बाइबल पुस्तक

यशायाह की पुस्तक: न्याय, सांत्वना और आनेवाले मसीह की भविष्यवाणी

परिचय

सन 701 ईसा पूर्व। यरूशलेम की दीवारों के बाहर अश्शूर की सेना पड़ाव डाले हुए है, और एक अधिकारी दीवार के नीचे खड़ा होकर इब्रानी भाषा में चिल्लाता है, ताकि हर पहरेदार, हर माँ, हर बच्चा उसे समझ सके। उसका सवाल छोटा है, मगर वह शहर की आत्मा को चीर देता है: "तू किस पर भरोसा करता है?" (यशायाह 36:4)

यह सवाल यशायाह की पुस्तक के ठीक बीच में खड़ा है, और सच कहें तो यही सवाल पूरी पुस्तक की रीढ़ है। छियासठ अध्यायों में परमेश्वर अपनी प्रजा से बार-बार यही पूछते हैं। मिस्र के रथों पर? अश्शूर की संधियों पर? काठ की मूरतों पर? या उस पवित्र परमेश्वर पर, जिन्हें यशायाह ने ऊँचे सिंहासन पर बैठे देखा था?

इस पृष्ठ पर आप यशायाह की पुस्तक को उसके इतिहास, उसकी रचना और उसके मुख्य विषयों के साथ समझेंगे, और यह भी देखेंगे कि उसका न्याय, उसकी सांत्वना और उसका आनेवाला मसीह आपके आज के जीवन से कैसे जुड़ते हैं।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

यशायाह पर लिखे गए ज़्यादातर लेख पुस्तक को दो हिस्सों में बाँटकर बता देते हैं: पहले न्याय, फिर सांत्वना। हम एक कदम और आगे जाएँगे। यहाँ हम यशायाह को एक ही सवाल के इर्द-गिर्द पढ़ेंगे: तुम्हारा भरोसा किस पर है? आहाज़ से यह सवाल पूछा गया, हिजकिय्याह से पूछा गया, बाबुल में बंधुए बने लोगों से पूछा गया, और आज आपसे पूछा जा रहा है। इस पुस्तक में न्याय वहाँ आता है जहाँ भरोसा गलत जगह रखा गया, सांत्वना वहाँ फूटती है जहाँ परमेश्वर स्वयं को भरोसे के योग्य साबित करते हैं, और मसीह वहाँ प्रकट होता है जहाँ यह दोनों मिलते हैं।

बाइबल यशायाह की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?

यशायाह अपनी पुस्तक की शुरुआत ही एक अदालत के दृश्य से करते हैं। परमेश्वर गवाही के लिए सृष्टि को बुलाते हैं: "हे स्वर्ग सुन, और हे पृथ्वी कान लगा" (यशायाह 1:2)। आरोप यह नहीं है कि यहूदा धार्मिक नहीं है; आरोप यह है कि उसकी धार्मिकता खोखली हो चुकी है। बलिदान चढ़ते हैं, पर्व मनाए जाते हैं, प्रार्थनाएँ लंबी होती हैं, और उसी समय अनाथ और विधवा की पुकार अनसुनी रह जाती है। परमेश्वर कहते हैं कि ऐसी उपासना से उनका जी भर गया है। यहीं से यशायाह की पहली बड़ी सच्चाई सामने आती है: परमेश्वर धर्म के प्रदर्शन से नहीं, हृदय के भरोसे से प्रसन्न होते हैं।

और फिर, आरोपों के ठीक बीच में, एक ऐसा वाक्य आता है जो पूरी बाइबल में अद्भुत है: "यहोवा कहता है, आओ, हम आपस में वादविवाद करें: तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, तौभी वे हिम की नाईं उजले हो जाएँगे" (यशायाह 1:18)। न्यायाधीश ही अपने कटघरे में खड़े अपराधी को क्षमा का प्रस्ताव देते हैं। यशायाह की पुस्तक कभी केवल क्रोध की पुस्तक नहीं है; उसका न्याय हमेशा किसी खुले दरवाज़े की ओर इशारा करता है।

छठे अध्याय में हम समझते हैं कि यशायाह के भीतर यह आवाज़ कहाँ से आई। मंदिर में उन्होंने प्रभु को सिंहासन पर बैठे देखा, और स्वर्गदूत पुकार रहे थे, "सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है" (यशायाह 6:3)। यशायाह की पहली प्रतिक्रिया आराधना नहीं, आतंक थी: "मैं नाश हुआ! क्योंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ" (यशायाह 6:5)। जब जलती हुई अंगार से उनके होंठ शुद्ध किए गए, तब वह आवाज़ आई जिसने उनका जीवन बदल दिया: "तब मैं ने प्रभु का यह वचन सुना, मैं किस को भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा? तब मैं ने कहा, मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज" (यशायाह 6:8)। ध्यान दीजिए, यह समर्पण किसी उत्साही जोश से नहीं, बल्कि क्षमा पाए हुए मनुष्य की कृतज्ञता से निकला। पहले अनुग्रह, फिर सेवा। यही क्रम यशायाह की पूरी पुस्तक का क्रम है।

सातवें अध्याय में यह सिद्धांत ठोस राजनीति से टकराता है। राजा आहाज़ डरा हुआ है, क्योंकि उत्तर से दो राजा उस पर चढ़ आए हैं। यशायाह उसे परमेश्वर पर भरोसा रखने को कहते हैं और चेतावनी देते हैं, "यदि तुम विश्वास न करो, तो निश्चय तुम स्थिर न रहोगे" (यशायाह 7:9)। आहाज़ भरोसे के बजाय अश्शूर से सौदा करना चुनता है। और तब, उस अविश्वासी राजा के सामने, परमेश्वर एक चिन्ह देते हैं जो सदियों तक गूँजता रहेगा: "इसलिये प्रभु आप ही तुम को एक चिन्ह देगा: सुनो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी" (यशायाह 7:14)।

इम्मानुएल का अर्थ है "परमेश्वर हमारे साथ"। यह नाम एक उत्तर है। आहाज़ को लगा कि सुरक्षा संधियों में है; परमेश्वर कहते हैं कि सुरक्षा उनकी उपस्थिति में है। मत्ती 1:22-23 में इस वचन को यीशु मसीह के जन्म पर लागू किया गया, क्योंकि उसी में परमेश्वर सचमुच, देह धारण करके, हमारे साथ आ बसे। यशायाह की पुस्तक इस तरह इतिहास की एक विशेष घड़ी में बोली गई, मगर उसका निशाना उससे बहुत आगे था।

लेखक, समय और परिस्थितियाँ

पुस्तक अपना परिचय स्वयं देती है: यह "आमोस के पुत्र यशायाह" का दर्शन है, जो उज्जिय्याह, योताम, आहाज़ और हिजकिय्याह के दिनों में यहूदा और यरूशलेम के विषय में दिया गया (यशायाह 1:1)। इसका अर्थ है कि उनकी सेवकाई लगभग 740 ईसा पूर्व से लेकर 680 ईसा पूर्व के आसपास तक, यानी करीब पचास वर्ष या उससे अधिक फैली रही। वह यरूशलेम के निवासी थे, राजदरबार तक उनकी पहुँच थी, उनकी भाषा किसी गाँव के साधारण वक्ता की नहीं बल्कि एक कुशल कवि की भाषा है। उनकी पत्नी को "भविष्यद्वक्तिन" कहा गया है, और उनके दो पुत्रों के नाम स्वयं संदेश थे: शार्यशूब, यानी "बचा हुआ लौटेगा", और महेर्शालाल्हाशबज़, यानी "लूट फुर्ती से आ रही है"।

यह वह युग था जब प्राचीन पूर्व की सबसे क्रूर शक्ति, अश्शूर, तेज़ी से फैल रही थी। 722 ईसा पूर्व में उत्तरी राज्य इस्राएल की राजधानी शोमरोन गिर गई और दस गोत्र बिखेर दिए गए। यहूदा काँप उठा। छोटे राज्यों के सामने दो ही रास्ते दिखते थे: अश्शूर के आगे झुक जाओ, या मिस्र से गठबंधन कर लो। यशायाह लगातार तीसरा रास्ता दिखाते रहे, जो किसी को व्यावहारिक नहीं लगता था: परमेश्वर पर भरोसा। उन्होंने लिखा, "तुम्हारा उद्धार लौट आने और चुपचाप रहने में है, और तुम्हारा बल शान्त रहने और भरोसा रखने में है" और तुरंत जोड़ा, "परन्तु तुम ने ऐसा नहीं किया" (यशायाह 30:15)।

फिर 701 ईसा पूर्व आया, जब सन्हेरीब ने यरूशलेम को घेर लिया। इस बार राजा हिजकिय्याह ने आहाज़ से उलट किया: वह धमकी की चिट्ठी लेकर मंदिर गया, उसे परमेश्वर के सामने फैला दिया और प्रार्थना की। और परमेश्वर ने नगर को बचाया। यशायाह 36 से 39 तक ये घटनाएँ लिखी हैं, और ये अध्याय पुस्तक के दो हिस्सों को जोड़ने वाला कब्ज़ा हैं।

लेखकत्व पर आधुनिक समय में बहुत बहस हुई है, क्योंकि अध्याय 40 से आगे का दृश्य बदल जाता है और बाबुल की बंधुआई मानो सामने खड़ी दिखती है। कुछ विद्वानों ने दूसरे और तीसरे यशायाह की कल्पना की। परंपरागत और नए नियम का साक्ष्य दूसरी दिशा में जाता है। यूहन्ना 12:38-41 में यशायाह 53 और यशायाह 6, दोनों को "यशायाह" का ही वचन कहा गया है; लूका 4 में यीशु मसीह अध्याय 61 को यशायाह की पुस्तक से पढ़ते हैं; प्रेरितों के काम 8 में कूश देश का अधिकारी अध्याय 53 को यशायाह के रूप में पढ़ रहा है। कुमरान से मिली यशायाह की पूरी पोथी भी पुस्तक को एक ही अखंड कृति के रूप में दिखाती है। भविष्यद्वक्ता का काम था आगे देखना, और परमेश्वर के लिए सौ साल आगे का हाल बताना कोई कठिन बात नहीं। परंपरा यह भी कहती है कि मनश्शे के राज में यशायाह शहीद हुए, और इब्रानियों 11:37 का "आरे से चीरे गए" कई पाठकों को उसी स्मृति की याद दिलाता है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

यशायाह अकेले खड़ी पुस्तक नहीं है। वह मूसा के व्यवस्था के वाचा-वचनों को हाथ में लेकर बोलते हैं: यदि प्रजा भरोसा और आज्ञाकारिता छोड़ेगी, तो देश से निकाली जाएगी; और यदि वह लौटेगी, तो परमेश्वर उसे इकट्ठा करेंगे। वह दाऊद से की गई प्रतिज्ञा को भी थामे रहते हैं, कि उसके सिंहासन पर एक सदा रहनेवाला राजा बैठेगा। इसी धागे से यशायाह 9:6 निकलता है: "क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; उसके काँधे पर प्रभुता होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करनेवाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।" ध्यान दीजिए कि यह प्रतिज्ञा सेना नहीं, एक बालक है। अश्शूर के रथों के जवाब में परमेश्वर एक शिशु भेजते हैं। भरोसे की परीक्षा यहीं होती है।

अध्याय 40 से पुस्तक की आवाज़ बदल जाती है: "मेरी प्रजा को शान्ति दो, तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, शान्ति दो" (यशायाह 40:1)। और इस सांत्वना की बुनियाद भावनाएँ नहीं, परमेश्वर का चरित्र है: मूरतें बनानेवाले थक जाते हैं, राष्ट्र घास की तरह सूख जाते हैं, "परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा" (यशायाह 40:8)। इसके बाद चार गीतों में एक रहस्यमय व्यक्ति उभरता है, जिसे परमेश्वर "मेरा दास" कहते हैं (यशायाह 42:1)। वह न्याय जातियों तक पहुँचाएगा, मगर चिल्लाकर नहीं; कुचले हुए नरकट को न तोड़ेगा।

और तब पुस्तक का शिखर आता है, यशायाह 53। वहाँ वह दास घायल किया जाता है: "परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; उसी की ताड़ना से हमको शान्ति मिली, और उसी के कोड़े खाने से हम चंगे हो गए" (यशायाह 53:5)। यह वही पवित्रता है जिसने अध्याय 6 में यशायाह को हिला दिया था, और यही वह अनुग्रह है जिसने उनके होंठ शुद्ध किए थे, अब एक व्यक्ति में मिल जाते हैं। पवित्रता ने जो माँगा, अनुग्रह ने वही चुकाया।

नया नियम इस सूत्र को खुलकर पकड़ता है। यशायाह भजन संहिता के बाद सबसे अधिक उद्धृत पुरानी पुस्तक है, इसलिए कलीसिया की परंपरा उसे "पाँचवाँ सुसमाचार" कहती आई है। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला अपने बारे में यशायाह 40 के शब्द बोलता है। मत्ती यीशु के जन्म पर यशायाह 7:14 उद्धृत करता है और गलील की सेवकाई पर यशायाह 9। पतरस अपनी पत्री में यशायाह 53 को खोलकर क्रूस की व्याख्या करता है। और नासरत के आराधनालय में यीशु मसीह खड़े होकर पढ़ते हैं: "प्रभु यहोवा का आत्मा मुझ पर है, क्योंकि यहोवा ने सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया और मुझे इसलिये भेजा है कि खेदित मन के लोगों को शान्ति दूँ; कि बन्दियों के लिये छुटकारे का और गिरफ्तारों के लिये कैद से छूटने का प्रचार करूँ" (यशायाह 61:1)। पोथी लपेटकर उन्होंने कहा कि यह वचन आज पूरा हुआ। सात सौ साल पुराना कागज़ उस दिन एक चेहरा बन गया। पुस्तक का अंत भी नए नियम के अंत से मिलता है: यशायाह का "नया आकाश और नई पृथ्वी" (यशायाह 65:17) प्रकाशितवाक्य 21 में फिर सुनाई देता है।

रचना और मुख्य विषय

यशायाह को समझने की सबसे सरल कुंजी उसका तीन-भागीय ढाँचा है, और ध्यान देने वाली बात यह है कि हर भाग भरोसे के उसी सवाल को एक नए मोड़ से पूछता है।

पहला भाग, अध्याय 1 से 39, न्याय का भाग है। अध्याय 1 से 12 में यहूदा और यरूशलेम पर मुकदमा चलता है, यशायाह का बुलावा आता है, और इम्मानुएल तथा शान्ति के राजकुमार की प्रतिज्ञाएँ चमकती हैं। अध्याय 13 से 23 में परमेश्वर आस-पास की जातियों से निपटते हैं, बाबुल, मोआब, दमिश्क, मिस्र, सोर; यह दिखाने के लिए कि इतिहास का न्यायाधीश केवल इस्राएल का देवता नहीं, सारी पृथ्वी का प्रभु है। अध्याय 24 से 27 दृष्टि को और चौड़ा करते हैं और सारी सृष्टि के न्याय तथा मृत्यु के निगल जाने की बात करते हैं। अध्याय 28 से 35 में "हाय" की एक श्रृंखला है, जो लगभग हर बार गलत भरोसे को निशाना बनाती है: मिस्र के घोड़े, चतुर राजनीति, झूठे भविष्यद्वक्ता, नशे में डूबे अगुवे। और फिर अध्याय 36 से 39 में कहानी रुककर इतिहास बन जाती है: सन्हेरीब का घेरा, "तू किस पर भरोसा करता है?" वाला ताना, हिजकिय्याह की प्रार्थना, और परमेश्वर का छुटकारा। यही पुस्तक का धुरी-बिंदु है। इसी हिस्से के अंत में हिजकिय्याह बाबुल के दूतों को अपना खज़ाना दिखाता है, और यशायाह भविष्य में बाबुल की बंधुआई की घोषणा करते हैं, जिससे दूसरे भाग का दरवाज़ा खुल जाता है।

दूसरा भाग, अध्याय 40 से 55, सांत्वना का भाग है। यहाँ पाठक मानो बंधुआई में बैठा है, मंदिर उजड़ चुका है, और सवाल बदल गया है: क्या परमेश्वर ने हमें छोड़ दिया? इन अध्यायों में परमेश्वर अपने सामर्थ्य का प्रमाण देते हैं, मूरतों का खोखलापन उजागर करते हैं, कुस्रू का नाम तक पहले से बता देते हैं, और उस दास को प्रकट करते हैं जो अपने लोगों के लिए दुख उठाएगा। इस भाग का अंत खुले निमंत्रण से होता है: "हे सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ" (यशायाह 55:1)।

तीसरा भाग, अध्याय 56 से 66, महिमा और नई सृष्टि का भाग है। छुटकारा पा चुके लोगों के बीच भी पाखंड, उपवास का दिखावा और अन्याय बचे रहते हैं, इसलिए यहाँ न्याय और आशा साथ-साथ चलते हैं। अभिषिक्त जन आता है (अध्याय 61), परमेश्वर स्वयं युद्ध के वस्त्र पहनते हैं (अध्याय 59 और 63), और पुस्तक नए आकाश और नई पृथ्वी पर समाप्त होती है, जहाँ हर जाति से लोग परमेश्वर की उपासना करेंगे।

पूरी पुस्तक में जो विषय बार-बार लौटते हैं, वे यही हैं: परमेश्वर की पवित्रता, जिसे यशायाह पच्चीस से अधिक बार "इस्राएल का पवित्र" कहकर पुकारते हैं; मनुष्य के घमंड का गिराया जाना; "बचे हुए लोग", यानी वह छोटा समूह जिसके द्वारा परमेश्वर अपनी योजना बनाए रखते हैं; सिय्योन, जो उजड़ती है और फिर जातियों का केंद्र बनती है; परमेश्वर का आत्मा, जो दास पर और अभिषिक्त जन पर उतरता है; और मूरतों की निस्सारता के मुकाबले जीवित परमेश्वर की सामर्थ्य।

इस पुस्तक के मुख्य पद

यशायाह 9:6 पुस्तक का पहला बड़ा शिखर है: "क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; उसके काँधे पर प्रभुता होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करनेवाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।" यह वचन अंधकार की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है; ठीक पहले गलील के उन इलाकों की बात है जिन्हें अश्शूर ने रौंद दिया था। और इस अंधकार में जो उत्तर आता है वह चौंकाने वाला है: एक बालक। उसके नाम बताते हैं कि वह साधारण राजा नहीं। "पराक्रमी परमेश्वर" और "अनन्तकाल का पिता" ऐसे शब्द हैं जिन्हें कोई इब्रानी भविष्यद्वक्ता किसी मनुष्य के लिए हल्के मन से नहीं लिखता। यही कारण है कि कलीसिया शुरू से इस वचन को यीशु मसीह में पूरा हुआ मानती आई है, जिसकी प्रभुता काँधे पर है, यानी उठाई हुई, ओढ़ी हुई, ज़िम्मेदारी की तरह।

यशायाह 40:31 बंधुआई में थके लोगों को दिया गया वचन है: "परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएँगे, वे उकाबों की समान उड़ेंगे, वे दौड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे।" इस पद को अक्सर पोस्टर की तरह पढ़ा जाता है, मगर इसका संदर्भ हार और थकान है। "बाट जोहना" का अर्थ आलस नहीं, बल्कि आशा के साथ प्रतीक्षा करना है, अपने संसाधन खत्म मानकर परमेश्वर के भरोसे टिक जाना। ध्यान दीजिए कि क्रम उतरता हुआ है: उड़ना, दौड़ना, चलना। परमेश्वर हर दिन उड़ान नहीं देते; कई दिन वे केवल चलने की शक्ति देते हैं, और वह भी अनुग्रह ही है। कई बार विश्वास का अर्थ है, केवल चलते रहना।

यशायाह 53:5 पूरी पुस्तक का हृदय है: "परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; उसी की ताड़ना से हमको शान्ति मिली, और उसी के कोड़े खाने से हम चंगे हो गए।" इस एक वाक्य में सर्वनामों का आदान-प्रदान देखिए: अपराध हमारे, घाव उसके; अधर्म हमारा, कुचला जाना उसका; ताड़ना उसकी, शान्ति हमारी। अगला पद इसे और साफ करता है: "यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया" (यशायाह 53:6)। यह दुर्घटना नहीं, परमेश्वर का निर्णय है। यही वह जगह है जहाँ अध्याय 1 का सवाल, कि लाल पाप हिम जैसे उजले कैसे होंगे, अपना उत्तर पा लेता है।

यशायाह पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

यशायाह को शुरू से आखिर तक एक साँस में पढ़ने की कोशिश कई पाठकों को अध्याय 13 के आसपास थका देती है, क्योंकि जातियों के विरुद्ध भविष्यवाणियाँ बिना नक्शे और बिना इतिहास के भारी लगती हैं। इसलिए पहली बार पढ़ने के लिए एक बेहतर रास्ता है।

पहले हफ्ते में अध्याय 1 से 12 पढ़िए, और पढ़ते समय दो चीज़ें नोट कीजिए: परमेश्वर किस बात पर आरोप लगाते हैं, और किस बात की प्रतिज्ञा करते हैं। अध्याय 6 पर रुकिए और अपने आप से पूछिए कि पवित्र परमेश्वर के सामने आपका पहला विचार क्या होता है। दूसरे हफ्ते में सीधे अध्याय 36 से 39 पढ़िए। यह कहानी है, आसान है, और इसे पढ़ने के बाद आप समझ जाएँगे कि पुस्तक किस असली संकट में लिखी गई। आहाज़ (अध्याय 7) और हिजकिय्याह (अध्याय 37) की तुलना कीजिए; दोनों डरे हुए थे, मगर एक ने संधि चुनी और दूसरे ने प्रार्थना।

तीसरे हफ्ते में अध्याय 40 से 55 पढ़िए, और चारों दास-गीतों पर ठहरिए: यशायाह 42:1-9, यशायाह 49:1-13, यशायाह 50:4-11 और यशायाह 52:13 से 53:12। अध्याय 53 को धीरे-धीरे, कम से कम तीन बार पढ़िए, एक बार यह सोचकर कि इसे बंधुआई में बैठा कोई यहूदी कैसे सुनता होगा, और एक बार यह सोचकर कि गतसमनी के बाद यीशु मसीह के शिष्यों ने इसे कैसे समझा होगा। चौथे हफ्ते में अध्याय 56 से 66 पढ़िए और साथ में लूका 4:16-21 तथा प्रकाशितवाक्य 21 खोलकर रखिए।

इसके बाद ही अध्याय 13 से 35 पर लौटिए, अच्छे संदर्भ-टिप्पणियों के साथ, ताकि जातियों के नाम बोझ न लगें। और एक आदत बनाइए: जब भी नए नियम में यशायाह का उद्धरण मिले, रुककर मूल स्थान पढ़िए। यही अभ्यास आपको इस पुस्तक का सबसे भरोसेमंद पाठक बनाएगा।

दर्पण

अब सवाल आपकी तरफ मुड़ता है, और यह वही पुराना सवाल है: आपका भरोसा किस पर है? यशायाह इस सवाल को धार्मिक ढंग से नहीं, बहुत ठोस ढंग से पूछते हैं। आहाज़ का अविश्वास प्रार्थना छोड़ने में नहीं दिखा, बल्कि एक राजनीतिक सौदे में दिखा। इसका मतलब है कि आपका असली भरोसा वहाँ दिखता है जहाँ आप घबराहट में सबसे पहले हाथ बढ़ाते हैं।

नौकरी जाने की खबर मिलती है, और आपका पहला कदम क्या होता है? हिसाब, संपर्क, चालाकी, या घुटने? बच्चे की मार्कशीट कमज़ोर आती है, और आपकी पहचान हिल जाती है, क्योंकि आपने चुपचाप अपने भरोसे की नींव उसके नंबरों पर रख दी थी। शरीर बीमार पड़ता है और आपको एहसास होता है कि आप वर्षों से अपनी सुरक्षा अपनी सेहत में देख रहे थे। पैसा जमा होता है और डर घटता नहीं, बढ़ता है, क्योंकि जो चीज़ हमें बचा नहीं सकती, उसे बचाने के लिए हम और मेहनत करने लगते हैं। और अकेलेपन में सबसे ख़तरनाक भरोसा जन्म लेता है: कि कोई इंसान आ जाए और मेरी पूरी ख़ालीपन भर दे।

यशायाह इन सब चीज़ों को बुरा नहीं कहते। वह इन्हें छोटा कहते हैं। मिस्र के घोड़े असली थे, संधियाँ असली थीं, बस वे उस बोझ को उठाने लायक नहीं थीं जो उन पर डाला गया।

और यहीं यह पुस्तक चोट पहुँचाने के बाद खोल देती है। क्योंकि इस पुस्तक का केंद्र आपका मज़बूत भरोसा नहीं, बल्कि वह दास है जिस पर आपके अधर्म का बोझ लादा गया। आपको अपने विश्वास की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं करना है; आपको उस पर भरोसा करना है जो कुचला गया ताकि आपको शान्ति मिले। थकी हुई श्रद्धा, काँपता हुआ हाँ, आधी रात की टूटी-फूटी प्रार्थना, यह सब उसी के लिए काफी है जो नरकट को नहीं तोड़ता। आज अगर आप केवल चल पा रहे हैं, उड़ नहीं पा रहे, तो यशायाह 40:31 आपको शर्मिंदा करने नहीं, थामने आया है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को यशायाह समझाने का सबसे अच्छा रास्ता उपदेश नहीं, चित्र हैं। इस पुस्तक में बच्चों के मन को पकड़ने वाले दृश्य भरे हुए हैं: एक ऊँचा सिंहासन और चमकते पंखों वाले स्वर्गदूत, एक आदमी जो डरकर कहता है "मैं तो अशुद्ध हूँ", और फिर वही आदमी हाथ उठाकर कहता है "मुझे भेज"; एक शहर जिसकी दीवार के बाहर बहुत बड़ी सेना खड़ी है और अंदर एक राजा चिट्ठी लेकर प्रार्थना करने जाता है; एक थका हुआ बच्चा और आकाश में ऊँचा उड़ता उकाब; और सबसे अंत में वह भेड़ की तरह चुप रहने वाला व्यक्ति जिसने दूसरों की सज़ा अपने ऊपर ले ली।

छोटे बच्चों से आप इतना कह सकते हैं: यशायाह परमेश्वर का एक संदेशवाहक था। परमेश्वर ने उससे कहा कि लोगों को बताओ, गलत रास्ता दुख लाता है, मगर परमेश्वर अपने लोगों को नहीं भूलते। और परमेश्वर ने यशायाह से सैकड़ों साल पहले यह भी कहलवाया कि एक बालक आएगा, जिसका नाम "परमेश्वर हमारे साथ" होगा, और वही यीशु मसीह हैं। क्रिसमस के गीतों में जो "शान्ति का राजकुमार" गाया जाता है, वह इसी पुस्तक से आया है, और यह बताने पर बच्चों की आँखें अक्सर चमक उठती हैं।

बड़े बच्चों के साथ आप अध्याय 6 और अध्याय 53 को साथ रखकर बात कर सकते हैं: परमेश्वर बहुत पवित्र हैं, और परमेश्वर बहुत प्रेमी भी हैं, और क्रूस पर ये दोनों बातें मिल जाती हैं।

Faith.network पर इस पुस्तक की उम्र के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह वर्ष के नन्हे बच्चों के लिए बहुत साधारण कहानी-रूप में, सात से बारह वर्ष के बच्चों के लिए इतिहास और नक्शे के साथ, और बारह वर्ष से ऊपर के किशोरों के लिए भरोसे, न्याय और भविष्यवाणी के सवालों पर गहरी बातचीत के रूप में। परिवार के साथ पढ़ते समय अपने बच्चे की उम्र वाली व्याख्या चुनिए और उसी अध्याय पर मिलकर बात कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यशायाह की पुस्तक किसने लिखी?

पुस्तक स्वयं कहती है कि यह आमोस के पुत्र यशायाह का दर्शन है, जो यहूदा के राजाओं उज्जिय्याह, योताम, आहाज़ और हिजकिय्याह के दिनों में दिया गया (यशायाह 1:1)। यशायाह यरूशलेम में रहते थे, उनकी पहुँच राजदरबार तक थी, और उनकी भाषा इब्रानी काव्य के सबसे सुंदर नमूनों में गिनी जाती है। नया नियम पुस्तक के पहले और बाद वाले, दोनों हिस्सों के उद्धरण "यशायाह" के नाम से देता है, जैसे यूहन्ना 12:38-41 में, जहाँ अध्याय 53 और अध्याय 6 दोनों उसी भविष्यद्वक्ता के वचन कहे गए हैं।

यशायाह की पुस्तक कब लिखी गई?

यशायाह की सेवकाई लगभग 740 ईसा पूर्व में, राजा उज्जिय्याह की मृत्यु के वर्ष में शुरू हुई और हिजकिय्याह के राज के अंत तक, यानी करीब 680 ईसा पूर्व के आसपास तक चली। इस दौरान उत्तरी राज्य इस्राएल 722 ईसा पूर्व में अश्शूर के हाथों गिरा और 701 ईसा पूर्व में सन्हेरीब ने यरूशलेम को घेरा। पुस्तक इन दशकों में दिए गए संदेशों का संग्रह है, जिसे अंतिम रूप देने में शायद यशायाह के शिष्यों का भी हाथ रहा, ठीक जैसे यिर्मयाह के साथ बारूक था।

क्या यशायाह की पुस्तक के दो या तीन लेखक थे?

आधुनिक आलोचनात्मक अध्ययन में अध्याय 40 से 55 को "दूसरा यशायाह" और 56 से 66 को "तीसरा यशायाह" कहने का चलन रहा है, क्योंकि इन हिस्सों का दृश्य बंधुआई और उसके बाद का लगता है। पारंपरिक और सुसमाचारीय पक्ष इस विभाजन को आवश्यक नहीं मानता, क्योंकि भविष्यद्वक्ता का काम ही आगे देखना था, कुमरान की पोथी पुस्तक को एक अखंड कृति दिखाती है, और नया नियम बार-बार दोनों हिस्सों को एक ही यशायाह के नाम से उद्धृत करता है।

यशायाह 7:14 में "कुँवारी" शब्द का क्या अर्थ है?

इब्रानी शब्द "अल्माह" एक ऐसी युवती के लिए है जो विवाह योग्य है और जिसका कुँवारी होना सामान्य रूप से मान लिया जाता है। ईसा से लगभग दो सौ वर्ष पहले, मसीह के जन्म से बहुत पहले, यहूदी विद्वानों ने ही इस शब्द का यूनानी अनुवाद "पार्थेनोस" किया, जिसका स्पष्ट अर्थ कुँवारी है। मत्ती 1:22-23 इसी परंपरा में इस पद को मरियम से यीशु मसीह के जन्म पर लागू करता है, और चिन्ह का मुख्य बल नाम में है: इम्मानुएल, यानी परमेश्वर हमारे साथ।

यशायाह 53 किसके बारे में है?

यहूदी व्याख्या की एक धारा इस अध्याय को दुख उठानेवाली इस्राएल जाति के रूप में पढ़ती है, मगर पाठ खुद बताता है कि यह दास "मेरी प्रजा के अपराध के कारण" मारा गया, यानी वह प्रजा से अलग कोई है। कलीसिया शुरू से इसे यीशु मसीह में पूरा हुआ मानती आई है, और इसका आधार कल्पना नहीं बल्कि नया नियम है: प्रेरितों के काम 8 में फिलिप्पुस इसी अध्याय से यीशु का सुसमाचार सुनाता है, और 1 पतरस 2:24 इसकी भाषा में क्रूस की व्याख्या करता है।

यशायाह में कितने अध्याय हैं और उसे कैसे बाँटा जाता है?

यशायाह में छियासठ अध्याय हैं, और परंपरागत रूप से इसे तीन भागों में देखा जाता है: अध्याय 1 से 39 में मुख्य रूप से न्याय और अश्शूर का संकट, अध्याय 40 से 55 में बंधुआई में दी गई सांत्वना और दास के गीत, तथा अध्याय 56 से 66 में नई सृष्टि और अंतिम महिमा। अध्याय 36 से 39 इस पुस्तक का ऐतिहासिक धुरी-बिंदु हैं, जहाँ सन्हेरीब का घेरा और हिजकिय्याह की प्रार्थना पहले भाग को दूसरे से जोड़ देते हैं।

यशायाह को "पाँचवाँ सुसमाचार" क्यों कहा जाता है?

क्योंकि यह पुरानी वाचा की पुस्तक होकर भी मसीह के बारे में इतना खुलकर बोलती है कि उसे पढ़ते हुए सुसमाचार सुनाई देने लगता है। इम्मानुएल का जन्म, शान्ति का राजकुमार, दास का दुख, कोड़ों से मिली चंगाई, बंधुओं की रिहाई, और अंत में नया आकाश और नई पृथ्वी; ये सब यहाँ हैं। नए नियम में भजन संहिता के बाद सबसे अधिक उद्धरण यशायाह से लिए गए हैं, और यीशु मसीह ने नासरत में अपनी सेवकाई की घोषणा इसी पुस्तक का पद पढ़कर की।

यशायाह 40:31 में उकाब की तरह उड़ने का क्या अर्थ है?

यह पद उन लोगों से कहा गया जो बंधुआई की थकान में डूबे थे और सोचते थे कि परमेश्वर उनका मुकद्दमा भूल गए। "यहोवा की बाट जोहना" निष्क्रिय बैठना नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य की सीमा मानकर परमेश्वर पर टिक जाना है। उकाब की उपमा दिखाती है कि नई शक्ति भीतर से नहीं, ऊपर से आती है, ठीक जैसे उकाब हवा के सहारे ऊँचा उठता है। और वचन का क्रम, उड़ना, दौड़ना, चलना, यह भी बताता है कि कुछ दिनों में परमेश्वर केवल चलते रहने की शक्ति देते हैं।

यशायाह में "बचे हुए लोग" कौन हैं?

यशायाह बार-बार एक छोटे समूह की बात करते हैं जो न्याय के बीच से बचकर निकलेगा, और उनके बड़े बेटे का नाम ही "बचा हुआ लौटेगा" था। यह विचार निराशा और आशा दोनों को साथ रखता है: पाप के परिणाम असली हैं, इसलिए बहुत कुछ ढह जाएगा, मगर परमेश्वर की प्रतिज्ञा भी असली है, इसलिए एक बीज बचा रहेगा। रोमियों 9 और 11 में पौलुस इसी विषय को उठाकर दिखाता है कि कलीसिया में यहूदी और अन्यजाति विश्वासी उसी अनुग्रह के बचे हुए लोग हैं।

"इस्राएल का पवित्र" नाम का क्या अर्थ है?

यह यशायाह का सबसे प्रिय नाम है, जो पुस्तक में पच्चीस से अधिक बार आता है, और यह दो सच्चाइयों को एक साँस में जोड़ता है। "पवित्र" कहता है कि परमेश्वर बिलकुल अलग, निष्कलंक और भयभीत करनेवाले तेज से भरे हैं, जैसा यशायाह ने अध्याय 6 में अनुभव किया। "इस्राएल का" कहता है कि यही पवित्र परमेश्वर एक साधारण, गिरी हुई, बार-बार भटकनेवाली जाति के साथ अपना नाम जोड़ लेते हैं। पवित्रता दूर करती है, वाचा पास खींचती है, और यशायाह हमें दोनों के बीच खड़ा रखते हैं।

क्या यशायाह की सारी भविष्यवाणियाँ पूरी हो चुकी हैं?

बहुत सी पूरी हो चुकी हैं। अश्शूर का हमला और यरूशलेम का बचना, शोमरोन का पतन, बाबुल की बंधुआई और कुस्रू के द्वारा लौटना, और सबसे बढ़कर मसीह का जन्म, उसकी सेवकाई और उसका दुख उठाना। मगर पुस्तक का अंतिम दृश्य, नया आकाश और नई पृथ्वी जहाँ सब जातियाँ परमेश्वर की उपासना करेंगी और आँसू नहीं होंगे, अभी हमारे आगे है। इसलिए यशायाह पढ़ना विश्वास और प्रतीक्षा, दोनों को साथ लेकर चलना है।

यशायाह और यिर्मयाह में क्या अंतर है?

दोनों यहूदा के भविष्यद्वक्ता थे, मगर उनका समय और स्वर अलग है। यशायाह अश्शूर के संकट में, यरूशलेम के बचने के दौर में बोले, और उनकी भाषा राजसी, काव्यात्मक और दर्शन से भरी है। यिर्मयाह लगभग सौ वर्ष बाद, बाबुल के हाथों यरूशलेम के गिरने की घड़ी में बोले, और उनकी पुस्तक में आँसू, अकेलापन और भीतरी संघर्ष अधिक खुलकर सामने आते हैं। यशायाह हमें ऊँचे सिंहासन के सामने खड़ा करते हैं; यिर्मयाह हमें टूटते शहर के मलबे में बैठाते हैं।

यशायाह की पुस्तक पहली बार पढ़ने के लिए कहाँ से शुरू करें?

अध्याय 6 से शुरू कीजिए, ताकि आप समझें कि यह भविष्यद्वक्ता किस दर्शन के बाद बोल रहा है। फिर अध्याय 36 से 39 पढ़िए, जो कहानी के रूप में है और पुस्तक का असली संकट खोल देता है। इसके बाद अध्याय 40, फिर अध्याय 52:13 से 53:12, और उसके बाद अध्याय 61 पढ़कर लूका 4:16-21 खोलिए। इतना पढ़ने के बाद अध्याय 1 से क्रम से शुरू करना बहुत आसान लगेगा, क्योंकि तब आपके हाथ में पुस्तक का नक्शा आ चुका होगा।

अंत में

यशायाह की पुस्तक हमें एक ही सवाल के साथ छोड़ती है, और वह सवाल दीवार के नीचे खड़े उस अश्शूरी अधिकारी से नहीं, परमेश्वर के हृदय से आता है: तुम्हारा भरोसा किस पर है? आहाज़ ने संधि चुनी और डूबा। हिजकिय्याह ने प्रार्थना चुनी और बचा। बंधुए लोग मूरतों के बीच बैठे थे और उन्हें बताया गया कि घास सूख जाती है, पर परमेश्वर का वचन अटल रहता है। और सबके अंत में वह दास सामने आता है, जिसने न रथों पर भरोसा किया और न अपनी सुरक्षा पर, बल्कि हमारे अपराधों का बोझ उठाकर हमें वह शान्ति दी जिसे हम कमा नहीं सकते थे।

इसलिए यशायाह पढ़ना केवल भविष्यवाणियों की जाँच नहीं है; यह अपने भरोसे की जाँच है। इस सप्ताह अध्याय 6, अध्याय 40 और अध्याय 53 को साथ रखकर पढ़िए, और हर पाठ के बाद एक ही प्रार्थना कीजिए: प्रभु, मेरी सुरक्षा जहाँ भी झूठी है, उसे हटा दीजिए, और मुझे उस पर टिकना सिखाइए जो घायल किया गया ताकि मैं चंगा हो जाऊँ। जो इस प्रार्थना के साथ यशायाह में उतरता है, वह वहाँ से खाली हाथ नहीं लौटता।

यह पृष्ठ साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter
दैनिक वचन

हर सुबह आपके इनबॉक्स में एक बाइबल अंश और मनन

हर सुबह आपको एक बाइबल अंश और एक छोटा मनन मिलेगा, जिससे आप अपना दिन आरंभ कर सकें। पहले से ही 3.487 लोग साथ पढ़ रहे हैं।

आपको पहले एक पुष्टिकरण ईमेल मिलेगा। आप कभी भी एक क्लिक से सदस्यता समाप्त कर सकते हैं।

5.430
साथ मिलकर खोले गए बाइबल अंश
इस सप्ताह पहले से ही 435 नए अध्ययन

अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर निर्गमन 25:10

फिर बबूल की लकड़ी का एक सन्दूक बनाना" (निर्गमन 25:10)। सोचो, परमेश्वर ने अपनी उपस्थिति के लिए जंगल में उगने…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 1 कुरिन्थियों 9:2

पौलुस के पास कोई प्रमाणपत्र नहीं था, कोई सिफारिशी चिट्ठी नहीं। उसने कहा, "तुम प्रभु में मेरी प्रेरिताई पर छाप…

प्रार्थना संपादकीय पर 1 राजाओं 21:11

पिता, कितनी बार मैंने चुप रहकर उस बात में साथ दिया जो गलत थी, सिर्फ इसलिए कि विरोध करना महंगा…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 कुरिन्थियों 7:4

पौलुस लिखता है, "अपने सारे क्लेश में मैं आनन्द से अति भरपूर रहता हूँ।" ध्यान दे, वह यह नहीं कहता…

धन्यवाद संपादकीय पर यहोशू 16:3

पिता, आपने यूसुफ की संतान की सीमा ठहराई, निचले बेथोरोन और गेजेर से होते हुए समुद्र तक। धन्यवाद कि आप…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर व्यवस्थाविवरण 32:2

मूसा अपने जीवन के अंत में खड़ा है, और वह अपने शब्दों के लिए यही चाहता है: "मेरा उपदेश मेंह…

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल अध्ययन और मनन तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडलों का उपयोग करता है। सारी सामग्री बाइबल के मूल पाठ से ही तैयार की जाती है और प्रतिदिन एक स्वतंत्र, स्वचालित गुणवत्ता जाँच द्वारा परखी जाती है: प्रत्येक भाषा साइट से यादृच्छिक नमूने पवित्रशास्त्र के प्रति निष्ठा, बाइबल के शब्दशः उद्धरण, भाषा और स्पष्टता के आधार पर आँके जाते हैं, और परिणाम बिना संपादन के प्रकाशित किए जाते हैं। फिर भी, कोई भी व्याख्या अचूक नहीं है और त्रुटियाँ हो सकती हैं। इस मंच पर कुछ भी पेशेवर सलाह नहीं है, और इसकी सामग्री से कोई अधिकार प्राप्त नहीं किया जा सकता। जो आप पढ़ें उसे सदा स्वयं बाइबल से जाँचें, और Faith.network को अपने व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन, प्रार्थना और स्थानीय कलीसिया के जीवन के पूरक के रूप में उपयोग करें, कभी भी उनके स्थान पर नहीं। हमारी पूर्ण अस्वीकरण सूचना और उपयोग की शर्तें लागू होती हैं। हमारी दैनिक गुणवत्ता जाँच देखें

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव