प्रेम क्या है: बाइबल के अनुसार सच्चे प्रेम की परिभाषा
परिचय
शादी के मंडप पर पास्टर ने 1 कुरिन्थियों 13 पढ़ा। "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है।" सब मुस्कुराए, किसी ने आँख पोंछी, फोटो खिंची। चार साल बाद वही दोनों रसोई की मेज़ पर आमने-सामने बैठे हैं, बीच में ठंडी चाय है और चुप्पी है, और दोनों के मन में एक ही सवाल घूम रहा है, "क्या अब भी प्रेम बचा है?" क्योंकि जो महसूस होता था, वह अब महसूस नहीं होता।
यही वह जगह है जहाँ बाइबल हमसे बात करना शुरू करती है। हमारी दुनिया प्रेम को एक अनुभूति मानती है, जो आती है और चली जाती है। पवित्रशास्त्र प्रेम को किसी और ही चीज़ से नापता है।
इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि बाइबल प्रेम को कैसे परिभाषित करती है, यह सूत्र उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक कैसे चलता है, कौन-सी आम गलतफहमियाँ हमें थका देती हैं, और यह सच्चाई कल सुबह आपके घर, दफ़्तर और मन में कैसे उतर सकती है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
इस पूरे पृष्ठ पर मैं प्रेम को एक ही खिड़की से देखूँगा: बाइबल में प्रेम पहले भावना नहीं, वाचा है, और उस वाचा की कीमत लहू से चुकाई गई है। हम आमतौर पर अपने अनुभव से प्रेम की परिभाषा बनाते हैं और फिर परमेश्वर पर वह परिभाषा चढ़ा देते हैं। पवित्रशास्त्र उलटा करता है: वह पहले क्रूस दिखाता है और कहता है, यह है प्रेम, अब अपनी परिभाषा सुधार लो। यह दृष्टिकोण मायने रखता है, क्योंकि जिस दिन आपको लगे कि आपके भीतर प्रेम की भावना सूख गई है, उस दिन आपकी नींव आपकी भावना नहीं, परमेश्वर की चुकाई हुई कीमत होगी।
बाइबल प्रेम के बारे में क्या कहती है?
बाइबल प्रेम की परिभाषा किसी शब्दकोश की तरह नहीं देती। वह एक व्यक्ति की ओर उँगली उठाती है। प्रेरित यूहन्ना लिखते हैं, "हे प्रियो, हम आपस में प्रेम रखें; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है: और जो कोई प्रेम करता है, वह परमेश्वर से जन्मा है, और परमेश्वर को जानता है। जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है" (1 यूहन्ना 4:7-8)। ध्यान दीजिए, यहाँ यह नहीं लिखा कि प्रेम परमेश्वर है। लिखा है कि परमेश्वर प्रेम हैं। यानी प्रेम कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं जिसे हम पूजें, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव का बहाव है। जहाँ भी सच्चा प्रेम दिखता है, वह उनके झरने से निकली हुई धारा है।
और यह प्रेम कैसा दिखता है? यूहन्ना खुद ही तीन पद बाद बताते हैं: "प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर से प्रेम किया; पर इस में है, कि उस ने हम से प्रेम किया, और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा" (1 यूहन्ना 4:10)। परिभाषा की जड़ हमारे हृदय में नहीं, कलवरी में है।
इसीलिए पौलुस उस पद को लिखते हैं जो शायद पूरे पवित्रशास्त्र में प्रेम की सबसे तीखी परिभाषा है: "परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा" (रोमियों 5:8)। दुनिया का प्रेम पात्रता ढूँढ़ता है; परमेश्वर का प्रेम पात्रता बनाता है। हम पहले सुधरे, फिर वे आए, ऐसा नहीं हुआ। हम अभी पाप में डूबे हुए थे, तभी कीमत चुका दी गई।
प्रेम वह है जो चुकाया गया, न कि जो महसूस हुआ।
यीशु मसीह ने भी प्रेम को इसी तराज़ू पर तौला: "इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे" (यूहन्ना 15:13)। उन्होंने यह वाक्य उसी रात कहा जिस रात वे पकड़वाए जाने वाले थे। यह कोई काव्य नहीं था, यह चौबीस घंटे के भीतर पूरा होने वाला वादा था। और यूहन्ना 3:16 उसी सच्चाई को पूरे जगत के आकार तक फैला देता है: "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।" इस पद की क्रिया गौर करने लायक है: प्रेम रखा, इसलिए दे दिया। बाइबल में प्रेम हमेशा देने की क्रिया में बदलता है।
अब जब परमेश्वर हमसे इसी प्रेम की माँग करते हैं, तो वह माँग भी वाचा की भाषा में आती है। यीशु मसीह से पूछा गया कि व्यवस्था में सबसे बड़ी आज्ञा कौन-सी है, और उन्होंने उत्तर दिया, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (मत्ती 22:37-39)। ध्यान दीजिए कि प्रेम की आज्ञा दी जा सकती है। भावनाओं की आज्ञा नहीं दी जाती; कोई आपसे यह नहीं कह सकता कि कल सुबह नौ बजे आपको खुशी महसूस होनी चाहिए। पर निष्ठा की आज्ञा दी जा सकती है, क्योंकि वह इच्छा का काम है। यही बाइबल का प्रेम है: पूरे व्यक्तित्व की, पूरे जीवन की, समर्पित निष्ठा।
और फिर 1 कुरिन्थियों 13:4-8, जहाँ पौलुस प्रेम को इतने ठोस शब्दों में उतार देते हैं कि बचने की कोई जगह नहीं बचती: "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है। प्रेम कभी टलता नहीं।" पौलुस एक भी बार यह नहीं कहते कि प्रेम क्या महसूस कराता है। वे केवल बताते हैं कि प्रेम क्या करता है और क्या नहीं करता। यह विवाह के कार्ड की सजावट नहीं, चरित्र की जाँच सूची है।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
पुराने नियम में एक इब्रानी शब्द बार-बार लौटता है: हेसेद। हिन्दी बाइबल इसे करुणा, कृपा, दया या अटल प्रेम कहकर अनुवाद करती है। इसका अर्थ है वह निष्ठा जो वाचा के भीतर बँधी है, वह प्रेम जो इसलिए नहीं टिकता कि सामने वाला अच्छा है, बल्कि इसलिए टिकता है कि वचन दिया गया था। जब परमेश्वर मूसा के सामने से गुज़रे, तो उन्होंने अपना नाम इसी तरह घोषित किया: "यहोवा, यहोवा, ईश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य" (निर्गमन 34:6)। यह वह क्षण था जब इस्राएल ने अभी-अभी सोने का बछड़ा बनाया था। परमेश्वर का प्रेम उनकी असफलता के मलबे पर खड़े होकर घोषित हुआ।
इसराइल का चुनाव भी इसी सूत्र पर टिका है। व्यवस्थाविवरण साफ कहता है कि परमेश्वर ने उन्हें इसलिए नहीं चुना कि वे बड़ी या ताकतवर जाति थे, बल्कि केवल इसलिए कि वे उनसे प्रेम रखते थे और उन्होंने अपने पुरखाओं से खाई हुई शपथ को पूरा किया। और इसी पुस्तक में वह आज्ञा आती है जिसे यीशु मसीह ने बाद में सबसे बड़ी कहा: "तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना" (व्यवस्थाविवरण 6:5)। और लैव्यव्यवस्था 19:18 में उसका जुड़वाँ भाई: "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।" यानी दोनों महान आज्ञाएँ यीशु मसीह ने आविष्कार नहीं कीं, उन्होंने उन्हें उठाकर एक साथ जोड़ दिया और अपने जीवन में जीकर दिखा दिया।
फिर भविष्यद्वक्ता आते हैं और वाचा के प्रेम को और भी चुभती हुई तस्वीर देते हैं। होशे को कहा जाता है कि वह उस स्त्री से प्रेम करे जो बार-बार बेवफ़ा हुई, ताकि इस्राएल देख सके कि परमेश्वर का प्रेम कैसा है। यिर्मयाह के द्वारा परमेश्वर कहते हैं, "मैं ने तुझ से सदा की प्रीति रखी है; इस कारण मैं ने तुझ पर अपनी करुणा बनाए रखी है" (यिर्मयाह 31:3)। श्रेष्ठगीत में वही प्रेम मानवीय स्तर पर गाया जाता है, "प्रेम मृत्यु के समान बलवन्त है" (श्रेष्ठगीत 8:6), और यह गीत हमें सिखाता है कि देह, आकर्षण और वफ़ादारी परमेश्वर की बनाई हुई अच्छी चीज़ें हैं, गंदी नहीं।
पर पुराना नियम एक अधूरे वाक्य की तरह खत्म होता है। वाचा टूटती रही, लोग भटकते रहे, और सवाल लटका रहा: क्या परमेश्वर सचमुच इस विद्रोही जाति से बँधे रहेंगे? नए नियम में उत्तर देह धारण करके आता है। बेतलहम की चरनी से लेकर गोलगोता के क्रूस तक, परमेश्वर वह कीमत खुद चुकाते हैं जो हम चुका नहीं सकते थे। ऊपरी कमरे में यीशु मसीह कहते हैं, "मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूं, कि एक दूसरे से प्रेम रखो: जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो" (यूहन्ना 13:34)। नयापन आज्ञा में नहीं, माप में है: "जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है।"
और अंत में प्रकाशितवाक्य। बाइबल का आखिरी दृश्य कोई अदालत का सूखा कमरा नहीं, बल्कि एक विवाह भोज है, जहाँ मेम्ने की दुल्हिन तैयार खड़ी है। जो प्रेम उत्पत्ति के बगीचे में एक विवाह से शुरू हुआ था, वह नई सृष्टि में एक विवाह पर समाप्त होता है। बीच की पूरी कहानी परमेश्वर की उस निष्ठा की कहानी है जो कभी नहीं टूटी।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति: प्रेम एक भावना है। हम कहते हैं "मुझे अब वैसा महसूस नहीं होता", और मान लेते हैं कि प्रेम मर गया। पर याद कीजिए, यीशु मसीह ने प्रेम की आज्ञा दी। गतसमनी में उनके भीतर कोई मीठी अनुभूति नहीं थी; पसीना लहू की बूँदों जैसा हो रहा था और उन्होंने कहा कि यदि हो सके तो यह कटोरा टल जाए। फिर भी उन्होंने आगे बढ़कर हमें चुना। भावनाएँ प्रेम का साथी हो सकती हैं, ड्राइवर नहीं। जब पौलुस लिखते हैं कि प्रेम "सब बातें सह लेता है" और "सब बातों में धीरज धरता है" (1 कुरिन्थियों 13:7), तो वे उस निष्ठा की बात कर रहे हैं जो भावना के सूख जाने के बाद भी खड़ी रहती है।
दूसरी भ्रांति: प्रेम का मतलब है हर बात मान लेना। आज सबसे बड़ी उलझन यही है कि हम स्वीकृति और प्रेम को एक ही चीज़ समझ बैठे हैं। पर 1 कुरिन्थियों 13:6 कहता है कि प्रेम "कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है।" जो प्रेम आपको उस रास्ते पर चुपचाप जाने देता है जो आपको नष्ट कर देगा, वह प्रेम नहीं, आलस्य है। यीशु मसीह ने व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री को दोषी नहीं ठहराया, पर उन्होंने यह भी कहा कि अब से पाप न करना। प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं; जब आप उन्हें अलग करते हैं, तो एक कठोर हो जाता है और दूसरा खोखला।
तीसरी भ्रांति: परमेश्वर का प्रेम मेरे प्रदर्शन पर टिका है। यह वह भ्रांति है जो सबसे ज़्यादा विश्वासियों को अंदर से खा जाती है। हम सोचते हैं कि अच्छे सप्ताह में परमेश्वर हमसे ज़्यादा प्रेम करते हैं और बुरे सप्ताह में कम। रोमियों 5:8 इस सोच को जड़ से काट देता है, क्योंकि वह कहता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरे। हमारा सबसे बुरा दिन भी उस प्रेम को हिला नहीं सकता, क्योंकि वह प्रेम हमारे चरित्र पर नहीं, परमेश्वर के चरित्र पर टिका है। पौलुस इसे रोमियों 8:38-39 में गिन-गिनकर बंद कर देते हैं: न मृत्यु, न जीवन, न वर्तमान, न भविष्य, न कोई और सृष्टि हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग कर सकेगी।
चौथी भ्रांति: "परमेश्वर प्रेम है" का मतलब है कि वे कभी न्याय नहीं करेंगे। यह पद अक्सर आधा उद्धृत किया जाता है ताकि परमेश्वर को एक सहनशील बूढ़े दादा में बदला जा सके जिसे किसी बात से फ़र्क नहीं पड़ता। पर उसी पत्री में यूहन्ना यह भी लिखते हैं कि परमेश्वर ज्योति हैं और उनमें कुछ भी अंधकार नहीं। जो प्रेम बुराई पर क्रोधित नहीं होता, वह प्रेम नहीं, उदासीनता है। एक पिता जो अपनी बेटी के साथ हुए अन्याय पर शांत बैठा रहे, उसे हम प्रेमी नहीं कहेंगे। क्रूस ही वह जगह है जहाँ परमेश्वर का न्याय और उनका प्रेम एक-दूसरे से टकराते नहीं, बल्कि गले मिलते हैं: पाप की पूरी कीमत वसूली गई, पर वह पापी से नहीं, स्वयं परमेश्वर के पुत्र से।
आज इसे जीवन में उतारना
अगर प्रेम एक वाचा है और भावना नहीं, तो वह हर सुबह किसी ठोस काम की शक्ल लेगा। इसका मतलब है कि आप उस पति या पत्नी के लिए सुबह की चाय बनाते रहेंगे जिनसे कल रात कड़वी बहस हुई थी। इसका मतलब है कि जिस बूढ़ी माँ को अब आपकी हर बात दोहरानी पड़ती है, आप तीसरी बार भी शांति से उत्तर देंगे, क्योंकि "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है" (1 कुरिन्थियों 13:4)। बाइबल का प्रेम बड़े नाटकीय बलिदानों से कम और छोटी, ऊबाऊ वफ़ादारियों से ज़्यादा बना है।
पैसे की जगह पर यह और भी ठोस हो जाता है। यूहन्ना पूछते हैं कि जिसके पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को अभाव में देखकर अपना हृदय बंद कर ले, उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है। यानी आपका बैंक स्टेटमेंट आपके प्रेम का सबसे ईमानदार गवाह है। जिस दिन आप चुपचाप किसी की फ़ीस भर देते हैं, या किसी विधवा के महीने का राशन बिना बताए भेज देते हैं, उस दिन 1 यूहन्ना 3:16 आपके जीवन में उतरा है।
काम की जगह पर प्रेम का मतलब है कि आप उस सहकर्मी की पीठ पीछे बुराई नहीं करेंगे जिसने आपका श्रेय छीन लिया, क्योंकि "प्रेम डाह नहीं करता" और "बुरा नहीं मानता।" यह सबसे कठिन हिस्सा है, और यीशु मसीह इसे और आगे ले जाते हैं: "अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो" (मत्ती 5:44)। किसी के लिए प्रार्थना करना और उससे नफ़रत बनाए रखना बहुत मुश्किल है; प्रार्थना धीरे-धीरे हृदय को पिघला देती है।
छोटी वफ़ादारियाँ बड़े वादों से ज़्यादा भारी होती हैं।
अकेलेपन में यह सच्चाई अलग तरह से काम करती है। जब कोई फोन नहीं करता, जब त्योहार की शाम खाली लगती है, तब यूहन्ना 3:16 एक सिद्धांत नहीं रह जाता। वह वाक्य आपके नाम के साथ पढ़ा जाना चाहिए: परमेश्वर ने इस जगत से, और इसमें आपसे भी, ऐसा प्रेम रखा कि अपना एकलौता पुत्र दे दिया।
और शुरुआत कहाँ से करें? वहीं से जहाँ बाइबल शुरुआत करती है: "हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उस ने हम से प्रेम किया" (1 यूहन्ना 4:19)। अपने भीतर से प्रेम निचोड़ने की कोशिश मत कीजिए, वह कुआँ जल्दी सूख जाता है। पहले उस प्रेम में भीगिए जो आपको पहले ही मिल चुका है, और फिर उसे बहने दीजिए। यही कारण है कि प्रेम आत्मा का फल है (गलातियों 5:22), उत्पाद नहीं। फल उगाया नहीं जाता, वह जुड़े रहने से आता है।
दर्पण
अब मुझे आपसे सीधे बात करनी है।
आप शायद इस पृष्ठ पर इसलिए आए हैं कि आप जानना चाहते हैं कि प्रेम क्या है। पर मुझे लगता है असली सवाल इससे थोड़ा अलग है। असली सवाल यह है: क्या मुझसे कोई ऐसे प्रेम करता है जो मेरे सबसे बुरे रूप को जानकर भी न भागे?
अगर आपने कभी रात के दो बजे छत को घूरते हुए यह सोचा है कि अगर लोग मेरा असली चेहरा जान लें तो कोई नहीं टिकेगा, तो रोमियों 5:8 आपके लिए लिखा गया है। परमेश्वर ने आपको आपके सबसे सजे-धजे रूप में देखकर प्रेम नहीं किया। उन्होंने आपको उस हालत में देखकर प्रेम किया जिसे आप किसी को नहीं दिखाते, और तब क्रूस चुना।
पर यही सच्चाई चुभती भी है। क्योंकि अगर प्रेम वाचा है, तो आप उस रिश्ते से यह कहकर नहीं भाग सकते कि "अब भावना नहीं रही।" अगर प्रेम देने की क्रिया है, तो आपके पैसे, आपका कैलेंडर और आपका फोन आपके धर्मशास्त्र की जाँच करते हैं। कितने घंटे आपने पिछले महीने किसी ऐसे व्यक्ति को दिए जिससे आपको बदले में कुछ नहीं मिलना था? आप उस भाई या बहन के बारे में क्या बोलते हैं जब वे कमरे में नहीं होते?
और शायद सबसे कठिन जगह यह है: आपके भीतर कोई एक नाम है जिसे आपने माफ़ नहीं किया। उस नाम को सोचते ही आपका जबड़ा कस जाता है। मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि उस दर्द को छोटा मानिए, क्योंकि क्रूस दर्द को छोटा नहीं मानता। पर मैं आपसे यह पूछूँगा: जिस परमेश्वर ने आपको माफ़ करने के लिए अपने पुत्र की कीमत चुकाई, क्या वे आपके हृदय में इतना प्रेम नहीं भर सकते कि आप एक कदम आगे बढ़ें?
प्रेम आपसे कुछ माँगता है। पर वह पहले आपको भर देता है, फिर माँगता है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को प्रेम समझाने के लिए बड़े शब्दों की ज़रूरत नहीं, उन्हें एक चित्र चाहिए। सबसे सरल तरीका यह है कि आप उनसे पूछें, "अगर तुम्हारा सबसे प्यारा खिलौना कोई तोड़ दे, तो तुम क्या करोगे?" और फिर बताएँ कि परमेश्वर ने हमें तब भी नहीं छोड़ा जब हमने उनका दिल तोड़ा। बच्चे "बलिदान" शब्द नहीं समझते, पर वे यह समझते हैं कि माँ ने अपनी रोटी उन्हें दे दी और खुद भूखी रह गई। इसी अनुभव से यूहन्ना 3:16 का दरवाज़ा खुलता है: परमेश्वर के पास जो सबसे कीमती था, उन्होंने वही हमें दे दिया।
छोटे बच्चों के लिए प्रेम को "करने वाली चीज़" के रूप में सिखाना सबसे अच्छा रहता है। प्रेम वह है जो अपने भाई को पहले खेलने देता है, जो सच बोलता है भले ही डाँट पड़े, जो अकेले बैठे बच्चे के पास जाकर बैठ जाता है। भावना पर ज़ोर मत दीजिए, काम पर दीजिए, क्योंकि यही बाइबल का तरीका भी है।
बड़े बच्चों और किशोरों के साथ आप और गहराई में जा सकते हैं, खासकर उस उलझन पर जो आजकल हर मोबाइल स्क्रीन से आती है, कि प्रेम केवल आकर्षण या रोमांस है। उन्हें 1 कुरिन्थियों 13:4-8 दिखाइए और पूछिए कि इनमें से कौन-सी बात फिल्मों वाले प्रेम में दिखती है।
हमारी वेबसाइट पर इस विषय की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए। उन्हें अपने परिवार की उम्र और समझ के अनुसार चुनिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाइबल में प्रेम का असली अर्थ क्या है?
बाइबल में प्रेम मुख्यतः वाचा की निष्ठा है, यानी वह समर्पण जो दूसरे की भलाई के लिए अपनी कीमत चुकाता है। यह भावना को बाहर नहीं करता, पर भावना पर टिकता भी नहीं। इसकी सबसे स्पष्ट परिभाषा रोमियों 5:8 में मिलती है, जहाँ लिखा है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरे। यानी प्रेम वह नहीं जो हम महसूस करते हैं, बल्कि वह है जो परमेश्वर ने किया, और उसी नमूने पर हमें एक-दूसरे से प्रेम करना है।
"परमेश्वर प्रेम है" का क्या मतलब है?
1 यूहन्ना 4:8 कहता है, "जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है।" इसका अर्थ यह नहीं कि हर तरह की भावना परमेश्वर है, बल्कि यह कि प्रेम परमेश्वर के स्वभाव का हिस्सा है, कोई मूड नहीं जो कभी आता कभी जाता है। वे प्रेम करने का निर्णय नहीं लेते, वे प्रेममय हैं। और चूँकि वे पवित्र भी हैं और सत्य भी, उनका प्रेम कभी बुराई को नज़रअंदाज़ नहीं करता, बल्कि उसकी कीमत क्रूस पर स्वयं उठा लेता है।
अगापे, फिलिया और एरोस में क्या अंतर है?
यूनानी भाषा में प्रेम के लिए कई शब्द हैं। एरोस आकर्षण और दांपत्य प्रेम है, फिलिया मित्रता और स्नेह है, स्तोर्गे परिवार का सहज लगाव है, और अगापे वह देने वाला, बलिदानी प्रेम है जिसे नया नियम सबसे ऊँचा स्थान देता है। यूहन्ना 3:16 और 1 कुरिन्थियों 13 में यही अगापे शब्द है। पर ध्यान रखिए, बाइबल इन्हें एक-दूसरे का दुश्मन नहीं बनाती; श्रेष्ठगीत दांपत्य प्रेम को सुंदर मानता है, और यीशु मसीह ने अपने चेलों को मित्र कहा।
क्या प्रेम एक भावना है या एक निर्णय?
दोनों, पर क्रम मायने रखता है। बाइबल प्रेम की आज्ञा देती है, और आज्ञा केवल उसी चीज़ की दी जा सकती है जो इच्छा के अधीन हो। मत्ती 22:37-39 में यीशु मसीह पूरे मन, प्राण और बुद्धि से प्रेम रखने की आज्ञा देते हैं। यानी प्रेम एक निर्णय से शुरू होता है और अक्सर भावना बाद में उसके पीछे आती है, ठीक वैसे जैसे किसी बीमार के पास बैठे-बैठे करुणा जागती है। जो प्रेम केवल भावना पर चलता है, वह पहली कठिनाई में टूट जाता है।
1 कुरिन्थियों 13 क्या केवल विवाह के लिए लिखा गया है?
नहीं। यह अध्याय शादियों में पढ़ा जाता है, पर पौलुस ने इसे एक झगड़ालू कलीसिया को लिखा था जहाँ लोग आत्मिक वरदानों को लेकर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में थे। इसीलिए वहाँ लिखा है कि प्रेम "अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं।" यह पद विवाह पर भी लागू होता है, पर उतना ही कलीसिया, दफ़्तर, परिवार और पड़ोस पर भी। दरअसल इसे अपने जीवनसाथी के बजाय अपने ऊपर लागू करके पढ़िए, तो यह अध्याय आईने की तरह काम करता है।
मैं अपने शत्रु से प्रेम कैसे कर सकता हूँ?
यीशु मसीह ने मत्ती 5:44 में कहा, "अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।" ध्यान दीजिए, उन्होंने यह नहीं कहा कि पहले उनके लिए अच्छा महसूस करो। वे प्रार्थना से शुरू करने को कहते हैं, क्योंकि किसी का नाम परमेश्वर के सामने बार-बार लेना धीरे-धीरे हमारे भीतर की कड़वाहट को घोल देता है। इसके साथ छोटे-छोटे भले काम जोड़िए, बदले की उम्मीद के बिना। यह भूलना नहीं है और न ही अन्याय को सही ठहराना; यह प्रतिशोध को परमेश्वर के हाथ में छोड़ देना है।
क्या परमेश्वर उन लोगों से भी प्रेम करते हैं जो उन्हें नहीं मानते?
हाँ। यूहन्ना 3:16 कहता है कि परमेश्वर ने जगत से प्रेम रखा, और वह जगत विश्वास करने वालों से कहीं बड़ा है। रोमियों 5:8 और भी सीधा है: मसीह तब मरे जब हम पापी ही थे, यानी विरोधी अवस्था में। यीशु मसीह ने सिखाया कि परमेश्वर भले और बुरे दोनों पर अपना सूर्य उगाते हैं। पर यह भी सच है कि उस प्रेम के फल, यानी क्षमा और अनन्त जीवन, विश्वास के द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। प्रेम की पेशकश सबके लिए खुली है; उसे स्वीकार करना ज़रूरी है।
अगर परमेश्वर प्रेम हैं तो दुनिया में इतना दुख क्यों है?
यह सवाल ईमानदार है और बाइबल इसे दबाती नहीं; अय्यूब और भजनसंहिता इसी से भरे हैं। पवित्रशास्त्र दुख का पूरा गणित नहीं समझाता, पर वह एक चीज़ दिखाता है जो कोई दर्शनशास्त्र नहीं दे सकता: परमेश्वर ने दुख से दूरी नहीं बनाई, वे उसमें उतर आए। क्रूस पर वे स्वयं परित्यक्त हुए, ताकि हम कभी परित्यक्त न हों। इसीलिए रोमियों 8:38-39 कहता है कि कोई भी वर्तमान या भविष्य की बात हमें उनके प्रेम से अलग नहीं कर सकती। दुख अंतिम शब्द नहीं है; प्रकाशितवाक्य में हर आँसू पोंछा जाता है।
मुझे कैसे पता चले कि परमेश्वर मुझसे प्रेम करते हैं जब मुझे कुछ महसूस ही नहीं होता?
अपनी भावनाओं से मत पूछिए, इतिहास से पूछिए। प्रेम का प्रमाण आपके भीतर की अनुभूति नहीं, गोलगोता पर हुई एक घटना है। यूहन्ना 15:13 कहता है, "इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे।" वह कीमत उस दिन चुकाई गई जब आपकी भावनाएँ मौजूद भी नहीं थीं। सूखे दिनों में वचन को ऊँची आवाज़ में पढ़िए, किसी विश्वासी मित्र को अपनी हालत बताइए, और प्रभु भोज में हिस्सा लीजिए, क्योंकि वहाँ प्रेम को देखा और चखा जा सकता है।
क्या बाइबल खुद से प्रेम करने के लिए कहती है?
मत्ती 22:39 में यीशु मसीह कहते हैं, "तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" यहाँ आत्म-प्रेम आज्ञा नहीं, बल्कि एक मानक के रूप में माना गया है, क्योंकि हम पहले से ही अपनी चिंता करते हैं। यानी बाइबल कहती है कि जितनी सहजता से आप अपनी भूख, नींद और सुरक्षा का ध्यान रखते हैं, उतनी ही सहजता से दूसरे का रखिए। इसके साथ यह भी सच है कि परमेश्वर की नज़र में आपका मूल्य अपार है, इसलिए स्वयं से घृणा करना भी पवित्रशास्त्र के अनुरूप नहीं है।
"अपना पहला सा प्रेम छोड़ देना" का क्या अर्थ है?
प्रकाशितवाक्य 2:4 में इफिसुस की कलीसिया से कहा गया, "तू ने अपना पहिला सा प्रेम छोड़ दिया है।" यह कलीसिया मेहनती थी, सच्चाई की रक्षा करती थी और थकी नहीं थी, फिर भी कुछ खो चुकी थी: मसीह के प्रति वह ताज़ा, व्यक्तिगत लगाव जो शुरू में था। सेवा मशीन बन गई थी। यह चेतावनी हम सबके लिए है, कि सही काम करते-करते हम उस व्यक्ति को भूल सकते हैं जिसके लिए हम काम कर रहे हैं। इलाज वही है जो वहाँ दिया गया: याद करो, मन फिराओ, और पहले जैसे काम करो।
प्रेम और क्षमा का आपस में क्या संबंध है?
1 कुरिन्थियों 13:5 कहता है कि प्रेम "बुरा नहीं मानता", यानी वह चोटों का हिसाब-किताब नहीं रखता। जहाँ क्षमा नहीं होती, वहाँ प्रेम धीरे-धीरे दम तोड़ देता है, क्योंकि हर रिश्ता चोट पहुँचाता है और बिना क्षमा के वे चोटें जमा होती जाती हैं। क्षमा का मतलब यह मानना नहीं कि जो हुआ वह ठीक था, और न ही हर बार पुराने रिश्ते को उसी रूप में लौटाना। इसका मतलब है बदला लेने का अधिकार परमेश्वर को सौंप देना, ठीक वैसे जैसे मसीह ने हमारे कर्ज़ को अपने ऊपर ले लिया।
अंत में
अगर इस पूरे पृष्ठ से आप केवल एक बात ले जा सकें, तो यह हो: प्रेम की परिभाषा आपके हृदय में नहीं लिखी गई, वह गोलगोता की पहाड़ी पर लिखी गई है। हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रेम एक अनुभूति है जिसे ढूँढ़ना है, और जब वह चली जाए तो नई ढूँढ़नी है। पवित्रशास्त्र कहता है कि प्रेम एक वाचा है जिसमें हमें ले लिया गया, और उसकी कीमत हमसे नहीं, हमारे लिए चुकाई गई। यही कारण है कि बाइबल का प्रेम टिकता है जब भावनाएँ हिलती हैं, और यही कारण है कि "प्रेम कभी टलता नहीं" (1 कुरिन्थियों 13:8)।
अब आगे क्या? 1 कुरिन्थियों 13 को अगले सात दिन तक रोज़ धीरे-धीरे पढ़िए, पर "प्रेम" शब्द की जगह अपना नाम रखकर। जहाँ चुभे, वहीं प्रार्थना कीजिए। फिर 1 यूहन्ना की पूरी पत्री पढ़िए, जो केवल पाँच अध्यायों में इस विषय को खोलकर रख देती है। और शुरुआत हमेशा उसी जगह से कीजिए जहाँ से यूहन्ना करते हैं: पहले उस प्रेम को ग्रहण कीजिए जो आपको बिना शर्त मिला है, क्योंकि खाली बर्तन से कोई किसी को पानी नहीं पिला सकता।
