के अनुसार अलग व्याख्याएँ भी उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए सरल कहानी-रूप में, सात से बारह साल के बच्चों के लिए उदाहरणों और प्रश्नों के साथ, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए उन कठिन सवालों के साथ जो वे सचमुच पूछते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दस आज्ञाएँ बाइबल में कहाँ लिखी हैं?
दस आज्ञाएँ बाइबल में दो जगह पूरी तरह दर्ज हैं। पहली बार निर्गमन 20:1-17 में, जब परमेश्वर ने सीनै पहाड़ पर इस्राएल को मिस्र की दासता से छुड़ाने के बाद ये वचन दिए। दूसरी बार व्यवस्थाविवरण 5:6-21 में, जहाँ मूसा चालीस साल बाद नई पीढ़ी को वही आज्ञाएँ दोहराकर सुनाता है, क्योंकि वे अब वादा किए हुए देश में प्रवेश करने वाले थे। दोनों सूचियाँ लगभग एक जैसी हैं, पर विश्रामदिन के कारण में एक महत्वपूर्ण अंतर है।
दस आज्ञाएँ संक्षेप में क्या-क्या हैं?
संक्षेप में: केवल परमेश्वर की उपासना करना, कोई मूर्ति बनाकर पूजा न करना, परमेश्वर का नाम व्यर्थ न लेना, विश्रामदिन को पवित्र मानना, माता-पिता का आदर करना, खून न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी साक्षी न देना, और दूसरे की किसी वस्तु का लालच न करना। पहली चार आज्ञाएँ परमेश्वर के साथ संबंध से जुड़ी हैं और बाकी छह पड़ोसी के साथ। यीशु मसीह ने मत्ती 22:37-40 में इन्हें परमेश्वर से प्रेम और पड़ोसी से प्रेम, इन दो आज्ञाओं में समेट दिया।
क्या दस आज्ञाएँ आज भी मसीहियों पर लागू होती हैं?
हाँ, पर एक नए रिश्ते में। यीशु ने मत्ती 5:17 में स्पष्ट कहा कि वे व्यवस्था को लोप करने नहीं, पूरा करने आए हैं, और नए नियम की पत्रियाँ हत्या, व्यभिचार, चोरी, झूठ और लालच को लगातार पाप कहती हैं। जो बदला है वह यह है कि अब हम इन आज्ञाओं को परमेश्वर की स्वीकृति कमाने के लिए नहीं मानते, बल्कि क्योंकि हम मसीह में पहले ही स्वीकार किए जा चुके हैं। यूहन्ना 14:15 में प्रभु कहते हैं, "यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"
निर्गमन और व्यवस्थाविवरण की दस आज्ञाओं में क्या अंतर है?
सबसे उल्लेखनीय अंतर विश्रामदिन के कारण में है। निर्गमन 20 में कारण सृष्टि है, क्योंकि परमेश्वर ने छह दिन में सब बनाया और सातवें दिन विश्राम किया। व्यवस्थाविवरण 5:15 में कारण छुटकारा है: "और स्मरण रख कि तू मिस्र देश में दास था, और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे वहाँ से बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा निकाल लाया।" दसवीं आज्ञा में शब्दों का क्रम भी थोड़ा भिन्न है। ये अंतर विरोधाभास नहीं, एक ही सच्चाई के दो पहलू हैं: सृष्टि और छुटकारा दोनों विश्राम का आधार हैं।
क्या दस आज्ञाएँ मानकर कोई उद्धार पा सकता है?
नहीं। रोमियों 3:20 कहता है, "क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी न ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है।" व्यवस्था हमें अपनी सच्ची हालत दिखाती है और मसीह के पास ले जाती है, जैसे गलातियों 3:24 में लिखा है। ध्यान दीजिए कि सीनै पर व्यवस्था तब दी गई जब इस्राएल पहले ही छुड़ाया जा चुका था। उद्धार सदा कृपा से, विश्वास के द्वारा मिलता है, और आज्ञाकारिता उस उद्धार का फल है, उसकी कीमत नहीं।
यीशु ने दस आज्ञाओं के बारे में क्या कहा?
यीशु मसीह ने उन्हें न हल्का किया, न रद्द किया, बल्कि हृदय तक गहरा कर दिया। पहाड़ी उपदेश में उन्होंने बताया कि हत्या की जड़ क्रोध में और व्यभिचार की जड़ लालसा भरी दृष्टि में है। मत्ती 22:37-40 में उन्होंने कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख... और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" इस तरह उन्होंने दोनों पटियाओं को प्रेम के दो रुखों में बाँध दिया।
विश्रामदिन की आज्ञा का आज क्या अर्थ है, क्या रविवार अब विश्रामदिन है?
आदि कलीसिया ने सप्ताह के पहले दिन एकत्र होना शुरू किया, क्योंकि उसी दिन प्रभु यीशु जी उठे थे, और इसलिए अनेक मसीही रविवार को प्रभु का दिन मानते हैं। कुछ विश्वासी सातवें दिन के विश्राम को ही जारी रखते हैं। इस प्रश्न पर मसीहियों में ईमानदार मतभेद रहा है, पर आज्ञा का मूल हृदय स्पष्ट है: हफ्ते में एक दिन काम से हाथ खींचकर परमेश्वर की आराधना, विश्राम और दूसरों के आराम का ध्यान रखना, यह घोषित करते हुए कि जीवन हमारे परिश्रम से नहीं, परमेश्वर से चलता है।
मूर्ति न बनाने की आज्ञा का क्या मतलब है, क्या तस्वीरें रखना भी पाप है?
निर्गमन 20:4-5 में आज्ञा का केंद्र किसी वस्तु को दण्डवत् करना और उसकी उपासना करना है। परमेश्वर यह नहीं चाहते कि हम उन्हें किसी बनाई हुई चीज़ में समेटकर अपने नियंत्रण में ले आएँ, क्योंकि वे जीवित हैं और स्वयं को अपने वचन में प्रकट करते हैं। इसलिए चित्रों, प्रतीकों या क्रूस के सामने प्रार्थना करने और उनसे प्रार्थना करने में अंतर है। और यह याद रखना भी ज़रूरी है कि पैसा, प्रतिष्ठा, संतान और खुद की सफलता भी हृदय की मूर्तियाँ बन सकती हैं।
"परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेना" का असली अर्थ क्या है?
निर्गमन 20:7 केवल गाली-गलौज में परमेश्वर का नाम घसीटने के बारे में नहीं है, हालाँकि यह उसमें शामिल है। इबरानी अर्थ है परमेश्वर के नाम को खाली, झूठे या तुच्छ तरीके से उठाना। इसमें झूठी शपथ, परमेश्वर के नाम पर अपने स्वार्थ को ढँकना, और "प्रभु ने मुझसे कहा" कहकर अपनी मर्ज़ी को पवित्र घोषित करना भी आता है। जो व्यक्ति मसीह का नाम लेता है, वह परमेश्वर के नाम को अपने चरित्र से बदनाम भी कर सकता है, और यही इस आज्ञा की सबसे गंभीर चेतावनी है।
अलग-अलग कलीसियाओं में दस आज्ञाओं की गिनती क्यों अलग होती है?
बाइबल का पाठ एक ही है, पर उसे दस में बाँटने के तरीके परंपरा के अनुसार थोड़े भिन्न हैं। यहूदी परंपरा छुटकारे की घोषणा को पहला वचन मानती है। कुछ कलीसियाएँ अन्य ईश्वरों और मूर्तियों वाले भाग को एक ही आज्ञा गिनती हैं और लालच वाले भाग को दो में बाँटती हैं, जबकि अन्य उन्हें पहली और दूसरी आज्ञा के रूप में अलग रखती हैं। इससे विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं आता; सभी परंपराएँ उन्हीं वचनों को मानती हैं जो निर्गमन 20:1-17 में लिखे हैं।
अगर मैंने एक आज्ञा तोड़ी तो क्या मैं सब तोड़ने का दोषी हूँ?
याकूब 2:10 कहता है, "क्योंकि जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु एक ही बात में चूक जाए तो वह सब बातों में दोषी ठहरा।" इसका अर्थ यह नहीं कि सभी पाप एक जैसे गंभीर परिणाम रखते हैं, बल्कि यह कि व्यवस्था एक ही परमेश्वर की एक ही इच्छा है, इसलिए किसी एक जगह उसे तोड़ना पूरे रिश्ते को तोड़ना है। यह वचन आत्मसंतोष को खत्म कर देता है और हमें वहीं ले जाता है जहाँ जाना चाहिए, यानी मसीह की कृपा के पास।
लालच की आज्ञा बाकी आज्ञाओं से अलग कैसे है?
दसवीं आज्ञा किसी ऐसे काम को मना नहीं करती जिसे कोई देख सके। "तू किसी के घर का लालच न करना" पूरी तरह भीतर की बात है, और इसीलिए यह सबसे ज़्यादा खोलकर दिखाती है कि व्यवस्था केवल बाहरी व्यवहार की नहीं, हृदय की है। पौलुस ने अपनी गवाही में यही आज्ञा उद्धृत की, क्योंकि इसने उसका आत्मविश्वास तोड़ा। रोमियों 13:9 में भी वह लालच को उन आज्ञाओं के साथ गिनता है जिन्हें प्रेम पूरा करता है।
अंत में
दस आज्ञाएँ आपको दो में से एक जगह मिलेंगी: या तो किसी अदालत की दीवार पर, या उस खाली दास-घर के दरवाज़े पर जिसमें से परमेश्वर ने अपने लोगों को बाहर निकाला। यह पृष्ठ आपको दूसरी जगह से पढ़ने का न्योता देता है। जब पहला वाक्य "मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है" सुनाई देता है, तो बाकी नौ या दस वचन धमकी नहीं, एक पिता का घर सजाने का तरीका बन जाते हैं। पत्थर की पटियाएँ कृपासन के नीचे रखी गई थीं, और आज वही व्यवस्था पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों पर लिखी जा रही है।
आगे के अध्ययन के लिए निर्गमन 20:1-17 और व्यवस्थाविवरण 5:6-21 को साथ रखकर धीरे-धीरे पढ़िए, फिर मत्ती 22:37-40 और रोमियों 13:8-10 पर ठहरिए, और अंत में भजन संहिता 119 का कोई हिस्सा प्रार्थना की तरह पढ़िए। एक सवाल अपने साथ ले जाइए: इन दस वचनों में से कौन-सा एक आज मेरे घर, मेरे पैसे या मेरे समय में परमेश्वर का प्रेम दिखाने के लिए मुझे बुला रहा है? जहाँ आज्ञा चुभती है, वहीं कृपा सबसे गहरी काम करती है।
