चिंता और डर से छुटकारा: बाइबल से शांति पाने का मार्ग
परिचय
रात के दो बजे हैं। घर में सब सो रहे हैं, पंखा घूम रहा है, और आपकी आँखें छत पर टिकी हैं। दिमाग में एक ही बात घूम रही है, कल का बिल, बेटी का रिजल्ट, ऑफिस में बॉस की वह ठंडी नज़र, या वह रिपोर्ट जो डॉक्टर ने अभी तक नहीं दी। आप जानते हैं कि इस समय सोचने से कुछ नहीं बदलेगा, फिर भी दिमाग रुकता नहीं। और उसके ऊपर एक और बोझ आ जाता है, एक धार्मिक बोझ: "मैं विश्वासी हूँ, मुझे तो चिंता ही नहीं करनी चाहिए थी।"
अगर आपने कभी यह रात जी है, तो यह पृष्ठ आपके लिए लिखा गया है। हम यहाँ चिंता के ऊपर उपदेश नहीं झाड़ेंगे। हम बाइबल के भीतर उतरेंगे, उत्पत्ति की पहली दहशत से लेकर प्रकाशितवाक्य के अंतिम आँसू पोंछने तक, और देखेंगे कि परमेश्वर डरे हुए लोगों से कैसे बात करते हैं। आप पाएँगे कि परमेश्वर का उत्तर आपकी परिस्थिति की व्याख्या नहीं है, बल्कि उससे कुछ बहुत बड़ा है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
बाइबल में जब भी परमेश्वर कहते हैं "मत डर", वे उसके साथ यह वादा नहीं जोड़ते कि "सब ठीक हो जाएगा"। वे कुछ और जोड़ते हैं: "क्योंकि मैं तेरे संग हूँ।" यही इस पूरे पृष्ठ का सूत्र है। चिंता का उत्तर जानकारी नहीं, उपस्थिति है; भविष्य की गारंटी नहीं, एक व्यक्ति है।
और दूसरी बात, बाइबल चिंता को सबसे पहले एक अपराध की तरह नहीं, एक बोझ की तरह देखती है। बोझ को छिपाया नहीं जाता, उठाकर किसी मज़बूत हाथ में सौंपा जाता है। इसलिए यहाँ आपको डाँट नहीं मिलेगी, एक दिशा मिलेगी: बोझ कहाँ रखना है।
बाइबल चिंता और डर के बारे में क्या कहती है?
बाइबल डर से घबराती नहीं। वह डर को इंसान की सच्चाई मानकर उससे बात करती है। पहली बार डर का ज़िक्र मनुष्य के मुँह से उत्पत्ति 3:10 में निकलता है, जब आदम कहता है, "मैं तेरा शब्द बारी में सुनकर डर गया, क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया।" ध्यान दीजिए, डर पाप के बाद आया, और डर का पहला असर था छिपना। यही आज भी होता है। चिंता हमें अकेला करती है, हमें दिखावा सिखाती है, हमें परमेश्वर से और लोगों से दूर खींचती है। इसलिए बाइबल का हर इलाज एक ही दिशा में जाता है: छिपने की जगह सामने आना।
पुराने नियम में इसका सबसे सीधा वाक्य दाऊद के मुँह से आता है। भजन संहिता 55:22 कहती है, "अपना बोझ यहोवा पर डाल दे वह तुझे सम्भालेगा; वह धर्मी को कभी टलने न देगा।" यह पद इस भजन के बीच में आता है जहाँ दाऊद अपने ही मित्र के धोखे से टूट चुका है। वह यह नहीं कहता कि बोझ हल्का है। वह यह भी नहीं कहता कि बोझ ग़लत है। वह कहता है, बोझ किसी और के कंधे पर डाल दे। हिब्रू में इस शब्द में एक तरह का "फेंकना" है, जैसे गधे की पीठ से भारी गठरी उतार कर दूसरी जगह पटक देना। और परिणाम भी देखिए: "वह तुझे सम्भालेगा।" बोझ ग़ायब नहीं होता, उठाने वाला बदल जाता है।
पुराने नियम का सबसे कोमल वचन यशायाह 41:10 है: "मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ; इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ; मैं तुझे दृढ़ करूँगा, और तेरी सहायता करूँगा, और अपने धर्ममय दहिने हाथ से तुझे सम्भाले रहूँगा।" यह उस राष्ट्र से कहा गया है जो बंधुआई की ओर बढ़ रहा था। परमेश्वर उनकी परिस्थिति बदलने का वादा तुरंत नहीं करते; वे अपनी उपस्थिति का वादा करते हैं। "इधर उधर मत ताक" का अर्थ है, हर तरफ़ नज़र दौड़ाकर सहारा ढूँढ़ना बंद कर। चिंता का आधा हिस्सा यही भागदौड़ है, कि कोई और तो होगा जो बचा लेगा।
नए नियम में यीशु मसीह इस विषय को पहाड़ी उपदेश के केंद्र में रखते हैं। मत्ती 6:34 में वे कहते हैं, "इसलिये कल के लिये चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुख बहुत है।" यह लापरवाही का बुलावा नहीं है। यीशु मानते हैं कि आज में भी दुख है और कल में भी होगा। वे केवल यह कहते हैं कि आपको एक दिन की शक्ति दी गई है, और आप उसे तीन दिनों में बाँटने की कोशिश कर रहे हैं। इसी अध्याय में वे आकाश के पक्षियों और मैदान के फूलों की ओर इशारा करते हैं, और मत्ती 6:27 में एक ऐसा प्रश्न पूछते हैं जिसका उत्तर किसी के पास नहीं: "तुम में कौन है जो चिन्ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?"
फिर यूहन्ना 14:27 में प्रभु यीशु अपनी मृत्यु से कुछ घंटे पहले कहते हैं, "मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, मैं अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ; जैसा संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता। तुम्हारा मन व्याकुल न हो और न डरे।" यह "अपनी शान्ति" वाला वाक्यांश सुनने में छोटा लगता है, पर यह पूरे विषय की चाबी है। मसीह हमें शांति का उपदेश नहीं, अपनी शांति देते हैं, वह भीतरी स्थिरता जो उन्हें क्रूस की ओर चलते हुए भी बनी रही।
पौलुस इसे प्रार्थना की भाषा में उतारते हैं। फिलिप्पियों 4:6-7 कहता है, "किसी भी बात की चिन्ता न करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल बाहर है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" यहाँ "सुरक्षित रखेगी" शब्द सैनिक की पहरेदारी का चित्र है। परमेश्वर पहले परिस्थिति पर पहरा नहीं बैठाते, हृदय और विचारों पर बैठाते हैं।
और पतरस, जो खुद डर के कारण अपने प्रभु का इनकार कर बैठा था, बुढ़ापे में सताए हुए विश्वासियों को लिखता है, 1 पतरस 5:7: "अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि वह तुम्हारी चिन्ता करता है।" वाक्य के दो हिस्सों में एक ही शब्द दो बार आया है। आपकी चिंता, और उनकी चिंता। आप जिस बात से रात भर जागते हैं, वही बात परमेश्वर के दिल में भी है, फ़र्क़ यह है कि वे जागते नहीं थकते।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
अगर आप बाइबल को शुरू से अंत तक पढ़ें, तो आप पाएँगे कि "मत डर" परमेश्वर के सबसे बार दोहराए गए वाक्यों में से एक है, और वह लगभग हमेशा किसी बहुत डरावने मोड़ पर आता है, कभी शांत मौसम में नहीं।
अब्राहम को अपनी संतानहीनता और अनजान भविष्य के बीच कहा गया, "मत डर, मैं तेरी ढाल हूँ" (उत्पत्ति 15:1)। हागार को रेगिस्तान में, जहाँ पानी ख़त्म हो चुका था, परमेश्वर का दूत मिला। मूसा फिरौन के सामने अपनी ज़बान की लड़खड़ाहट से डरता था। यहोशू को नदी पार करने से पहले परमेश्वर ने कहा, "हियाव बाँधकर दृढ़ हो जा; मत डर, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहाँ जहाँ तू जाएगा वहाँ वहाँ तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा" (यहोशू 1:9)। एलिय्याह जब जान बचाकर भागा और झाऊ के पेड़ के नीचे मरने की प्रार्थना करने लगा, तब परमेश्वर ने उसे धर्मशास्त्र का पाठ नहीं पढ़ाया; उन्होंने उसे रोटी दी, पानी दिया, और सोने दिया, और फिर धीमी आवाज़ में बात की। दाऊद ने भजन 56:3 में लिखा, "जिस समय मुझे डर लगेगा, उस समय मैं तुझ पर भरोसा रखूँगा।" ध्यान दें, उसने यह नहीं कहा कि भरोसा करने पर डर लगना बंद हो जाएगा; उसने डर के ठीक बीच से भरोसा किया।
डर का इलाज तर्क नहीं, संग है।
पुराने नियम में यह उपस्थिति बादल, आग, तम्बू और मंदिर के रूप में आती है। नए नियम में वह उपस्थिति देह धारण कर लेती है। यीशु मसीह का नाम इम्मानुएल है, अर्थात "परमेश्वर हमारे साथ"। और वह साथ रहना कैसा है, यह गलील की झील पर साफ़ दिखता है। तूफ़ान में शिष्य चिल्लाते हैं, "हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं, कि हम नाश होते हैं?" यीशु हवा को डाँटते हैं और फिर उनसे पूछते हैं, "तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?" (मरकुस 4:38-40)। जिस नाव में मसीह हैं, वह नाव डूब नहीं सकती, चाहे भीग जाए।
लेकिन सूत्र यहीं ख़त्म नहीं होता, और यही सबसे मार्मिक हिस्सा है। गतसमनी के बाग़ में हमारा प्रभु स्वयं उस पीड़ा से गुज़रे जिसे लूका "अत्यन्त संकट" कहता है, और उनका पसीना लोहू की बूँदों जैसा हो गया (लूका 22:44)। जो हमसे कहते हैं "तुम्हारा मन व्याकुल न हो", उन्होंने अपना मन व्याकुल होने दिया, ताकि हमारा मन शांत हो सके। इब्रानियों 2:15 कहती है कि उन्होंने उन्हें छुड़ाया "जो मृत्यु के भय के कारण जीवन भर दासत्व में फँसे थे"। यही हर डर की जड़ है, अंत का डर, खोने का डर, मिट जाने का डर। क्रूस और पुनरुत्थान ने उस जड़ पर कुल्हाड़ी चलाई।
और अंत में, जब यूहन्ना पत्मोस के द्वीप पर महिमामय मसीह को देखकर मुर्दे के समान गिर पड़ता है, तो वही हाथ उस पर रखा जाता है और वही आवाज़ आती है, "मत डर; मैं प्रथम और अन्तिम हूँ" (प्रकाशितवाक्य 1:17)। बाइबल की आख़िरी तस्वीर में परमेश्वर हमें समझाते नहीं, छूते हैं: "वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा" (प्रकाशितवाक्य 21:4)। शुरुआत में डर के कारण मनुष्य छिपा था; अंत में परमेश्वर स्वयं झुककर उसके आँसू पोंछते हैं।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: चिंता करना सीधा-सीधा पाप है, और सच्चे विश्वासी को कभी चिंता नहीं होती।
यह आधा सच है, और आधा सच अक्सर पूरे झूठ से ज़्यादा चोट करता है। हाँ, यीशु ने कहा "चिन्ता न करो", और पौलुस ने भी। परंतु वही बाइबल पौलुस के मुँह से कहती है कि उन पर "कलीसियाओं की चिन्ता" का दैनिक बोझ था (2 कुरिन्थियों 11:28), और वही बाइबल भजनों से भरी है जहाँ परमेश्वर के लोग खुलकर अपना डर उगलते हैं। बाइबल जिस चिंता को मना करती है, वह वह भीतरी बँटवारा है जो परमेश्वर के पिता होने पर संदेह करता है, न कि वह स्वाभाविक चिंता जो प्रेम के कारण उठती है। सही सवाल यह नहीं है, "मुझे चिंता क्यों हो रही है?" सही सवाल है, "मैं इस चिंता को कहाँ ले जा रहा हूँ?"
दूसरी भ्रांति: फिलिप्पियों 4:6-7 एक फ़ॉर्मूला है, प्रार्थना करो और चिंता मिट जाएगी।
पौलुस शांति की गारंटी नहीं देते, पहरे की गारंटी देते हैं। वे लिखते हैं कि परमेश्वर की शांति "तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी"। पहरा इसलिए बैठाया जाता है क्योंकि हमला जारी है। कई बार आप प्रार्थना करके उठेंगे और परिस्थिति वैसी ही होगी, धड़कन भी तेज़ होगी, फिर भी कुछ भीतर बदल चुका होगा: अब आप अकेले नहीं लड़ रहे। और ध्यान दीजिए, पौलुस "धन्यवाद के साथ" कहते हैं। धन्यवाद इसलिए नहीं कि समस्या अच्छी है, बल्कि इसलिए कि जिनके हाथ में आप उसे रख रहे हैं, वे भरोसेमंद हैं।
तीसरी भ्रांति: 2 तीमुथियुस 1:7 का अर्थ है कि हर डर शैतान की ओर से आता है।
पद कहता है, "क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं दी, पर सामर्थ, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है।" पौलुस यहाँ जवान तीमुथियुस को सेवकाई में पीछे हटने से रोक रहे हैं, उसकी घबराहट को दानव घोषित नहीं कर रहे। बाइबल में एक डर पवित्र भी है, वह श्रद्धा भरा भय जो नीतिवचन कहती है ज्ञान का आरंभ है। और शरीर का सहज डर परमेश्वर की दी हुई सुरक्षा-प्रणाली है; आग देखकर हाथ खींच लेना पाप नहीं। समस्या तब है जब डर हमारा मालिक बन जाए और परमेश्वर की आवाज़ से ऊँचा बोलने लगे।
चौथी भ्रांति: दवा, नींद, इलाज या काउंसलिंग लेना विश्वास की कमज़ोरी है।
बाइबल इंसान को आत्मा और देह की इकाई मानती है। भजन 127:2 कहता है, "वह अपने प्रियों को नींद ही देता है।" एलिय्याह को रोटी और नींद परमेश्वर ने ही भेजी थी। हमारा शरीर मिट्टी का है, और थकान, हार्मोन, अकेलापन और सदमा असली चीज़ें हैं। किसी डॉक्टर या परामर्शदाता की मदद लेना अविश्वास नहीं, वैसे ही जैसे टूटी हड्डी पर पट्टी बाँधना अविश्वास नहीं। अनुग्रह गोली से नहीं डरता। पर याद रखिए, दवा नींद दे सकती है, शांति केवल मसीह देते हैं।
आज इसे जीवन में उतारना
पहला क़दम है नाम देना। चिंता धुँधली रहती है तो बड़ी लगती है। कागज़ लीजिए और लिखिए कि असल में आप किस बात से डर रहे हैं। "सब ठीक नहीं है" के नीचे अक्सर कुछ बहुत ठोस छिपा होता है: "मुझे डर है कि मेरी नौकरी चली जाएगी और लोग मुझे नाकाम समझेंगे।" जब बोझ का आकार पता चल जाता है, तभी उसे उठाकर सौंपा जा सकता है, क्योंकि भजन संहिता 55:22 कहता है "अपना बोझ यहोवा पर डाल दे", और डालने के लिए पहले पकड़ में लाना पड़ता है।
दूसरा क़दम है दिन की सीमा मानना। मत्ती 6:34 आपको आज की सीमा में लौटाता है। व्यवहार में इसका मतलब है कि आप कल की समस्याओं के लिए आज नहीं तड़पेंगे, बल्कि पूछेंगे, "आज मेरे हाथ में कौन सा एक क़दम है?" फिर वही क़दम लेंगे और बाक़ी परमेश्वर के हाथ में छोड़ देंगे। योजना बनाना आज्ञाकारिता है; भविष्य को अपने कंधे पर उठाना बोझ है। दोनों में फ़र्क़ यह है कि योजना के बाद आप सो जाते हैं, और चिंता के बाद आप जागते रहते हैं।
तीसरा क़दम है प्रार्थना को ठोस बनाना। फिलिप्पियों 4:6-7 तीन शब्द इस्तेमाल करता है, निवेदन, प्रार्थना और बिनती, और सबके साथ धन्यवाद जोड़ता है। इसलिए अपनी प्रार्थना में तीन वाक्य रखिए: यह मेरा डर है, यह मैं आपसे माँगता हूँ, और यह मैं आपके बारे में जानता हूँ इसलिए धन्यवाद देता हूँ। तीसरा वाक्य ही चिंता की कमर तोड़ता है, क्योंकि वह आपकी नज़र समस्या से हटाकर परमेश्वर के चरित्र पर टिका देता है।
चौथा क़दम है वचन को ऊँची आवाज़ में बोलना। रात के दो बजे विचार तर्क नहीं सुनते, पर वे आवाज़ सुनते हैं। यशायाह 41:10 को धीरे-धीरे बोलिए, विशेष रूप से यह हिस्सा: "मैं तेरा परमेश्वर हूँ; मैं तुझे दृढ़ करूँगा।" यूहन्ना 14:27 दोहराइए और अपने मन से कहिए कि यह शांति संसार की तरह हालात पर टिकी हुई नहीं है।
पाँचवाँ क़दम है अकेलापन तोड़ना। डर का पहला असर उत्पत्ति 3 में छिपना था, और आज भी वही है। किसी एक भरोसेमंद विश्वासी को अपनी असली हालत बताइए, ऐसे शब्दों में जो आप सोशल मीडिया पर नहीं लिखेंगे। शरीर के साथ भी ईमानदार रहिए: नींद, भोजन, धूप, चलना, और स्क्रीन से दूरी। और जहाँ बोझ लंबे समय से गले तक चढ़ा हुआ हो, वहाँ पास्टर, परामर्शदाता या डॉक्टर की मदद लेना उसी अनुग्रह का हिस्सा है जिसने एलिय्याह को रोटी भेजी थी।
दर्पण
अब मैं सीधे आपसे बात करता हूँ। आपकी चिंता बेकार नहीं है, वह आपको कुछ बता रही है। वह बता रही है कि आपने कहीं अपने कंधे पर कुछ ऐसा उठा लिया है जो कभी आपका काम नहीं था। परिवार को सुरक्षित रखना, हर संबंध को बचाना, हर नतीजे को नियंत्रित करना, हर आपदा को पहले से भाँप लेना, यह ब्रह्मांड चलाने वाले का काम है, और वह पद ख़ाली नहीं है।
पूछिए अपने आप से, आप किस बात के बारे में सबसे ज़्यादा सोचते हैं जब कोई नहीं देख रहा? पैसा? शायद आप महीने के अंत की गिनती में परमेश्वर के प्रबंधकपन को भूल गए हैं और अकेले मालिक बन बैठे हैं। शरीर? शायद हर छोटी टीस आपको मौत तक ले जाती है, क्योंकि भीतर कहीं यह मान लिया गया है कि मृत्यु के बाद कोई हाथ नहीं थामने वाला। बच्चे? आप उनके हर कदम पर पहरा देते हैं क्योंकि आपको यक़ीन नहीं कि उन्हें थामने वाला कोई और भी है। अकेलापन? आप हर रिश्ते को इतनी ज़ोर से पकड़ते हैं कि वह दम घुटने लगता है, क्योंकि छूट जाने का डर प्रेम से बड़ा हो गया है।
और यह भी सुन लीजिए: चिंता कई बार ईमानदारी की जगह ले लेती है। हम चिंता करते हैं ताकि लगे कि हम कुछ कर रहे हैं, जबकि असल में हम फ़ोन उठाकर माफ़ी माँगने, हिसाब सुधारने, या मदद माँगने से बच रहे हैं। चिंता आराम की तरह लगती है, पर वह मेहनत सबसे कड़ी है, और उसकी मज़दूरी शून्य है।
आज परमेश्वर आपसे यह नहीं पूछ रहे कि आप कितने मज़बूत हैं। वे आपसे 1 पतरस 5:7 के शब्दों में एक ही चीज़ माँग रहे हैं, वह गठरी जो आपकी पीठ छील रही है। बोझ उतारने के लिए हाथ खोलने पड़ते हैं, और हाथ खोलना ही विश्वास है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चे डर के बारे में हमसे ज़्यादा ईमानदार होते हैं। वे बिना शरमाए कह देते हैं कि अंधेरे से डर लगता है, स्कूल जाने से पेट में गुड़गुड़ होती है, या यह सवाल पूछ लेते हैं कि अगर मम्मी को कुछ हो जाए तो क्या होगा। ऐसे समय में हमारी सबसे बड़ी ग़लती यह होती है कि हम कह देते हैं, "डरने की कोई बात नहीं है।" बच्चा जानता है कि बात है, और अब वह यह भी सीख लेता है कि डर के बारे में बोलना नहीं चाहिए।
इसकी जगह बच्चों को वही बताइए जो बाइबल बताती है। परमेश्वर यह नहीं कहते कि डरावनी चीज़ें नहीं होतीं; वे कहते हैं, "मैं तेरे संग हूँ।" बच्चों को यह चित्र दीजिए कि पिता की गोद में बैठा बच्चा तूफ़ान की आवाज़ सुनता है, पर वह गोद से नहीं गिरता। यीशु मसीह नाव में शिष्यों के साथ थे और उन्होंने हवा को चुप करा दिया, और वही यीशु आज भी हमारे साथ हैं। सोने से पहले उनके साथ छोटी प्रार्थना कीजिए जिसमें वे अपना डर नाम लेकर परमेश्वर को दें, और फिर एक धन्यवाद जोड़ें। यह उन्हें जीवन भर का तरीक़ा सिखा देगा।
उम्र के हिसाब से यह बातचीत बदलती है, इसलिए हमारे यहाँ इस विषय पर अलग-अलग स्तर की व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों (तीन से छह साल) के लिए बहुत सरल चित्रों और कहानियों के साथ, स्कूल जाने वाले बच्चों (सात से बारह साल) के लिए सवाल-जवाब और वचन याद करने के तरीक़ों के साथ, और किशोरों (बारह साल से ऊपर) के लिए, जहाँ परीक्षा, दोस्ती, सोशल मीडिया और पहचान के डर पर सीधी बात होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या चिंता करना पाप है?
बाइबल चिंता को हल्के में नहीं लेती, क्योंकि यीशु ने साफ़ कहा "चिन्ता न करो" (मत्ती 6:34)। परंतु वह चिंता को सबसे पहले एक बोझ की तरह देखती है जिसे परमेश्वर पर डालना है, न कि एक अपराध की तरह जिसे छिपाना है। जब चिंता परमेश्वर के पिता होने पर अविश्वास बन जाती है, तब वह पाप की दिशा में जाती है; जब वह प्रेम और ज़िम्मेदारी से उठती है, तब वह प्रार्थना की दिशा में जाती है। इसलिए अपनी चिंता के लिए स्वयं को कोसने की जगह उसे नाम देकर परमेश्वर के सामने रखिए।
बाइबल में "मत डर" कितनी बार लिखा है?
गिनती अनुवाद और वाक्यांश के अनुसार बदलती है, इसलिए कोई एक निश्चित संख्या पक्की नहीं है; बहुत सारे लोग "365 बार" कहते हैं, पर यह एक सुंदर कहावत है, गिना हुआ आँकड़ा नहीं। सच यह है कि "मत डर" और उससे मिलते-जुलते शब्द बाइबल में सौ से ज़्यादा बार आते हैं, उत्पत्ति से प्रकाशितवाक्य तक। और उससे ज़रूरी बात यह है कि यह वाक्य लगभग हमेशा एक कारण के साथ आता है, जैसे यशायाह 41:10 में, "क्योंकि मैं तेरे संग हूँ।"
फिलिप्पियों 4:6-7 का असली अर्थ क्या है?
पौलुस जेल से लिख रहे हैं, इसलिए यह किसी आराम-कुर्सी का उपदेश नहीं है। वे कहते हैं कि चिंता को भीतर घुमाने की जगह उसे प्रार्थना, निवेदन और धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सामने रखा जाए, और तब परमेश्वर की शांति "तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी"। ध्यान दीजिए, वादा यह नहीं है कि हालात बदल जाएँगे या भावनाएँ तुरंत शांत हो जाएँगी। वादा यह है कि आपके मन के दरवाज़े पर परमेश्वर की शांति पहरेदार की तरह खड़ी रहेगी, भले बाहर शोर जारी हो।
1 पतरस 5:7 में "डाल दो" का क्या मतलब है?
मूल शब्द में एक ज़ोरदार क्रिया है, कुछ फेंक देना या पटक देना, जैसे थका हुआ मज़दूर कंधे से गठरी उतारकर ज़मीन पर रख देता है। यह हल्की-फुल्की भावना नहीं, एक निर्णय है। और पतरस इसका कारण भी देता है, "क्योंकि वह तुम्हारी चिन्ता करता है", यानी आप बोझ किसी उदासीन ताक़त पर नहीं, अपने प्रेमी पिता पर डाल रहे हैं। व्यवहार में इसका मतलब है नाम लेकर, शब्दों में, प्रार्थना में उस चीज़ को परमेश्वर को सौंपना, और जब मन उसे फिर उठाए, तो फिर सौंप देना।
प्रार्थना करने के बाद भी चिंता जाती नहीं, तो क्या मेरा विश्वास कमज़ोर है?
नहीं। भजन संहिता 55:22 में दाऊद बोझ डालने की बात करता है, पर उसी भजन में वह अपने आँसू और घबराहट भी रखता है। बाइबल में शांति अक्सर एक क्षण की चमत्कारिक राहत नहीं, बल्कि बार-बार लौटने का अभ्यास है। भावनाएँ शरीर से जुड़ी हैं और वे नींद, थकान और सदमे से प्रभावित होती हैं, इसलिए मन का शांत होना कभी-कभी धीमा होता है। विश्वास का माप यह नहीं है कि आपको डर लगा या नहीं, बल्कि यह है कि डर लगने पर आप किसकी ओर मुड़े।
क्या दवा लेना या काउंसलिंग करवाना विश्वास के ख़िलाफ़ है?
नहीं। बाइबल मनुष्य को देह और आत्मा की इकाई मानती है, और परमेश्वर शरीर की ज़रूरतों को गंभीरता से लेते हैं; एलिय्याह को उसकी टूटी हालत में परमेश्वर ने पहले भोजन और नींद दी, फिर बातचीत की। भजन 127:2 कहता है, "वह अपने प्रियों को नींद ही देता है।" किसी डॉक्टर, मनोचिकित्सक या परामर्शदाता की मदद लेना अविश्वास नहीं, बुद्धिमानी है, ठीक वैसे ही जैसे टूटी हड्डी का इलाज कराना। साथ ही याद रखिए, इलाज लक्षण संभाल सकता है, पर गहरी शांति मसीह से आती है।
परमेश्वर का भय और डर में क्या अंतर है?
परमेश्वर का भय श्रद्धा है, वह गहरा आदर जो उनकी पवित्रता और महानता को पहचानकर उठता है, और नीतिवचन उसे ज्ञान का आरंभ कहती है। यह भय हमें परमेश्वर से दूर नहीं, उनके पास खींचता है। इसके विपरीत जिस डर से बाइबल छुड़ाती है, वह दंड और परित्याग का डर है, जिसके बारे में 1 यूहन्ना 4:18 कहता है, "प्रेम में भय नहीं होता, वरन सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है।" एक भय आपको बच्चा बनाता है, दूसरा दास बनाता है।
मत्ती 6:34 का मतलब है कि हम भविष्य की योजना ही न बनाएँ?
नहीं। बाइबल जगह-जगह आगे की सोच की तारीफ़ करती है, जैसे नीतिवचन में चींटी का उदाहरण, और यूसुफ़ ने अकाल के लिए सात साल की योजना बनाई थी। यीशु योजना पर रोक नहीं लगाते, वे कल का बोझ आज उठाने पर रोक लगाते हैं। योजना बनाकर आप काम अपने हाथ में लेते हैं और फिर परिणाम परमेश्वर के हाथ में छोड़ देते हैं; चिंता में आप परिणाम भी अपने हाथ में रखने की कोशिश करते हैं, और वह हाथ इतना बड़ा नहीं है।
2 तीमुथियुस 1:7 के अनुसार क्या डर परमेश्वर से नहीं आता?
पद कहता है, "क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं दी, पर सामर्थ, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है।" पौलुस यहाँ जवान तीमुथियुस से कह रहे हैं कि सेवकाई में झिझककर पीछे न हटे। इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके भीतर उठने वाली हर घबराहट शैतानी है, बल्कि यह कि आपकी पहचान डर से नहीं, पवित्र आत्मा से तय होती है। जो आत्मा आपमें बसते हैं, वे सामर्थ, प्रेम और आत्म-संयम देते हैं, इसलिए डर आपका मालिक नहीं, केवल एक आवाज़ है।
रात को नींद न आए और चिंता बढ़ जाए तो कौन से पद पढ़ूँ?
यशायाह 41:10 से शुरुआत कीजिए और उस हिस्से पर रुकिए, "मैं तुझे दृढ़ करूँगा, और तेरी सहायता करूँगा।" फिर भजन संहिता 55:22 पढ़कर सचमुच शब्दों में अपना बोझ परमेश्वर को सौंपिए, और यूहन्ना 14:27 को धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ में कहिए। भजन 4:8, भजन 23 और भजन 94:19 भी रात के लिए बने हुए लगते हैं। ज़रूरी बात यह है कि केवल पढ़िए नहीं, बोलिए, क्योंकि रात में मन तर्क से नहीं, आवाज़ से शांत होता है।
क्या यीशु मसीह ने भी डर और घबराहट का अनुभव किया?
हाँ, और यही हमारी सबसे बड़ी सांत्वना है। गतसमनी के बाग़ में लूका लिखता है कि वे "अत्यन्त संकट में व्याकुल होकर" प्रार्थना करने लगे और उनका पसीना लोहू की बूँदों जैसा हो गया (लूका 22:44)। जिन्होंने यूहन्ना 14:27 में कहा "तुम्हारा मन व्याकुल न हो", उन्होंने स्वयं अपने मन की व्याकुलता को सहा, ताकि हम शांति पाएँ। इसलिए इब्रानियों कहती है कि हमारा महायाजक हमारी दुर्बलताओं में हमारे साथ दुखी हो सकता है; वे आपकी घबराहट को दूर से नहीं देखते, भीतर से जानते हैं।
यशायाह 41:10 मूल रूप से किससे कहा गया था और यह आज मुझ पर कैसे लागू होता है?
यह वचन इस्राएल से कहा गया था, उस समय जब वे बंधुआई और राष्ट्रीय पतन की ओर बढ़ रहे थे और उन्हें लग रहा था कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया। परमेश्वर ने उन्हें तुरंत छुटकारे का नक़्शा नहीं दिया, अपनी उपस्थिति दी, "मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ।" मसीह में यह वादा और गहरा हो जाता है, क्योंकि अब परमेश्वर का संग रहना बादल या मंदिर में नहीं, यीशु मसीह और पवित्र आत्मा के द्वारा आपके भीतर है। इसलिए यह पद आज आपको हालात की गारंटी नहीं, संग की गारंटी देता है।
क्या चिंता से छुटकारे के लिए कोई सरल प्रार्थना है?
हाँ, और उसे फिलिप्पियों 4:6-7 के ढाँचे पर बनाइए। कहिए: "पिता, मेरा डर यह है", और उसे नाम दीजिए, बिना सजाए। फिर कहिए: "मैं आपसे यह माँगता हूँ", और अपनी ठोस ज़रूरत रखिए। और अंत में: "मैं आपको धन्यवाद देता हूँ क्योंकि आप मेरे संग हैं और आप मेरी चिंता करते हैं।" इसके बाद 1 पतरस 5:7 के शब्दों में हाथ खोलकर बोझ सौंप दीजिए। यह प्रार्थना जादू नहीं है, पर यह वही रास्ता है जिस पर परमेश्वर की शांति चलकर आती है।
अंत में
अगर इस पूरे पृष्ठ से आप एक ही बात लेकर जाएँ, तो वह यह हो: परमेश्वर आपके डर का उत्तर जानकारी से नहीं, अपनी उपस्थिति से देते हैं। वे यह नहीं कहते कि तूफ़ान नहीं आएगा; वे कहते हैं कि तूफ़ान में नाव ख़ाली नहीं है। और वे आपकी चिंता को शर्म की चीज़ नहीं, सौंपने की चीज़ मानते हैं, इसलिए आप उसे छिपाकर धार्मिक बने रहने के बोझ से आज़ाद हैं।
इसलिए इस हफ़्ते कुछ बड़ा करने की कोशिश न कीजिए, कुछ छोटा और सच्चा कीजिए। सात दिन के लिए यशायाह 41:10, यूहन्ना 14:27, फिलिप्पियों 4:6-7 और 1 पतरस 5:7 को रोज़ ऊँची आवाज़ में पढ़िए, और हर दिन एक बोझ नाम लेकर परमेश्वर को सौंपिए। साथ ही मत्ती के छठे अध्याय को पूरा पढ़िए और देखिए कि यीशु किस कोमलता से पक्षियों और फूलों की ओर इशारा करते हैं।
आपका बोझ आपसे बड़ा है, परमेश्वर आपके बोझ से बड़े हैं।
और जिस रात नींद फिर टूटे, याद रखिए कि जो आपको थामे हैं, वे न ऊँघते हैं और न सोते हैं।
