दाऊद का जीवन: चरवाहे से राजा बनने तक की कहानी
परिचय
बेतलेहेम के बाहर एक ढलान पर, भेड़ों की गन्ध और रात के सन्नाटे के बीच, एक लड़का सितारों के नीचे बैठा गा रहा है। उसके पिता के घर में उस दिन एक भविष्यद्वक्ता आया हुआ है, बलिदान की तैयारी हो रही है, सात बड़े भाई नहाकर, अच्छे कपड़े पहनकर पंक्ति में खड़े हैं, और किसी को यह याद तक नहीं आया कि सबसे छोटे को बुला लिया जाए। वह वहीं है जहाँ उसे होना चाहिए था: भूला हुआ, गिना न गया, भेड़ों के साथ।
उसी लड़के के सिर पर उस दोपहर तेल उंडेला जाएगा। और फिर, अभिषेक के बाद, वह सीधे सिंहासन पर नहीं बैठेगा। वह वापस भेड़ों के पास जाएगा।
इस पृष्ठ पर आप दाऊद के जीवन को शुरू से अन्त तक देखेंगे: चरवाहे का लड़का, गोलियत का विजेता, भगोड़ा, राजा, पापी, पश्चातापी, गीतकार, और मसीह का पूर्वज। पर आप उसे एक खास दृष्टि से देखेंगे, जो शायद पहले किसी ने आपको नहीं दिखाई।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
दाऊद के जीवन की असली कहानी उसके ताज में नहीं, बल्कि ताज से पहले के लम्बे खालीपन में है। अभिषेक (1 शमूएल 16) और यरूशलेम के सिंहासन (2 शमूएल 5) के बीच लगभग पन्द्रह वर्ष हैं: भेड़शाला, दरबार, जंगल, गुफाएँ, शत्रु का देश। परमेश्वर ने उसे वहीं गढ़ा। और सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि दाऊद जंगल में मजबूत था और महल की छत पर गिरा। इसलिए यह मार्गदर्शिका दाऊद को "बीच के समय के मनुष्य" के रूप में पढ़ती है: प्रतिज्ञा मिल चुकी है, पूर्ति अभी बाकी है, और उसी खाई में चरित्र बनता या टूटता है। यही खाई आप और मैं आज जी रहे हैं।
बाइबल दाऊद के जीवन के बारे में क्या कहती है?
दाऊद बाइबल का सबसे विस्तार से वर्णित मनुष्य है। उसकी कहानी 1 शमूएल 16 से शुरू होकर 1 राजा 2 तक चलती है, फिर 1 इतिहास 11 से 29 में दोबारा, एक दूसरे कोण से, कही जाती है। इसके ऊपर भजन संहिता की लगभग आधी पुस्तक उसके नाम से जुड़ी है, यानी हमें उसके जीवन का बाहरी इतिहास ही नहीं, उसके भीतर का हाल भी सुनने को मिलता है। किसी और बाइबल पात्र के साथ ऐसा नहीं होता। हम अब्राहम के डर के बारे में पढ़ते हैं, पर दाऊद के डर को उसी की आवाज़ में सुनते हैं।
उसकी कहानी की नींव एक वाक्य में रखी गई है, जो परमेश्वर ने शमूएल से कहा था जब भविष्यद्वक्ता यिशै के लम्बे, सुन्दर बड़े बेटे एलीआब को देखकर प्रभावित हो गया था: "परन्तु यहोवा ने शमूएल से कहा, न तो उसके रूप पर दृष्टि कर, और न उसके कद की ऊंचाई पर, क्योंकि मैं ने उसे अयोग्य ठहराया है; क्योंकि यहोवा का देखना मनुष्य का सा नहीं है; मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु यहोवा की दृष्टि मन पर रहती है" (1 शमूएल 16:7)। यह पद केवल दाऊद के चुने जाने की व्याख्या नहीं करता, यह पूरी कहानी का ताला खोलता है। इस्राएल ने अपना पहला राजा आँखों से चुना था: शाऊल सबसे ऊँचा, सबसे सुन्दर। परमेश्वर अपना राजा हृदय से चुनते हैं। और जो हृदय से चुना जाता है, उसे हृदय में ही तैयार भी किया जाता है, जिसमें समय लगता है।
परमेश्वर पहले हृदय चुनते हैं, फिर सिंहासन देते हैं।
दाऊद की पहचान का दूसरा स्तम्भ उसका पेशा है। वह चरवाहा था, और उसने चरवाहे की भाषा में परमेश्वर को जाना: "यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी" (भजन संहिता 23:1)। ध्यान दीजिए कि यह वाक्य किसने लिखा। वह आदमी जिसने खुद भेड़ों की रखवाली की थी, जो जानता था कि रखवाली में क्या लगता है: रातों का जागना, सिंह और भालू से भिड़ना, घायल भेड़ को कंधे पर उठाना। जब वही आदमी कहता है कि परमेश्वर मेरे चरवाहे हैं, तो वह भावुक कविता नहीं लिख रहा; वह अपने अनुभव से बता रहा है कि उसकी अपनी देखभाल किसी और के हाथ में है। जो राजा बनने वाला था, उसने पहले भेड़ बनना सीखा।
तीसरा स्तम्भ वह प्रतिज्ञा है जो परमेश्वर ने नातान भविष्यद्वक्ता के द्वारा उसे दी: "और तेरा घराना और तेरा राज्य मेरे साम्हने सदा अटल रहेंगे; तेरी राजगद्दी सदैव बनी रहेगी" (2 शमूएल 7:16)। दाऊद परमेश्वर के लिए एक भवन बनाना चाहता था; परमेश्वर ने उत्तर में कहा कि वे दाऊद के लिए एक घराना बनाएँगे। यह वाचा बाइबल की रीढ़ की हड्डी है। इसके बिना न भविष्यद्वक्ताओं का मसीहा समझ आता है, न मत्ती की वंशावली, न वह पुकार जो अंधे बरतिमै के मुँह से निकली: "हे दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर।"
और चौथा स्तम्भ, जिसे कोई ईमानदार पाठक छोड़ नहीं सकता, वह है उसका पतन। बाइबल दाऊद को धोती-पोंछती नहीं। बतशेबा और ऊरिय्याह की घटना का अध्याय एक ठंडे, भयानक वाक्य पर खत्म होता है: "परन्तु जो काम दाऊद ने किया था वह यहोवा की दृष्टि में बुरा लगा" (2 शमूएल 11:27)। दरबार में किसी ने कुछ नहीं कहा। सेनापति योआब चुप रहा। सब कुछ ढँक दिया गया था। पर स्वर्ग चुप नहीं था। यही पद हमें बताता है कि दाऊद की कहानी नायक की कहानी नहीं है; यह अनुग्रह की कहानी है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
दाऊद पुराने नियम में अचानक नहीं आता। उत्पत्ति 49 में याकूब कहता है कि राजदण्ड यहूदा से दूर न होगा। रूत की छोटी सी पुस्तक, जो अकाल और शोक से शुरू होती है, जानबूझकर इस वाक्य पर खत्म होती है कि ओबेद यिशै का पिता हुआ और यिशै दाऊद का। यानी मोआबी विधवा रूत की वफादारी और बोअज की छुड़ौती के पीछे परमेश्वर चुपचाप एक वंश बुन रहे थे। दाऊद अचानक चमकने वाला सितारा नहीं, बल्कि एक लम्बी, धीमी, वफादार बुनाई का फल है।
उसके बाद पूरा पुराना नियम दाऊद की छाया में चलता है। राजाओं की पुस्तकों में हर राजा को इसी पैमाने से नापा जाता है: उसने अपने पिता दाऊद के समान किया, या नहीं किया। पर जितने राजा आते गए, उतना ही यह स्पष्ट होता गया कि कोई भी उस प्रतिज्ञा को पूरा नहीं कर सकता। सुलैमान बुद्धिमान था, फिर भी बँट गया। हिजकिय्याह और योशिय्याह भले थे, फिर भी मर गए। और अन्त में बाबुल आया, यरूशलेम गिरा, दाऊद का सिंहासन खाली हो गया। जो वाचा "सदैव" के लिए थी, वह मिट्टी में पड़ी दिखाई दी।
इसी अँधेरे में भविष्यद्वक्ताओं की आवाज़ उठी। यशायाह ने कहा कि यिशै के ठूँठ में से एक डाली निकलेगी। यिर्मयाह ने दाऊद के लिए एक धर्मी अंकुर की बात कही। यहेजकेल ने एक ही चरवाहे की प्रतिज्ञा की जो अपनी भेड़ों की चरवाही करेगा। यानी दाऊद की खाली गद्दी एक प्रश्नचिह्न बन गई जिसे केवल परमेश्वर ही मिटा सकते थे।
नया नियम पहले ही वाक्य में उत्तर देता है: "इब्राहीम की सन्तान, दाऊद की सन्तान, यीशु मसीह की वंशावली" (मत्ती 1:1)। स्वर्गदूत ने मरियम से कहा: "वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उस को देगा" (लूका 1:32)। और पौलुस ने पिसिदिया के अन्ताकिया की सभा में इस्राएल का पूरा इतिहास सुनाते हुए दाऊद पर रुककर कहा: "फिर उसे अलग करके, दाऊद को उन का राजा बनाया; जिस के विषय में उस ने गवाही दी, कि मुझे एक मनुष्य, यिशै का पुत्र दाऊद, मेरे मन के अनुसार मिल गया है। वही मेरी सारी इच्छा पूरी करेगा" (प्रेरितों के काम 13:22)। पौलुस यह बात व्यर्थ में नहीं कहता; अगले ही वाक्य में वह जोड़ता है कि इसी के वंश से परमेश्वर ने इस्राएल के लिए उद्धारकर्ता, यीशु को भेजा।
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि "मेरे मन के अनुसार मनुष्य" वाली गवाही तब भी टिकी रही जब दाऊद का पूरा जीवन, उसके पाप समेत, दर्ज हो चुका था। परमेश्वर ने दाऊद को उसकी निर्दोषता के कारण नहीं, बल्कि उस दिशा के कारण चुना जिस ओर उसका हृदय हर बार लौटता था।
और अन्त में, बाइबल के आखिरी अध्याय में स्वयं यीशु अपना परिचय देते हैं: "मैं दाऊद का मूल और वंश, और भोर का चमकता हुआ तारा हूं" (प्रकाशितवाक्य 22:16)। मूल भी और वंश भी: दाऊद जिससे निकला, और दाऊद से जो निकला। वह चरवाहा जो राजा बना, उस राजा की ओर संकेत करता है जो चरवाहा बना: "अच्छा चरवाहा मैं हूं; अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है" (यूहन्ना 10:11)।
भेड़शाला से अभिषेक तक: गिना न गया लड़का
दाऊद की कहानी एक इनकार से शुरू होती है। शमूएल शोक में था क्योंकि शाऊल ठुकराया जा चुका था, और परमेश्वर ने उसे तेल का सींग लेकर बेतलेहेम भेजा। यिशै ने अपने बेटे एक-एक करके सामने खिलाए, और हर बार परमेश्वर ने कहा, यह नहीं। जब सातों निकल गए, तब शमूएल को पूछना पड़ा कि क्या और कोई बेटा है। पिता का उत्तर हृदय को चुभता है: सबसे छोटा बाकी है, वह भेड़ें चरा रहा है। अपने ही घर में वह गिनती से बाहर था।
उसी लड़के को बुलाया गया, और उसके भाइयों के बीच में उसका अभिषेक हुआ, और परमेश्वर का आत्मा उस दिन से दाऊद पर बल के साथ उतरता रहा। पर यहाँ कहानी वह मोड़ लेती है जिसे हम अक्सर छोड़ देते हैं: तेल लगने के बाद कोई जुलूस नहीं निकला, कोई मुकुट नहीं आया। दाऊद वापस भेड़ों के पास चला गया। परमेश्वर की बुलाहट और उसकी पूर्ति के बीच लगभग पन्द्रह साल की खाई खुद गई, और उन वर्षों में दाऊद ने वह सीखा जो सिंहासन कभी नहीं सिखा सकता था।
यह खाई ही उसका विद्यालय थी। वहाँ उसने गोफन चलाना सीखा, वहाँ उसने वीणा बजाना सीखा, वहाँ अकेलेपन में परमेश्वर से बात करना सीखा। जब बाद में शाऊल को एक संगीतकार की जरूरत पड़ी, तो सेवकों ने दाऊद का नाम लिया, क्योंकि जो कौशल गुमनामी में मेहनत से बनता है, वह किसी न किसी दिन दरवाजे खोल ही देता है। पर ध्यान रहे, उस समय दरबार में जाना उसकी बुलाहट की पूर्ति नहीं था; वह तो एक और कक्षा थी, इस बार राजा के घर के भीतर से राजनीति देखने की।
गोलियत के सामने: विश्वास की पहली सार्वजनिक परीक्षा
एला की तराई में इस्राएल की सेना चालीस दिन से लकवाग्रस्त पड़ी थी। एक पलिश्ती योद्धा, लगभग तीन मीटर लम्बा, कवच से लदा हुआ, सुबह-शाम आकर ललकारता था, और सेनाएँ काँप जाती थीं। दाऊद अपने भाइयों के लिए रोटी और पनीर लेकर आया था, यानी वह सैनिक नहीं, कुरियर था। पर उसने जो सुना, उससे उसके भीतर कुछ जल उठा, और वह प्रश्न जो किसी के मन में नहीं आया वह उसने पूछ लिया: यह खतनारहित पलिश्ती कौन है जो जीवते परमेश्वर की सेना को ललकारता है।
यहाँ दाऊद के जंगल के वर्षों का फल दिखता है। उसने शाऊल से कहा कि उसने सिंह और भालू को मारा है, इसलिए यह पलिश्ती भी उन्हीं में से एक होगा। भेड़शाला में मिली छोटी-छोटी जीतें उस दिन बड़ी लड़ाई का आधार बनीं। किसी ने वे जीतें नहीं देखी थीं, कोई अखबार नहीं छपा था, पर परमेश्वर ने देखी थीं।
फिर वह वाक्य आता है जो इस्राएल के इतिहास में गूँजता रह गया: "दाऊद ने पलिश्ती से कहा, तू तो तलवार और भाला और बर्छी लिए हुए मेरे पास आता है; परन्तु मैं सेनाओं के यहोवा के नाम से तेरे पास आता हूं, जो इस्राएली सेना का परमेश्वर है, और उसी को तू ने ललकारा है" (1 शमूएल 17:45)। यह बहादुरी का नारा नहीं, धर्मविज्ञान का वाक्य है। दाऊद हथियारों की तुलना नहीं कर रहा; वह कह रहा है कि यह लड़ाई उसकी नहीं है और यह अपमान उसका नहीं है। गोलियत ने परमेश्वर का नाम ललकारा था, इसलिए परमेश्वर का नाम ही उत्तर देगा।
इसलिए दाऊद और गोलियत की कहानी को "अपने भीतर के दानव को हराओ" वाली प्रेरक कथा बना देना उसे छोटा कर देना है। कहानी यह कहती है कि इस्राएल के पास एक ऐसा प्रतिनिधि आया जिसने अकेले जाकर उनके शत्रु को हराया, और उसकी जीत सबकी जीत बन गई। जो लोग खड़े-खड़े देख रहे थे, वे लूट में हिस्सेदार हुए। यह सुसमाचार का ढाँचा है। हमारी लड़ाई हमारे लिए किसी और ने लड़ी।
शाऊल का दरबार और गुफा के वर्ष
जीत के बाद इनाम नहीं, ईर्ष्या मिली। स्त्रियों ने गाया कि शाऊल ने हजार मारे और दाऊद ने लाखों, और उस दिन से राजा की आँख बदल गई। भाला दीवार में गड़ा, फिर दोबारा। दाऊद को खिड़की से उतरकर भागना पड़ा, और वहाँ से उसके जीवन का सबसे कठिन और सबसे उपजाऊ दौर शुरू हुआ।
वह नोब के याजक के पास भूखा पहुँचा और भेंट की रोटी खाई। वह गत में शत्रु के राजा के सामने पागल होने का नाटक करने तक गिर गया, दाढ़ी पर लार बहाते हुए, ताकि जान बच जाए। परमेश्वर के अभिषिक्त की यह तस्वीर हमें असहज करती है, और करनी भी चाहिए, क्योंकि यही सच है: बुलाहट पाया हुआ व्यक्ति भी डरता है, झूठ बोलता है, फिसलता है।
अदुल्लाम की गुफा में जो लोग उसके पास इकट्ठे हुए वे संकट में पड़े, कर्ज में डूबे और मन के कड़वे लोग थे, कोई चार सौ। भावी राजा को यही सेना मिली। उसी गुफा-काल के भजनों में हम उसकी असली आवाज़ सुनते हैं, जहाँ वह शिकायत करता है, रोता है, और फिर भी भरोसा करने का चुनाव करता है।
फिर वह परीक्षा आई जो उसके पूरे भविष्य को तय करती है। एनगदी की गुफा में शाऊल असावधान होकर भीतर आया, और दाऊद के आदमियों ने कहा कि यही परमेश्वर का दिया हुआ मौका है। दाऊद ने चुपके से केवल उसके बागे की छोर काट ली, और उतने पर भी उसका मन उसे धिक्कारने लगा। उसने कहा कि परमेश्वर के अभिषिक्त पर हाथ उठाना उसके लिए वर्जित है। बाद में जीप के जंगल में यही परीक्षा दोबारा आई, जब वह सोते हुए शाऊल के सिरहाने से भाला और पानी की सुराही उठा लाया, पर उसे छुआ तक नहीं।
यहीं दाऊद और शाऊल का असली अन्तर खुलता है। दोनों को राजपद मिला। पर शाऊल ने राजपद को अपनी सम्पत्ति समझा, इसलिए वह उसे बचाने के लिए निर्दोषों को मारने तक गया। दाऊद ने राजपद को परमेश्वर का उपहार समझा, इसलिए उसने उसे लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। जो सिंहासन आप छीनते हैं, आपको उसे जीवन भर पकड़े रहना पड़ता है; जो सिंहासन आपको दिया जाता है, उसे परमेश्वर सम्भालते हैं।
इसी दौर की सबसे अँधेरी रात सिकलग में आई, जब लौटकर उसने अपना नगर जला हुआ और परिवार बन्दी पाया, और उसके अपने आदमी उसे पथराव करने की बात करने लगे। शास्त्र कहता है: "परन्तु दाऊद ने अपने परमेश्वर यहोवा पर भरोसा रखकर हियाव बान्धा" (1 शमूएल 30:6)। यह वाक्य सिखाता है कि विश्वास हमेशा उत्साह नहीं होता; कभी-कभी वह राख में बैठकर अपने आपको परमेश्वर की याद दिलाने का कठिन परिश्रम होता है।
हेब्रोन से यरूशलेम: धीरे-धीरे मिलता हुआ ताज
शाऊल गिलबो पर्वत पर मारा गया, और जो खबर दाऊद के लिए मुक्ति हो सकती थी, उसने उसे विलाप में बदल दिया। उसने शाऊल और योनातान के लिए एक शोकगीत रचा और उसे यहूदा के लोगों को सिखाने का आदेश दिया। जो व्यक्ति अपने सताने वाले की मृत्यु पर सच्चा शोक कर सकता है, उसका हृदय कड़वाहट से मुक्त है।
उसके बाद भी सब कुछ एक साथ नहीं मिला। पहले वह केवल यहूदा के गोत्र का राजा बना, हेब्रोन में, साढ़े सात वर्ष तक; उत्तर के गोत्र शाऊल के पुत्र ईशबोशेत के पीछे चलते रहे। घरेलू युद्ध, हत्याएँ, राजनीति, योआब की क्रूरता, यह सब उन वर्षों का हिस्सा है। तीस वर्ष की आयु में वह पूरे इस्राएल का राजा बना और कुल चालीस वर्ष राज्य किया।
राजा बनते ही उसने दो निर्णय लिए जिन्होंने इतिहास बदल दिया। पहला, उसने यबूसियों का किला यरूशलेम जीत लिया और उसे राजधानी बनाया, एक ऐसा नगर जो किसी गोत्र की सम्पत्ति नहीं था और इसलिए सबको जोड़ सकता था। दूसरा, वह वाचा का सन्दूक वहाँ ले आया, यानी उसने राजनीतिक केन्द्र को आराधना का केन्द्र भी बनाया। पहली कोशिश में उज्जा की मृत्यु हुई क्योंकि सन्दूक को परमेश्वर के ठहराए तरीके से नहीं, बल्कि "सुविधाजनक" तरीके से गाड़ी पर ढोया जा रहा था; दाऊद डर गया और तीन महीने रुक गया। दूसरी बार उसने व्यवस्था के अनुसार लेवियों से उठवाया, और खुद सारी शक्ति से नाचा, यहाँ तक कि उसकी पत्नी मीकल ने खिड़की से देखकर उसका तिरस्कार किया। एक राजा जो प्रजा के सामने अपनी गरिमा भूलकर परमेश्वर के आगे नाचता है, यह इस्राएल के लिए नया दृश्य था।
वह वाचा जिसने इतिहास बदल दिया
जब युद्ध थम गए और वह अपने देवदार के महल में बैठा, तो उसे बेचैनी हुई कि परमेश्वर का सन्दूक अब भी तम्बू में है। उसने नातान से कहा कि वह भवन बनाना चाहता है। उसी रात परमेश्वर ने नातान से बात की, और उत्तर में सब कुछ उलट गया: दाऊद परमेश्वर के लिए घर नहीं बनाएगा; परमेश्वर दाऊद के लिए घराना बनाएँगे। उसका पुत्र भवन बनाएगा, और उसका राज्य सदा बना रहेगा: "और तेरा घराना और तेरा राज्य मेरे साम्हने सदा अटल रहेंगे; तेरी राजगद्दी सदैव बनी रहेगी" (2 शमूएल 7:16)।
यह वाचा दाऊद के जीवन का शिखर है, और यहीं उसकी सबसे सुन्दर प्रार्थना निकलती है, जिसमें वह भीतर जाकर परमेश्वर के सामने बैठ जाता है और पूछता है कि मैं कौन हूँ और मेरा घराना क्या है कि आपने मुझे यहाँ तक पहुँचाया। ध्यान दीजिए, यह वादा उसकी योग्यता के आधार पर नहीं दिया गया। परमेश्वर ने साफ कहा कि यदि उसकी सन्तान कुटिलता करेगी तो वे उसे ताड़ना देंगे, पर अपनी करुणा उससे नहीं हटाएँगे। यह अनुग्रह की वाचा है, कर्म की नहीं। इसीलिए जब बाद में दाऊद का घराना बुरी तरह गिरा, तब भी वाचा नहीं टूटी, क्योंकि वह दाऊद की वफादारी पर नहीं, परमेश्वर की वफादारी पर टिकी थी।
वाचा दाऊद की योग्यता पर नहीं, परमेश्वर की करुणा पर खड़ी है।
छत पर की गिरावट और टूटा हुआ मन
अब वह क्षण आता है जिसकी ओर हमारा पूरा दृष्टिकोण इशारा करता रहा है। 2 शमूएल 11 इन शब्दों से शुरू होता है कि वसन्त ऋतु में, जिस समय राजा युद्ध करने निकलते हैं, दाऊद ने योआब को भेज दिया और खुद यरूशलेम में रह गया। वह गुफा में मजबूत था; अब वह छत पर आराम कर रहा है। जीवन भर उसने खतरे में परमेश्वर पर भरोसा किया था, और अब सुरक्षा में वह ढीला पड़ गया।
आगे की कहानी ठंडी क्रियाओं में लिखी है: उसने देखा, उसने पूछवाया, उसने बुलवा भेजा, उसने ले लिया। यही "ले लेना" वह चीज है जिसके खिलाफ शमूएल ने चेतावनी दी थी कि राजा तुम्हारे बेटे-बेटियाँ ले लेगा। जिस दाऊद ने शाऊल का सिंहासन छीनने से इनकार किया था, उसने अपने ही सैनिक की पत्नी ले ली। और जब गर्भ की खबर आई, तो उसने ढाँकने की कोशिश की, ऊरिय्याह को बुलाया, नशे में डालने की कोशिश की, और अन्त में उसकी मृत्यु का पत्र उसी के हाथ भेज दिया। हत्या का आदेश उस व्यक्ति ने लिखा जिसने कभी परमेश्वर के अभिषिक्त पर हाथ उठाने से इनकार किया था।
अध्याय का अन्तिम वाक्य पूरी चुप्पी को चीर देता है: "परन्तु जो काम दाऊद ने किया था वह यहोवा की दृष्टि में बुरा लगा" (2 शमूएल 11:27)। लगभग एक साल तक कोई अदालत नहीं बैठी, कोई सजा नहीं हुई। दाऊद राजकाज करता रहा। भजन 32 में वह उन महीनों का वर्णन करता है, कि चुप रहने से उसकी हड्डियाँ गल गईं और दिन भर वह कराहता रहा।
फिर नातान आया, एक कहानी लेकर, एक धनी आदमी और एक गरीब की भेड़ की कहानी। दाऊद क्रोध से भड़क उठा और अपने ही ऊपर दण्ड की घोषणा कर बैठा, और तब वह वाक्य आया जो हर उपदेशक के मुँह में जलता है: तू ही वह मनुष्य है। यहाँ दाऊद और शाऊल का अन्तर आखिरी बार साफ होता है। शाऊल पकड़े जाने पर बहाने बनाता था, दूसरों को दोष देता था, इज्जत बचाने की गुहार लगाता था। दाऊद ने कहा: "मैं ने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है।" और नातान का उत्तर तुरन्त आया कि यहोवा ने उसका पाप दूर कर दिया है (2 शमूएल 12:13)।
क्षमा मिली, पर परिणाम नहीं मिटे। बच्चा मर गया। घर में तलवार बनी रही: अम्नोन का पाप, तामार का अपमान, अबशालोम का बदला, फिर अबशालोम का विद्रोह, और राजा का नंगे पाँव, सिर ढाँके, रोते हुए किद्रोन नाले को पार करना। जिस बाप ने अपने बेटों को कभी नहीं टोका, उसे उन्हीं बेटों से खोना पड़ा। पाप की क्षमा और पाप के परिणाम, ये दो अलग चीजें हैं, और दाऊद का जीवन इसे बेरहमी से स्पष्ट करता है।
पर इसी राख में से बाइबल की सबसे गहरी प्रार्थना निकली: "हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर" (भजन संहिता 51:10)। जो क्रिया यहाँ "उत्पन्न कर" के लिए है, वह वही है जो उत्पत्ति 1:1 में सृष्टि के लिए इस्तेमाल हुई। दाऊद मरम्मत नहीं माँग रहा, नई सृष्टि माँग रहा है। वह जानता है कि उसका मन ऐसा टूट चुका है कि उसे सुधारा नहीं जा सकता, केवल नया बनाया जा सकता है। और उसी भजन में वह कहता है कि परमेश्वर बलिदान से प्रसन्न नहीं होते; "टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता" (भजन संहिता 51:17)।
अन्तिम वर्ष: ठंडे हाथ और अन्तिम शब्द
बुढ़ापे में दाऊद कमजोर पड़ गया, इतना कि उसे कम्बलों से गर्मी नहीं मिलती थी। उसका बेटा अदोनिय्याह खुद को राजा घोषित करने लगा, और बत्शेबा तथा नातान के हस्तक्षेप से सुलैमान का अभिषेक हुआ। एक और गम्भीर भूल भी उसी दौर की है, जब उसने गिनती करवाई, यानी अपनी सेना की संख्या पर भरोसा करने का पाप किया, और उसके परिणाम में देश पर मरी आई। जब उसने अरौना के खलिहान पर वेदी बनाई, तो अरौना ने सब कुछ मुफ्त देना चाहा, पर दाऊद ने इनकार करते हुए कहा कि वह अपने परमेश्वर को ऐसा होमबलि नहीं चढ़ाएगा जिसमें उसका कुछ भी न लगे। वही खलिहान आगे चलकर मन्दिर की भूमि बना।
अपने अन्तिम वर्षों में दाऊद ने वह किया जो शायद उसकी सबसे परिपक्व सेवा थी: उसने वह काम तैयार किया जिसका श्रेय उसे कभी नहीं मिलने वाला था। उसने मन्दिर के लिए सोना, चाँदी, लोहा, लकड़ी और पत्थर जमा किए, याजकों और गायकों की व्यवस्था बनाई, नक्शा सुलैमान को सौंपा, और सारी प्रजा के सामने प्रार्थना की कि सब कुछ तो परमेश्वर का ही है और हमने उन्हीं के हाथ से लेकर उन्हें दिया है। एक आदमी जो अपने सपने का उद्घाटन देखे बिना उसके लिए जी-जान से जुटा रहे, वह सचमुच बदल चुका है।
उसके अन्तिम शब्दों में वह खुद को "यिशै के पुत्र" और "इस्राएल के मधुर भजन गानेवाले" के रूप में याद करता है और अपने घराने के साथ बाँधी गई सदा की वाचा को थामे रहता है। वह भरे पूरे बुढ़ापे में, सन्तोष के साथ मरा, और दाऊदपुर में गाड़ा गया। लगभग सत्तर वर्ष का जीवन: चरवाहा, भगोड़ा, राजा, पापी, क्षमा पाया हुआ आदमी, और भविष्य की एक ओर उठी हुई उंगली।
उसके जीवन का सार
अगर दाऊद के पूरे जीवन को तीन क्षणों में समेटना हो, तो पहला क्षण वह है जब बेतलेहेम में तेल उसके सिर पर उंडेला गया और वह वापस भेड़ों के पास लौट गया। यह क्षण हमें बुलाहट का असली स्वभाव सिखाता है। परमेश्वर ने उसे चुना, पर तुरन्त उसे मंच नहीं दिया। बीच के वर्षों में कोई दर्शक नहीं था, कोई तालियाँ नहीं थीं, कोई पदवी नहीं थी। जो कुछ उसमें बना, वह वहीं बना। यदि परमेश्वर आपके जीवन में कुछ करने का मन रखते हैं, तो सम्भावना यही है कि वे पहले आपको एक ऐसी जगह ले जाएँगे जहाँ आपकी परख कोई और नहीं, केवल वे करेंगे।
दूसरा निर्णायक क्षण एला की तराई है, जहाँ एक लड़का पाँच चिकने पत्थर लेकर उस मैदान में उतरा जिससे पूरी सेना भाग रही थी, और उसने अपनी ताकत का नहीं, परमेश्वर के नाम का हवाला दिया (1 शमूएल 17:45)। यह वह क्षण है जब गुप्त वफादारी सार्वजनिक हो जाती है। पर इस क्षण की असली महिमा यह है कि दाऊद पूरे इस्राएल का प्रतिनिधि बनकर लड़ा। उसकी जीत ने उन लोगों को भी विजयी बना दिया जिन्होंने एक भी वार नहीं किया। यही ढाँचा क्रूस पर पूरा हुआ, जहाँ एक और दाऊद की सन्तान अकेली उतरी और हमारी सबसे बड़ी शत्रु, मृत्यु, को हरा दिया।
तीसरा क्षण महल की छत है, और उसके बाद नातान का सामना। यह वह जगह है जहाँ नायक टूट जाता है। दाऊद ने वह किया जिसके लिए किसी भी कानून में मृत्युदण्ड था: व्यभिचार और सुनियोजित हत्या। और फिर भी बाइबल उसे परमेश्वर के मन के अनुसार मनुष्य कहती रही (प्रेरितों के काम 13:22)। इसका कारण उसका पाप नहीं, उसका लौटना है। पकड़े जाने पर उसने अपने वकील नहीं खड़े किए; उसने अपना दोष माना और अनुग्रह की भीख माँगी। पवित्रता की परख गिरने में नहीं, लौटने की दिशा में है। यही तीन क्षण, गुमनाम अभिषेक, सार्वजनिक विजय, और सार्वजनिक पतन के बाद निजी पश्चाताप, मिलकर वह मनुष्य बनाते हैं जिसके वंश में उद्धारकर्ता आया।
दाऊद से हम क्या सीखते हैं
पहला पाठ यह है कि परमेश्वर बीच के समय में काम करते हैं। हमारी संस्कृति तुरन्त परिणाम चाहती है, पर दाऊद के जीवन में अभिषेक और ताज के बीच पन्द्रह साल हैं, और वाचा तथा मसीह के बीच एक हजार साल। यदि आज आपकी प्रार्थना का उत्तर नहीं आया, यदि जिस काम के लिए आप बने हैं वह अभी शुरू नहीं हुआ, तो इसका मतलब यह नहीं कि परमेश्वर ने अपना वादा भुला दिया। गुफा भी पाठशाला है, और वहाँ जो पाठ पढ़ाए जाते हैं वे महल में नहीं पढ़ाए जा सकते।
दूसरा पाठ आराम के खतरे के बारे में है, और यह पाठ हमें डराना चाहिए। दाऊद जंगल में सुरक्षित था और महल में गिरा। जब आपके ऊपर दबाव होता है तब आप प्रार्थना करते हैं; जब सब ठीक चलता है तब आप ढीले पड़ते हैं। इसलिए अपनी आत्मिक चौकसी को केवल संकट के भरोसे मत छोड़िए। जिस दिन आपको लगे कि अब किसी जवाबदेही की जरूरत नहीं है, समझिए कि आप छत पर टहल रहे हैं।
तीसरा पाठ अनुग्रह के बारे में है, और यही सबसे बड़ी राहत है। दाऊद का जीवन हमें यह भरोसा नहीं देता कि हम गिरेंगे नहीं; वह हमें यह भरोसा देता है कि गिरने के बाद भी घर का दरवाजा बन्द नहीं होता। उसने अपने पाप को छिपाने की पूरी कोशिश की, और असफल रहा; फिर उसने उसे कबूल किया, और क्षमा पाई। पर उसने एक अधूरी बात नहीं माँगी। उसने केवल माफी नहीं, नया मन माँगा: "हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर" (भजन संहिता 51:10)। यह प्रार्थना नई वाचा की ओर इशारा करती है, जहाँ परमेश्वर पत्थर का मन निकालकर माँस का मन देने का वादा करते हैं, और जिसे यीशु मसीह ने पवित्र आत्मा के द्वारा पूरा किया। दाऊद ने जो माँगा, वह मसीह में हमें दिया गया है।
दर्पण
अब जरा रुकिए और अपने आप से पूछिए कि आप इस कहानी में कहाँ खड़े हैं।
शायद आप भेड़शाला में हैं। आपका काम कोई नहीं देखता। दफ्तर में आपसे कम योग्य लोग आगे बढ़ गए, घर में आपकी सेवा को कोई गिनता नहीं, आपने कलीसिया में सालों से चुपचाप कुर्सियाँ लगाई हैं और किसी ने धन्यवाद तक नहीं कहा। दाऊद की कहानी आपसे कहती है कि जिस दोपहर उसके पिता ने उसे गिनती में नहीं रखा, उसी दोपहर परमेश्वर ने उसका नाम लिया। आपकी गुमनामी परमेश्वर के लिए अँधेरा नहीं है।
शायद आप गुफा में हैं। आर्थिक तंगी, अदालत का मुकदमा, बीमारी की रिपोर्ट, या एक रिश्ता जो टूट गया और आप अब भी उसके टुकड़े उठा रहे हैं। सिकलग की राख में बैठा वह आदमी, जिसके अपने साथी उसे पत्थर मारने की बात कर रहे थे, आपको सिखाता है कि विश्वास कभी-कभी सिर्फ इतना होता है कि आप जबरदस्ती अपने आपको परमेश्वर की याद दिलाएँ।
और शायद, ईमानदारी से, आप छत पर हैं। कोई मैसेज जो आपने डिलीट किया। कोई हिसाब जो आपने थोड़ा घुमा दिया। कोई लत जो अकेले कमरे में आपको खा रही है। कोई गुस्सा जो आप सिर्फ अपने घरवालों पर उतारते हैं क्योंकि वहाँ कोई देखता नहीं। एक साल तक दाऊद भी शान्त दिखता रहा। पर वह वाक्य उसका पीछा करता रहा कि उसका किया हुआ काम परमेश्वर की दृष्टि में बुरा लगा (2 शमूएल 11:27)।
यहाँ सुसमाचार यह नहीं है कि आप और मेहनत करें। सुसमाचार यह है कि नातान आपके पास इसलिए आया ताकि आप बच सकें। परमेश्वर आपको बेनकाब करते हैं ताकि आपको क्षमा कर सकें। आज आपके सामने दो रास्ते हैं: शाऊल का रास्ता, जहाँ आप इज्जत बचाते हैं और भीतर से सूख जाते हैं; या दाऊद का रास्ता, जहाँ आप घुटनों पर गिरकर कहते हैं कि मैंने पाप किया है, और नया मन पाते हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को दाऊद की कहानी बहुत जल्दी पसन्द आ जाती है, क्योंकि उसमें भेड़ें हैं, गोफन है, एक विशालकाय योद्धा है और एक ऐसा लड़का है जिसे कोई गम्भीरता से नहीं लेता। पर यहीं खतरा भी है: अगर हम कहानी को "छोटा लड़का बहादुर था" पर खत्म कर दें, तो बच्चा यही सीखेगा कि उसे भी बहादुर बनना है, और वह अपनी बहादुरी के भरोसे बड़ा होगा। इसके बजाय बच्चों को बताइए कि दाऊद जीता क्योंकि परमेश्वर उसके साथ थे, और दाऊद खुद इसे जानता था, इसीलिए उसने कहा कि वह सेनाओं के यहोवा के नाम से आ रहा है।
सरल भाषा में कहानी कुछ ऐसी बनती है: परमेश्वर ने एक ऐसे लड़के को राजा चुना जिसे उसके घरवाले भूल गए थे, क्योंकि परमेश्वर बाहर की सुन्दरता नहीं, दिल देखते हैं। वह लड़का भेड़ों की रखवाली करता था और गीत गाता था। बड़ा होकर वह राजा बना, पर एक दिन उसने बहुत बुरा काम किया। जब परमेश्वर ने उसे पकड़ा, तो उसने बहाने नहीं बनाए; उसने माफी माँगी और नया दिल माँगा, और परमेश्वर ने उसे माफ किया। और उसी के परिवार में, बहुत सालों बाद, यीशु का जन्म हुआ, जो हमेशा के लिए राजा हैं।
हर उम्र को अलग तरीके से समझाने की जरूरत होती है। छोटे बच्चों (तीन से छह वर्ष) के लिए भेड़ें, चरवाहा और सुरक्षा का चित्र सबसे अच्छा काम करता है। प्राथमिक कक्षा के बच्चों (सात से बारह वर्ष) के लिए गोलियत, योनातान की दोस्ती और शाऊल को न मारने का चुनाव गहरी बातचीत खोलते हैं। किशोरों (बारह वर्ष से ऊपर) के साथ ईमानदारी से बात कीजिए, बतशेबा की घटना समेत, क्योंकि वे पाखण्ड तुरन्त पहचान लेते हैं और उन्हें ऐसा नायक चाहिए जो असली हो। हमारी वेबसाइट पर इन तीनों आयु वर्गों के लिए अलग-अलग तैयार की गई व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, ताकि आप अपने घर या कक्षा के लिए सही सामग्री चुन सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दाऊद कौन था और वह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
दाऊद बेतलेहेम के यिशै का सबसे छोटा पुत्र था, पहले चरवाहा, फिर इस्राएल का दूसरा और सबसे बड़ा राजा। वह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परमेश्वर ने उसके साथ एक स्थायी वाचा बाँधी: "और तेरा घराना और तेरा राज्य मेरे साम्हने सदा अटल रहेंगे; तेरी राजगद्दी सदैव बनी रहेगी" (2 शमूएल 7:16)। इसी वाचा के कारण नया नियम यीशु को दाऊद की सन्तान कहता है। इसके अलावा दाऊद ने भजन संहिता के बहुत से गीत रचे, जिनसे कलीसिया आज तक प्रार्थना करना सीखती है।
दाऊद ने कितने वर्ष राज्य किया और वह कब राजा बना?
बाइबल के अनुसार दाऊद तीस वर्ष की आयु में राजा बना और कुल चालीस वर्ष तक राज्य किया। पहले साढ़े सात वर्ष वह केवल यहूदा गोत्र पर हेब्रोन से राज करता रहा, क्योंकि उत्तरी गोत्र शाऊल के पुत्र के पीछे चल रहे थे; उसके बाद तैंतीस वर्ष उसने पूरे इस्राएल और यहूदा पर यरूशलेम से राज किया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उसका अभिषेक इससे कई वर्ष पहले हुआ था, यानी बुलाहट और उसकी पूर्ति के बीच एक लम्बा प्रशिक्षण काल था।
दाऊद को "परमेश्वर के मन के अनुसार मनुष्य" क्यों कहा गया, जबकि उसने व्यभिचार और हत्या की?
यह गवाही उसकी निर्दोषता का प्रमाणपत्र नहीं है। प्रेरितों के काम 13:22 में पौलुस यह बात तब कहता है जब दाऊद का पूरा जीवन, उसके पाप समेत, लिखा जा चुका था। अन्तर उसके पाप में नहीं, उसकी प्रतिक्रिया में है। शाऊल पकड़े जाने पर बहाने बनाता और दोष दूसरों पर डालता था; दाऊद ने नातान के सामने बिना शर्त कहा कि उसने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है। परमेश्वर के मन के अनुसार होने का अर्थ है ऐसा हृदय जो सत्य के सामने झुकता है और हर बार परमेश्वर की ओर लौटता है।
क्या दाऊद ने भजन संहिता की सारी पुस्तक लिखी थी?
नहीं। भजन संहिता में एक सौ पचास भजन हैं, और उनमें से लगभग तिहत्तर के शीर्षकों में दाऊद का नाम जुड़ा है। बाकी भजन आसाप, कोरह के पुत्रों, सुलैमान, मूसा और अनेक अनाम रचयिताओं के हैं, और कुछ बाबुल की बन्धुआई के समय के हैं, यानी दाऊद के सैकड़ों वर्ष बाद के। फिर भी दाऊद को "इस्राएल का मधुर भजन गानेवाला" कहा गया है, और उसने आराधना और संगीत की जो व्यवस्था स्थापित की, उसका असर पूरे मन्दिर काल पर रहा।
दाऊद और गोलियत की कहानी का असली अर्थ क्या है?
इसे केवल "छोटा आदमी बड़ी मुश्किल को हरा सकता है" वाली प्रेरक कहानी बना देना पाठ को कमजोर कर देता है। दाऊद स्वयं कहता है कि लड़ाई हथियारों की नहीं, नाम की है: "मैं सेनाओं के यहोवा के नाम से तेरे पास आता हूं" (1 शमूएल 17:45)। इसके अलावा वह पूरी सेना के प्रतिनिधि के रूप में उतरा, और उसकी जीत उन सबकी जीत बन गई जो सिर्फ खड़े देख रहे थे। यही सुसमाचार का ढाँचा है, जहाँ मसीह हमारे स्थान पर लड़े और उनकी विजय हमारी हो गई।
दाऊद ने शाऊल को मारने का मौका मिलने पर भी क्यों छोड़ दिया?
दो बार, एनगदी की गुफा में और जीप के जंगल में, दाऊद के पास शाऊल को मारने का साफ मौका था, और उसके साथी इसे परमेश्वर का दिया हुआ अवसर बता रहे थे। दाऊद ने इनकार किया क्योंकि शाऊल परमेश्वर का अभिषिक्त था, और सिंहासन ऐसा उपहार है जो परमेश्वर देते हैं, ऐसी वस्तु नहीं जिसे छीना जाए। यही निर्णय उसके चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा थी: वह अपनी बुलाहट की पूर्ति को अपने हाथों में लेने से इनकार करता है और परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करता है।
क्या परमेश्वर ने बतशेबा वाले पाप के लिए दाऊद को सचमुच क्षमा किया?
हाँ। जब दाऊद ने अपना दोष माना, तो नातान ने तुरन्त कहा कि यहोवा ने उसका पाप दूर कर दिया है और वह मरेगा नहीं (2 शमूएल 12:13)। यह क्षमा पूरी और वास्तविक थी। पर बाइबल यह भी दिखाती है कि क्षमा परिणामों को हमेशा नहीं मिटाती: बालक की मृत्यु हुई, और दाऊद के परिवार में हिंसा, बलात्कार और विद्रोह का सिलसिला चला। भजन संहिता 51 उसी घटना के बाद की प्रार्थना है, और वह हमें सिखाती है कि सच्चा पश्चाताप केवल दण्ड से बचने की कोशिश नहीं, बल्कि नए हृदय की गहरी भूख है।
दाऊद को मन्दिर बनाने की अनुमति क्यों नहीं मिली?
दाऊद के मन में मन्दिर बनाने की गहरी इच्छा थी, पर परमेश्वर ने उत्तर दिया कि यह काम उसका पुत्र करेगा। 1 इतिहास में कारण बताया गया है कि दाऊद ने बहुत लहू बहाया था और बड़े युद्ध लड़े थे; मन्दिर शान्ति के व्यक्ति के हाथों बनना था, इसीलिए सुलैमान, जिसके नाम का अर्थ ही शान्ति से जुड़ा है, उसे बनाएगा। यह दण्ड नहीं था, बल्कि परमेश्वर की योजना थी। दाऊद ने इस निर्णय को स्वीकार किया और अपने अन्तिम वर्ष उस भवन के लिए सामग्री, नक्शा और व्यवस्था तैयार करने में लगा दिए।
दाऊद की वाचा का हम मसीहियों के लिए क्या अर्थ है?
दाऊद की वाचा का वचन है कि उसका सिंहासन सदा बना रहेगा (2 शमूएल 7:16)। इतिहास में यह वादा टूटता हुआ दिखा, क्योंकि बाबुल के आक्रमण के बाद दाऊद का घराना गद्दी से उतर गया। नया नियम बताता है कि वादा टूटा नहीं, बल्कि यीशु मसीह में पूरा हुआ, जिनके विषय में स्वर्गदूत ने कहा कि परमेश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन देंगे (लूका 1:32)। हमारे लिए इसका अर्थ यह है कि हमारा राजा किसी चुनाव या तख्तापलट से नहीं हटता; उसका राज्य अटल है।
यीशु को "दाऊद की सन्तान" क्यों कहा जाता है?
क्योंकि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि मसीहा दाऊद के वंश से आएगा, और मत्ती तथा लूका दोनों वंशावलियों के द्वारा दिखाते हैं कि यीशु इसी वंश से हैं। मत्ती अपनी पुस्तक इन शब्दों से शुरू करता है: "इब्राहीम की सन्तान, दाऊद की सन्तान, यीशु मसीह की वंशावली" (मत्ती 1:1)। जब लोग यीशु को इस नाम से पुकारते थे, तो वे उन्हें प्रतिज्ञा किया हुआ राजा मान रहे थे। स्वयं यीशु प्रकाशितवाक्य 22:16 में कहते हैं कि वे दाऊद के मूल भी हैं और वंश भी, यानी उससे बड़े और उसमें से आए हुए।
भजन संहिता 23 दाऊद ने कब लिखा था और उसका मुख्य सन्देश क्या है?
बाइबल यह नहीं बताती कि यह भजन किस घटना के समय लिखा गया, और अनुमान लगाना ही सम्भव है; इसकी परिपक्व शान्ति और मृत्यु की छाया वाली घाटी का उल्लेख देखकर बहुत से पाठक इसे उसके बाद के जीवन से जोड़ते हैं। मुख्य सन्देश उसकी पहली पंक्ति में है: "यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी" (भजन संहिता 23:1)। जो व्यक्ति खुद चरवाहा और फिर राजा रहा, वह स्वीकार करता है कि उसकी अपनी देखभाल किसी और के हाथ में है, और यही उसकी शान्ति का कारण है।
दाऊद की मृत्यु कैसे हुई और उसके बाद क्या हुआ?
दाऊद बुढ़ापे में कमजोर हुआ, और उसके जीते जी उसका पुत्र अदोनिय्याह खुद को राजा घोषित करने लगा। नातान और बत्शेबा के हस्तक्षेप पर दाऊद ने सुलैमान को अपना उत्तराधिकारी घोषित करवाया और उसका अभिषेक करवाया। मरने से पहले उसने सुलैमान को परमेश्वर की व्यवस्था पर चलने की आज्ञा दी और मन्दिर के लिए सारी सामग्री सौंपी। 1 इतिहास कहता है कि वह भरे पूरे बुढ़ापे में, आयु, धन और महिमा से तृप्त होकर मरा, और उसे दाऊदपुर में गाड़ा गया।
अंत में
दाऊद की कहानी हमें इसलिए नहीं दी गई कि हम उसकी नकल करें, बल्कि इसलिए कि हम उसमें अपना चेहरा पहचानें और उसके आगे देखें। वह भेड़शाला में भुला दिया गया था, और परमेश्वर ने उसका नाम लिया। वह गुफाओं में छिपा रहा, और वहीं उसका चरित्र गढ़ा गया। वह महल की छत पर सुरक्षित था, और वहीं वह गिरा। उसे क्षमा मिली, पर परिणाम भी भुगतने पड़े। और उसकी अपनी सबसे गहरी प्रार्थना, कि परमेश्वर उसके भीतर शुद्ध मन उत्पन्न करें (भजन संहिता 51:10), उसके जीवनकाल में पूरी तरह उत्तर नहीं पा सकी; उसका उत्तर एक हजार साल बाद उसी के नगर बेतलेहेम में, एक चरनी में जन्मा।
इसलिए यदि आप आज अभिषेक और सिंहासन के बीच की खाई में खड़े हैं, तो जान लीजिए कि यही वह जगह है जहाँ परमेश्वर सबसे अधिक काम करते हैं। आगे पढ़ने के लिए 1 शमूएल 16 से लेकर 1 राजा 2 तक की कहानी को एक साथ पढ़िए, और साथ में भजन संहिता 23, 32, 51 और 139 को खोलिए, ताकि आप घटनाओं के साथ-साथ उस हृदय को भी सुन सकें जिसे परमेश्वर ने चुना था। और जब आप पढ़ें, तो हर पन्ने पर उस बड़े दाऊद की खोज कीजिए जो कभी नहीं गिरा, ताकि हम गिरने के बाद भी उठ सकें।
