मरकुस का सुसमाचार: सेवक मसीह और उसके सामर्थी कार्य
परिचय
रोम में साठ के दशक का कोई शाम का समय। एक किराए के मकान की ऊपरी मंज़िल पर बीस-पचीस लोग बैठे हैं। बाहर सम्राट नीरो का शहर है, जहाँ मसीह के नाम के कारण लोग जलाए गए हैं, जहाँ पड़ोसी मुखबिर बन सकता है। कोई एक व्यक्ति खड़ा होकर एक छोटी-सी पुस्तक पढ़ने लगता है, और पहला ही वाक्य सुनकर कमरे की हवा बदल जाती है: "परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।" कोई वंशावली नहीं, कोई जन्म की कहानी नहीं, कोई लम्बी भूमिका नहीं। सीधे मैदान में।
यह पुस्तक डरे हुए लोगों के लिए लिखी गई थी, और आज भी डरे हुए लोगों के हाथ में सबसे पहले थमाई जानी चाहिए। इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि मरकुस किसने लिखा, कब और क्यों लिखा, यह कैसे बुना गया है, इसके मुख्य पद क्या कहते हैं, और सबसे बढ़कर यह कि मरकुस की सामर्थ्य की परिभाषा बाकी दुनिया से बिलकुल उलटी क्यों है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लोग मरकुस को "चमत्कारों का सुसमाचार" कहकर पढ़ते हैं, मानो यीशु की पहचान उनकी ताकत के प्रदर्शन से साबित होती हो। हम इसे उलटी दिशा से पढ़ेंगे, यानी क्रूस के नीचे से। मरकुस में हर चंगाई, हर दुष्टात्मा का निकाला जाना, हर तूफ़ान का शांत होना एक दिशासूचक है जो गोलगोथा की ओर उँगली उठाता है। इसीलिए पूरी पुस्तक में कोई मनुष्य यीशु को "परमेश्वर का पुत्र" पूरी तरह तब तक नहीं पुकारता जब तक वह मर नहीं जाते, और तब पुकारने वाला एक रोमी सूबेदार होता है। मरकुस में सामर्थ्य सेवा के लिए झुकती है, और महिमा मृत्यु के रास्ते आती है।
बाइबल मरकुस के सुसमाचार के बारे में क्या कहती है?
मरकुस अपनी पुस्तक की नींव पहले ही वाक्य में रख देता है: "परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ" (मरकुस 1:1)। यह केवल शीर्षक नहीं, यह घोषणा है। रोमी दुनिया में "सुसमाचार" शब्द सम्राट की जीत या उसके सिंहासन पर बैठने की खबर के लिए इस्तेमाल होता था, और "परमेश्वर का पुत्र" कैसर की उपाधि थी। मरकुस पहली पंक्ति में ही राजद्रोह जैसी बात कह देता है: असली राजा यह है, और असली अच्छी खबर यह है। ध्यान दीजिए कि वह "आरम्भ" शब्द इस्तेमाल करता है, मानो यह पुस्तक ख़त्म नहीं होती, बल्कि पढ़ने वाले के जीवन में आगे चलती रहती है।
फिर यीशु का पहला उपदेश आता है, और मरकुस उसे बहुत संक्षेप में सार रूप में देता है: "समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो" (मरकुस 1:15)। चार बातें एक साथ। इतिहास की घड़ी पूरी हो चुकी है, परमेश्वर का राज्य दूर की आशा नहीं बल्कि आ पहुँची हकीकत है, इसलिए मन फिराना ज़रूरी है, और मन फिराना सूखी पश्चाताप-भावना नहीं बल्कि एक खुशखबरी पर भरोसा रखकर मुड़ना है। मरकुस के अनुसार मसीही जीवन की शुरुआत नियमों की सूची से नहीं, एक व्यक्ति के आगमन से होती है।
इसके बाद आठ अध्यायों तक यीशु काम करते हैं: दुष्टात्माएँ निकलती हैं, कोढ़ी शुद्ध होते हैं, लकवे का रोगी चलता है, तूफ़ान थमता है, हज़ारों खाते हैं। और चेले हर बार एक ही सवाल पर लौटते हैं: "यह कौन है, कि आँधी और पानी भी उसकी आज्ञा मानते हैं?" (मरकुस 4:41)। पूरी पुस्तक इसी प्रश्न पर टिकी है। ठीक बीच में, कैसरिया फिलिप्पी के रास्ते पर, यीशु खुद पूछते हैं और पतरस उत्तर देता है: "तू मसीह है" (मरकुस 8:29)। यह सही उत्तर है, पर अधूरा है, क्योंकि अगले ही क्षण जब यीशु दुःख उठाने और मारे जाने की बात करते हैं, पतरस उन्हें झिड़कने लगता है।
यहीं मरकुस का असली पासा पलटता है। यीशु मसीह हैं, पर उस तरह के नहीं जैसा कोई चाहता था। इसकी सबसे साफ़ व्याख्या यीशु स्वयं देते हैं: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे" (मरकुस 10:45)। यह पद पूरी पुस्तक का दिल है। सामर्थ्य का लक्ष्य दबदबा नहीं, छुड़ौती है।
और अंत में वह क्षण आता है जिसके लिए मरकुस ने पन्द्रह अध्याय तैयारी की थी। यीशु क्रूस पर प्राण त्यागते हैं, मन्दिर का परदा फटता है, और एक बुतपरस्त रोमी अफ़सर कहता है: "सचमुच यह मनुष्य, परमेश्वर का पुत्र था!" (मरकुस 15:39)। पुस्तक के पहले पद का दावा अब एक चश्मदीद के मुँह से निकलता है, और वह चश्मदीद कोई प्रेरित नहीं, फाँसी देने वाली टुकड़ी का अधिकारी है। कब्र खाली होने के बाद जो आदेश मिलता है, वह इसी घोषणा को दुनिया भर में फैलाने का है: "तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो" (मरकुस 16:15)।
लेखक, समय और परिस्थितियाँ
पुस्तक अपने भीतर लेखक का नाम नहीं देती, पर आरम्भिक कलीसिया की गवाही एक स्वर में यूहन्ना मरकुस की ओर इशारा करती है। दूसरी सदी के पापियास ने, जो प्रेरितों के शिष्यों से जुड़ा था, लिखा कि मरकुस पतरस का दुभाषिया था और उसने पतरस के प्रचार को ध्यान से लिखकर सुरक्षित रखा। इरिनियस, क्लेमेंट और बाद के लेखक इसी परम्परा को दोहराते हैं। कोई कारण नहीं था कि कलीसिया एक ऐसी पुस्तक को, जिसका लेखक अज्ञात रह जाता, एक गैर-प्रेरित और कभी असफल हो चुके व्यक्ति के नाम से जोड़ती, जब तक कि यह सचमुच सच न होता।
यूहन्ना मरकुस का घर यरूशलेम में था, और प्रेरितों के काम 12:12 बताता है कि जब पतरस जेल से छूटकर आए, तो प्रार्थना करती हुई कलीसिया मरकुस की माँ मरियम के घर में इकट्ठी थी। यानी यह नौजवान पतरस को बचपन से जानता था। फिर वह पौलुस और बरनबास के साथ पहली मिशन यात्रा पर गया और बीच में ही छोड़कर लौट आया (प्रेरितों के काम 13:13)। दूसरी यात्रा से पहले इसी बात पर पौलुस और बरनबास के बीच इतनी तीखी तकरार हुई कि दोनों अलग हो गए (प्रेरितों के काम 15:37-39)। यह मरकुस के जीवन का सबसे शर्मनाक अध्याय था।
पर कहानी वहीं नहीं रुकी। सालों बाद कैद में बैठा पौलुस तीमुथियुस को लिखता है: "मरकुस को लेकर चला आ: क्योंकि सेवा के लिये वह मेरे बहुत काम का है" (2 तीमुथियुस 4:11)। कुलुस्सियों 4:10 में वह मरकुस को अपना सहकर्मी मानता है, और पतरस अपनी पहली पत्री के अंत में उसे "मेरा पुत्र" कहकर पुकारता है। सोचिए: जो चेला मैदान छोड़कर भागा था, वही उस सुसमाचार का लेखक बना जिसमें चेले बार-बार असफल होते हैं और फिर भी बुलाए जाते हैं।
भागा हुआ सेवक फिर से भेजा गया।
पुस्तक के भीतर के संकेत बताते हैं कि यह गैर-यहूदी पाठकों, विशेषकर रोम के मसीहियों, के लिए लिखी गई। मरकुस यहूदी रीति-रिवाजों को समझाता है (मरकुस 7:3-4), अरामी शब्दों का अनुवाद करता है जैसे "तलीता कूमी" और "इलोई, इलोई, लमा शबक्तनी", और लैटिन से आए शब्द बेझिझक इस्तेमाल करता है। वह कुरेनी शमौन के बेटों सिकन्दर और रूफुस के नाम ऐसे लेता है मानो पाठक उन्हें जानते हों, और रोमियों 16:13 में एक रूफुस का नाम मिलता भी है।
समय के बारे में विद्वानों में मतभेद है, पर अधिकतर इसे लगभग 55 से 70 ईस्वी के बीच रखते हैं, और सबसे अधिक संभावना नीरो के अत्याचार के आसपास, यानी पतरस की शहादत के ठीक पहले या बाद की है। यही परिस्थिति इस पुस्तक के तेवर की व्याख्या करती है। जिस कलीसिया के लोग गिरफ़्तार हो रहे हों, उसे लम्बे धर्मशास्त्रीय निबंध की नहीं, एक ऐसे मसीह की ज़रूरत है जो दुःख उठाना जानता है और जिसने कहा था कि अपना क्रूस उठाकर पीछे हो लो।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
मरकुस अपनी पुस्तक पुराने नियम के दो हवालों से शुरू करता है, और यह संयोग नहीं है। मलाकी 3:1 का दूत जो मार्ग तैयार करेगा, और यशायाह 40:3 की जंगल में पुकारती आवाज़ जो कहती है "प्रभु का मार्ग तैयार करो", दोनों एक साथ रखे जाते हैं। यशायाह 40 बेबीलोन की बंधुआई से लौटने का अध्याय है, नई निर्गमन की घोषणा। मरकुस कह रहा है कि यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के साथ वह लम्बी प्रतीक्षा खत्म हो रही है: परमेश्वर स्वयं अपने लोगों को छुड़ाने आ रहे हैं, और छुड़ाने वाले का नाम यीशु है।
पूरे पुराने नियम में एक धारा बहती है जिसे यशायाह "यहोवा का दास" कहता है। यशायाह 42:1 में परमेश्वर कहते हैं, "देखो, यह मेरा सेवक जिसे मैं संभाले हूँ, मेरा चुना हुआ, जिससे मेरा जी प्रसन्न है।" यीशु के बपतिस्मे पर आकाश से जो शब्द आता है, "तू मेरा प्रिय पुत्र है, तुझ से मैं प्रसन्न हूँ", वह उसी सेवक-गीत की गूँज है। और यशायाह 53 में वह सेवक कुचला जाता है, चुप रहता है, बहुतों के पाप का बोझ उठाता है, "वह अपने ही ज्ञान के द्वारा बहुतों को धर्मी ठहराएगा; क्योंकि वह उनके अधर्म के कामों का बोझ आप उठा लेगा।" मरकुस 10:45 का "बहुतों की छुड़ौती" ठीक इसी "बहुतों" को उठा लेता है।
दूसरी ओर दानिय्येल 7 है, जहाँ "मनुष्य के सन्तान सा कोई" आकाश के बादलों के साथ आता है और उसे ऐसा राज्य दिया जाता है जो कभी नष्ट नहीं होगा। यीशु अपने लिए सबसे अधिक यही उपाधि, "मनुष्य का पुत्र", इस्तेमाल करते हैं, और महायाजक के सामने खुलकर दानिय्येल की भविष्यवाणी अपने ऊपर लागू करते हैं। मरकुस की प्रतिभा यह है कि वह दो ऐसी आकृतियों को एक व्यक्ति में जोड़ देता है जिन्हें कोई जोड़ने की कल्पना नहीं करता था: बादलों पर आने वाला राजा और वध किए जाने वाला सेवक। मरकुस 10:45 में दोनों एक ही वाक्य में मिलते हैं।
छुड़ौती का विचार भी पुराना है। निर्गमन में फसह का मेम्ना, लैव्यव्यवस्था में बलिदान, दासों को छुड़ाने के लिए दी जाने वाली कीमत, ये सब इस ओर बढ़ते हैं। यीशु अन्तिम भोज में कटोरा उठाकर वाचा के लहू की बात करते हैं, और मरकुस पाठक को यरमियाह 31 की नई वाचा तक ले जाता है।
नए नियम में यही ढाँचा आगे चलता है। प्रेरितों के काम 10 में पतरस कुरनेलियुस के घर जो उपदेश देता है, उसकी रूपरेखा लगभग मरकुस की रूपरेखा है: यूहन्ना का बपतिस्मा, गलील से आरम्भ, भलाई करते फिरना, क्रूस, तीसरे दिन जी उठना, और फिर गवाही देने का आदेश। पौलुस फिलिप्पियों 2 में उसी सेवक का गीत गाता है जिसने अपने आप को दीन किया और मृत्यु तक आज्ञाकारी रहा। सब कुछ मसीह में आकर पूरा होता है, और मरकुस चाहता है कि आप उसे दूर से न देखें बल्कि उसके पीछे चलें।
रचना और मुख्य विषय
मरकुस की बनावट आश्चर्यजनक रूप से सुगठित है, भले ही उसकी शैली तेज़ और बेतकल्लुफ़ लगे। पुस्तक साफ़ तौर पर दो हिस्सों में बँटी है, और इनके बीच का कब्ज़ा कैसरिया फिलिप्पी की वह घटना है जहाँ पतरस कहता है "तू मसीह है"। उससे पहले के आठ अध्याय गलील में हैं और मुख्य प्रश्न है "यह कौन है?" उसके बाद के अध्याय यरूशलेम की ओर बढ़ते हैं और मुख्य प्रश्न है "यह मसीह करेगा क्या?" पहले भाग में भीड़ है, चमत्कार हैं, विरोध बढ़ता है। दूसरे भाग में सड़क है, शिक्षा है, और क्रूस की छाया लम्बी होती जाती है।
मरकुस ने इस मध्यवर्ती हिस्से को, अध्याय 8 से 10 तक, बड़े कौशल से दो अंधों की चंगाई के बीच रखा है। बैतसैदा का अंधा दो चरणों में चंगा होता है, पहले लोग उसे पेड़ों जैसे चलते दिखते हैं, फिर सब कुछ साफ़ दिखता है (मरकुस 8:22-26)। इसके तुरन्त बाद पतरस आधा सही उत्तर देता है। और इस हिस्से के अंत में यरीहो का बरतिमाई चंगा होकर "यीशु के पीछे मार्ग में हो लिया" (मरकुस 10:52)। बीच में तीन बार यीशु अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान की भविष्यवाणी करते हैं, और तीनों बार चेले ठीक उसके बाद कुछ बेतुका करते हैं: पतरस झिड़कता है, चेले आपस में झगड़ते हैं कि कौन बड़ा है, याकूब और यूहन्ना महिमा में ऊँची कुर्सियाँ माँगते हैं। और तीनों बार यीशु उन्हें चेलेपन का पाठ पढ़ाते हैं, जिसकी चोटी मरकुस 10:45 है।
अधूरी दृष्टि भी दृष्टि है, पर वहाँ रुकना नहीं है।
मुख्य विषयों में सबसे पहला है तात्कालिकता। "तुरन्त" शब्द मरकुस में चालीस से अधिक बार आता है। यह सुसमाचार दौड़ता है, क्योंकि सेवक के पास सुस्ताने का समय नहीं। दूसरा विषय वह है जिसे लोग "मसीही भेद" कहते हैं: यीशु बार-बार चंगे हुए लोगों और दुष्टात्माओं को चुप रहने का आदेश देते हैं। कारण यह नहीं कि वे अपनी पहचान छिपाना चाहते थे, बल्कि यह कि लोग "मसीह" शब्द से एक राजनीतिक मुक्तिदाता समझ लेते, और अधूरी समझ खतरनाक होती है। पूरा सत्य क्रूस के बिना कहा ही नहीं जा सकता था।
तीसरा विषय चेलों की नाकामी है। किसी और सुसमाचार में बारह चेले इतने मंदबुद्धि और डरपोक नहीं दिखते। यह क्रूरता नहीं, कृपा है, क्योंकि इसे लिखने वाला खुद एक बार भाग चुका था और सताव झेल रही रोमी कलीसिया के बहुत से लोग डर से डगमगा रहे थे।
चौथा विषय क्रूस का केन्द्रीय स्थान है। पुस्तक के सोलह अध्यायों में से लगभग छह अन्तिम सप्ताह को समर्पित हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि मरकुस एक लम्बी भूमिका वाला दुःखभोग का वृत्तान्त है। और मरकुस दो जगह एक ही असामान्य क्रिया इस्तेमाल करता है, "फटना": बपतिस्मे पर आकाश फटता है (मरकुस 1:10) और मृत्यु पर मन्दिर का परदा फटता है (मरकुस 15:38)। ऊपर से खुलता परमेश्वर, नीचे तक खुलता रास्ता।
अंत में पुस्तक का समापन। सबसे प्राचीन यूनानी हस्तलिपियाँ मरकुस 16:8 पर समाप्त होती हैं, जहाँ स्त्रियाँ डरकर भागती हैं। बाद की परम्परा में जो लम्बा अंत जुड़ा है, उसमें पुनरुत्थान के दर्शन और महान आदेश शामिल हैं। इस पर आगे विस्तार से बात करेंगे, पर इतना जान लें कि मरकुस का अचानक रुकना अपने आप में एक निमंत्रण है: कहानी अब पढ़ने वाले के हाथ में है।
इस पुस्तक के मुख्य पद
पहला, मरकुस 1:15: "समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।" यीशु के मुँह से मरकुस में जो पहले शब्द निकलते हैं, वही उनके पूरे सन्देश का सार हैं। "समय पूरा हुआ" का अर्थ है कि परमेश्वर ने घड़ी खुद चलाई थी और अब अलार्म बजा है। "राज्य निकट आ गया" का अर्थ है कि राजा की उपस्थिति में राज्य पहुँच चुका है, हालाँकि उसकी पूर्णता अभी आनी है। और ध्यान दीजिए कि आदेश दो हैं, पर वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मन फिराना केवल बुरी आदतें छोड़ना नहीं, दिशा बदलना है। और विश्वास करना खाली आशावाद नहीं, एक खबर पर भरोसा करना है। कृपा पहले आती है, माँग बाद में, क्योंकि जिस राज्य में आपको बुलाया जा रहा है, वह आपकी मेहनत का इनाम नहीं बल्कि परमेश्वर का काम है।
दूसरा, मरकुस 10:45: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे।" यह वाक्य उस बातचीत के अंत में आता है जहाँ चेले ऊँचे पदों के लिए लड़ रहे थे। यीशु पहले बताते हैं कि अन्यजातियों के शासक लोगों पर हुकूमत जताते हैं, फिर कहते हैं कि तुम में ऐसा नहीं होगा। और फिर वे अपने ही जीवन को नाप के रूप में सामने रखते हैं। "छुड़ौती" वह कीमत थी जो किसी दास या बन्दी को छुड़ाने के लिए चुकाई जाती थी। यीशु की मृत्यु दुर्घटना नहीं थी, न सिर्फ़ एक प्रेरणादायक बलिदान; वह एक अदायगी थी, "बहुतों" की जगह ली गई एक कीमत। यहाँ सुसमाचार का हृदय धड़कता है।
तीसरा, मरकुस 15:39: "सचमुच यह मनुष्य, परमेश्वर का पुत्र था!" यह पुस्तक का चरम बिन्दु है। मरकुस ने 1:1 में जो दावा किया था, वह अब एक मनुष्य के होठों से निकलता है, और वह मनुष्य यहूदी धर्मगुरु नहीं, कोई चेला नहीं, बल्कि वह रोमी अफ़सर है जिसने शायद कीलें ठोंकने का हुक्म दिया था। उसने कोई चमत्कार होते नहीं देखा, कोई स्वर्गदूत नहीं देखा। उसने केवल एक आदमी को मरते देखा, और उसी में परमेश्वर को पहचान लिया। मरकुस अपने रोमी पाठकों से कह रहा है कि जो सूबेदार के लिए सम्भव था, वह तुम्हारे लिए भी सम्भव है। और वह हमसे कह रहा है कि यदि आप यीशु को क्रूस पर नहीं पहचानते, तो आपने उन्हें कहीं भी ठीक से नहीं पहचाना।
चारों सुसमाचारों में मरकुस की जगह
बाइबल में मरकुस दूसरे स्थान पर रखा गया है, पर बहुत सम्भावना है कि लिखा वह पहले गया था। मत्ती और लूका दोनों में मरकुस की सामग्री का बड़ा हिस्सा मिलता है, अक्सर उसी क्रम में, और कई जगह लगभग उन्हीं शब्दों में। इसका सीधा-सा अर्थ यह नहीं कि किसी ने नकल की; इसका अर्थ यह है कि आरम्भिक कलीसिया के पास एक सुव्यवस्थित, भरोसेमंद वृत्तान्त था जिसे बाद के लेखकों ने अपने पाठकों की ज़रूरत के अनुसार आगे बढ़ाया।
चारों सुसमाचार एक ही मसीह को चार कोणों से दिखाते हैं। मत्ती यहूदी पाठकों को राजा दिखाता है जो भविष्यवाणियाँ पूरी करता है। लूका डॉक्टर की सजगता से उस मनुष्य को दिखाता है जो खोए हुओं, स्त्रियों और गरीबों की ओर झुकता है। यूहन्ना धीमी, गहरी आवाज़ में परमेश्वर के अनन्त वचन को दिखाता है। और मरकुस? मरकुस वह सेवक दिखाता है जो काम करता है। इसीलिए उसमें लम्बे उपदेश कम हैं और कर्म ज़्यादा; इसीलिए उसमें वंशावली नहीं, क्योंकि सेवक की वंशावली कौन पूछता है।
कैनन में मरकुस की भूमिका संतुलन की है। उसके बिना हम मसीह को केवल शिक्षक या केवल धर्मशास्त्र के विषय के रूप में देखने का जोखिम उठाते। मरकुस हमें पसीना, भीड़, थकान, आँसू और खून वापस देता है। वह हमें याद दिलाता है कि हमारा उद्धार किसी विचार से नहीं, एक व्यक्ति के जीवन और मृत्यु से हुआ।
दर्पण
अब सीधे आपसे बात। आप चाहते हैं कि यीशु तूफ़ान शांत करें, और यह गलत नहीं है। पर मरकुस आपसे पूछता है: क्या आप उस यीशु के पीछे चलने को तैयार हैं जो तूफ़ान शांत करने के कुछ ही समय बाद कहते हैं कि अपना क्रूस उठाओ? आप शायद प्रार्थना कर रहे हैं कि नौकरी में तरक्की मिले, कि बीमारी की रिपोर्ट ठीक आए, कि घर में तनाव खत्म हो। मरकुस आपकी प्रार्थनाओं का मज़ाक नहीं उड़ाता; यीशु खुद गतसमनी में काँपते हुए कहते हैं कि यह कटोरा हटा लीजिए। पर वे वाक्य वहीं नहीं छोड़ते, वे जोड़ते हैं कि जैसा आप चाहते हैं वही हो।
पैसे के मामले में मरकुस बेरहमी से साफ़ है। एक धनी जवान आता है, सब कुछ सही करता है, और एक चीज़ पर टूट जाता है। यीशु ने उससे प्रेम किया, और फिर भी उसे जाने दिया। क्या ऐसी कोई चीज़ है जिसे छोड़ने की बात सोचकर आपका पेट सिकुड़ जाता है?
काम की जगह पर आप शायद इस डर में जीते हैं कि कोई आपका श्रेय न छीन ले। परिवार में शायद आप गिन रहे हैं कि किसने कितना किया। मरकुस 10:43 का वाक्य सीधे इसी हिसाब-किताब पर हाथ रखता है: जो बड़ा होना चाहे, वह सेवक बने। यह कमज़ोरी की सलाह नहीं, राज्य का उलटा गणित है।
और यदि आप अकेले हैं, यदि आपने कभी दबाव में मसीह को अनदेखा किया है, यदि आपके भीतर पतरस की तरह आँसुओं वाली एक रात दफ़्न है, तो मरकुस 16 का वह छोटा-सा वाक्य याद रखिए जहाँ स्वर्गदूत कहता है कि जाकर चेलों और पतरस से कहो। उस सुसमाचार में जहाँ हर चेला असफल होता है, नाम लेकर बुलाया गया वही है जिसने सबसे बुरी तरह इनकार किया था। आपकी असफलता आपकी अन्तिम पहचान नहीं है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को मरकुस बहुत भाता है, क्योंकि इसमें कहानियाँ तेज़ी से चलती हैं और कुछ न कुछ हमेशा हो रहा होता है। शुरुआत ऐसे कीजिए: "यह एक ऐसे राजा की किताब है जो ताज पहनकर बैठा नहीं रहा, बल्कि आस्तीन चढ़ाकर लोगों की मदद करने निकल पड़ा।" बच्चों को बताइए कि यीशु ने बीमारों को छुआ, तूफ़ान से कहा कि चुप हो जा, और भूखी भीड़ को खाना खिलाया। फिर सबसे ज़रूरी बात जोड़िए: यीशु ने यह सब इसलिए किया क्योंकि वे हमसे प्रेम करते हैं, और सबसे बड़ा काम उन्होंने क्रूस पर किया, जहाँ उन्होंने हमारे लिए अपनी जान दे दी और फिर तीसरे दिन जी उठे।
छोटे बच्चों के लिए "सेवक" शब्द को घर की भाषा में उतारिए: जो सबसे पहले उठकर दूसरों की थाली लगाता है, जो बिना शिकायत के बर्तन उठाता है। बड़े बच्चों के साथ आप वह सवाल पूछ सकते हैं जो चेलों ने नाव में पूछा था, "यह कौन है?", और उन्हें पूरे सुसमाचार में उत्तर खोजने दीजिए। किशोरों के साथ ईमानदार रहिए कि यीशु के सबसे करीबी दोस्त भी डर गए थे और भाग गए थे, और यह कि उन्हें फिर भी माफ़ किया गया।
Faith.network पर मरकुस के सुसमाचार की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए सरल चित्रात्मक कहानियाँ, सात से बारह साल के बच्चों के लिए प्रश्नोत्तर के साथ गहराई, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए वे कठिन सवाल जो वे सचमुच पूछते हैं। घर में पढ़ने के लिए इन्हें साथ लेकर चलिए।
मरकुस पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
सबसे पहला सुझाव सबसे सरल है: मरकुस को एक ही बैठक में पढ़िए। इसमें लगभग डेढ़ घंटा लगता है, उतना ही जितना एक फ़िल्म में। यह पुस्तक टुकड़ों में पढ़ने के लिए नहीं, ज़ोर से सुनाने के लिए लिखी गई थी, और जब आप इसे एक साँस में पढ़ते हैं तो उसकी गति और उसका ढलान आप खुद महसूस करेंगे। यदि सम्भव हो तो किसी और के साथ बैठकर ज़ोर से पढ़िए, बारी-बारी से, जैसे रोम के उस कमरे में पढ़ा गया होगा।
इसके बाद चार हफ़्तों की एक धीमी यात्रा कीजिए। पहले हफ़्ते अध्याय 1 से 4 पढ़िए और हर दिन यह प्रश्न लिखिए कि इस भाग में यीशु के अधिकार का कौन-सा पहलू दिखा। दूसरे हफ़्ते अध्याय 5 से 8 पढ़िए और नाव में उठा वह प्रश्न अपने साथ लिए चलिए, "यह कौन है?" तीसरे हफ़्ते अध्याय 9 से 12 पढ़िए, जहाँ यीशु यरूशलेम की ओर बढ़ते हैं, और हर बार जब चेले कुछ गलत समझते हैं, रुककर पूछिए कि मैं इसी गलती को कहाँ दोहराता हूँ। चौथे हफ़्ते अध्याय 13 से 16 पढ़िए, धीरे-धीरे, दुःखभोग के वृत्तान्त को जल्दबाज़ी में मत निपटाइए।
पढ़ते समय तीन शब्दों पर निशान लगाइए। पहला, "तुरन्त", जो आपको इस सेवक की व्यस्तता दिखाएगा। दूसरा, "मनुष्य का पुत्र", जो हर बार दानिय्येल 7 और यशायाह 53 दोनों की ओर इशारा करता है। तीसरा, "मार्ग" या "पीछे हो ले", क्योंकि मरकुस के लिए चेलापन कोई कक्षा नहीं, एक सड़क है।
नए विश्वासियों को बाइबल पढ़ना शुरू करने के लिए मरकुस से बेहतर जगह कम ही है। जो व्यक्ति मसीह के बारे में पूछताछ कर रहा है, उसे यह पुस्तक दीजिए और कहिए कि पढ़कर बताइए कि आपको यह आदमी कैसा लगा। छोटे समूहों के लिए अध्याय 8 से 10 का हिस्सा सबसे उपजाऊ है, क्योंकि वहाँ सेवा, नम्रता, विवाह, धन और महत्वाकांक्षा सब एक साथ आते हैं।
अंत में, पढ़ने को प्रार्थना में बदलिए। बरतिमाई की पुकार दिन भर दोहराने लायक है, और उस पिता की प्रार्थना भी जिसने कहा था कि मैं विश्वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर। मरकुस आपसे परिपूर्ण विश्वास की माँग नहीं करता, केवल ईमानदार विश्वास की।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मरकुस का सुसमाचार किसने लिखा था?
पुस्तक अपने भीतर लेखक का नाम नहीं बताती, पर आरम्भिक कलीसिया की एकमत गवाही यूहन्ना मरकुस की ओर इशारा करती है, जो यरूशलेम का निवासी, बरनबास का रिश्तेदार और पतरस का घनिष्ठ सहयोगी था। दूसरी सदी के पापियास के अनुसार मरकुस ने पतरस के प्रचार को ध्यानपूर्वक लिखकर सुरक्षित रखा। इसी कारण मरकुस में पतरस से जुड़े ब्यौरे इतने जीवन्त और कभी-कभी पतरस के लिए इतने असुविधाजनक हैं, जैसा कोई चश्मदीद ही ईमानदारी से बता सकता है।
मरकुस का सुसमाचार कब लिखा गया था?
अधिकांश विद्वान इसे लगभग 55 से 70 ईस्वी के बीच रखते हैं, और सबसे प्रबल मत यह है कि यह नीरो के सताव के आसपास, यानी साठ के दशक में, रोम में लिखा गया। पतरस की शहादत के ठीक पहले या उसके तुरन्त बाद का समय इसकी परिस्थितियों से सबसे अच्छा मेल खाता है। यरूशलेम के मन्दिर के विनाश का उल्लेख पुस्तक में पूरी हो चुकी घटना के रूप में नहीं मिलता, जो इसे 70 ईस्वी से पहले रखने का एक और कारण देता है।
क्या मरकुस सबसे पहले लिखा गया सुसमाचार है?
बहुत सम्भव है, हालाँकि यह विश्वास का प्रश्न नहीं बल्कि इतिहास का अनुमान है। मत्ती और लूका दोनों में मरकुस की लगभग सारी सामग्री मिलती है, अक्सर उसी क्रम और भाषा में, जिससे अधिकांश विद्वान यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मरकुस पहले लिखा गया और बाकी दोनों ने उसे जाना। परम्परा में कुछ आवाज़ें मत्ती को पहले रखती हैं। किसी भी स्थिति में मरकुस की विश्वसनीयता और अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
मरकुस का सुसमाचार किसके लिए लिखा गया था?
सारे संकेत गैर-यहूदी, विशेषकर रोमी पाठकों की ओर जाते हैं। मरकुस यहूदी रीति-रिवाजों को समझाकर बताता है, अरामी वाक्यों का अनुवाद देता है, और लैटिन से आए शब्द सहजता से इस्तेमाल करता है। वह कुरेनी शमौन के बेटों के नाम ऐसे लेता है मानो पाठक उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते हों। इन पाठकों के सामने सताव था, इसलिए उन्हें ऐसे मसीह की ज़रूरत थी जो दुःख उठाना जानते हैं और जिन्होंने अपने पीछे चलने वालों को क्रूस उठाने के लिए बुलाया।
मरकुस 16:9 से 20 के बारे में विवाद क्यों है?
सबसे प्राचीन और भरोसेमंद यूनानी हस्तलिपियाँ मरकुस 16:8 पर समाप्त हो जाती हैं, और कुछ पुराने लेखक इन अन्तिम पदों को नहीं जानते। इसीलिए अधिकतर बाइबल संस्करणों में यहाँ एक टिप्पणी दी जाती है। ध्यान देने की बात यह है कि इन पदों में कोई भी सत्य ऐसा नहीं जो नए नियम में कहीं और न हो: पुनरुत्थान, दर्शन, और सुसमाचार सुनाने का आदेश मत्ती, लूका, यूहन्ना और प्रेरितों के काम में स्पष्ट रूप से मिलते हैं। इस अंश के आधार पर कोई असाधारण सिद्धांत गढ़ना बुद्धिमानी नहीं।
मरकुस 16:15 का क्या अर्थ है?
"तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो" वह आदेश है जो पूरी पुस्तक की दिशा को पाठक की ओर मोड़ देता है। मरकुस ने दिखाया कि सूबेदार ने क्रूस के नीचे मसीह को पहचाना; अब वही खबर हर जाति तक पहुँचनी है। "सारी सृष्टि" शब्द सीमाएँ तोड़ देता है, चाहे वे जातीय हों, सांस्कृतिक हों या सामाजिक। यह आदेश केवल मिशनरियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जिसने खुद यह खबर पाई है।
मसीही भेद क्या है और यीशु लोगों को चुप रहने को क्यों कहते थे?
मरकुस में यीशु बार-बार चंगे हुए लोगों, दुष्टात्माओं और चेलों को अपनी पहचान के बारे में चुप रहने का आदेश देते हैं। इसका कारण छिपाव नहीं, समय और समझ है। उस दौर में "मसीह" शब्द सुनते ही अधिकांश लोग एक राजनीतिक मुक्तिदाता की कल्पना करते थे जो रोम को उखाड़ फेंकेगा। यीशु नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान एक अधूरी और विकृत तस्वीर में कैद हो जाए। पूरा सत्य क्रूस के बिना कहा ही नहीं जा सकता था, इसलिए पूरी घोषणा गोलगोथा तक रोकी गई।
मरकुस का मुख्य पद कौन सा है?
अधिकांश पाठक मरकुस 10:45 को पुस्तक का केन्द्रीय पद मानते हैं, क्योंकि उसमें यीशु स्वयं अपने आने का उद्देश्य बताते हैं: सेवा करना और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण देना। यह पद दो हिस्सों को जोड़ता है, यशायाह के दुःख उठाने वाले सेवक को और दानिय्येल के मनुष्य के पुत्र को। इसके साथ मरकुस 1:1, मरकुस 1:15 और मरकुस 15:39 को रखिए, तो आपके पास पूरी पुस्तक का ढाँचा आ जाता है।
क्या मरकुस ने यीशु को अपनी आँखों से देखा था?
वह बारह चेलों में नहीं था, पर यरूशलेम में उसकी माँ का घर आरम्भिक कलीसिया का ठिकाना था, इसलिए यह पूरी तरह सम्भव है कि उसने यीशु को देखा हो। कई पाठक मरकुस 14:51-52 के उस बेनाम जवान को, जो गिरफ़्तारी की रात चादर छोड़कर नंगा भाग गया, स्वयं लेखक मानते हैं, क्योंकि यह अजीब-सा ब्यौरा और किसी सुसमाचार में नहीं है। चाहे जो हो, मरकुस की असली नींव पतरस की चश्मदीद गवाही है।
मरकुस और मत्ती में क्या अंतर है?
मत्ती मुख्यतः यहूदी पाठकों के लिए लिखता है, पुराने नियम की भविष्यवाणियों पर बार-बार लौटता है और यीशु को राजा तथा नया मूसा दिखाता है, इसलिए उसमें पहाड़ी उपदेश जैसे लम्बे शिक्षा-खंड हैं। मरकुस छोटा, तेज़ और कर्म-प्रधान है, गैर-यहूदी पाठकों के लिए लिखा गया, और उसमें यीशु का चित्र उस सेवक का है जो लगातार काम में लगा है। मत्ती में बचपन की कहानी और वंशावली है, मरकुस सीधे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से शुरू होता है।
"मनुष्य का पुत्र" का मरकुस में क्या अर्थ है?
यह यीशु का अपने लिए सबसे प्रिय पदनाम है और इसके दो पहलू हैं। एक ओर यह साधारण मनुष्यता की ओर इशारा करता है, दूसरी ओर यह दानिय्येल 7 की उस भव्य आकृति की ओर, जो आकाश के बादलों के साथ आती है और जिसे अनन्त राज्य दिया जाता है। मरकुस में यही मनुष्य का पुत्र पापों को क्षमा करता है, सब्त का प्रभु है, और साथ ही दुःख उठाता, मारा जाता और तीसरे दिन जी उठता है। दोनों पहलू मरकुस 10:45 में एक साथ आते हैं।
नए विश्वासी को मरकुस से क्यों शुरू करना चाहिए?
क्योंकि यह सबसे छोटा सुसमाचार है, लगभग डेढ़ घंटे में पढ़ा जा सकता है, और इसकी भाषा सीधी है। यह यहूदी पृष्ठभूमि की लम्बी जानकारी माँगे बिना पाठक को सीधे यीशु के सामने खड़ा कर देता है और बार-बार वही प्रश्न उठाता है जो हर नए पाठक के मन में होता है: यह व्यक्ति आख़िर कौन है। साथ ही यह ईमानदारी से दिखाता है कि यीशु के सबसे करीबी लोग भी धीमे और डरपोक थे, जो शुरुआत करने वालों के लिए बड़ी राहत की बात है।
अंत में
मरकुस उस मसीह का परिचय देता है जो पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने तक चलता रहता है, और जिसका हर सामर्थी काम एक ही दिशा में उँगली उठाता है। तूफ़ान इसलिए थमा कि आप जान लें वह कौन है; रोटियाँ इसलिए बढ़ीं कि आप भरोसा करना सीखें; कब्र इसलिए खाली हुई कि आपका डर आख़िरी शब्द न कहे। पर इन सबका केन्द्र गोलगोथा है, जहाँ एक रोमी सैनिक ने वह कहा जो पूरी पुस्तक कहलवाना चाहती थी।
इसलिए मरकुस पढ़ने का सही तरीका यह नहीं कि आप चमत्कारों की सूची बनाएँ, बल्कि यह कि आप उस सड़क पर चलें जिस पर यह सेवक चला। आगे के अध्ययन के लिए यशायाह 53 को मरकुस के दुःखभोग वृत्तान्त के साथ पढ़िए, और फिर प्रेरितों के काम में देखिए कि वही खबर कैसे पूरे संसार में फैली।
जो क्रूस पर पहचाना जाता है, वही सिंहासन पर राज करता है।
और यदि आज आप थके हैं, तो याद रखिए कि यह पुस्तक उस व्यक्ति ने लिखी जो कभी सेवा छोड़कर भाग गया था। कृपा दूसरी शुरुआत देती है, और मरकुस इसका जीता-जागता प्रमाण है।
