एलिय्याह का जीवन: आग बरसाने वाले भविष्यद्वक्ता की कहानी
परिचय
एक आदमी राजा के महल में बिना बुलाए घुसता है। न कोई सेना उसके पीछे, न कोई पद, न कोई सिफ़ारिश। उसके पास बस एक वाक्य है, और उस वाक्य से इस्राएल का आकाश तीन साल के लिए बन्द हो जाता है। यही एलिय्याह का पहला दृश्य है, और यही उसकी छवि बन गई: वह भविष्यद्वक्ता जिसने कार्मेल पर आग बरसाई, जो अग्निमय रथ में स्वर्ग गया, जिसका नाम सुनते ही हमें शक्ति, तेज और तूफ़ान याद आते हैं।
लेकिन उसी आदमी को कुछ ही अध्यायों बाद हम एक झाड़ी के नीचे लेटा पाते हैं, यह कहते हुए कि अब मुझे मरना ही अच्छा है। वही मुँह जो राजा के सामने काँपा नहीं, अब परमेश्वर से मौत माँग रहा है।
इस पृष्ठ पर हम एलिय्याह के जीवन को क्रम से देखेंगे, उसकी ताक़त और उसकी टूटन दोनों के साथ, और यह भी समझेंगे कि यह अकेला, ऊबड़-खाबड़ आदमी परमेश्वर की उद्धार की बड़ी कहानी में मसीह की ओर कैसे इशारा करता है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
हम एलिय्याह को "महान नायक" के रूप में नहीं पढ़ेंगे, बल्कि उस दृष्टिकोण से जो पवित्र आत्मा ने याकूब 5:17 में हमें दिया है: "एलिय्याह भी तो हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था।" इस पृष्ठ का सूत्र यह है: आग कभी एलिय्याह की नहीं थी। वह आग बरसाने वाला नहीं, आग माँगने वाला था। उसकी असली सेवा सार्वजनिक चमत्कारों में नहीं, बल्कि छिपे हुए नाले, विधवा की छत, घुटनों के बीच झुके सिर और गुफा के द्वार पर हुई। जब हम इस कोण से देखते हैं, तो एलिय्याह हमारे लिए पहुँच से बाहर की मूर्ति नहीं रहता, बल्कि हमारा भाई बन जाता है, और परमेश्वर का अनुग्रह पूरे दृश्य में सबसे बड़ा हो जाता है।
बाइबल एलिय्याह के जीवन के बारे में क्या कहती है?
बाइबल एलिय्याह का परिचय बिना किसी वंशावली, बिना बचपन, बिना पृष्ठभूमि के देती है। वह अचानक कहानी में आ खड़ा होता है, जैसे किसी सूखी धरती पर बिजली गिरे। 1 राजा 17:1-6 में लिखा है: "तिशबी एलिय्याह जो गिलाद का निवासी था, उसने अहाब से कहा, 'इस्राएल का परमेश्वर यहोवा जिसके सम्मुख मैं उपस्थित रहता हूँ, उसके जीवन की सौगन्ध इन वर्षों में मेरे बिना कहे, न ओस पड़ेगी, और न मेंह बरसेगा।' तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुँचा, 'यहाँ से चलकर पूरब की ओर मुड़ जा, और करीत नाम नाले में जो यरदन के पूर्व की ओर है छिप जा। और उसी नाले का पानी पीना, और मैंने कौवों को आज्ञा दी है कि वे तुझे वहाँ खाना पहुँचाएँ।' अतः वह यहोवा का वचन मानकर चला गया, और करीत नाले में जो यरदन के पूर्व की ओर है जाकर रहने लगा। और सवेरे और साँझ को कौवे उसके पास रोटी और माँस लाते थे, और वह नाले का पानी पीता था।"
ध्यान दें कि यह घोषणा हवा में नहीं की गई थी। अहाब और ईजेबेल ने इस्राएल में बाल की उपासना फैलाई थी, और बाल को ही तूफ़ान और वर्षा का देवता माना जाता था। परमेश्वर ने ठीक उसी जगह प्रहार किया जहाँ बाल का दावा सबसे ऊँचा था: आकाश। यह न्याय भी था और करुणा भी, क्योंकि व्यवस्थाविवरण 11 में परमेश्वर ने पहले ही कहा था कि मूर्तिपूजा का फल बन्द आकाश होगा। सूखा इस्राएल को जगाने के लिए भेजा गया अलार्म था।
पर परमेश्वर का पहला हुक्म एलिय्याह के लिए यह नहीं था कि "अब जाकर लड़"; बल्कि "छिप जा"। जो मुँह राजा के सामने गरजा, उसी को अब एक सूखते नाले के किनारे बैठकर कौवों के लाए टुकड़ों पर जीना था। परमेश्वर अपने सेवक को पहले छिपाते हैं, फिर प्रकट करते हैं। अशुद्ध माने जाने वाले पक्षी उसके रसोइए बने, और जब नाला सूख गया, तो परमेश्वर ने उसे सारपत भेजा, इस्राएल के बाहर, ईजेबेल के ही इलाके में, एक कंगाल विधवा के घर। वहाँ आटे का घड़ा और तेल की कुप्पी दिन-ब-दिन खाली होने से इनकार करते रहे, और जब उस विधवा का बेटा मर गया, तो एलिय्याह ने उसे अपनी गोद में उठाकर परमेश्वर से जीवन के लिए विनती की, और लड़का जी उठा। पूरी बाइबल में यह पहला पुनरुत्थान है।
तीसरे वर्ष एलिय्याह लौटा और कार्मेल पर्वत पर उसने बाल के चार सौ पचास नबियों को चुनौती दी। दो वेदियाँ, दो बलिदान, और एक सवाल: जो परमेश्वर आग से उत्तर दे, वही परमेश्वर है। बाल के नबी सुबह से साँझ तक चिल्लाए, नाचे, अपने शरीर चीरे, और आकाश चुप रहा। फिर 1 राजा 18:36-39 का दृश्य आता है: "साँझ के अन्नबलि के समय एलिय्याह भविष्यद्वक्ता ने निकट जाकर कहा, 'हे यहोवा, हे अब्राहम, इसहाक और इस्राएल के परमेश्वर, आज यह प्रगट कर कि इस्राएल में तू ही परमेश्वर है, और मैं तेरा दास हूँ, और मैंने ये सब काम तुझी से वचन पाकर किए हैं। हे यहोवा, मेरी सुन, मेरी सुन, कि ये लोग जान लें कि हे यहोवा, तू ही परमेश्वर है, और तू ही उनका मन लौटा लेता है।' तब यहोवा की आग आकाश से प्रगट हुई और होमबलि को लकड़ी और पत्थरों और धूलि समेत भस्म कर दिया, और गड्ढे का जल भी सुखा दिया। यह देखकर सब लोग मुँह के बल गिरकर बोल उठे, 'यहोवा ही परमेश्वर है, यहोवा ही परमेश्वर है।'"
यह प्रार्थना कितनी छोटी है, कितनी शान्त है, और कितनी बड़ी बात कहती है। एलिय्याह अपने लिए कुछ नहीं माँगता, न सम्मान, न बदला। वह चाहता है कि लोगों का मन लौट आए। और आग गिरती है, पर उसके शब्द पर नहीं, परमेश्वर की दया पर। इसके बाद वह कार्मेल की चोटी पर चढ़ा, घुटनों के बीच सिर झुकाकर बैठा, और सात बार अपने सेवक को समुद्र की ओर देखने भेजा, जब तक हथेली भर बादल न उठा। जिस आदमी ने आकाश बन्द होते देखा, उसी को उसे खोलने के लिए सात बार गिड़गिड़ाना पड़ा।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
एलिय्याह की कहानी 1 राजा 17 से 2 राजा 2 तक चलती है, पर उसका असर पूरी बाइबल में फैला है। पुराने नियम में वह मूसा की छाया में चलता दिखता है: दोनों जंगल में परमेश्वर से मिले, दोनों होरेब पर्वत पर गए, दोनों ने पानी को बाँटा, दोनों की मृत्यु का स्थान रहस्य में ढका है। एलिय्याह इस्राएल को उसी वाचा में लौटाने आया था जो मूसा के द्वारा दी गई थी, इसलिए कार्मेल पर उसने बारह पत्थरों से वेदी बनाई, इस्राएल के बारह गोत्रों की याद में, टूटी हुई जाति को उसकी असली पहचान दिखाते हुए।
पुराने नियम के अन्त में परमेश्वर एलिय्याह का नाम फिर उठाते हैं। मलाकी 4:5 कहता है: "सुनो, मैं यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहले तुम्हारे पास एलिय्याह भविष्यद्वक्ता को भेजूँगा।" इस एक पद ने सदियों तक इस्राएल को प्रतीक्षा में रखा। एलिय्याह उस "अगुवे" का चिह्न बन गया जो प्रभु के दिन से पहले मन फिराव का शब्द लेकर आएगा। जब लूका 1:17 में स्वर्गदूत ने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के बारे में कहा कि वह "एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य में" आगे-आगे चलेगा, तब यह प्रतीक्षा पूरी हुई। यीशु ने मत्ती 11:14 में साफ़ कहा कि यूहन्ना ही वह एलिय्याह है जिसे आना था। जंगल में रहने वाला, ऊँट के रोम पहनने वाला, राजा के पाप पर उँगली उठाने वाला यूहन्ना, एलिय्याह की ही धारा में खड़ा है।
नए नियम में एलिय्याह का नाम बार-बार आता है, पर हर बार वह मसीह की ओर इशारा करता है। रूपान्तरण के पहाड़ पर मूसा और एलिय्याह यीशु के साथ बात करते दिखे, व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता दोनों उस एक की ओर झुके हुए, और पिता का शब्द आया: "यह मेरा प्रिय पुत्र है, इसकी सुनो।" यीशु ने अपने पहले उपदेश में भी एलिय्याह को उठाया। लूका 4:25-26 में वे कहते हैं: "और मैं तुम से सच कहता हूँ कि एलिय्याह के दिनों में जब साढ़े तीन वर्ष तक आकाश बन्द रहा, यहाँ तक कि सारे देश में बड़ा अकाल पड़ा, तो इस्राएल में बहुत सी विधवाएँ थीं। परन्तु उनमें से किसी के पास एलिय्याह नहीं भेजा गया, केवल सैदा के सारपत में एक विधवा के पास।" यीशु यह कहकर नासरत के लोगों की धार्मिक सुरक्षा तोड़ रहे थे: परमेश्वर का अनुग्रह वंश या धर्म-चिह्न का बन्दी नहीं है, वह वहाँ जाता है जहाँ खाली हाथ फैले हों। इसी बात पर लोग इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने यीशु को पहाड़ से गिराना चाहा।
और यहीं वह रेखा दिखती है जो एलिय्याह से मसीह तक जाती है। एलिय्याह ने आग माँगी जो बलिदान पर गिरी, और भीड़ ने कहा, यहोवा ही परमेश्वर है। कलवरी पर परमेश्वर के न्याय की आग स्वयं परमेश्वर के पुत्र पर गिरी, और जो उस पर विश्वास करते हैं वे बच जाते हैं। एलिय्याह ने विधवा के बेटे को गोद में उठाकर जीवन माँगा; यीशु ने अपनी देह में मृत्यु उठाकर हमें जीवन दिया। एलिय्याह अग्निमय रथ में उठा लिया गया; यीशु अपनी ही सामर्थ्य से स्वर्ग पर चढ़े और वहाँ हमारे लिए विनती करते हैं।
उसके जीवन का सार
एलिय्याह के जीवन में तीन क्षण हैं जिनसे बाक़ी सब समझ में आता है।
पहला क्षण करीत का नाला है। हम आमतौर पर कार्मेल को उसकी सेवा का शिखर मानते हैं, पर परमेश्वर ने कार्मेल से पहले करीत चुना। वहाँ कोई दर्शक नहीं था, कोई चमत्कार का ताली बजाने वाला नहीं। वहाँ एलिय्याह ने सीखा कि आकाश को बन्द करने वाला शब्द उसकी जेब में नहीं है, वह हर सुबह और हर साँझ परमेश्वर के हाथ से रोटी लेने पर निर्भर है। और जब नाला सूख गया, तो परमेश्वर ने उसे नहीं छोड़ा, बस अगली जगह भेज दिया, एक ऐसी विधवा के पास जिसके पास बस एक आख़िरी मुट्ठी आटा था। परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को दुनिया के सबसे कमज़ोर सहारे पर टिकाया, ताकि सारपत भी सीखे कि इस्राएल का परमेश्वर सचमुच जीवित है। जो आदमी बाद में आग माँगेगा, उसे पहले आटे की कमी में जीना सिखाया गया।
दूसरा क्षण कार्मेल है, पर उसे उस तरह न पढ़ें जैसे किसी जादूगर का प्रदर्शन। 1 राजा 18:36-39 में एलिय्याह के शब्द कुल तीन वाक्य हैं, और उनका केन्द्र "मैं" नहीं, "तू" है। उसने आग नहीं बरसाई, उसने प्रार्थना की और परमेश्वर ने उत्तर दिया। आग ने बलिदान, लकड़ी, पत्थर, धूल और पानी तक निगल लिया, ताकि किसी को शक न रहे कि यह कोई मानवीय चाल थी। फिर वही आदमी वर्षा के लिए सात बार प्रार्थना करता है, और अन्त में राजा के रथ के आगे-आगे यिज्रेल तक दौड़ता है, जैसे विजय का जश्न मनाता कोई सेवक।
तीसरा क्षण होरेब की गुफा है, और यह सबसे मार्मिक है। ईजेबेल की एक धमकी ने उस आदमी को तोड़ दिया जिसे आग ने नहीं तोड़ा था। वह जंगल भागा, झाड़ी के नीचे मौत माँगी, सो गया, और परमेश्वर ने उसे डाँटा नहीं; उन्होंने उसे रोटी और पानी दिया और फिर सोने दिया। फिर होरेब पर परमेश्वर ने उसे वह पाठ पढ़ाया जो हमारी सारी धारणाएँ उलट देता है। 1 राजा 19:11-13 कहता है: "उसने कहा, 'निकलकर पर्वत पर यहोवा के सम्मुख खड़ा हो।' और यहोवा पास से होकर चला, और यहोवा के सामने एक बड़ी प्रचण्ड आँधी से पहाड़ फटने और चट्टानें टूटने लगीं, तौभी यहोवा उस आँधी में न था; फिर आँधी के बाद भूमि डोलने लगी, परन्तु यहोवा उस भूकम्प में न था। फिर भूकम्प के बाद आग प्रगट हुई, परन्तु यहोवा उस आग में न था; फिर आग के बाद एक दबा हुआ धीमा शब्द सुनाई दिया। यह सुनते ही एलिय्याह ने अपना मुँह चादर से ढाँपा, और बाहर जाकर गुफा के द्वार पर खड़ा हुआ।" आग वाले भविष्यद्वक्ता को परमेश्वर ने आग में नहीं, फुसफुसाहट में मिलकर सिखाया कि उनका काम शोर से नहीं मापा जाता। और तब उसने शिकायत सुनी, "मैं अकेला रह गया हूँ," और उत्तर दिया कि इस्राएल में सात हज़ार लोग बचे हैं जिन्होंने बाल को नहीं पूजा। एलिय्याह अकेला महसूस करता था, पर वह कभी अकेला नहीं था।
इसके बाद उसका जीवन ढलान पर उतरता है, पर व्यर्थ नहीं: उसने एलीशा को बुलाया, नाबोत की दाख की बारी के अन्याय पर अहाब का सामना किया, अहज्याह के दूतों को परमेश्वर का वचन सुनाया, यहोराम को एक चिट्ठी लिखी (2 इतिहास 21:12-15), और अन्त में 2 राजा 2:11 का दृश्य आता है: "जब वे बातें करते करते चले जा रहे थे, तब देखो, एक अग्निमय रथ और अग्निमय घोड़ों ने उनको अलग अलग किया, और एलिय्याह बवंडर में होकर स्वर्ग पर चढ़ गया।"
एलिय्याह से हम क्या सीखते हैं
पहला पाठ: प्रार्थना ही उसकी असली सामर्थ्य थी। याकूब 5:17-18 इसे इतने सीधे शब्दों में कहता है कि बहाने की जगह नहीं बचती: "एलिय्याह भी तो हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था, और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की कि मेंह न बरसे, तो साढ़े तीन वर्ष तक भूमि पर मेंह नहीं बरसा। फिर उसने प्रार्थना की, तो आकाश से वर्षा हुई और भूमि फलवन्त हुई।" पवित्र आत्मा एलिय्याह की तुलना हमसे करते हैं, ताकि हम यह न सोचें कि वह किसी और मिट्टी का बना था। वह डरता था, थकता था, निराश होता था, और फिर भी घुटनों पर जाता था। इसलिए जब आपकी प्रार्थना कमज़ोर और बार-बार दोहराई हुई लगे, याद रखिए कि एलिय्याह ने भी सात बार भेजा।
दूसरा पाठ: अपनी सेवा को अपनी भावनाओं से न आँकें। जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार देखने के अगले दिन एलिय्याह मरने की इच्छा कर रहा था। यह विश्वास की कमी नहीं थी, यह थकान, भय और अकेलेपन का मिला-जुला बोझ था। और परमेश्वर ने उससे कैसा व्यवहार किया? उन्होंने उसे बर्ख़ास्त नहीं किया, शर्मिंदा नहीं किया, प्रवचन नहीं दिया। उन्होंने खाना दिया, नींद दी, अपनी उपस्थिति दी, एक सवाल पूछा, नया काम सौंपा और एक साथी दिया। परमेश्वर टूटे सेवकों को फेंकते नहीं, सँभालते हैं। जो आज मानसिक थकान या अवसाद के अन्धेरे में हैं, उनके लिए होरेब की गुफा बाइबल का सबसे कोमल कमरा है।
तीसरा पाठ: परमेश्वर का काम आपकी गिनती से बड़ा है। "मैं अकेला रह गया हूँ" एलिय्याह की सबसे बड़ी भूल थी, और यह भूल आज भी छोटी कलीसियाओं, अकेले विश्वासियों और अपने परिवार में एकमात्र मसीही व्यक्ति को घेरती है। परमेश्वर ने सात हज़ार बचे हुए लोगों का ज़िक्र किया जिन्हें एलिय्याह जानता भी नहीं था। पौलुस ने रोमियों 11 में इसी घटना को उठाकर अनुग्रह के "बचे हुए लोगों" का सिद्धान्त समझाया। आप जो नहीं देख पा रहे, परमेश्वर उसे पहले से थाम रखे हैं। आपका काम वफ़ादार रहना है, पूरा हिसाब रखना उनका काम है।
दर्पण
आप उस आदमी को अच्छी तरह जानते हैं जो कार्मेल पर खड़ा था, क्योंकि आप कभी-कभी वही होते हैं। दफ़्तर में जब सबने चुप रहना चुना और आपने सच बोल दिया, तब भीतर एक अजीब सी शक्ति महसूस हुई थी। और उसी शाम, घर पहुँचकर, जब बिजली का बिल, बच्चों की फ़ीस और माँ की दवाई एक साथ सामने आए, तो वही शक्ति काँप गई। यह विरोधाभास एलिय्याह का था, और यह आपका भी है।
तो अपने आप से एक सीधा सवाल पूछिए: आप परमेश्वर से किस चीज़ की अपेक्षा करते हैं, आग या फुसफुसाहट? हम अक्सर आग चाहते हैं, कोई नाटकीय समाधान, कोई अचानक चंगाई, कोई ऐसा दरवाज़ा जो एक ही रात में खुल जाए। और परमेश्वर बहुत बार धीमे शब्द में आते हैं, बाइबल के एक पद में, किसी भाई की एक बात में, एक अच्छी नींद में, एक थाली भोजन में। यदि आप केवल आग की तलाश में हैं, तो आप उनकी उपस्थिति को कई बार सुने बिना निकल जाएँगे।
और यदि आप आज उस झाड़ी के नीचे हैं, तो सुनिए। शायद आपका शरीर टूट चुका है, नौकरी छूट गई है, विवाह ठंडा हो गया है, या रात दो बजे आपके मन में यह वाक्य आता है कि "मैं यह और नहीं कर सकता।" परमेश्वर ने एलिय्याह से यह नहीं कहा कि तेरी सोच ग़लत है, तू शर्म कर। उन्होंने उसे छुआ और कहा, उठ और खा, क्योंकि तेरे लिए यात्रा बहुत लम्बी है। यही स्पर्श आपके लिए भी है। आप अकेले नहीं हैं, चाहे आपको ऐसा लगता हो। परमेश्वर ने सात हज़ार लोग बचाए थे जिन्हें एलिय्याह की आँखें नहीं देख सकीं, और उन्होंने आपके लिए भी वह बन्दोबस्त किया है जिसका आपको अभी पता नहीं। यीशु मसीह में आपकी पहचान आपकी सफल सेवा नहीं, उनका पूरा किया हुआ काम है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को एलिय्याह की कहानी बहुत जल्दी पकड़ में आती है, क्योंकि इसमें कौवे हैं, आग है, और आकाश में उड़ता रथ है। पर कहानी सुनाते समय एक बात का ध्यान रखिए: बच्चों को यह मत सिखाइए कि एलिय्याह "सुपरहीरो" था। उन्हें यह बताइए कि एलिय्याह एक साधारण आदमी था जो परमेश्वर से बात करता था, और परमेश्वर सचमुच सुनते हैं।
छोटे बच्चों के लिए सबसे सुन्दर प्रवेश-द्वार करीत का नाला है। उनसे पूछिए, अगर आपके पास खाना खत्म हो जाए तो कौन आपकी मदद करेगा? फिर बताइए कि परमेश्वर ने पक्षियों को भेजकर एलिय्याह को रोटी खिलाई। यह चित्र उनके दिल में बैठ जाता है कि परमेश्वर हमारी देखभाल करते हैं, और वे ऐसे तरीक़ों से करते हैं जो हमें सोचे भी नहीं थे।
थोड़े बड़े बच्चों के साथ कार्मेल की कहानी लीजिए और ज़ोर इस पर दीजिए कि केवल एक ही सच्चा परमेश्वर है, और वे प्रार्थना का उत्तर देते हैं। किशोरों के साथ आप होरेब की गुफा खोल सकते हैं, क्योंकि यही उम्र है जब निराशा, तुलना और अकेलापन सबसे तेज़ चुभते हैं। उन्हें दिखाइए कि परमेश्वर एक थके, डरे हुए भविष्यद्वक्ता को कैसे कोमलता से सँभालते हैं।
हमारी वेबसाइट पर एलिय्याह के जीवन की उम्र के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह वर्ष के नन्हे बच्चों के लिए सरल चित्र-कहानी, सात से बारह वर्ष के बच्चों के लिए घटनाओं और प्रश्नों के साथ विस्तृत पाठ, और बारह वर्ष से ऊपर के किशोरों के लिए ईमानदार बातचीत वाली सामग्री। परिवार की आराधना में इन्हें साथ पढ़ना बच्चों के लिए बहुत उपयोगी होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एलिय्याह कौन था और वह किस समय जीवित था?
एलिय्याह "तिशबी" कहलाता था और गिलाद का निवासी था, यानी यरदन के पूर्व के उस इलाके का, जो कम आबादी वाला और खुरदुरा था। वह उत्तरी राज्य इस्राएल में राजा अहाब और उसकी पत्नी ईजेबेल के दिनों में सेवा करता था, मोटे तौर पर मसीह से लगभग नौ सौ वर्ष पूर्व। यह वह समय था जब बाल की उपासना राजकीय धर्म बन चुकी थी और यहोवा के भक्तों को सताया जाता था। बाइबल एलिय्याह के माता-पिता, प्रशिक्षण या बुलाहट का ब्योरा नहीं देती; वह 1 राजा 17:1 में सीधे परमेश्वर के वचन के साथ प्रवेश करता है।
एलिय्याह ने कौन-कौन से चमत्कार किए?
उसकी सेवा में परमेश्वर ने बहुत कुछ किया: उसके वचन पर साढ़े तीन वर्ष का सूखा आया, कौवों ने उसे भोजन पहुँचाया, सारपत की विधवा का आटा और तेल कम नहीं हुआ, उसकी प्रार्थना पर एक मरा बच्चा जी उठा, कार्मेल पर आकाश से आग गिरी, वर्षा लौटी, अहज्याह के भेजे दलों पर आग आई, और अन्त में उसने अपनी चादर से यरदन को दो भाग किया। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इनमें से एक भी चमत्कार एलिय्याह की अपनी शक्ति से नहीं हुआ; हर बार वह परमेश्वर के वचन या प्रार्थना पर निर्भर था।
क्या एलिय्याह ने खुद आग बरसाई थी?
नहीं, और यह अन्तर बहुत महत्वपूर्ण है। 1 राजा 18:36-39 में एलिय्याह केवल प्रार्थना करता है, और लिखा है कि "यहोवा की आग आकाश से प्रगट हुई"। उसकी प्रार्थना में एक बार भी अपनी सामर्थ्य का दावा नहीं है; वह कहता है कि "मैंने ये सब काम तुझी से वचन पाकर किए हैं"। लोकप्रिय कल्पना में एलिय्याह आग फेंकने वाला भविष्यद्वक्ता बन गया है, पर बाइबल का चित्र इसके उलट है: वह आग माँगने वाला दास है। यही बात उसे हमारे लिए अनुकरणीय बनाती है, क्योंकि प्रार्थना हम भी कर सकते हैं।
2 राजा 2:11 का क्या अर्थ है, क्या एलिय्याह मरा ही नहीं?
2 राजा 2:11 कहता है कि "एलिय्याह बवंडर में होकर स्वर्ग पर चढ़ गया"। बाइबल के अनुसार वह सामान्य मृत्यु से नहीं गुज़रा, जैसे हनोक भी नहीं गुज़रा था (उत्पत्ति 5:24)। अग्निमय रथ और घोड़े परमेश्वर की सेना का चित्र हैं, जो दिखाते हैं कि यह अकेला आदमी असल में स्वर्ग की सुरक्षा में था। यह घटना पुनरुत्थान की आशा की एक झलक है, पर पूर्णता नहीं; मृत्यु पर अन्तिम विजय यीशु मसीह के पुनरुत्थान में आई, और उसी के कारण हमारी भी आशा है।
एलिय्याह और एलीशा में क्या अन्तर है?
एलिय्याह एलीशा का गुरु था, और एलीशा उसका उत्तराधिकारी। एलिय्याह की सेवा ज़्यादा टकराव वाली थी: राजा के सामने खड़ा होना, न्याय की घोषणा करना, बाल की उपासना पर सीधा प्रहार। एलीशा की सेवा में करुणा और रोज़मर्रा की चंगाई अधिक दिखती है: तेल का बढ़ना, कुष्ठ की सफ़ाई, ज़हरीले भोजन को ठीक करना, अकाल में लोगों की मदद। एलीशा ने एलिय्याह से "दो गुनी आत्मा" माँगी थी, जो ज्येष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार की भाषा है, यानी उसने अपने गुरु की सेवा का बोझ पूरी तरह उठाने की इच्छा जताई।
मलाकी 4:5 में जिस एलिय्याह के आने की बात है, वह कौन है?
मलाकी 4:5 कहता है, "सुनो, मैं यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहले तुम्हारे पास एलिय्याह भविष्यद्वक्ता को भेजूँगा।" नया नियम इसका उत्तर देता है: यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला "एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य में" आया (लूका 1:17), और यीशु ने मत्ती 11:14 तथा मत्ती 17:12 में स्पष्ट किया कि यूहन्ना ही वह एलिय्याह है जिसे आना था। इसका अर्थ पुनर्जन्म नहीं है, बल्कि एक ही बुलाहट है: मन फिराव का शब्द लेकर प्रभु के आगे-आगे चलना, ताकि लोग उद्धारकर्ता को ग्रहण करने के लिए तैयार हों।
एलिय्याह मरने की इच्छा तक क्यों पहुँच गया?
कार्मेल की विजय के तुरन्त बाद ईजेबेल ने उसे मार डालने की धमकी दी, और एलिय्याह भाग गया। इसके पीछे कई बातें थीं: शारीरिक थकान, नींद और भोजन की कमी, जान का डर, और सबसे गहरी बात यह अपेक्षा कि कार्मेल के बाद पूरा देश बदल जाएगा, जो नहीं हुआ। इसी निराशा में उसने कहा कि अब मेरा प्राण ले ले। परमेश्वर ने उसे धिक्कारा नहीं; उन्होंने भोजन, विश्राम, अपनी उपस्थिति, एक नई ज़िम्मेदारी और एक साथी दिया। यह उन सब के लिए सान्त्वना है जो सेवा के बाद खोखलापन महसूस करते हैं।
1 राजा 19:11-13 का "दबा हुआ धीमा शब्द" क्या सिखाता है?
यह दिखाता है कि परमेश्वर की उपस्थिति को हमारे नाटकीय पैमानों से नहीं मापा जा सकता। आँधी, भूकम्प और आग गुज़र गए, और लिखा है कि यहोवा उनमें न था; परमेश्वर उस शान्त, धीमी आवाज़ में मिले। एलिय्याह ने अपना मुँह चादर से ढाँपा, क्योंकि यही सच्ची आराधना की मुद्रा है। हमारे लिए इसका अर्थ है कि परमेश्वर सामान्य साधनों से बोलते हैं: उनका वचन, प्रार्थना, संगति, संस्कार। जो केवल असाधारण अनुभव खोजते हैं, वे बहुत बार उनकी वास्तविक आवाज़ चूक जाते हैं।
लूका 4:25-26 में यीशु ने एलिय्याह की कहानी क्यों उठाई?
नासरत के आराधनालय में यीशु ने अपने ही नगर के लोगों को याद दिलाया कि अकाल के दिनों में इस्राएल में बहुत विधवाएँ थीं, पर एलिय्याह को एक ग़ैर-यहूदी नगर सारपत की विधवा के पास भेजा गया। यीशु यह दिखा रहे थे कि परमेश्वर का अनुग्रह अधिकार से नहीं माँगा जा सकता; वह विश्वास और ज़रूरत के खाली हाथों में उतरता है, चाहे वे हाथ किसी भी जाति के हों। यह वचन सुसमाचार की उस चौड़ाई की घोषणा है जो बाद में सारे संसार तक पहुँची, और यही बात सुनकर भीड़ भड़क उठी।
याकूब 5:17-18 हमें प्रार्थना के बारे में क्या सिखाता है?
याकूब जानबूझकर कहता है कि "एलिय्याह भी तो हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था"। यानी उसकी प्रार्थना का असर उसकी विशेष श्रेणी के कारण नहीं था, बल्कि उस परमेश्वर के कारण जिससे वह प्रार्थना करता था। याकूब यह भी बताता है कि उसने "गिड़गिड़ाकर" प्रार्थना की, यानी लगन और ईमानदारी से, और परिणाम आया। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी हर इच्छा पूरी होगी, क्योंकि एलिय्याह भी परमेश्वर के प्रकट किए हुए वचन के अनुसार प्रार्थना कर रहा था। पर यह हमें साहस देता है कि साधारण विश्वासी की प्रार्थना छोटी बात नहीं है।
रूपान्तरण के पहाड़ पर एलिय्याह क्यों दिखाई दिया?
मत्ती 17 और लूका 9 में मूसा और एलिय्याह यीशु के साथ बात करते दिखते हैं। मूसा व्यवस्था का प्रतिनिधि है और एलिय्याह भविष्यद्वक्ताओं का; दोनों मिलकर पूरे पुराने नियम की गवाही देते हैं, और दोनों यीशु के "कूच", यानी उनकी मृत्यु और पुनरुत्थान की चर्चा करते हैं। इसका सन्देश साफ़ है: व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता यीशु के प्रतिद्वन्द्वी नहीं, गवाह हैं। इसीलिए पिता की आवाज़ ने कहा कि इसकी सुनो, और जब चेलों ने आँखें उठाईं तो यीशु के सिवा कोई न रहा।
क्या आज भी "एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य" मिल सकती है?
पवित्र आत्मा आज हर विश्वासी में वास करते हैं, और वे परमेश्वर के लोगों को साहस, स्पष्टता और प्रार्थना का जीवन देते हैं। पर सावधानी की भी बात है: बाइबल में "एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य" का प्रयोग यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले की विशेष बुलाहट के लिए हुआ, न कि किसी ऐसे अनुभव के लिए जिसे हम माँगकर हासिल कर सकें। हमें एलिय्याह जैसा प्रभाव नहीं, एलिय्याह जैसी निर्भरता चाहिए: परमेश्वर के वचन पर टिकना, ईमानदारी से प्रार्थना करना, और मसीह की महिमा को अपनी महिमा से ऊपर रखना।
अंत में
एलिय्याह का जीवन एक शुष्क आकाश के नीचे शुरू होता है और एक अग्निमय रथ में समाप्त होता है, पर उसके बीच में जो पड़ा है, वही हमारे लिए सबसे कीमती है: एक सूखता नाला, एक विधवा की छत, घुटनों के बीच झुका सिर, एक झाड़ी के नीचे थका शरीर, और गुफा के द्वार पर एक धीमी आवाज़। यही उसका असली जीवन-चित्र है, और यही उसे हमारा भाई बनाता है। उसकी ताक़त उसकी प्रार्थना में थी, तेज़ मिज़ाज में नहीं।
यदि आप आगे पढ़ना चाहते हैं, तो 1 राजा 17 से 19 अध्याय एक ही बैठक में धीरे-धीरे पढ़िए और हर बार जहाँ एलिय्याह प्रार्थना करता है वहाँ रुककर सोचिए कि आप उसी विषय में क्या माँगना चाहेंगे। फिर 2 राजा 2 और उसके बाद याकूब 5:16-18 पढ़िए, ताकि पुराने नियम की कहानी सीधे आपकी प्रार्थना की कोठरी में उतर आए। और अन्त में लूका 9 का रूपान्तरण पढ़िए, जहाँ एलिय्याह भी उसी की ओर देखता खड़ा है जिस पर हमारी सारी आशा टिकी है। एलिय्याह ने आग माँगी; यीशु मसीह ने वह आग अपने ऊपर ले ली, और यही सुसमाचार है।