आत्मिक वरदान क्या हैं: पवित्र आत्मा के वरदान और उनका सही उपयोग
परिचय
रविवार की सभा के बाद एक बहन मेरे पास आईं। आँखों में आँसू थे। उन्होंने कहा, "पास्टर, पच्चीस साल से मैं कलीसिया में हूँ। मंच पर दूसरे लोग गाते हैं, प्रचार करते हैं, प्रार्थना में लोगों के लिए खड़े होते हैं। मुझे लगता है परमेश्वर ने मुझे कुछ भी नहीं दिया। मैं खाली हाथ हूँ।" उसी हफ़्ते एक और भाई ने मुझे फ़ोन किया, लगभग उल्टी शिकायत लेकर: "मुझे भविष्यद्वाणी का वरदान मिला है, पर कलीसिया के अगुवे मुझे जगह नहीं देते।"
दो लोग, दो दर्द, एक ही गलतफ़हमी। दोनों ही सोच रहे थे कि आत्मिक वरदान एक तमगा है, कोई प्रमाणपत्र जो बताता है कि परमेश्वर की नज़र में मेरी कीमत कितनी है।
बाइबल कुछ और कहती है। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि वरदान आपकी पहचान का सर्टिफ़िकेट नहीं, बल्कि किसी और के नाम लिखी चिट्ठी है जो आपके हाथ में थमाई गई है। और जब यह बात समझ में आ जाती है, तो खाली हाथ भरे हुए लगने लगते हैं और भरे हुए हाथ झुकना सीख जाते हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
यह पृष्ठ आत्मिक वरदानों की सूची गिनाने के लिए नहीं लिखा गया। यहाँ हम एक ही सूत्र पकड़ेंगे: वरदान तोहफ़ा नहीं, अमानत है। पवित्र आत्मा आपको कुछ देता है, लेकिन वह चीज़ आपकी निजी संपत्ति नहीं होती; वह आपके हाथों से होकर किसी और तक पहुँचने के लिए दी जाती है। इसलिए हर वरदान का पता आपके नाम पर नहीं, दूसरों के नाम पर लिखा होता है।
यह दृष्टिकोण ज़रूरी है, क्योंकि वरदानों पर होने वाले ज़्यादातर झगड़े, घमंड और हीन भावना इसी एक गलती से पैदा होते हैं कि हम अमानत को मालिकाना हक़ समझ बैठते हैं। जब मालिक याद आ जाता है, तो वरदान फिर आशीष बनते हैं।
बाइबल आत्मिक वरदानों के बारे में क्या कहती है?
नए नियम में इस विषय का सबसे बड़ा खुला पत्र 1 कुरिन्थियों 12 है। पौलुस शुरुआत ही इस वाक्य से करते हैं कि "हे भाइयों, मैं नहीं चाहता कि तुम आत्मिक वरदानों के विषय में अज्ञान रहो" (1 कुरिन्थियों 12:1)। यानी यह विषय वैकल्पिक नहीं है, न ही यह किसी विशेष "आत्मिक वर्ग" के लिए आरक्षित है। यह हर विश्वासी के लिए जानने योग्य बात है।
इसके बाद पौलुस एक ऐसी नींव रखते हैं जो पूरे विषय का ढाँचा तय कर देती है: "वरदान तो कई प्रकार के हैं, परन्तु आत्मा एक ही है" (1 कुरिन्थियों 12:4)। ध्यान दीजिए, पौलुस विविधता से इनकार नहीं करते। वे कहते हैं विविधता असली है, मगर स्रोत एक है। हाथ में जो औज़ार है वह अलग-अलग हो सकता है, लेकिन देनेवाला एक ही है। इसी अध्याय में आगे वे कहते हैं कि "ये सब प्रभावशाली कार्य वही एक आत्मा करवाता है, और जिस को जो चाहता है, वही बाँट देता है" (1 कुरिन्थियों 12:11)। वरदान आत्मा की मर्ज़ी से बँटते हैं, हमारी योग्यता के हिसाब से नहीं। इसी एक पंक्ति ने सदियों से लाखों घमंडों की जड़ काटी है।
अब आइए उस पद पर, जो इस पूरे पृष्ठ का दिल है: "किन्तु हर एक को आत्मा का प्रकाश दूसरों के लाभ पहुँचाने के लिये दिया जाता है" (1 कुरिन्थियों 12:7)। इसमें दो बातें एक साथ हैं। पहली, "हर एक को।" कोई भी विश्वासी खाली हाथ नहीं है। दूसरी, "दूसरों के लाभ पहुँचाने के लिये।" वरदान का मकसद मेरे अंदर नहीं, मेरे बाहर है। अगर मैं अपने वरदान से मिले आनंद को अपनी आत्मिक प्रगति का पैमाना बना लूँ, तो मैंने उस चिट्ठी को खोलकर पढ़ लिया है जो किसी और के नाम की थी।
पौलुस आगे कलीसिया में परमेश्वर की व्यवस्था गिनाते हैं: "परमेश्वर ने कलीसिया में अलग अलग व्यक्ति नियुक्त किए हैं; प्रथम प्रेरित, दूसरे भविष्यद्वक्ता, तीसरे उपदेशक, फिर सामर्थ्य के काम करनेवाले, फिर चंगा करनेवाले, और उपकार करनेवाले, और प्रधान, और नाना प्रकार की भाषा बोलनेवाले" (1 कुरिन्थियों 12:28)। यह सूची इसलिए दिलचस्प है कि इसमें वरदान और व्यक्ति अलग नहीं किए गए हैं। परमेश्वर वरदान हवा में नहीं उड़ाते; वे वरदान से लैस लोगों को एक शरीर में रखते हैं। और जो क्रम कुरिन्थ की कलीसिया को सबसे ऊँचा लगता था, नाना प्रकार की भाषाएँ, वह पौलुस की सूची में सबसे अंत में आता है। यह जानबूझकर किया गया है, ताकि वरदानों की "रैंकिंग" की हमारी भूख पर ठंडा पानी पड़े।
रोमियों में भी वही सुर है, मगर एक नए शब्द के साथ: "जब कि अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिस को भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे" (रोमियों 12:6)। यहाँ "अनुग्रह के अनुसार" शब्द बहुत कुछ तय कर देता है। यूनानी भाषा में वरदान के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द ही अनुग्रह शब्द से निकला है। वरदान कमाई नहीं, अनुग्रह का फल है। जो चीज़ मुफ़्त मिली है, उस पर छाती चौड़ी करना बेमानी है।
इफिसियों में पौलुस आसमान की ओर इशारा करते हैं। जी उठे और ऊँचे पर चढ़े मसीह ने अपने लोगों को वरदान दिए: "और उसने कुछ को प्रेरित, कुछ को भविष्यद्वक्ता, कुछ को सुसमाचार सुनाने वाले, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्त कर दिया" (इफिसियों 4:11)। और इनका काम? अगले पद में साफ़ है, "जिससे पवित्र लोग सेवा का काम करने के लिये सिद्ध हों, और मसीह की देह उन्नति पाए" (इफिसियों 4:12)। अगुवों का वरदान भी उनके लिए नहीं, पूरी कलीसिया को सेवा के लिए तैयार करने के लिए है।
और पतरस इस सारी बात को एक ही वाक्य में बाँध देते हैं: "जैसा हर एक को वरदान मिला है, उसी के अनुसार परमेश्वर के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्डारियों के समान एक दूसरे की सेवा करो" (1 पतरस 4:10)। भण्डारी, यानी मैनेजर, वह आदमी जो दूसरे की संपत्ति सँभालता है। पतरस के शब्दकोश में विश्वासी वरदान का मालिक नहीं, भण्डारी है।
वरदान आपके हाथ में है, पर आपके नाम पर नहीं।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यह विषय नए नियम में अचानक नहीं टपकता। पुराने नियम में परमेश्वर का आत्मा बार-बार किसी व्यक्ति पर उतरता है, और हर बार मकसद वही होता है: लोगों की भलाई।
सबसे सुंदर उदाहरण मूसा के समय का एक कारीगर है। बसलेल के विषय में परमेश्वर कहते हैं, "और मैंने उसको परमेश्वर के आत्मा से परिपूर्ण किया है, कि वह बुद्धिमान और समझदार और ज्ञानी होकर सब प्रकार की कारीगरी कर सके" (निर्गमन 31:3)। बाइबल में पहली बार जिस व्यक्ति के बारे में कहा गया कि वह परमेश्वर के आत्मा से भरा है, वह कोई भविष्यद्वक्ता या राजा नहीं, बल्कि लकड़ी और सोने पर काम करनेवाला शिल्पी है। और उसका हुनर उसके नाम की ख्याति के लिए नहीं, निवासस्थान बनाने के लिए दिया गया, जहाँ सारी मंडली परमेश्वर से मिल सके। अमानत का सूत्र वहीं से शुरू हो जाता है।
फिर न्यायियों की किताब में गिदोन, शिमशोन और दबोरा पर आत्मा उतरता है, मगर अपनी महानता दिखाने के लिए नहीं, दबी हुई प्रजा को छुड़ाने के लिए। शाऊल और दाऊद पर आत्मा उतरता है, अपने लिए राज भोगने के लिए नहीं, झुंड की चरवाही करने के लिए। और जब सत्तर पुरनियों पर आत्मा उतरता है और यहोशू उसे रोकना चाहता है, मूसा का जवाब आज के हर कलीसियाई झगड़े का इलाज है: "भला होता कि यहोवा की सारी प्रजा के लोग भविष्यद्वक्ता होते, और यहोवा अपना आत्मा उन सभों में समवा देता!" (गिनती 11:29)। मूसा दूसरों के वरदान से खतरा महसूस नहीं करते; वे उसके लिए तरसते हैं।
पुराने नियम में आत्मा का यह आना चुनिंदा लोगों पर होता था। मगर भविष्यद्वक्ता योएल एक ऐसे दिन की बात करते हैं जब यह सीमा टूट जाएगी: "इसके बाद मैं सब प्राणियों पर अपना आत्मा उण्डेलूँगा; तुम्हारे बेटे और बेटियाँ भविष्यद्वाणी करेंगी, और तुम्हारे पुरनिए स्वप्न देखेंगे, और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे" (योएल 2:28)। बेटे और बेटियाँ, बूढ़े और जवान, दास और दासियाँ। यही वादा पिन्तेकुस्त के दिन पूरा होता है, जब "वे सब पवित्र आत्मा से भर गए, और जिस प्रकार आत्मा ने उनको बोलने की सामर्थ्य दी, वे अन्य अन्य भाषा बोलने लगे" (प्रेरितों के काम 2:4)। और गौर कीजिए कि पहली बार जब आत्मा के वरदान सार्वजनिक रूप से प्रकट होते हैं, तो उनका नतीजा यह होता है कि अलग-अलग देशों के लोग अपनी-अपनी भाषा में परमेश्वर के बड़े काम सुनते हैं। वरदान बाहर की ओर काम करता है, दूसरों के कानों तक।
इस सारे सूत्र का केंद्र मसीह हैं। यशायाह ने जिस व्यक्ति पर यहोवा का आत्मा ठहरने की बात की, वह यीशु थे; नासरत के आराधनालय में उन्होंने खुद वही पढ़ा और कहा कि यह आज पूरा हुआ। और जिसने आत्मा को बिना नाप लिया, उसी ने ऊँचे पर चढ़कर अपने लोगों को बाँट दिया। यहीं इफिसियों 4:11 अपनी पूरी गहराई पाता है: वरदान मसीह की विजय की लूट हैं, जो उन्होंने अपनी देह पर बरसा दी। और पवित्र आत्मा कभी अपनी महिमा नहीं चाहता; यीशु ने स्वयं कहा, "वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह मेरी ही बातों में से लेकर तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:14)। इसलिए जो वरदान आत्मा से आता है, वह हमेशा मसीह की ओर इशारा करता है, वरदान पाने वाले की ओर नहीं।
अंत में प्रकाशितवाक्य में यह सूत्र एक वाक्य में सिमट जाता है: "क्योंकि यीशु की गवाही भविष्यद्वाणी की आत्मा है" (प्रकाशितवाक्य 19:10)। जब सब कुछ पूरा हो जाएगा, तो वरदानों की ज़रूरत नहीं रहेगी, क्योंकि जिसकी ओर वे इशारा करते थे वह सामने खड़े होंगे। अमानत तब मालिक को लौटा दी जाएगी।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: वरदान आत्मिक परिपक्वता का सबूत है। कुरिन्थ की कलीसिया वरदानों में बहुत समृद्ध थी। पौलुस खुद कहते हैं कि उनमें किसी वरदान की कमी नहीं थी। फिर भी उसी कलीसिया को उन्होंने "शारीरिक" कहा, क्योंकि वहाँ गुट थे, मुकदमे थे, व्यभिचार था और प्रभु भोज में अमीर-गरीब का भेद था। वरदान और चरित्र दो अलग चीज़ें हैं। यीशु की चेतावनी पढ़िए: "उस दिन बहुत लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी न की थी? और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को न निकाला था?'" (मत्ती 7:22) और उत्तर है, "मैं ने तुम को कभी नहीं जाना।" वरदान उधार लिया हुआ औज़ार है; पवित्रता देह का फल है। गलातियों 5:22 में आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल है, वरदान नहीं। फल से आदमी बनता है, वरदान से काम होता है।
दूसरी भ्रांति: वरदान मेरी व्यक्तिगत पूर्ति के लिए है। आज बहुत जगहों पर वरदान की खोज आत्म-खोज बन गई है, जैसे कोई व्यक्तित्व परीक्षण जिससे मुझे अपनी "पहचान" मिलेगी। मगर 1 कुरिन्थियों 12:7 ने मकसद साफ़ कर दिया है: "दूसरों के लाभ पहुँचाने के लिये।" और 1 कुरिन्थियों 14:12 में पौलुस कहते हैं कि वरदान पाने की धुन कलीसिया की उन्नति के लिए हो। इसलिए सही सवाल यह नहीं है, "मेरा वरदान क्या है ताकि मैं खुद को जान सकूँ," बल्कि "मेरे सामने कौन खड़ा है और उसे किस चीज़ की ज़रूरत है।"
तीसरी भ्रांति: कुछ वरदान बड़े हैं, कुछ छोटे। कुरिन्थ में यही बीमारी थी। पौलुस ने जवाब में शरीर का चित्र दिया: आँख कान से यह नहीं कह सकती कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, और जो अंग कमज़ोर लगते हैं उनका ज़्यादा आदर किया जाता है। 1 कुरिन्थियों 12:28 में "उपकार करनेवाले" यानी सहायता देने वाले, उसी सूची में हैं जिसमें प्रेरित और भविष्यद्वक्ता हैं। जो बहन चुपचाप बीमारों के घर खाना पहुँचाती है, वह उसी आत्मा के हाथ में है जिसके हाथ में प्रचारक है। हाँ, पौलुस कहते हैं कि जो वरदान कलीसिया को ज़्यादा बनाते हैं उनकी धुन में रहो, मगर यह उपयोगिता का क्रम है, व्यक्ति के मूल्य का नहीं।
चौथी भ्रांति: प्रेम वरदानों का विकल्प है। कुछ लोग 1 कुरिन्थियों 13 पढ़कर कहते हैं, "मुझे वरदानों की ज़रूरत नहीं, मुझे बस प्रेम चाहिए।" पर पौलुस वरदानों को रद्द नहीं कर रहे; वे उनका रास्ता दिखा रहे हैं। "यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियाँ बोलूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झनझनाती हुई झाँझ हूँ" (1 कुरिन्थियों 13:1)। प्रेम उस नाली का नाम है जिससे वरदान बहता है। और यह ठीक हमारे सूत्र पर मोहर लगाता है: अमानत को सही पते पर पहुँचाने का तरीका प्रेम है। प्रेम के बिना वरदान वही चिट्ठी है जो डाकिए ने अपनी जेब में रख ली।
आज इसे जीवन में उतारना
कल्पना कीजिए कि आप अपने ऑफ़िस में बैठे हैं और बगल की कुर्सी पर बैठा सहकर्मी तीन हफ़्ते से अजीब सा चुप है। आपको समझाने का हुनर है, पर यहाँ समझाने की ज़रूरत नहीं; यहाँ बैठकर सुनने की ज़रूरत है। वरदान को अमानत मानने का पहला व्यावहारिक नतीजा यही है कि आप अपने औज़ार से शुरू नहीं करते, सामने वाले की ज़रूरत से शुरू करते हैं। भण्डारी पहले देखता है कि घर में किसे क्या चाहिए, फिर भंडार खोलता है।
दूसरी बात, वरदान की खोज कमरे में बैठकर नहीं होती। मैंने शायद ही किसी को प्रार्थना की डायरी में वरदान "खोजते" देखा है; लोग उसे सेवा करते-करते पाते हैं। किसी के घर जाकर प्रार्थना कीजिए, बच्चों की कक्षा में पढ़ाइए, किसी नए विश्वासी के साथ हफ़्ते में एक बार बाइबल खोलिए, किसी बीमार पड़ोसी का राशन उठा लाइए। कुछ महीनों में दो चीज़ें साफ़ हो जाएँगी: जहाँ आपके काम से दूसरों को असल में मज़बूती मिलती है, और जहाँ आप थककर भी भीतर से जीवित महसूस करते हैं। इन दोनों के कटाव पर आपका वरदान खड़ा मिलेगा। और भरोसेमंद भाई-बहनों से पूछना मत भूलिए; शरीर के बाकी अंग अक्सर हमसे पहले देख लेते हैं कि हम किस काम के लिए बने हैं।
तीसरी बात, वरदान को समय, पैसे और शरीर के फ़ैसलों से जोड़िए। 1 पतरस 4:10 का भण्डारी शब्द यह मानता है कि कोई हिसाब मांगने वाला है। अगर आपके पास सिखाने का वरदान है, तो हफ़्ते में तैयारी के दो घंटे कहाँ से आएँगे? अगर दान देने का वरदान है, तो आपके बजट में वह कहाँ दिखता है? अगर दया दिखाने का वरदान है, तो आपका कैलेंडर किसी के लिए खाली है या पूरा भर चुका है? रोमियों 12:6 के बाद पौलुस हर वरदान को एक रवैये से जोड़ते हैं, सेवा करनेवाला सेवा करे, दान देनेवाला उदारता से दे, दया करनेवाला हर्ष से करे। वरदान हवा में नहीं चलता; वह आपके रोज़मर्रा के फ़ैसलों में उतरता है।
और चौथी बात, परखना सीखिए। "भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानो; सब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो" (1 थिस्सलुनीकियों 5:20)। न हर दावे पर आँख मूँदकर भरोसा, न हर अनुभव पर शक। कसौटी यह है कि क्या इससे मसीह बड़े हुए, क्या वचन के साथ यह मेल खाता है, और क्या कलीसिया मज़बूत हुई। 1 कुरिन्थियों 14 में पौलुस का अंतिम नियम यही है कि सब कुछ आत्मिक उन्नति के लिए हो।
दर्पण
अब मैं सीधे आपसे बात करता हूँ। आप किस तरफ़ खड़े हैं? उस बहन के साथ, जो मानती है कि उसके पास कुछ नहीं, और इसलिए चुपचाप पीछे की कुर्सी पर बैठकर ज़िंदगी निकाल रही है? अगर हाँ, तो आपको यह सुनना होगा कि 1 कुरिन्थियों 12:7 में लिखा "हर एक को" आपको भी शामिल करता है। आपकी खामोशी विनम्रता नहीं है, वह अविश्वास भी हो सकती है। आप कह रहे हैं कि आत्मा ने बाँटते समय मेरा नाम भूल गया। यह बात सच नहीं है, और आपकी कलीसिया आपकी गैर-हाज़िरी की कीमत चुका रही है।
या आप दूसरी तरफ़ हैं? आपके पास हुनर है, मंच है, मोबाइल पर लोगों के संदेश हैं जो कहते हैं कि आपने उन्हें आशीष दी। और भीतर कहीं एक पतली सी आवाज़ है जो गिनती रखती है कि आपको पिछले महीने कितनी बार बुलाया गया और किसे ज़्यादा जगह मिली। वह गिनती करने वाली आवाज़ बता रही है कि आपने अमानत को जेब में डाल लिया है।
और सबसे असली सवाल घर पर पूछा जाता है। जो आदमी सभा में सहनशीलता पर प्रचार करता है, वह शाम को अपनी पत्नी की बात बीच में काटता है या नहीं? जो बहन दूसरों के लिए दिल खोलकर प्रार्थना करती है, वह अपने बेटे की चुप्पी के लिए कितना समय देती है? वरदान का सबसे कठिन इम्तिहान रसोई, दफ़्तर, बैंक खाते और थके हुए शरीर में होता है, मंच पर नहीं।
अगर आप आज रात अकेलेपन में यह पढ़ रहे हैं और लग रहा है कि किसी को आपकी ज़रूरत नहीं, तो एक काम कीजिए। किसी एक व्यक्ति का नाम लिखिए और कल उससे पूछिए कि वह कैसा है। यह बहुत छोटा काम लगता है। मगर अमानत हमेशा छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटी जाती है।
खाली हाथ नहीं, बस अब तक बंद मुट्ठी।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को आत्मिक वरदान समझाना मुश्किल नहीं है, बस हमें शब्दकोश बदलना पड़ता है। बच्चों के लिए सबसे काम का चित्र शरीर का है, वही जो पौलुस ने इस्तेमाल किया। हाथ पकड़ता है, आँख देखती है, पैर चलते हैं, और कान सुनता है। कोई भी अंग अपने लिए काम नहीं करता; हाथ खुद के लिए खाना नहीं उठाता, मुँह के लिए उठाता है। ठीक ऐसे ही परमेश्वर ने हर विश्वासी को कुछ ऐसा दिया है जो उसने दूसरों के लिए दिया है।
दूसरा चित्र उपहार बाँटने का है। कल्पना कीजिए किसी के जन्मदिन पर आपके हाथ में एक पैकेट दिया जाए और कहा जाए, "यह तुम्हारे दोस्त के लिए है, तुम ले जाकर दे दो।" पैकेट आपके हाथ में है, पर आपका नहीं है। बच्चे इस बात को बड़ों से भी जल्दी समझ जाते हैं, क्योंकि उनके लिए देना अभी तक गणित नहीं बना है।
और यह ज़रूर जोड़िए कि वरदान उन्हें बड़े होने के बाद नहीं मिलेगा, बल्कि आज भी वे किसी की मदद कर सकते हैं: एक रोते हुए साथी के पास बैठना, किसी को अपना टिफ़िन बाँटना, छोटी बहन को पढ़ाना, दादी के लिए प्रार्थना करना।
Faith.network पर इसी विषय पर अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए खास तैयार की गई व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए (तीन से छह साल) कहानी और चित्रों के ज़रिए, प्राथमिक उम्र के बच्चों के लिए (सात से बारह साल) बाइबल पदों और गतिविधियों के साथ, और किशोरों के लिए (बारह साल से ऊपर) पहचान, तुलना और सोशल मीडिया के दबाव जैसे सवालों को छूते हुए। माता-पिता और रविवार स्कूल के शिक्षक इन्हें सीधे इस्तेमाल कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आत्मिक वरदान का सही अर्थ क्या है?
आत्मिक वरदान वह क्षमता या सेवा है जो पवित्र आत्मा किसी विश्वासी को अनुग्रह से देते हैं, ताकि उसके द्वारा मसीह की देह मज़बूत हो। रोमियों 12:6 में इसे सीधे "अनुग्रह के अनुसार" मिला हुआ कहा गया है, यानी यह कमाई नहीं बल्कि भेंट है। इसका केंद्र पाने वाला नहीं, पाने वाले के आसपास के लोग हैं, क्योंकि 1 कुरिन्थियों 12:7 के अनुसार यह "दूसरों के लाभ पहुँचाने के लिये" दिया जाता है। इसलिए हर वरदान एक ज़िम्मेदारी है, एक उपाधि नहीं।
बाइबल में कुल कितने आत्मिक वरदान बताए गए हैं?
बाइबल कहीं भी कोई बंद और अंतिम गिनती नहीं देती। मुख्य सूचियाँ रोमियों 12, 1 कुरिन्थियों 12, इफिसियों 4 और 1 पतरस 4 में मिलती हैं, और इन्हें जोड़ने पर लगभग बीस से बाईस वरदान गिने जाते हैं, मगर हर सूची अलग है और कोई भी दूसरी को दोहराती नहीं। यही बताता है कि ये सूचियाँ उदाहरण हैं, पूरा शब्दकोश नहीं। परमेश्वर के अनुग्रह को पतरस "नाना प्रकार का" कहते हैं, यानी बहुरंगी। इसलिए अपनी सेवा को किसी सूची के खाने में फ़िट करने की चिंता छोड़ दीजिए।
मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरा आत्मिक वरदान क्या है?
आमतौर पर यह बात सेवा करते-करते साफ़ होती है, बैठकर सोचते रहने से नहीं। किसी ज़रूरत को देखिए, उसमें हाथ लगाइए, और कुछ महीनों बाद दो सवाल पूछिए: इससे दूसरों को असल में मज़बूती मिली या नहीं, और इस काम में आप थकने के बाद भी भीतर से जीवित महसूस करते हैं या नहीं। इसके साथ अपनी कलीसिया के भरोसेमंद भाई-बहनों से खुलकर पूछिए, क्योंकि शरीर के बाकी अंग अक्सर हमसे पहले पहचान लेते हैं कि हम किस काम के लिए बने हैं।
आत्मिक वरदान और आत्मा के फल में क्या अंतर है?
वरदान बताता है कि परमेश्वर आपके द्वारा क्या करते हैं, और फल बताता है कि परमेश्वर आपके भीतर क्या बनाते हैं। गलातियों 5:22 में आत्मा का फल प्रेम, आनन्द और मेल जैसा चरित्र है, जो हर विश्वासी में एक ही दिशा में बढ़ता है; वरदान अलग-अलग लोगों को अलग-अलग मिलते हैं। इसीलिए वरदान से भरी कुरिन्थ की कलीसिया को पौलुस "शारीरिक" कह सके। वरदान आपकी परिपक्वता का प्रमाण नहीं है, फल है। और वरदान के बिना फल संभव है, पर फल के बिना वरदान खतरनाक होता है।
क्या अन्य भाषाएँ बोलना हर विश्वासी के लिए ज़रूरी है?
बाइबल इसे सब विश्वासियों के लिए अनिवार्य चिह्न नहीं बनाती। 1 कुरिन्थियों 12 में पौलुस सीधे पूछते हैं कि क्या सब भाषाएँ बोलते हैं, और सवाल का ढाँचा ही बताता है कि उत्तर नहीं है। उसी अध्याय में 1 कुरिन्थियों 12:11 कहता है कि आत्मा "जिस को जो चाहता है, वही बाँट देता है।" इसलिए यह वरदान न होने से कोई विश्वासी कम आत्मिक नहीं होता, और होने से कोई ऊँचा नहीं हो जाता। कलीसियाई सभा में पौलुस इसका उपयोग व्यवस्था और अनुवाद के साथ करने को कहते हैं।
क्या भविष्यद्वाणी और चंगाई के वरदान आज भी काम करते हैं?
मसीही कलीसिया में इस पर ईमानदार मतभेद है। कुछ मानते हैं कि ये वरदान प्रेरितों के युग के साथ अपना खास मकसद पूरा कर चुके, और कुछ मानते हैं कि ये आज भी जारी हैं। दोनों पक्ष एक बात पर सहमत हैं कि परमेश्वर आज भी चंगा करने में समर्थ हैं और बाइबल में लिखा वचन हर अनुभव की कसौटी है। इसलिए रुख यह हो: 1 थिस्सलुनीकियों 5:20 के अनुसार भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानें, मगर सब बातों को परखें, और जहाँ मसीह की महिमा और कलीसिया की उन्नति हो, वहाँ धन्यवाद दें।
क्या आत्मिक वरदान और प्राकृतिक प्रतिभा एक ही चीज़ हैं?
पूरी तरह एक नहीं, मगर आमने-सामने भी नहीं। निर्गमन 31:3 में बसलेल का कारीगरी का हुनर आत्मा से भरा हुआ बताया गया है, यानी परमेश्वर स्वभाविक क्षमताओं को भी अपनी सेवा के लिए पवित्र कर सकते हैं। फ़र्क़ मकसद और सामर्थ्य का है: प्रतिभा से नाम कमाया जा सकता है, वरदान देह को बनाता है और मसीह की ओर इशारा करता है। कई बार परमेश्वर आपकी पुरानी क्षमता को नई दिशा दे देते हैं, और कई बार वे कुछ ऐसा करवाते हैं जिसके लिए आप खुद को कभी काबिल न समझते।
अगर मुझे लगता है कि मेरे पास कोई वरदान नहीं है तो क्या करूँ?
यह एहसास बहुत आम है, पर वचन इसे सही नहीं ठहराता। 1 पतरस 4:10 बिना किसी शर्त के कहता है, "जैसा हर एक को वरदान मिला है," और 1 कुरिन्थियों 12:7 भी "हर एक को" कहता है। आपकी समस्या वरदान की कमी नहीं, पहचान की देरी है। सबसे छोटा कदम उठाइए: किसी एक इंसान की एक ज़रूरत पूरी कीजिए, इस हफ़्ते, बिना किसी को बताए। जो आत्मा बाँटते हैं वही दिखाते भी हैं, और वे अक्सर काम के बीच में ही दिखाते हैं।
क्या परमेश्वर से कोई खास वरदान माँगना सही है?
हाँ, पौलुस इसकी खुली इजाज़त देते हैं। 1 कुरिन्थियों 12:31 में वे कहते हैं कि बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो, और 1 कुरिन्थियों 14:12 में इसका पैमाना भी बताते हैं कि यह चाह कलीसिया की उन्नति के लिए हो। इसलिए माँगना गलत नहीं, मगर नीयत सब तय करती है। अगर मैं मंच, पहचान या प्रभाव के लिए वरदान माँग रहा हूँ, तो मैं असल में वरदान नहीं, तमगा माँग रहा हूँ। बाँटने का अधिकार हमेशा आत्मा के हाथ में रहता है।
क्या आत्मिक वरदान छिन सकता है या खत्म हो सकता है?
बाइबल वरदानों को छिन जाने से ज़्यादा उनके दबे रह जाने की चेतावनी देती है। पौलुस तीमुथियुस को लिखते हैं कि अपने भीतर के वरदान को भड़काता रहे, और ध्यान न देने पर उसकी उपेक्षा न करे। यानी इस्तेमाल न करने से वरदान सुस्त पड़ सकता है, ठीक जैसे बिना चले मांसपेशी कमज़ोर हो जाती है। साथ ही 1 थिस्सलुनीकियों 5:19 कहता है, "आत्मा को न बुझाओ।" पाप, कड़वाहट और लगातार अवज्ञा उस नाली को बंद कर देती है जिससे अमानत दूसरों तक पहुँचती थी।
1 कुरिन्थियों 12:28 में वरदानों का क्रम क्यों दिया गया है?
पौलुस वहाँ व्यक्तियों के मूल्य का क्रम नहीं, कलीसिया की नींव और निर्माण का क्रम बता रहे हैं। प्रेरित और भविष्यद्वक्ता पहले आते हैं क्योंकि उनके द्वारा मसीह का सुसमाचार और शिक्षा की नींव रखी गई, जैसा इफिसियों में कहा गया है। खास बात यह है कि जिन भाषाओं पर कुरिन्थ की कलीसिया सबसे ज़्यादा गर्व करती थी, वे इस सूची में सबसे अंत में रखी गई हैं। यह जानबूझकर की गई व्यवस्था है, ताकि वरदानों की सीढ़ी बनाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की आदत टूटे।
इफिसियों 4:11 के वरदान आज कलीसिया में कैसे काम करते हैं?
इफिसियों 4:11 में प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, सुसमाचार सुनाने वाले, रखवाले और उपदेशक दिए गए हैं, और अगला पद उनका काम साफ़ करता है, कि पवित्र लोग सेवा के लिए तैयार हों और मसीह की देह बढ़े। इसका मतलब है कि अगुवों का काम सारी सेवा खुद करना नहीं, बल्कि लोगों को सेवा के लिए सज्जित करना है। जिस कलीसिया में सब कुछ पास्टर के भरोसे है, वहाँ यह पद नहीं जीया जा रहा। अगुवाई का वरदान भी एक अमानत है, जिसका पता पूरी मंडली के नाम लिखा है।
अंत में
जिस बहन ने कहा था कि उसके हाथ खाली हैं, उसने कुछ महीनों बाद अपनी गली की चार बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ हर मंगलवार बाइबल पढ़ना शुरू किया। कोई मंच नहीं, कोई घोषणा नहीं, कोई तालियाँ नहीं। मगर जब एक बुज़ुर्ग बहन मरते समय पूरे भरोसे के साथ मसीह के पास गईं, तो कहीं कोई हिसाब जुड़ गया जो हमारी गिनती में नहीं आता।
इसी सूत्र को थामकर आगे बढ़िए: वरदान तोहफ़ा नहीं, अमानत है। इसका मतलब है कि आपको अपनी कीमत साबित करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि 1 कुरिन्थियों 12:4 के अनुसार आत्मा एक ही है और वही बाँटते हैं। और इसका मतलब यह भी है कि आप निश्चिंत होकर बैठ नहीं सकते, क्योंकि 1 पतरस 4:10 आपको भण्डारी कहता है, और भण्डारी से हिसाब लिया जाता है।
आगे पढ़ने के लिए 1 कुरिन्थियों 12 से 14 तक एक बैठक में पढ़िए, बिना अध्याय तोड़े, और हर बार जहाँ "एक दूसरे" या "लाभ" शब्द आए वहाँ रुक जाइए। फिर अपनी डायरी में एक नाम लिखिए और एक तारीख़। बाकी काम आत्मा करेंगे।
अमानत बाँटने के लिए दी जाती है, सँभालकर रखने के लिए नहीं।
