बाइबल पुस्तक

याकूब की पत्री: जीवित विश्वास जो कामों में दिखाई देता है

परिचय

रविवार की सभा में वह आदमी सबसे ऊँची आवाज़ में गाता है। प्रार्थना में उसकी आँखें भर आती हैं, और वचन सुनते समय वह सिर हिलाकर "आमीन" कहता है। सोमवार की सुबह वही आदमी अपने मज़दूर की मजदूरी में से कुछ रुपये काट लेता है, घर पर पत्नी से कड़वे शब्द बोलता है, और सभा में आए हुए किसी गरीब भाई को पहचानने से कतराता है। क्या उसका विश्वास जीवित है?

यही वह चुभता हुआ सवाल है जिसे लेकर यीशु मसीह का अपना भाई याकूब कलम उठाता है। पाँच छोटे अध्यायों में वह हमें आईने के सामने खड़ा कर देता है और पूछता है, तुम जो सुनते हो, क्या वह तुम्हारे हाथों तक पहुँचता है?

इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पत्री किसने, कब और किन हालात में लिखी; इसकी बनावट कैसी है; इसके मुख्य विषय और मुख्य पद क्या हैं; यह पौलुस की शिक्षा का खंडन क्यों नहीं करती; और आप इसे आज कैसे पढ़ सकते हैं ताकि यह आपको तोड़े नहीं, बल्कि गढ़े।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लोग याकूब की पत्री को "कामों वाली पत्री" कहकर एक नैतिक नियमावली की तरह पढ़ते हैं। हम इसे दूसरे कोण से पढ़ेंगे: याकूब की पत्री पहाड़ी उपदेश की गूँज है, व्यवस्था की वापसी नहीं। यह उस भाई की कलम से निकली है जो वर्षों तक यीशु के साथ एक ही घर में रहा और फिर भी विश्वास नहीं करता था, जब तक जी उठे हुए प्रभु ने उसे दर्शन नहीं दिए। उसके बाद उसने जो लिखा, वह मानो अपने बड़े भाई के शब्दों को अपनी ज़ुबान में दोहराना था। इसलिए यह पत्री अनुग्रह के विरुद्ध नहीं खड़ी; यह दिखाती है कि अनुग्रह जब किसी हृदय में उतरता है, तो वह गूँगा नहीं रहता।

अनुग्रह चुप नहीं बैठता; वह हाथ-पाँव पा लेता है।

बाइबल याकूब की पत्री के बारे में क्या कहती है?

पत्री अपना परिचय बहुत संक्षेप में देती है: "परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास याकूब की ओर से उन बारह गोत्रों को जो तित्तर बितर होकर रहते हैं नमस्कार पहुंचे" (याकूब 1:1)। जो व्यक्ति चाहता तो लिख सकता था "प्रभु का भाई", वह अपने आप को केवल "दास" कहता है। यहीं से इस पत्री का स्वर तय हो जाता है: यहाँ कोई अपने पद का रौब नहीं जमा रहा, यहाँ एक चरवाहा बिखरे हुए झुंड को पुकार रहा है।

और पहला ही विषय आराम का नहीं, आग का है: "हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो" (याकूब 1:2)। ध्यान दीजिए, याकूब यह नहीं कहता कि परीक्षा अपने आप में आनन्द की बात है। वह कहता है, "इसको समझो", यानी एक निर्णय लीजिए, एक नज़रिया अपनाइए। क्यों? क्योंकि अगली ही पंक्तियों में वह बताता है कि परीक्षा धीरज पैदा करती है और धीरज हमें "सिद्ध और सम्पूर्ण" बनाता है। परीक्षा कोई दुर्घटना नहीं, वह परमेश्वर के हाथ का औज़ार है जिससे वे अपने बच्चों के विश्वास को खरा करते हैं।

पर खरा होने की इस प्रक्रिया में हम अक्सर अंधेरे में टटोलते हैं। इसलिए तुरंत एक अद्भुत निमंत्रण आता है: "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी" (याकूब 1:5)। "बिना उलाहना दिए" इस पत्री के सबसे कोमल शब्द हैं। परमेश्वर यह नहीं कहते, "फिर आ गए? पिछली बार भी तो यही पूछा था।" वे उदारता से देते हैं। यह वही आवाज़ है जिसने कहा था, माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा।

फिर पहला अध्याय अपनी चोटी पर पहुँचता है: "परन्तु वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं" (याकूब 1:22)। याकूब के लिए सबसे बड़ा धार्मिक खतरा नास्तिकता नहीं, आत्म-धोखा है। वचन सुनकर भावुक हो जाना और फिर वैसे ही लौट जाना, जैसे कोई दर्पण में अपना चेहरा देखकर तुरंत भूल जाए कि वह कैसा था।

दूसरे अध्याय में यही सिद्धांत अपनी सबसे तीखी शक्ल लेता है: "वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है" (याकूब 2:17)। यहाँ याकूब विश्वास को कर्मों से बदल नहीं रहा; वह जीवित विश्वास और मुर्दा विश्वास में फर्क कर रहा है। जैसे साँस लेना जीवन का कारण नहीं बल्कि प्रमाण है, वैसे ही प्रेम के काम उद्धार का कारण नहीं, उसका प्रमाण हैं।

तीसरे अध्याय में वह हमारी जीभ पर हाथ रखता है: "वैसे ही जीभ भी एक छोटा सा अंग है और बड़ी बड़ी डींगें मारती है। देखो, थोड़ी सी आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है" (याकूब 3:5)। चौथे अध्याय में वह समर्पण की पुकार देता है: "इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा" (याकूब 4:7)। और अंत में वह हमें एक दूसरे के सामने खड़ा कर देता है: "इसलिये तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने अपने पापों को मान लो; और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिस से चंगे हो जाओ; धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है" (याकूब 5:16)।

परीक्षा, बुद्धि, आज्ञापालन, प्रेम के काम, जीभ, नम्रता और प्रार्थना। यही सात तार हैं जिन पर यह पूरी पत्री बजती है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

याकूब की पत्री अचानक आसमान से नहीं टपकी। इसकी जड़ें पुराने नियम की उस परंपरा में हैं जिसे हम बुद्धि-साहित्य कहते हैं। जैसे नीतिवचन छोटे-छोटे सूत्रों में जीवन को सँवारता है, वैसे ही याकूब छोटी-छोटी चोटों में हमारे रोज़मर्रा को छूता है। अय्यूब की कहानी उसके पाँचवें अध्याय में लौट आती है, जहाँ वह धीरज के उदाहरण के रूप में अय्यूब का नाम लेता है। एलिय्याह की प्रार्थना उसके लिए इस बात का सबूत है कि "हमारे ही समान दुख-सुख भोगने वाला" एक मनुष्य प्रार्थना में स्वर्ग को हिला सकता है।

पर इससे भी गहरा एक सूत्र है जो कम लोग देखते हैं: याकूब बार-बार लैव्यव्यवस्था 19 की ओर लौटता है। वहाँ लिखा है कि न्याय में पक्षपात मत करो, और याकूब दूसरे अध्याय में पक्षपात पर प्रहार करता है। वहाँ लिखा है कि मज़दूर की मजदूरी रात भर मत रोको, और याकूब पाँचवें अध्याय में उन्हीं रुकी हुई मजदूरियों की दोहाई सुनाता है: "देखो, जिन मजदूरों ने तुम्हारे खेत काटे, उन की वह मजदूरी जो तुम ने धोखा देकर रख ली है चिल्ला रही है" (याकूब 5:4)। वहाँ लिखा है कि अपने लोगों में लुतराई मत करो, और याकूब चौथे अध्याय में एक दूसरे की निन्दा करने से मना करता है। और उसी अध्याय का वह महान वचन, "तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख", याकूब 2:8 में "राज व्यवस्था" कहकर उद्धृत होता है। यह पत्री मानो लैव्यव्यवस्था 19 पर एक मसीही उपदेश है।

पर सब कुछ कहाँ जाकर पूरा होता है? मसीह में। याकूब पूरे पत्र में यीशु मसीह का नाम केवल दो बार लेता है, फिर भी हर पन्ने पर उनकी आवाज़ सुनाई देती है। परीक्षाओं में आनन्द, माँगने पर मिलना, सुनने के साथ करना, चट्टान और रेत के घर, पेड़ और उसका फल, कल की डींग न मारना, शपथ न खाना, निन्दा न करना, शान्ति कराने वालों की धन्यता; ये सब पहाड़ी उपदेश के धागे हैं जो याकूब की चादर में बुने हुए हैं। वह अपने भाई को उद्धृत नहीं करता, वह अपने भाई की तरह बोलता है, क्योंकि उसने वे शब्द सिर्फ सुने नहीं थे, वे उसके भीतर बस गए थे।

और इसीलिए वह जिस "व्यवस्था" की बात करता है वह सीनै पर्वत का बोझ नहीं, वह "स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था" है, मसीह के द्वारा पूरी की गई और पवित्र आत्मा के द्वारा हृदय पर लिखी गई। याकूब 1:18 कहता है कि परमेश्वर ने "अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया"। नया जन्म पहले होता है, काम बाद में आते हैं। क्रम कभी उलटता नहीं।

लेखक, समय और पहले पाठक

यह याकूब कौन है? नए नियम में कई याकूब हैं, पर जो सबसे अधिक संभावित है, वह है यीशु मसीह का भाई। मरकुस 6:3 में नासरत के लोग यीशु के भाइयों के नाम गिनाते हैं और उसमें याकूब पहला है। यूहन्ना 7:5 हमें एक दर्दनाक सच बताता है: "क्योंकि उसके भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे।" सोचिए, वर्षों तक एक ही आँगन में, एक ही मेज़ पर, और फिर भी विश्वास नहीं। फिर 1 कुरिन्थियों 15:7 में पौलुस जी उठे हुए मसीह के दर्शनों की सूची में लिखता है कि वे याकूब को भी दिखाई दिए। उस एक मुलाकात ने संदेह करने वाले भाई को "प्रभु का दास" बना दिया।

प्रेरितों के काम 15 में हम उसे यरूशलेम की कलीसिया के अगुवे के रूप में देखते हैं, जहाँ वह गैर-यहूदी विश्वासियों पर अनावश्यक बोझ न डालने का निर्णायक वचन बोलता है। गलातियों 2:9 में पौलुस उसे कलीसिया के "खम्भों" में गिनता है। बाद की परंपरा उसे "याकूब धर्मी" कहती है और बताती है कि प्रार्थना में घुटने टेकते-टेकते उसके घुटनों पर गट्टे पड़ गए थे; यहूदी इतिहासकार योसेफुस के अनुसार लगभग 62 ईस्वी में यरूशलेम में उसकी हत्या कर दी गई।

पत्री का समय निश्चित रूप से तय करना कठिन है, पर कई संकेत बहुत आरंभिक तिथि की ओर इशारा करते हैं, लगभग 45 से 49 ईस्वी के बीच। खतने और गैर-यहूदियों के विवाद का कोई ज़िक्र नहीं, जो 49 ईस्वी के बाद हर जगह छाया रहा। कलीसिया की बनावट बहुत सरल है, केवल "प्राचीन" और "शिक्षक"। सभा के लिए जो शब्द इस्तेमाल होता है वह यहूदी आराधनालय वाला शब्द है। यदि यह तिथि सही है, तो याकूब की पत्री नए नियम की सबसे पुरानी पुस्तक है, सुसमाचारों से भी पहले लिखी हुई।

पहले पाठक कौन थे? "बारह गोत्र जो तित्तर बितर होकर रहते हैं", यानी वे यहूदी विश्वासी जो सताव के कारण यरूशलेम से बिखर गए थे और सीरिया, एशिया माइनर और आसपास के इलाकों में बसे थे। वे गरीब थे, मज़दूरी पर जीते थे, अमीर ज़मींदारों के शोषण के नीचे पिसते थे, अदालतों में घसीटे जाते थे। और उस दबाव में कलीसिया के भीतर भी दरारें आ रही थीं: धनी को ऊँची जगह, गरीब को पाँवों के पास; एक दूसरे पर आरोप; जीभ की आग; संसार से समझौता।

यह पत्री एक टूटी हुई, सताई हुई, और भीतर से बँटी हुई कलीसिया के लिए लिखा गया चरवाहे का पत्र है। इसलिए इसके शब्द कड़े हैं, पर इनमें नफरत नहीं; चोट है, पर दुश्मनी नहीं।

रचना और मुख्य विषय

याकूब की पत्री को पौलुस की पत्रियों की तरह पढ़ने की कोशिश मत कीजिए। रोमियों में एक लंबा तर्क क्रम से बढ़ता है; याकूब में मोती एक धागे में पिरोए हुए हैं। यह पत्री पत्र कम और उपदेश ज़्यादा है, और उपदेश भी ऐसा जैसे कोई बुज़ुर्ग चरवाहा सभा के बीच खड़ा होकर एक-एक बात पर हाथ रख रहा हो। ध्यान देने लायक बात यह है कि इसका अंत भी पत्रों जैसा नहीं होता; न नमस्कार, न आशीर्वाद, बस भटके हुए भाई को लौटा लाने की अपील और बात खत्म। यह अचानक रुकना बताता है कि लेखक का ध्यान शिष्टाचार पर नहीं, चेलेपन पर था।

फिर भी इसमें एक साफ़ रूपरेखा दिखाई देती है। पहला अध्याय पूरी पत्री की भूमिका है, जिसमें आगे आने वाले लगभग सभी विषय बीज रूप में आते हैं: परीक्षा और धीरज, बुद्धि और प्रार्थना, गरीबी और धन, परीक्षा का स्रोत, परमेश्वर की अपरिवर्तनीय भलाई, सुनना और करना, जीभ की लगाम, और "शुद्ध और निर्मल भक्ति" की परिभाषा, यानी अनाथों और विधवाओं की सुधि लेना और अपने आप को संसार से निष्कलंक रखना।

दूसरे अध्याय के दो हिस्से हैं और दोनों एक ही बात कहते हैं। पहले हिस्से में पक्षपात पर प्रहार है: सभा में अँगूठी पहने धनी आदमी को आदर और मैले कपड़े वाले गरीब को तिरस्कार। दूसरे हिस्से में विश्वास और कर्मों का प्रसिद्ध खंड है, जहाँ वह भूखे भाई से "कुशल से जाओ" कहने वाली खोखली भक्ति का मज़ाक उड़ाता है। ध्यान दीजिए कि याकूब के लिए "कर्म" का मतलब धार्मिक रस्में नहीं, बल्कि पड़ोसी से किया गया ठोस प्रेम है।

तीसरा अध्याय दो नक्शे खींचता है: जीभ का नक्शा और बुद्धि का नक्शा। घोड़े की लगाम, जहाज़ का पतवार, जंगल में लगी आग, खारे और मीठे पानी का सोता; एक के बाद एक चित्र हमें दिखाते हैं कि छोटी चीज़ कितना बड़ा रुख मोड़ सकती है। फिर वह दो तरह की बुद्धि सामने रखता है, एक जो नीचे से आती है और डाह और विरोध पैदा करती है, दूसरी जो ऊपर से आती है और "पहिले तो पवित्र", फिर मिलनसार और कोमल होती है।

चौथा अध्याय जड़ तक जाता है। झगड़े कहाँ से आते हैं? भीतर की लालसाओं से। और इलाज क्या है? नम्रता। यहीं पत्री का सुसमाचार-हृदय धड़कता है: "वह तो और भी अनुग्रह देता है... परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर नम्र लोगों पर अनुग्रह करता है" (याकूब 4:6)। इसके बाद समर्पण, प्रतिरोध और निकट आने की पुकार आती है, और साथ में कल के लिए डींग मारने वाले व्यापारी को चेतावनी।

पाँचवाँ अध्याय अमीर शोषकों पर भविष्यद्वक्ताओं जैसी फटकार से शुरू होता है, फिर प्रभु के आगमन तक किसान जैसे धीरज की ओर मुड़ता है, और अंत में प्रार्थना पर आकर ठहर जाता है: बीमार के लिए प्राचीनों को बुलाना, पापों का अंगीकार, एक दूसरे के लिए प्रार्थना, और भटके हुए को सत्य की ओर लौटा लाना।

पूरी पत्री का मुख्य सूत्र एक ही है: अखंडता। याकूब का सबसे प्रिय शब्द "दुचित्ता" है, वह आदमी जिसका दिल दो टुकड़ों में बँटा है। और उसका लक्ष्य है "सिद्ध और सम्पूर्ण", यानी ऐसा जीवन जहाँ मुँह और हाथ, विश्वास और व्यवहार, रविवार और सोमवार एक ही दिशा में चलते हों।

इस पुस्तक के मुख्य पद

याकूब 1:22 इस पत्री का दिल है: "परन्तु वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।" मूल भाषा में "सुननेवाला" उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता था जो किसी व्याख्यान में बैठकर आनन्द लेता है, जैसे आज कोई अच्छा उपदेश सुनकर कहे, "वाह, क्या बात कही।" याकूब कहता है, ऐसा सुनना अपने आप को ठगना है। और उसका तर्क मीठा है, डरावना नहीं: वचन वह दर्पण है जो हमें हमारा असली चेहरा दिखाता है, और दर्पण का काम तब पूरा होता है जब आप उसे देखकर कुछ बदलते हैं। जो वचन सुनकर भी वैसा ही रहता है, वह दर्पण को दोष नहीं दे सकता।

याकूब 2:17 उसी बात का धार्मिक रूप है: "वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।" यहाँ "मरा हुआ" शब्द बहुत सोच-समझकर चुना गया है। याकूब यह नहीं कहता कि ऐसा विश्वास कमज़ोर है या अधूरा है; वह कहता है कि वह लाश है। लाश में कमी नहीं होती, उसमें जीवन नहीं होता। और वह इसे साबित करने के लिए अब्राहम और राहाब, दो बिल्कुल अलग लोगों को सामने लाता है। अब्राहम ने बरसों पहले विश्वास किया था और धर्मी ठहराया गया था; मोरिय्याह पर्वत पर उसके आज्ञापालन ने उस पुराने विश्वास को "सिद्ध" किया, यानी उसे पूरी तरह प्रकट कर दिया। राहाब के पास तो न वंश था, न धर्मशास्त्र, पर उसने जासूसों को छिपाया, और यही उसका जीवित विश्वास था। विश्वास जो चलता नहीं, वह विश्वास नहीं।

याकूब 5:16 पत्री को वहाँ ले जाता है जहाँ उपदेश समुदाय बनता है: "इसलिये तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने अपने पापों को मान लो; और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिस से चंगे हो जाओ; धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।" पूरी पत्री में जीभ ने जो घाव बनाए हैं, वे यहाँ उसी जीभ से भरते हैं। जो मुँह निन्दा और पक्षपात और खोखली भक्ति का औज़ार था, वही अब अंगीकार और प्रार्थना का माध्यम बन जाता है। और ध्यान दीजिए, यह "आपस में" है। याकूब किसी अकेले संत की कल्पना नहीं करता; वह एक ऐसी कलीसिया चाहता है जहाँ लोग एक दूसरे के सामने सच बोलने से डरते नहीं, क्योंकि वे जानते हैं कि वहाँ उन्हें कुचला नहीं, थामा जाएगा।

दर्पण

अब आप से बात। आपने इस पत्री के बारे में शायद यह सुन रखा है कि यह "कामों पर ज़ोर देती है", और इसलिए आपने इसे सुरक्षित दूरी पर रखा है। पर सच यह है कि याकूब आपके धर्मशास्त्र से नहीं, आपकी दिनचर्या से उलझता है।

वह आपके पर्स में झाँकता है। जिस व्यक्ति से आप काम करवाते हैं, क्या उसे समय पर और पूरा भुगतान मिलता है, या आप "अगले हफ्ते देखते हैं" कहकर टालते हैं? वह आपके घर के भीतर आता है। जिस आवाज़ में आप सभा में गाते हैं और जिस आवाज़ में आप रात को अपने जीवनसाथी या बच्चों से बोलते हैं, क्या वे एक ही गले से निकलती हैं? वह आपके फ़ोन तक पहुँचता है, उन संदेशों तक जहाँ आपने किसी भाई के बारे में वह बात लिखी जो आप उसके मुँह पर कभी न कहते। थोड़ी सी आग, और पूरा जंगल।

वह आपके कैलेंडर को भी छूता है। "कल हम फलाँ नगर जाएँगे और लाभ उठाएँगे", यह कहने वाले व्यापारी की तरह क्या आप भी अपनी योजनाओं में परमेश्वर को केवल एक मुहर की तरह जोड़ते हैं? और वह आपके अकेलेपन को भी देखता है, उस थकान को जिसमें आपने प्रार्थना करना छोड़ दिया और यह मान लिया कि माँगने का कोई फ़ायदा नहीं। याकूब 1:5 आपके सामने खुला पड़ा है: परमेश्वर बिना उलाहना दिए देते हैं। वे आपकी बार-बार की गुहार से थके नहीं हैं।

पर सुनिए, यह आईना आपको शर्मिंदा करने के लिए नहीं टाँगा गया। याकूब 4:7 का रास्ता खुला है: पहले आधीन हो जाइए, फिर सामना कीजिए। क्रम उलटा मत कीजिए, वरना आप अपनी इच्छाशक्ति से लड़ते रहेंगे और हारते रहेंगे। जिस परमेश्वर ने "अपनी ही इच्छा से" आपको नया जन्म दिया, वही आपके भीतर वह जीवन उगाएँगे जो दिखाई देता है। आईना आपका दुश्मन नहीं; वह अनुग्रह की पहली दया है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को याकूब की पत्री समझाने का सबसे आसान रास्ता है रोज़मर्रा की चीज़ें। उनसे कहिए कि एक सेब के पेड़ को हम कैसे पहचानते हैं? उस पर लगे सेबों से। पेड़ सेब लगाकर पेड़ नहीं बनता, वह पेड़ है इसलिए सेब लगाता है। उसी तरह, हम अच्छे काम करके परमेश्वर के बच्चे नहीं बनते; हम उनके बच्चे हैं, इसलिए हमारे जीवन में प्रेम के काम दिखाई देते हैं। यीशु मसीह ने हमारे लिए सब कुछ किया, और अब उनका प्यार हमारे हाथों से बाहर निकलता है।

छोटे बच्चों को यह भी बताइए कि याकूब यीशु के छोटे भाई थे, और पहले तो वे विश्वास नहीं करते थे। बाद में जब यीशु मरकर जी उठे, तब वे विश्वास लाए और कलीसिया के अगुवे बने। बच्चों को यह कहानी बहुत भाती है, क्योंकि इसमें उम्मीद है कि देर से समझ आने वाले भी छूटते नहीं।

फिर उन्हें दो सरल चित्र दीजिए: दर्पण और आग। दर्पण में चेहरा देखकर अगर गाल पर लगी मिट्टी साफ़ न करें, तो देखने का क्या लाभ? और एक छोटी सी तीली से पूरा जंगल जल सकता है, वैसे ही एक छोटी सी बात से किसी का दिल टूट सकता है।

Faith.network पर इस पुस्तक की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार की गई व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए चित्रों और छोटी कहानियों के साथ, सात से बारह साल के बच्चों के लिए गतिविधियों और सवालों के साथ, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए उन सवालों के साथ जो वे सचमुच पूछते हैं, जैसे दोस्तों के बीच पक्षपात, सोशल मीडिया पर जीभ, और विश्वास का असली सबूत।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

याकूब की पत्री किसने लिखी?

परंपरा और अधिकतर विद्वान मानते हैं कि इसे यीशु मसीह के भाई याकूब ने लिखा, जो यरूशलेम की कलीसिया के अगुवे थे। वे प्रेरित याकूब नहीं थे जो ज़ब्दी के पुत्र और यूहन्ना के भाई थे, क्योंकि उनकी हत्या लगभग 44 ईस्वी में हेरोदेस ने कर दी थी। पत्री का यहूदी रंग, बुद्धि-साहित्य जैसी शैली और यीशु के पहाड़ी उपदेश से गहरी समानता इसी याकूब की ओर इशारा करती है। वे अपने को "प्रभु का भाई" नहीं, बल्कि "परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास" कहकर पेश करते हैं।

याकूब की पत्री कब लिखी गई थी?

इसकी तिथि पर दो मुख्य राय हैं। कई विद्वान इसे बहुत आरंभिक मानते हैं, लगभग 45 से 49 ईस्वी, क्योंकि इसमें खतने और गैर-यहूदी विश्वासियों वाले बड़े विवाद का कोई संकेत नहीं है, कलीसिया की बनावट बहुत सरल है, और सभा के लिए आराधनालय वाला शब्द प्रयोग होता है। यदि यह सही है, तो यह नए नियम की सबसे पुरानी पुस्तक है। कुछ लोग इसे याकूब की मृत्यु से कुछ पहले, लगभग 60 के दशक में रखते हैं। दोनों ही स्थितियों में यह पहली सदी की प्रामाणिक रचना है।

क्या याकूब और पौलुस एक दूसरे का खंडन करते हैं?

नहीं, वे एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाते हैं, क्योंकि दोनों अलग-अलग शब्दों को अलग अर्थ में प्रयोग करते हैं। पौलुस "कर्म" से व्यवस्था के वे काम समझता है जिनसे लोग परमेश्वर के सामने अपनी धार्मिकता कमाना चाहते थे, और वह उन्हें उद्धार के आधार के रूप में नकारता है। याकूब "कर्म" से पड़ोसी के प्रति ठोस प्रेम समझता है, जो सच्चे विश्वास से अपने आप निकलता है। पौलुस जड़ की बात करता है, याकूब फल की। और खुद पौलुस इफिसियों 2:10 में कहता है कि हम भले कामों के लिए मसीह यीशु में सृजे गए हैं।

याकूब 2:17 का असली अर्थ क्या है?

"वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है" का अर्थ यह नहीं कि कर्म विश्वास में जोड़ने से उद्धार बनता है। याकूब दो तरह के विश्वास की तुलना कर रहा है: एक जीवित, जो प्रेम में काम करता है, और दूसरा मुर्दा, जो केवल सही बातों पर सिर हिलाता है। इसी अध्याय में वह कहता है कि दुष्टात्मा भी विश्वास करती हैं कि एक ही परमेश्वर है, और थरथराती हैं। सहमति उद्धार नहीं देती; समर्पण देता है, और समर्पण हमेशा दिखाई देता है।

क्या मार्टिन लूथर ने याकूब की पत्री को "पुआल की पत्री" कहा था?

हाँ, अपने नए नियम की एक प्रस्तावना में लूथर ने यूहन्ना के सुसमाचार और रोमियों की तुलना में याकूब को "पुआल की पत्री" कहा, क्योंकि उसे लगा कि इसमें मसीह के क्रूस और पुनरुत्थान का प्रचार उतना स्पष्ट नहीं है। पर यह उसकी निजी राय थी, कलीसिया का निर्णय नहीं; लूथर ने इसे बाइबल से हटाया नहीं और बाद में इससे उपदेश भी दिए। कलीसिया ने सदैव इस पत्री को परमेश्वर का वचन माना है, और ध्यान से पढ़ने पर इसमें अनुग्रह की आवाज़ साफ़ सुनाई देती है, जैसे याकूब 4:6 में।

याकूब की पत्री किसके लिए लिखी गई थी?

पहली आयत में पाठकों का परिचय "उन बारह गोत्रों" के रूप में मिलता है "जो तित्तर बितर होकर रहते हैं", यानी वे यहूदी पृष्ठभूमि के विश्वासी जो सताव के कारण यरूशलेम से बिखरकर आसपास के देशों में बस गए थे। वे ज़्यादातर गरीब थे, मज़दूरी और छोटे व्यापार पर जीते थे, और धनी ज़मींदारों के शोषण तथा अदालती परेशानियों से जूझ रहे थे। इसी दबाव में उनकी सभाओं में पक्षपात, आपसी झगड़े और खोखली धार्मिकता पनप रही थी, और याकूब इन्हीं सबको संबोधित करता है।

याकूब 1:5 के अनुसार परमेश्वर से बुद्धि कैसे माँगें?

यह पद कहता है कि परमेश्वर "बिना उलाहना दिए सब को उदारता से" देते हैं, इसलिए पहली बात यह है कि आप बिना झिझक माँगिए। अगली आयतें जोड़ती हैं कि विश्वास से माँगिए, संदेह करते हुए नहीं, क्योंकि दुचित्ता व्यक्ति अपनी सब बातों में चंचल रहता है। यहाँ बुद्धि का मतलब सामान्य जानकारी नहीं, बल्कि यह समझ है कि इस परीक्षा में परमेश्वर की राह पर कैसे चलें। अक्सर यह बुद्धि वचन पढ़ते समय, परिपक्व विश्वासियों की सलाह में और धीरज के साथ प्रतीक्षा करते हुए मिलती है।

याकूब 3:5 जीभ के बारे में इतना कठोर क्यों है?

क्योंकि जीभ का आकार उसके असर से कोई मेल नहीं खाता। याकूब घोड़े की लगाम और जहाज़ के पतवार का उदाहरण देकर कहता है कि छोटी चीज़ पूरी दिशा मोड़ देती है, और फिर आग का चित्र देता है: "देखो, थोड़ी सी आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है।" एक वाक्य किसी की इज़्ज़त, किसी का विवाह, किसी की कलीसिया जला सकता है। और वह यह भी कहता है कि कोई मनुष्य जीभ को वश में नहीं कर सकता, जिसका मतलब है कि यहाँ हमें आत्म-संयम से ज़्यादा परमेश्वर के अनुग्रह की ज़रूरत है।

याकूब 4:7 में शैतान का सामना करने का क्या तरीका है?

इस आयत का क्रम ही इसका तरीका है: "परमेश्वर के आधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।" पहले समर्पण, फिर प्रतिरोध। जो व्यक्ति परमेश्वर के अधीन नहीं है, वह शैतान का सामना अपनी ताकत से करता है और थक जाता है। समर्पण का अर्थ है अपनी लालसाओं को स्वीकार करना, नम्र होना, और परमेश्वर के वचन तथा अधिकार के नीचे आ जाना। अगली आयत आगे का रास्ता दिखाती है: परमेश्वर के निकट आना, हाथ शुद्ध करना और दुचित्ते हृदय को पवित्र करना।

याकूब 5:14-15 में तेल मलने और प्राचीनों को बुलाने का क्या मतलब है?

याकूब बीमार विश्वासी को सलाह देता है कि वह कलीसिया के प्राचीनों को बुलाए, जो प्रभु के नाम से उस पर तेल मलकर प्रार्थना करें। उस समय तेल दवा के रूप में भी इस्तेमाल होता था और समर्पण का प्रतीक भी था, इसलिए इसमें न तो जादू है और न ही चिकित्सा का विरोध। मुख्य बल प्रार्थना और विश्वास पर है, और सारा भरोसा प्रभु पर रखा गया है, जो चंगा करते हैं। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि बीमारी में अकेले मत जूझिए, कलीसिया को बुलाइए।

"दुचित्ता" होने का क्या अर्थ है?

यह शब्द याकूब की अपनी गढ़ी हुई तस्वीर है और इसका शाब्दिक अर्थ है "दो प्राण वाला", यानी ऐसा व्यक्ति जिसका भीतर दो हिस्सों में बँटा है। याकूब 1:8 ऐसे व्यक्ति को "अपनी सारी बातों में चंचल" कहता है, और याकूब 4:8 दुचित्ते लोगों से कहता है कि वे अपने हृदय को पवित्र करें। यह वह विश्वासी है जो एक ही समय में परमेश्वर और संसार दोनों को चाहता है, प्रार्थना भी करता है और भरोसा भी नहीं करता। पत्री का पूरा लक्ष्य इसी बँटवारे का इलाज है, ताकि हम "सिद्ध और सम्पूर्ण" बनें।

क्या याकूब की पत्री में सुसमाचार और अनुग्रह मिलता है?

बिल्कुल, बस वह घोषणा की बजाय ज़मीन पर उतरे हुए रूप में मिलता है। याकूब 1:18 कहता है कि परमेश्वर ने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, जो नए जन्म का स्पष्ट सुसमाचार है। याकूब 1:17 परमेश्वर की अटल भलाई की गवाही देता है, और याकूब 4:6 कहता है कि "वह तो और भी अनुग्रह देता है"। पूरी पत्री मान लेती है कि पाठक पहले ही अनुग्रह से नया जन्म पा चुके हैं, और अब वह उन्हें उस नए जीवन के अनुरूप चलना सिखाती है।

याकूब को पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

पाँच अध्याय, एक सौ आठ आयतें। आप चाहें तो इसे एक बैठक में पढ़ सकते हैं, और कम से कम एक बार ऐसा करना चाहिए, ताकि पूरी आवाज़ एक साथ सुनाई दे। पर इसका असली फल धीमी पढ़ाई में मिलता है।

एक सरल योजना यह है: दो सप्ताह तक हर दिन लगभग दस आयतें पढ़िए, और हर दिन केवल एक सवाल लेकर उठिए, "आज मेरे हाथों को क्या करना है?" पहले सप्ताह में पहला और दूसरा अध्याय लीजिए, दूसरे सप्ताह में तीसरे से पाँचवें तक। पढ़ते समय एक कागज़ पर दो खाने बनाइए: एक में वे आज्ञाएँ लिखिए जो याकूब देता है, दूसरे में वे वादे जो वह जोड़ता है। आप हैरान होंगे कि आज्ञाओं के साथ हमेशा अनुग्रह की कोई न कोई पंक्ति चलती है।

इसके बाद एक काम और कीजिए जो इस पत्री को खोल देगा: मत्ती के पाँचवें, छठे और सातवें अध्याय, यानी पहाड़ी उपदेश, साथ-साथ पढ़िए। जब आप याकूब 1:2 के पास मत्ती 5 की धन्य वचनों की पंक्ति रखेंगे, याकूब 1:5 के पास "माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा", और याकूब 1:22 के पास चट्टान पर घर बनाने वाले बुद्धिमान मनुष्य का दृष्टांत, तो आपको लगेगा कि आप दो नहीं, एक ही आवाज़ सुन रहे हैं। याकूब अपने भाई की भाषा बोलता है।

फिर इसे अकेले मत पढ़िए। याकूब 5:16 की आज्ञा किसी कमरे में अकेले पूरी नहीं होती। किसी एक भरोसेमंद विश्वासी से कहिए कि वह आपसे पूछे कि इस हफ्ते आपकी जीभ, आपका पर्स और आपका समय किस दिशा में चले। और अंत में, पत्री का आखिरी वाक्य याद रखिए, जो भटके हुए को लौटा लाने की बात करता है। यह पुस्तक आपको जज बनाने के लिए नहीं, लौटाने वाला बनाने के लिए लिखी गई है।

अंत में

याकूब की पत्री उस आदमी की पत्री है जिसने वर्षों तक अनुग्रह को आँगन में खेलते देखा और पहचाना नहीं, और फिर जी उठे मसीह से मिलकर सब कुछ पहचान लिया। शायद इसीलिए वह इतनी बेरहमी से आत्म-धोखे पर हमला करता है; वह जानता है कि पास होना और जानना दो अलग बातें हैं। उसका संदेश यह नहीं कि आप कामों से बचाए जाएँगे, बल्कि यह कि जो सचमुच बचाया गया है, उसका जीवन चुप नहीं रहता। परीक्षा में धीरज, कमी में प्रार्थना, सभा में बराबरी, जीभ पर लगाम, योजना में नम्रता, बीमारी में संगति; यही उस नए जन्म के निशान हैं जो परमेश्वर ने सत्य के वचन से दिया है।

अब इस पत्री को फिर से खोलिए, पर इस बार किसी बहस को जीतने के लिए नहीं। इसे ऐसे पढ़िए जैसे कोई बड़ा भाई आपके कंधे पर हाथ रखकर कह रहा हो कि वचन सुनना काफ़ी नहीं, उस पर चलना ही उसका आदर है। और जब आईना चुभे, तो भागिए मत। उसी अध्याय में वह परमेश्वर भी खड़े हैं जो बिना उलाहना दिए, उदारता से देते हैं।

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