सुसमाचार कैसे सुनाएँ: गवाही देने का बाइबलीय और व्यावहारिक तरीका
परिचय
चाय की दुकान पर साथी कर्मचारी ने अचानक पूछा, "तुम हर रविवार सुबह कहाँ गायब हो जाते हो?" आपका दिल तेज़ धड़कने लगा। दिमाग में एक साथ दस बातें दौड़ीं, पर मुँह से निकला, "बस, ऐसे ही, एक जगह जाता हूँ।" घर लौटते समय वही सवाल आपका पीछा करता रहा, पर इस बार आपके अपने मन से: मैं बोल क्यों नहीं पाया?
यह अनुभव हम में से लगभग हर एक का है। हम मसीह से प्रेम करते हैं, पर उनके बारे में बोलते समय जीभ भारी हो जाती है। कहीं न कहीं हमने मान लिया है कि सुसमाचार सुनाना किसी विशेष प्रतिभा वाले लोगों का काम है, या यह कि हमें हर सवाल का जवाब आना चाहिए।
इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि बाइबल गवाही देने को कैसे समझती है, यह सूत्र उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक कैसे चलता है, कौन-सी गलतफहमियाँ हमारी ज़ुबान पर ताला लगाती हैं, और कल सुबह से आप व्यावहारिक रूप से क्या कर सकते हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
यह पृष्ठ एक ही बुनियादी फ़र्क पर टिका है: परमेश्वर ने आपको वकील नहीं, गवाह बुलाया है। अदालत में वकील तर्क से मुकदमा जीतता है, और न्यायी फैसला सुनाता है; गवाह सिर्फ़ वही बताता है जो उसने देखा और सुना है। प्रेरितों के काम 1:8 में प्रभु यीशु ने यही शब्द चुना, "मेरे गवाह होगे।" दोष का बोध कराने का काम पवित्र आत्मा का है, मन बदलने का काम परमेश्वर का है, और सच्चाई कह देने का काम आपका है। जब यह बँटवारा साफ़ हो जाता है, तो सुसमाचार सुनाना बोझ से उतरकर आनंद बन जाता है, और डर अपनी पकड़ खोने लगता है।
बाइबल सुसमाचार सुनाने के बारे में क्या कहती है?
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि "सुसमाचार" कोई धार्मिक सलाह नहीं, बल्कि एक समाचार है। समाचार वह चीज़ है जो घट चुकी है और जिसे बताया जाता है। पौलुस इसे बिल्कुल साफ़ करता है: "क्योंकि मैंने सब से पहले तुम्हें वही बात पहुँचा दी, जो मुझे पहुँची थी, कि पवित्रशास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मरा, और गाड़ा गया, और पवित्रशास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी उठा" (1 कुरिन्थियों 15:3-4)। ध्यान दीजिए, पौलुस कहता है "जो मुझे पहुँची थी।" वह लेखक नहीं, डाकिया है।
सुसमाचार आपका संदेश नहीं, आपको सौंपा गया संदेश है।
जी उठने के बाद प्रभु यीशु ने अपने चेलों को जो आदेश दिया, वह कलीसिया का जन्म-प्रमाणपत्र है: "इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो" (मत्ती 28:19)। यहाँ मुख्य क्रिया "जाना" नहीं, "चेला बनाना" है। यानी लक्ष्य सिर्फ़ किसी से एक प्रार्थना दोहरवा लेना नहीं, बल्कि एक व्यक्ति को मसीह का जीवन भर का विद्यार्थी बनने में मदद करना है। और यह आदेश "सब जातियों" तक फैला है, यानी कोई संस्कृति, कोई भाषा, कोई मोहल्ला इस निमंत्रण से बाहर नहीं।
मरकुस इसी आदेश को और चौड़ा करके लिखता है: "तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो" (मरकुस 16:15)। "सारी सृष्टि" शब्द हमें याद दिलाता है कि पाप ने जो कुछ बिगाड़ा, मसीह का कार्य उस सब पर प्रभाव डालता है। हमारी गवाही किसी छोटे धार्मिक समूह का आंतरिक मामला नहीं; यह पूरी दुनिया के लिए एक घोषणा है।
पर आदेश के साथ सामर्थ्य भी दी गई। चेले डरपोक थे, और प्रभु जानते थे। इसलिए उन्होंने कहा, "परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे" (प्रेरितों के काम 1:8)। यह वचन हमारे दृष्टिकोण की जड़ है। "गवाह" यूनानी में वह शब्द है जिससे "शहीद" शब्द बना। गवाह वह है जो किसी घटना का चश्मदीद है और अदालत में सच बोलने के लिए खड़ा होता है, चाहे कीमत चुकानी पड़े। गवाह से यह अपेक्षा नहीं कि वह न्यायाधीश को मना ले; उससे अपेक्षा यही है कि वह सच बोले।
तो फिर बोलना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि परमेश्वर ने विश्वास को सुनने के साथ जोड़ा है: "फिर जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, वे उसका नाम क्योंकर लें? और जिस की नहीं सुनी उस पर क्योंकर विश्वास करें? और प्रचारक बिना क्योंकर सुनें?" (रोमियों 10:14)। पौलुस यहाँ एक जंजीर बनाता है, पीछे की ओर चलती हुई: पुकारना, विश्वास करना, सुनना, और कोई सुनाने वाला। अगर जंजीर की आखिरी कड़ी, यानी बोलने वाला इंसान गायब हो जाए, तो पूरी शृंखला टूट जाती है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि में यह तय किया कि स्वर्गदूतों के बजाय बचाए हुए पापी ही उनकी दया की खबर पहुँचाएँ।
और हमारी पहचान? "तो हम मसीह के राजदूत हैं; मानो परमेश्वर हमारे द्वारा विनती कर रहा है: हम मसीह की ओर से निवेदन करते हैं, कि परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो" (2 कुरिन्थियों 5:20)। राजदूत अपनी नीति नहीं बनाता, वह अपने राजा की नीति पहुँचाता है। और ध्यान दीजिए, यह "विनती" है, धमकी नहीं। परमेश्वर का स्वर यहाँ कठोर नहीं, करुणा भरा है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
गवाही देना नये नियम में अचानक शुरू नहीं हुआ। यह सूत्र पहले पन्नों से बुना हुआ है। अदन में पाप के तुरंत बाद परमेश्वर ने पहला वादा दिया: "और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा" (उत्पत्ति 3:15)। यह मानव इतिहास का पहला सुसमाचार है, और इसे सुनाने वाले स्वयं परमेश्वर हैं। गवाही देने की परंपरा परमेश्वर से शुरू होती है, हमसे नहीं।
फिर अब्राहम को बुलाहट मिली, और उसमें एक वैश्विक वादा छिपा था: "भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे" (उत्पत्ति 12:3)। इस्राएल को चुना ही इसलिए गया था कि वह जातियों के बीच परमेश्वर का जीता-जागता प्रदर्शन बने। यशायाह में परमेश्वर अपनी प्रजा से कहते हैं, "तुम मेरे साक्षी हो" (यशायाह 43:10)। यह अदालत का ही दृश्य है: जातियाँ अपने देवताओं के साथ खड़ी हैं, और परमेश्वर अपने लोगों को गवाह के कटघरे में बुलाते हैं, ताकि वे बताएँ कि उन्होंने क्या देखा।
भजनों में यह बुलाहट गीत बन जाती है: "अन्यजातियों में उसकी महिमा का, और देश देश के लोगों में उसके आश्चर्यकर्मों का वर्णन करो" (भजन संहिता 96:3)। योना की पुस्तक दिखाती है कि एक भागता हुआ गवाह भी परमेश्वर की दया को नहीं रोक सकता, और यह भी कि कभी-कभी सबसे बड़ी बाधा संदेश नहीं, संदेशवाहक का दिल होता है। यशायाह उस दिन का सपना देखता है जब कोई पहाड़ों पर दौड़ता हुआ आएगा और शुभ समाचार सुनाएगा; उसके पाँव तक सुंदर लगेंगे (यशायाह 52:7)।
और फिर मसीह आते हैं। वे केवल संदेशवाहक नहीं, वे स्वयं संदेश हैं। वे सामरी स्त्री से कुएँ पर बात करते हैं, और वह स्त्री, जिसका जीवन टूटा-फूटा है, गाँव में जाकर कहती है, "आओ, एक मनुष्य को देखो, जिसने सब कुछ जो मैंने किया मुझे बता दिया। कहीं यह तो मसीह नहीं है?" (यूहन्ना 4:29)। यह आदर्श धर्मशास्त्रीय व्याख्यान नहीं है; यह एक गवाह का बयान है। गिरासेनियों के देश में छुड़ाए गए व्यक्ति से प्रभु कहते हैं, "अपने घर जाकर अपने लोगों को बता, कि तुझ पर प्रभु ने कैसे बड़े काम किए हैं, और तुझ पर कैसी दया की है" (मरकुस 5:19)। पहला मिशन-क्षेत्र अक्सर अपना ही घर होता है।
प्रेरितों के काम में यह सूत्र आग पकड़ लेता है। पतरस और यूहन्ना को चुप कराने की कोशिश होती है, और वे जवाब देते हैं, "क्योंकि यह तो हम से हो नहीं सकता, कि जो हमने देखा और सुना है, वह न कहें" (प्रेरितों के काम 4:20)। फिलिप्पुस एक सुनसान रास्ते पर एक अकेले इथियोपियाई अधिकारी के रथ के पास दौड़ता है और यशायाह की पुस्तक से यीशु का सुसमाचार सुनाता है। पौलुस शहर-दर-शहर जाता है, जेल में भी गवाही देता है।
और अंत में परदा उठता है। यूहन्ना देखता है, "हर एक जाति, और कुल, और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था" (प्रकाशितवाक्य 7:9)। आपकी हकलाती हुई गवाही, वह अजीब-सी बातचीत जो आपको लगा कि बेकार गई, उस भीड़ का हिस्सा बन रही है। उत्पत्ति का वादा प्रकाशितवाक्य के गीत में पूरा होता है, और बीच की पूरी कहानी गवाहों की कहानी है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: "सुसमाचार सुनाना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं, यह पास्टर का काम है।" बाइबल में ऐसा बँटवारा कहीं नहीं मिलता। प्रेरितों के काम 8:1 और 8:4 बताते हैं कि यरूशलेम में सताव होने पर प्रेरितों को छोड़कर बाकी सब तितर-बितर हो गए, और जो बिखरे वे "सुसमाचार सुनाते हुए फिरते रहे।" यानी आरंभिक कलीसिया में सुसमाचार मुख्य रूप से साधारण विश्वासियों के द्वारा फैला, नाम न जानने वाले व्यापारियों, गृहिणियों, दासों के द्वारा। मसीह के राजदूत होने की पदवी किसी विशेष वर्ग को नहीं, हर विश्वासी को दी गई है (2 कुरिन्थियों 5:20)।
दूसरी भ्रांति: "मुझे पहले हर सवाल का जवाब आना चाहिए।" पतरस लिखता है, "पर मसीह को प्रभु जानकर अपने-अपने मन में पवित्र समझो, और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ" (1 पतरस 3:15)। गौर कीजिए, पतरस यह नहीं कहता कि हर दार्शनिक प्रश्न का खंडन करने को तैयार रहो। वह कहता है, अपनी आशा का कारण बताने को तैयार रहो। आशा आपकी निजी चीज़ है; आप उसके विशेषज्ञ हैं। और इस पूरे वाक्य का पहला आदेश तर्क नहीं, आराधना है: मसीह को अपने मन में पवित्र समझो। जिसका दिल मसीह से भरा है, उसका मुँह अपने आप खुलता है। वह जन्म से अंधा व्यक्ति धर्मशास्त्रियों की जिरह में नहीं उलझा; उसने बस कहा, "एक बात मैं जानता हूँ कि मैं अंधा था और अब देखता हूँ" (यूहन्ना 9:25)।
तीसरी भ्रांति: "अगर सामने वाला विश्वास नहीं करता, तो मैं असफल हो गया।" यहीं वकील और गवाह का अंतर सबसे ज़रूरी है। पौलुस लिखता है, "मैंने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया" (1 कुरिन्थियों 3:6)। आपका काम बोना और सींचना है; उगाना परमेश्वर का काम है। प्रभु यीशु ने स्वयं कहा कि पवित्र आत्मा ही संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में दोषी ठहराएँगे (यूहन्ना 16:8)। जब आप परिणाम का बोझ अपने कंधे पर उठाते हैं, तो आप वह भार उठा रहे हैं जो कभी आपका था ही नहीं, और वही भार आपको चुप करा देता है।
गवाह सच बोलता है; न्यायी फैसला सुनाता है।
चौथी भ्रांति: "मेरा अच्छा जीवन ही काफ़ी गवाही है।" जीवन ज़रूरी है, पर अकेला काफ़ी नहीं। प्रभु ने कहा, "उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें" (मत्ती 5:16)। पर आपका अच्छा चरित्र लोगों को यह नहीं बता सकता कि मसीह आपके पापों के लिए मरे और तीसरे दिन जी उठे। वह तो केवल शब्दों से बताया जा सकता है, इसीलिए रोमियों 10:14 पूछता है, "प्रचारक बिना क्योंकर सुनें?" अच्छा जीवन दरवाज़ा खोलता है; शब्द उस दरवाज़े से अंदर ले जाते हैं। और शब्दों का स्वाद भी मायने रखता है: "तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो, कि तुम्हें हर मनुष्य को उचित रीति से उत्तर देना आ जाए" (कुलुस्सियों 4:6)।
आज इसे जीवन में उतारना
शुरुआत वहीं से कीजिए जहाँ परमेश्वर ने आपको रखा है। प्रेरितों के काम 1:8 का नक्शा गोल घेरों में फैलता है: पहले यरूशलेम, फिर यहूदिया, फिर सामरिया, फिर पृथ्वी की छोर। आपका "यरूशलेम" आपका घर, आपकी गली, आपका दफ़्तर है। तीन नाम लिखिए, ऐसे लोग जो अभी मसीह को नहीं जानते, और रोज़ उनके लिए प्रार्थना कीजिए। प्रार्थना गवाही का पहला काम है, क्योंकि सबसे पहली बातचीत परमेश्वर से होती है, इंसान से बाद में।
काम की जगह पर पहला कदम प्रचार नहीं, उपस्थिति है। जब कोई सहकर्मी बीमार हो, पूछिए कि क्या आप उसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं। यह छोटा-सा वाक्य अक्सर पूरी बातचीत का दरवाज़ा खोल देता है। कुलुस्सियों 4:6 कहता है कि हमारा वचन "सलोना" हो, यानी नमकीन, स्वादिष्ट, जो प्यास जगाए। नमक खाने की जगह नहीं लेता, वह भूख बढ़ाता है। इसी तरह आपकी बातें बहस नहीं, जिज्ञासा जगाएँ।
परिवार में यह सबसे कठिन होता है, क्योंकि वे आपकी कमज़ोरियाँ भी जानते हैं। यहाँ धैर्य और लगातार प्यार ही सबसे बड़ी भाषा है। जब आप गलती करें, माफ़ी माँगिए; क्षमा माँगता हुआ मसीही अक्सर उपदेश देते हुए मसीही से ज़्यादा असरदार होता है। मरकुस 5:19 की वह आज्ञा याद रखिए, "अपने घर जाकर अपने लोगों को बता।"
अपनी निजी गवाही को तीन हिस्सों में तैयार रखिए, लगभग तीन मिनट की: मसीह को जानने से पहले मेरा जीवन कैसा था, परमेश्वर ने मुझे कैसे छुआ, और आज क्या फ़र्क है। इसे घमंड के बिना, पर साफ़-साफ़ कहिए। और अपनी कहानी पर रुकिए मत; उसे मसीह की कहानी तक ले जाइए, क्योंकि बचाने वाली शक्ति आपके अनुभव में नहीं, 1 कुरिन्थियों 15:3-4 के समाचार में है।
बातचीत में सवाल पूछना सीखिए। प्रभु यीशु ने सैकड़ों सवाल पूछे। "आप परमेश्वर के बारे में क्या सोचते हैं?" या "जब ज़िंदगी में सब टूट जाता है, तब आप कहाँ से ताक़त लेते हैं?" ऐसे सवाल दिल के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं। सुनिए, टोकिए मत, और जीतने की चाह छोड़ दीजिए। 1 पतरस 3:15 की "नम्रता और भय" का यही अर्थ है: दूसरे का आदर, और परमेश्वर के सामने झुका हुआ दिल।
आखिर में, अपने फ़ोन को भी राजदूत बनने दीजिए। एक वचन, एक छोटी गवाही, एक ईमानदार पोस्ट भी बीज है। और अगर आज का दिन चुप्पी में बीत गया, तो हार मत मानिए। अनुग्रह गवाहों पर भी लागू होता है।
दर्पण
अब सीधे आपसे। आप जानते हैं न कि पिछली बार कब आपने विषय बदल दिया था? वह पल जब बात मसीह तक पहुँचने ही वाली थी, और आपने मौसम की चर्चा शुरू कर दी। उस पल के बाद जो खालीपन महसूस हुआ, वह अपराध-बोध नहीं था, वह बुलाहट थी जो दरवाज़े पर दस्तक दे रही थी।
पूछिए अपने आप से: मैं असल में किससे डरता हूँ? अगर मैं ईमानदार हूँ, तो क्या मुझे परमेश्वर के अपमान का डर है, या अपनी छवि खराब होने का? दफ़्तर में प्रमोशन के मौसम में, रिश्तेदारों के बीच शादी-ब्याह में, व्हाट्सएप ग्रुप में जहाँ मज़ाक उड़ाया जाता है, क्या मैंने चुप्पी को "बुद्धिमानी" कहकर सजा लिया है?
और एक और सवाल, जो शायद ज़्यादा चुभे। क्या आपकी चुप्पी की जड़ में डर है, या ठंडापन? क्योंकि जिस चीज़ से हमारा दिल भरा होता है, उसके बारे में हम बिना कोशिश के बोलते हैं। क्रिकेट का स्कोर, बच्चे के नंबर, नई गाड़ी, सस्ता सौदा; इनके लिए हमें हिम्मत नहीं जुटानी पड़ती। अगर मसीह के बारे में बोलना हर बार एक लड़ाई लगती है, तो शायद समस्या आपकी वाक्पटुता में नहीं, आपकी निकटता में है। 1 पतरस 3:15 का क्रम उलटा मत कीजिए: पहले मसीह को मन में पवित्र समझना, फिर उत्तर देने की तैयारी।
पर यहीं एक राहत भी है। आप वकील नहीं हैं। आपसे पूरी अदालत को मनाने की माँग नहीं की गई। आपसे बस यह कहा गया है कि जो आपने देखा और सुना है, वह कह दीजिए। आपके शब्द टूटे-फूटे हो सकते हैं; गवाह के बयान में व्याकरण की परीक्षा नहीं होती, सच्चाई की होती है।
डर मिटता नहीं, पर आज्ञाकारिता डर से बड़ी हो जाती है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को गवाही देना समझाना मुश्किल नहीं, क्योंकि बच्चे स्वभाव से ही खबर बाँटने वाले होते हैं। जब उन्हें कोई अच्छी चीज़ मिलती है, तो वे तुरंत दौड़कर बताते हैं। इसी स्वाभाविक बात से शुरू कीजिए: "जब तुम्हें कोई बहुत अच्छी खबर मिलती है, तो तुम क्या करते हो?" फिर बताइए कि यीशु के बारे में बताना भी ऐसा ही है, कोई कठिन परीक्षा नहीं, बल्कि सबसे अच्छी खबर किसी दोस्त को देना।
छोटे बच्चों को यह समझाना मददगार होता है कि गवाह वह होता है जो सिर्फ़ यह कहता है कि उसने क्या देखा। उन्हें याद दिलाइए कि वे सब कुछ जानने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं; "मुझे नहीं पता, चलो साथ में पता करते हैं" कहना भी ईमानदारी है, और परमेश्वर ईमानदारी से प्रसन्न होते हैं। घर में इसका अभ्यास कराइए: खाने की मेज़ पर हर कोई एक बात बताए जिसके लिए वह आज परमेश्वर का धन्यवाद करता है। यह गवाही देने का सबसे सरल प्रशिक्षण है।
बड़े बच्चों के साथ आप मरकुस 5:19 की कहानी पढ़ सकते हैं, जहाँ यीशु किसी को अपने घर भेजते हैं ताकि वह अपनों को बताए कि उस पर कैसी दया हुई। किशोरों के साथ उन असली दबावों पर बात कीजिए जो स्कूल और सोशल मीडिया में आते हैं, और 1 पतरस 3:15 की नम्रता पर ज़ोर दीजिए।
अलग-अलग उम्र के अनुसार विस्तृत व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष), प्राथमिक कक्षा के बच्चों (7 से 12 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए, ताकि आप अपने परिवार की उम्र और समझ के अनुसार सही सामग्री चुन सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुसमाचार सुनाने का सबसे आसान तरीका क्या है?
सबसे आसान तरीका अपनी निजी कहानी बताना है, क्योंकि उसके लिए आपको किसी प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं। तीन हिस्सों में सोचिए: मसीह को जानने से पहले मैं कैसा था, परमेश्वर ने मुझे कैसे छुआ, और आज क्या बदला है। फिर अपनी कहानी को मसीह की कहानी से जोड़िए, कि वे हमारे पापों के लिए मरे और तीसरे दिन जी उठे (1 कुरिन्थियों 15:3-4)। इसके बाद सामने वाले से एक सवाल पूछिए और शांति से सुनिए। बहस जीतने की कोशिश मत कीजिए; बस ईमानदारी से बताइए कि आपने क्या देखा और पाया है।
क्या सुसमाचार सुनाना हर मसीही का कर्तव्य है?
हाँ, पर इसे केवल कर्तव्य कहना अधूरा है; यह विशेषाधिकार भी है। मत्ती 28:19 का आदेश किसी विशेष वर्ग को नहीं, मसीह के चेलों को दिया गया, और प्रेरितों के काम 8:4 बताता है कि सताव के बाद बिखरे हुए साधारण विश्वासी ही सुसमाचार सुनाते फिरे। 2 कुरिन्थियों 5:20 हर विश्वासी को "मसीह के राजदूत" कहता है। हर कोई प्रचारक नहीं बुलाया गया, पर हर कोई गवाह बुलाया गया है। आपका रूप अलग हो सकता है: कोई बातचीत में, कोई मेहमाननवाज़ी में, कोई लिखकर। पर चुप रह जाना विकल्प नहीं है।
अगर मुझे बाइबल का ज्ञान कम है तो क्या मैं गवाही दे सकता हूँ?
बिल्कुल। यूहन्ना 9 में जन्म से अंधे व्यक्ति के पास कोई धर्मशास्त्रीय प्रशिक्षण नहीं था; उसने बस कहा, "एक बात मैं जानता हूँ कि मैं अंधा था और अब देखता हूँ" (यूहन्ना 9:25)। गवाह से विशेषज्ञता की नहीं, सच्चाई की अपेक्षा होती है। साथ ही यह भी सच है कि जानबूझकर अज्ञानी बने रहना अच्छा नहीं। वचन पढ़ते रहिए, सीखते रहिए, पर सीखने के पूरा होने का इंतज़ार मत कीजिए। जो आप आज जानते हैं, वही आज बाँटिए; परमेश्वर उसी छोटे हिस्से को इस्तेमाल करना जानते हैं।
सुसमाचार सुनाते समय डर कैसे दूर करें?
डर पूरी तरह शायद कभी न जाए, पर उसकी जड़ बदली जा सकती है। अधिकतर डर इस गलत सोच से आता है कि नतीजा हमारे ऊपर है। प्रेरितों के काम 1:8 में प्रभु ने पहले सामर्थ्य का वादा किया, फिर गवाह होने की बात कही; क्रम उल्टा नहीं है। 1 कुरिन्थियों 3:6 याद दिलाता है कि बढ़ाने का काम परमेश्वर का है। प्रार्थना से शुरुआत कीजिए, छोटे कदम उठाइए, और किसी एक विश्वासी मित्र को अपना साथी बनाइए जिसे आप बता सकें कि आपने किससे बात की। आज्ञाकारिता अभ्यास से आसान होती जाती है।
1 पतरस 3:15 में "नम्रता और भय" का क्या अर्थ है?
पतरस लिखता है कि उत्तर देने के लिए सर्वदा तैयार रहो, "पर नम्रता और भय के साथ"। नम्रता का अर्थ है सामने वाले को हराने की इच्छा छोड़ देना; आप भी कभी खोए हुए थे और अनुग्रह से ही पाए गए। भय का अर्थ यहाँ इंसानों का डर नहीं, परमेश्वर के प्रति आदरपूर्ण गंभीरता है, यह चेतना कि आप किसी पवित्र संदेश को संभाल रहे हैं। इसीलिए सुसमाचार कभी कटाक्ष, तिरस्कार या जीत के अहंकार के साथ नहीं सुनाया जाना चाहिए। कुलुस्सियों 4:6 इसी बात को दूसरे शब्दों में कहता है: वचन "अनुग्रह सहित और सलोना" हो।
अगर कोई ऐसा सवाल पूछे जिसका उत्तर मुझे न आता हो तो क्या करूँ?
सबसे अच्छा उत्तर है, "मुझे नहीं पता, पर मैं पता करके बताऊँगा।" यह ईमानदारी सामने वाले का भरोसा बढ़ाती है, जबकि गोल-मोल जवाब भरोसा तोड़ते हैं। फिर सचमुच पता कीजिए; अपने पास्टर से पूछिए, भरोसेमंद सामग्री पढ़िए, और बातचीत जारी रखिए। अक्सर कठिन सवाल के पीछे कोई व्यक्तिगत दर्द छिपा होता है, इसलिए यह भी पूछिए, "यह सवाल आपके लिए इतना अहम क्यों है?" आप वकील नहीं, गवाह हैं; हर बहस जीतना आपका काम नहीं, सच्चाई और करुणा के साथ मौजूद रहना आपका काम है।
मत्ती 28:19 में "चेला बनाओ" का क्या अर्थ है?
मूल भाषा में इस वाक्य की मुख्य क्रिया "चेला बनाओ" है, और "जाकर", "बपतिस्मा देते हुए", "सिखाते हुए" उसके सहायक रूप हैं। चेला यानी विद्यार्थी, वह व्यक्ति जो मसीह के पीछे चलकर जीवन भर उनसे सीखता है। इसलिए सुसमाचार सुनाना किसी को एक बार निर्णय लेने तक पहुँचाकर छोड़ देना नहीं है, बल्कि उसे कलीसिया के परिवार में जोड़ना, बपतिस्मा तक ले जाना और वचन सिखाना भी इसमें शामिल है। यह लंबी दौड़ है, और इसका वादा भी साथ है: प्रभु हर दिन हमारे संग रहते हैं।
प्रेरितों के काम 1:8 में "गवाह" शब्द का क्या मतलब है?
यूनानी शब्द "मार्तुस" अदालत की दुनिया से आता है और उसका अर्थ है चश्मदीद, वह जो देखी-सुनी बात की साक्षी देता है। बाद में यही शब्द "शहीद" के लिए भी इस्तेमाल होने लगा, क्योंकि कई गवाहों ने सच बोलने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। इसका अर्थ है कि गवाह का काम प्रमाणित करना नहीं, बल्कि सच बताना है, और ज़रूरत पड़े तो उसकी कीमत चुकाना है। यह बात ज़िम्मेदारी को स्पष्ट करती है: बोलना आपका हिस्सा है, दिलों को बदलना पवित्र आत्मा का।
क्या सिर्फ़ अच्छे कामों से गवाही देना काफ़ी है?
अच्छे काम बहुत ज़रूरी हैं, क्योंकि मत्ती 5:16 कहता है कि लोग हमारे भले कामों को देखकर पिता की बड़ाई करें। पर अच्छे काम यह नहीं बता सकते कि यीशु कौन हैं, उन्होंने क्रूस पर क्या किया और जी उठने का क्या अर्थ है। रोमियों 10:14 इसी कारण पूछता है कि प्रचारक के बिना लोग कैसे सुनें। जीवन और शब्द साथ-साथ चलते हैं: चरित्र भरोसा बनाता है, और शब्द उस भरोसे में सच्चाई भरते हैं। बिना शब्दों के गवाही अधूरी है, और बिना जीवन के शब्द खोखले।
अपने परिवार को सुसमाचार कैसे सुनाएँ जब वे सुनना न चाहें?
पहले उनके लिए लगातार प्रार्थना कीजिए, नाम लेकर, धैर्य के साथ। फिर दबाव के बजाय निरंतर प्रेम चुनिए: सेवा, आदर, क्षमा माँगना, वादे निभाना। परिवार आपके उपदेश से ज़्यादा आपके बदलाव को देखता है। मरकुस 5:19 में प्रभु ने छुड़ाए हुए व्यक्ति को अपने घर भेजा ताकि वह बताए कि उस पर कैसी दया हुई; गवाही अपने अनुभव से शुरू होती है, आरोप से नहीं। जब दरवाज़ा खुले, नम्रता से बोलिए, और जब बंद हो, तब प्रार्थना में बोलिए। परमेश्वर के पास आपसे ज़्यादा समय और धैर्य है।
अगर कोई मसीह को ठुकरा दे तो क्या यह मेरी असफलता है?
नहीं। प्रभु यीशु को स्वयं कई लोगों ने ठुकराया, और वे संपूर्ण थे। 1 कुरिन्थियों 3:6 साफ़ कहता है कि लगाना और सींचना हमारा काम है, बढ़ाना परमेश्वर का। आपकी सफलता का पैमाना यह नहीं कि कितने लोगों ने हाँ कहा, बल्कि यह कि आपने वफ़ादारी से सच बोला, नम्रता से बोला और प्रेम से बोला। कई बार एक बातचीत बीज होती है जिसका फल वर्षों बाद दिखता है, और शायद किसी और के सामने। परिणाम का बोझ उतार दीजिए; वह कभी आपके कंधे के लिए बना ही नहीं था।
क्या सोशल मीडिया पर सुसमाचार साझा करना सही है?
हाँ, बशर्ते वही सिद्धांत लागू हों जो आमने-सामने की बातचीत में लागू होते हैं। कुलुस्सियों 4:6 कहता है कि हमारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो; ऑनलाइन कटुता, तानाकशी और बहसबाज़ी सुसमाचार की खुशबू को मार देती है। अपनी गवाही, एक वचन, या एक ईमानदार पोस्ट साझा कीजिए, और टिप्पणियों में शांति से जवाब दीजिए। याद रखिए कि स्क्रीन के दूसरी ओर असली इंसान हैं, इसलिए जहाँ संभव हो, बातचीत को निजी संदेश या आमने-सामने मुलाकात तक ले जाइए, क्योंकि रिश्ते में कही गई बात सबसे गहरी उतरती है।
अंत में
पूरे पवित्रशास्त्र में एक ही ढाँचा दोहराया जाता है: परमेश्वर कुछ करते हैं, और फिर अपने लोगों को बुलाते हैं कि वे बताएँ कि उन्होंने क्या देखा। अदन में परमेश्वर स्वयं पहला वादा सुनाते हैं, इस्राएल को जातियों के बीच साक्षी ठहराया जाता है, मसीह आते हैं और स्वयं वह शुभ समाचार बन जाते हैं, और फिर वे डरे हुए मछुआरों को सामर्थ्य देकर पृथ्वी की छोर तक भेज देते हैं। आप उसी लंबी कतार में खड़े हैं।
इसलिए अपने आप पर वह बोझ मत डालिए जो आपका नहीं है। आपको किसी को मनाना नहीं है, किसी का न्याय नहीं करना है, और हर सवाल का जवाब देने की परीक्षा भी नहीं देनी है। आपको बस वह बताना है जो आपने देखा और पाया है, नम्रता और भय के साथ, अनुग्रह से भरे और सलोने शब्दों में।
आगे के मनन के लिए इस हफ़्ते प्रेरितों के काम 8 को पढ़िए, जहाँ फिलिप्पुस एक अकेले यात्री के पास दौड़ता है, और उसके साथ रोमियों 10 को रखिए। फिर तीन नाम लिखकर प्रार्थना शुरू कीजिए। आपकी अगली बातचीत कोई मुकदमा नहीं होगी; वह सिर्फ़ एक गवाह का सच्चा बयान होगा।
