उत्पत्ति की पुस्तक: सृष्टि से लेकर वाचा तक का सार
परिचय
किसी बुज़ुर्ग को अपने परिवार की कहानी सुनाते हुए सुनिए। वे कहीं दूर से शुरू करते हैं, किसी परदादा से, किसी गाँव से, किसी अकाल या बँटवारे से, और आप बीच में सोचते हैं कि इन सब नामों का मुझसे क्या लेना-देना। फिर अचानक वे रुककर आपकी आँखों में देखते हैं और कहते हैं, "और इसी वजह से आज तुम यहाँ हो।" उस एक वाक्य में सारे नाम जीवित हो उठते हैं।
उत्पत्ति की पुस्तक ठीक ऐसी ही है। बहुत लोग इसका पहला अध्याय श्रद्धा से पढ़ते हैं, और पाँचवें अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते नामों की सूची में थक जाते हैं। पर वे नाम बेकार नहीं हैं। वे एक रास्ता हैं, और वह रास्ता एक व्यक्ति तक जाता है।
इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि उत्पत्ति किसने, कब और क्यों लिखी, यह कैसे बनी है, इसके मुख्य विषय और मुख्य पद क्या हैं, और यह पूरी बाइबल में कहाँ बैठती है। और सबसे बढ़कर, आप देखेंगे कि इसकी हर पंक्ति किस ओर इशारा कर रही है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लेख उत्पत्ति को "शुरुआत की किताब" कहकर सृष्टि, पाप और जलप्रलय की चर्चा तक सीमित रह जाते हैं। हम इसे दूसरी तरह पढ़ेंगे। उत्पत्ति स्वयं को बार-बार "वंशावली" कहती है, और यह संयोग नहीं है। यह पुस्तक एक वंश की खोज है: वह वंश जिसका वादा सर्प के सामने किया गया, जो नूह में बचाया गया, इब्राहीम को सौंपा गया, और यहूदा के गोत्र में सुरक्षित रखा गया। इसलिए हम उत्पत्ति को उत्तरों की सूची की तरह नहीं, बल्कि अनुग्रह की वंशावली की तरह पढ़ेंगे, जो सीधे यीशु मसीह पर जाकर रुकती है। यही दृष्टिकोण नामों को जीवित कर देता है।
बाइबल उत्पत्ति की पुस्तक के बारे में क्या कहती है?
इब्रानी बाइबल में इस पुस्तक का नाम इसके पहले शब्द से आता है, बेरेशीत, यानी "आदि में"। यूनानी अनुवाद ने इसे जेनेसिस कहा, जिसका अर्थ है "उत्पत्ति" या "जन्म"। हिन्दी में यही नाम हम तक पहुँचा। यह बाइबल की पहली पुस्तक है, मूसा की पाँच पुस्तकों में पहली, और पचास अध्यायों में लगभग दो हज़ार वर्षों से अधिक की कहानी समेटती है।
परम्परागत रूप से, और स्वयं प्रभु यीशु के शब्दों के आधार पर, इसके लेखक मूसा माने जाते हैं। यीशु ने कहा, "क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करते, तो मेरी भी प्रतीति करते, इसलिये कि उस ने मेरे विषय में लिखा है" (यूहन्ना 5:46)। नया नियम बार-बार इन पुस्तकों को "मूसा की व्यवस्था" कहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मूसा ने हर घटना अपनी आँखों से देखी; उन्होंने पवित्र आत्मा की अगुवाई में पहले से चली आ रही पारिवारिक स्मृतियों, वंशावलियों और परमेश्वर के प्रत्यक्ष प्रकाशन को एक सुसंगत पुस्तक का रूप दिया। लिखे जाने का समय लगभग पंद्रहवीं से तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है, यानी मिस्र से निकलने के बाद जंगल के वर्षों में।
यह परिस्थिति समझना ज़रूरी है। पहले पाठक कोई विश्वविद्यालय के विद्यार्थी नहीं थे। वे गुलामी से निकले हुए, रेगिस्तान में तम्बुओं में रहने वाले लोग थे, जिन्होंने चार सौ वर्ष मिस्र के देवताओं के बीच बिताए थे। उन्हें जानना था कि जिस परमेश्वर ने उन्हें छुड़ाया, वे कौन हैं; उन्हें क्यों कनान की ओर जाना है; उनका खतना का चिन्ह कहाँ से आया; और वे इतने बड़े संसार में कौन हैं। उत्पत्ति उनके सारे प्रश्नों का उत्तर एक कहानी के रूप में देती है।
और वह कहानी एक वाक्य से शुरू होती है जो पूरे संसार की नींव हिला देता है: "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की" (उत्पत्ति 1:1)। यहाँ कोई देवताओं का युद्ध नहीं, कोई संघर्ष नहीं। परमेश्वर पहले से हैं, और वे बोलते हैं: "तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया" (उत्पत्ति 1:3)। सृष्टि उनके शब्द का फल है, और इसलिए यह उनकी है, और इसलिए यह अच्छी है।
परमेश्वर पहले बोलते हैं, फिर सब कुछ होता है।
फिर कैमरा पास आता है। "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया" (उत्पत्ति 2:7)। यह पद मनुष्य के बारे में दो सच्चाइयाँ एक साथ रखता है। हम मिट्टी हैं, नाज़ुक और नश्वर; और हम परमेश्वर की साँस से जीते हैं, इसलिए अनमोल। जो व्यक्ति अपने शरीर से घृणा करता है और जो व्यक्ति अपने आप को भगवान समझता है, दोनों को यह पद सुधारता है।
तीसरे अध्याय में सब कुछ टूट जाता है। मनुष्य परमेश्वर के वचन के बजाय सर्प के वचन पर भरोसा करता है, और लज्जा, दोषारोपण और मृत्यु संसार में घुस आते हैं। पर टूटन के ठीक बीच में परमेश्वर एक वादा बोलते हैं: "और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा" (उत्पत्ति 3:15)। यह बाइबल का पहला सुसमाचार है। न्याय की घोषणा के भीतर छिपा हुआ एक वादा, और वह वादा एक वंश के बारे में है। यहीं से पूरी पुस्तक की खोज शुरू होती है: वह वंश कौन है, और क्या वह जीवित बचेगा?
बाइबल में चलने वाला सूत्र
उत्पत्ति के बाद का हर पन्ना उसी वंश का पीछा करता है। कैन अपने भाई को मार डालता है और ढिठाई से पूछता है, "क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूं?" (उत्पत्ति 4:9)। ऐसा लगता है कि वादा वहीं दफ़न हो गया, पर परमेश्वर शेत को देते हैं और वंश आगे बढ़ता है। छठे अध्याय तक हिंसा इतनी बढ़ जाती है कि परमेश्वर पृथ्वी को धो डालने का निर्णय लेते हैं, और तब बाइबल में पहली बार वह शब्द आता है जिस पर हमारा पूरा जीवन टिका है: "परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही" (उत्पत्ति 6:8)। ध्यान दीजिए, नूह की धार्मिकता का उल्लेख इसके बाद आता है, पहले नहीं। पहले अनुग्रह, फिर चरित्र। जहाज़ की लकड़ी काटने से पहले परमेश्वर की कृपा ने उस परिवार को चुन लिया था।
अनुग्रह शब्द बाइबल में पहली बार नूह पर उतरता है।
जलप्रलय के बाद मनुष्य फिर वही करता है। बाबेल के मैदान में लोग कहते हैं, "आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे" (उत्पत्ति 11:4)। मनुष्य अपने नाम को बड़ा करना चाहता है। और ठीक उसी बिखराव के बाद, बारहवें अध्याय में, परमेश्वर एक बूढ़े मूर्तिपूजक परिवार के बेटे को बुलाकर कहते हैं, "और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा" (उत्पत्ति 12:2)। जो नाम मनुष्य अपनी ईंटों से नहीं बना सका, वह परमेश्वर अनुग्रह से दे देते हैं। और यह आशीष इब्राहीम के लिए तिजोरी नहीं, नल है; वह इसलिए भरता है ताकि बहे।
मोरिय्याह पर्वत पर, जब इब्राहीम अपने इकलौते पुत्र को वापस परमेश्वर के हाथ में सौंपने को तैयार होता है, वादा और भी चौड़ा हो जाता है: "और पृथ्वी की सारी जातियां तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है" (उत्पत्ति 22:18)। सारी जातियाँ। भारत भी। आपका शहर भी। और उसी पहाड़ पर इब्राहीम ने कहा था, "हे मेरे पुत्र, परमेश्वर आप ही होमबलि की भेड़ का उपाय करेगा" (उत्पत्ति 22:8), एक ऐसा वाक्य जो सदियों बाद यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के होठों पर पूरा हुआ।
वंश आगे बढ़ता है: इसहाक, याकूब, और याकूब की मृत्युशय्या पर यहूदा के गोत्र पर राजदण्ड ठहर जाता है, "जब तक शीलो न आए" (उत्पत्ति 49:10)। पुराना नियम इसी वंश को दाऊद तक ले जाता है, और नया नियम अपना पहला वाक्य ठीक वहीं से उठाता है: "यीशु मसीह की वंशावली जो दाऊद की सन्तान, और इब्राहीम की सन्तान है" (मत्ती 1:1)। पौलुस इसे बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं जब वे लिखते हैं कि प्रतिज्ञा बहुत वंशों को नहीं, एक वंश को दी गई थी, "और वह मसीह है" (गलातियों 3:16)।
और सर्प का सिर? क्रूस पर मसीह की एड़ी डसी गई, और उसी घड़ी शत्रु का सिर कुचला गया। पौलुस कलीसिया से कहते हैं, "और शान्ति का परमेश्वर शैतान को तुम्हारे पांवों से शीघ्र कुचलवा देगा" (रोमियों 16:20)। बाइबल का अंतिम पन्ना उत्पत्ति के पहले पन्ने को लौटाता है: नया आकाश, नई पृथ्वी, जीवन का वृक्ष, और श्राप का पूरी तरह मिट जाना। उत्पत्ति में जो द्वार बंद हुआ था, प्रकाशितवाक्य में वह हमेशा के लिए खुला रह जाता है।
रचना और मुख्य विषय
उत्पत्ति अनियोजित कहानियों का संग्रह नहीं है। लेखक ने स्वयं इसमें एक कंकाल डाला है। ग्यारह बार यह पुस्तक एक ही वाक्यांश दोहराती है, "यह वंशावली है" या "यह वृत्तान्त है" (इब्रानी में तोलेदोत), और हर बार कथा एक नए खंड में प्रवेश करती है। पहला खंड आकाश और पृथ्वी का है (उत्पत्ति 2:4), फिर आदम का (उत्पत्ति 5:1), नूह का (उत्पत्ति 6:9), नूह के पुत्रों का (उत्पत्ति 10:1), शेम का (उत्पत्ति 11:10), तेरह का (उत्पत्ति 11:27), इश्माएल का (उत्पत्ति 25:12), इसहाक का (उत्पत्ति 25:19), एसाव का (उत्पत्ति 36:1) और अंत में याकूब का (उत्पत्ति 37:2)। हर मोड़ पर दायरा छोटा होता जाता है: ब्रह्मांड से मनुष्य तक, मनुष्य से एक परिवार तक, एक परिवार से एक गोत्र तक। पुस्तक फैलती नहीं, सिकुड़ती है, जैसे कोई दूरबीन धीरे-धीरे एक बिंदु पर केंद्रित हो रही हो। और वह बिंदु वही वादा किया हुआ वंश है।
मोटे तौर पर पुस्तक दो भागों में बँटती है। पहले ग्यारह अध्याय पूरे संसार की कहानी हैं: सृष्टि, अदन, पतन, पहली हत्या, जलप्रलय और बाबेल। ये चार बड़ी घटनाएँ यह दिखाती हैं कि समस्या किसी एक जाति की नहीं, पूरी मानवजाति की है। बाकी उनतालीस अध्याय चार व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमते हैं: इब्राहीम, इसहाक, याकूब और यूसुफ। ध्यान दीजिए कि लेखक ने पूरे संसार को ग्यारह अध्याय दिए और एक परिवार को उनतालीस। यह अनुपात ही उत्पत्ति का संदेश है। परमेश्वर संसार को बचाने के लिए संसार से एक परिवार चुनते हैं।
इस ढाँचे में कुछ विषय बार-बार लौटते हैं। पहला, परमेश्वर अकेले सृष्टिकर्ता और मालिक हैं; सूर्य, चंद्रमा और नदियाँ देवता नहीं, उनकी बनाई वस्तुएँ हैं। दूसरा, मनुष्य उनके स्वरूप में बनाया गया है: "तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया" (उत्पत्ति 1:27), इसलिए हर व्यक्ति का मूल्य उसकी उपयोगिता से नहीं, उसके स्रोत से आता है। तीसरा, पाप वास्तविक है और उसके परिणाम भयानक हैं, पर परमेश्वर का न्याय कभी अनुग्रह से खाली नहीं होता; आदम को वस्त्र मिलते हैं, कैन को चिन्ह, नूह को जहाज़, बाबेल के बाद इब्राहीम। चौथा, और सबसे बड़ा, वाचा। परमेश्वर स्वयं को अपने वचन से बाँध लेते हैं, कभी इंद्रधनुष के चिन्ह से (उत्पत्ति 9:13), कभी दो टुकड़ों के बीच से गुज़रकर, कभी खतना के चिन्ह से। पाँचवाँ विषय है परमेश्वर का अदृश्य शासन, जो यूसुफ की कहानी में अपने चरम पर पहुँचता है।
और एक बात जो अक्सर छूट जाती है: उत्पत्ति के नायक चमकदार नहीं हैं। इब्राहीम झूठ बोलता है, याकूब छल करता है, यूसुफ के भाई अपने ही खून को बेच देते हैं। यह पुस्तक महान लोगों की जीवनी नहीं, एक विश्वासयोग्य परमेश्वर का दस्तावेज़ है।
इस पुस्तक के मुख्य पद
"आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की" (उत्पत्ति 1:1)। दस शब्दों में यह पद नास्तिकता, बहुदेववाद और भाग्यवाद तीनों को उत्तर दे देता है। संसार का कोई आरम्भ है, इसलिए यह शाश्वत नहीं; इसे किसी ने बनाया है, इसलिए यह दुर्घटना नहीं; और बनाने वाला एक है, इसलिए इसमें एक ही उद्देश्य चलता है। जब यूहन्ना ने अपना सुसमाचार शुरू किया तो उन्होंने जानबूझकर यही शब्द उठाए, "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था" (यूहन्ना 1:1)। जिस वचन से सृष्टि बनी, वही वचन देह धारण करके हमारे बीच आया। सृष्टिकर्ता और उद्धारकर्ता दो नहीं, एक ही हैं। इसलिए जो हाथ आपको बचाता है, वही हाथ तारों को थामे है।
"वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा" (उत्पत्ति 3:15)। कलीसिया ने सदियों से इसे प्रोतोइवांजेलियम, यानी पहला सुसमाचार, कहा है। यहाँ चार बातें छिपी हैं: शत्रु का अस्तित्व, एक आने वाला उद्धारक, उसकी पीड़ा, और उसकी निश्चित जीत। सबसे कोमल बात यह है कि यह वादा आदम और हव्वा से नहीं, सर्प से कहा गया, और वे इसे केवल सुन रहे थे। उन्हें बिना माँगे आशा मिली। अपराध के तुरंत बाद, सज़ा सुनाए जाने से पहले, अनुग्रह बोल उठा। आपके सबसे बुरे दिन में परमेश्वर की पहली प्रतिक्रिया आपको छोड़ देना नहीं, आपके लिए योजना बनाना है।
"यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे रहें" (उत्पत्ति 50:20)। यह पूरी पुस्तक का समापन-वाक्य है और उसका धर्मशास्त्र भी। यूसुफ यह नहीं कहता कि जो हुआ वह बुरा नहीं था; वह उसे बुराई ही कहता है। पर वह इससे भी बड़ा एक सच जानता है: उसी घटना पर परमेश्वर का अपना विचार चल रहा था। भाइयों का इरादा और परमेश्वर का इरादा एक ही घटना में साथ-साथ चले, और अंत में परमेश्वर का इरादा जीता। और ध्यान दीजिए कि लक्ष्य क्या था: "बहुत से लोगों के प्राण बचे रहें।" यही तो वंश की रक्षा थी। यदि याकूब का घराना उस अकाल में मर जाता, तो यहूदा का गोत्र नहीं बचता, और शीलो कभी नहीं आता। मिस्र का कारागार भी उसी वंशावली की एक कड़ी था।
दर्पण
अब इस पुस्तक को अपने ऊपर पड़ने दीजिए। आप शायद इसे इतिहास की तरह पढ़ने आए थे, पर उत्पत्ति आपकी तरफ़ मुड़कर वही सवाल पूछती है जो अदन के बगीचे में पूछा गया था: "तू कहां है?" (उत्पत्ति 3:9)। परमेश्वर को पता था कि आदम कहाँ छिपा है। वह सवाल जानकारी के लिए नहीं, लौटाने के लिए था।
आप कहाँ हैं? शायद अपने काम में, जहाँ आप वही बाबेल की मीनार बना रहे हैं, बस ईंटों की जगह पदोन्नति और प्रदर्शन है, और भीतर एक डर बैठा है कि यदि लोगों ने मेरा नाम भुला दिया तो मैं कुछ भी नहीं रहूँगा। उत्पत्ति कहती है कि नाम बड़ा करना परमेश्वर का काम है, आपका नहीं। शायद आप अपने शरीर से लड़ रहे हैं, आईने के सामने खड़े होकर उस चेहरे से नफ़रत करते हैं जिसमें परमेश्वर ने अपनी साँस फूँकी है। मिट्टी होना शर्म की बात नहीं; भूल जाना कि आप किसकी साँस से जीते हैं, वह त्रासदी है। शायद आपका परिवार टूट रहा है और आपको लगता है कि हमारी कहानी बहुत गंदी है, परमेश्वर ऐसे घर में काम नहीं करेंगे। तो याकूब के परिवार को दोबारा पढ़िए: पक्षपात, ईर्ष्या, धोखा, हिंसा, और फिर भी वही घराना वादे को आगे ले जाता है।
शायद आप पैसों की तंगी में हैं, या घड़ी की सुइयों के नीचे कुचले जा रहे हैं, या ऐसे अकेलेपन में जीते हैं जहाँ फ़ोन की घंटी हफ़्तों नहीं बजती। यूसुफ भी कुएँ में अकेला था, और कारागार में भुला दिया गया था। तब भी परमेश्वर बुन रहे थे।
उत्पत्ति आपको यह नहीं कहती कि आपकी पीड़ा असल में अच्छी थी। वह इससे कहीं बड़ी बात कहती है: आपकी पीड़ा आख़िरी शब्द नहीं है। जिस परमेश्वर ने शून्य से संसार बनाया, वे आपके मलबे से भी कुछ बना सकते हैं।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को उत्पत्ति सुनाना आसान भी है और ख़तरनाक भी। आसान इसलिए कि इसमें बगीचा है, बोलता हुआ सर्प है, विशाल जहाज़ है, इंद्रधनुष है, आकाश तक जाती मीनार है, तारों भरा आसमान है और रंग-बिरंगा अंगरखा है। ख़तरनाक इसलिए कि हम अक्सर इन्हें अलग-अलग मज़ेदार कहानियों में तोड़ देते हैं और बच्चा बड़ा होकर सोचता है कि बाइबल जानवरों और नावों की किताब है।
सबसे सरल तरीक़ा यह है कि आप बच्चे को एक ही धागा पकड़ा दें: परमेश्वर ने सब कुछ बहुत अच्छा बनाया, मनुष्य ने उनकी बात नहीं मानी और सब कुछ बिगड़ गया, पर परमेश्वर ने उसी दिन वादा किया कि वे एक ऐसा बच्चा भेजेंगे जो सब ठीक कर देगा। फिर हर कहानी पर पूछिए, "क्या यह वही बच्चा है?" नूह नहीं, इब्राहीम नहीं, यूसुफ नहीं। और तब जाकर क्रिसमस की रात का अर्थ खुलता है।
छोटे बच्चों को चित्र और दोहराव चाहिए, बड़े बच्चों को कारण और क्रम चाहिए, और किशोरों को ईमानदार प्रश्नों की जगह चाहिए, क्योंकि वे सृष्टि, विज्ञान और पीड़ा के सवाल स्कूल से घर लाते हैं। इसीलिए हमारे यहाँ उत्पत्ति की अलग-अलग आयु-वर्गों के लिए तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह वर्ष के नन्हे बच्चों के लिए, सात से बारह वर्ष के बच्चों के लिए, और बारह वर्ष से ऊपर के किशोरों के लिए। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वह पृष्ठ चुनिए और उसे उसी की भाषा में यह वंशावली सुनाइए।
उत्पत्ति पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका
उत्पत्ति को एक ही बैठक में निगलने की कोशिश मत कीजिए, और न ही रोज़ एक अध्याय की रस्म की तरह। चार हफ़्तों की एक सरल योजना बहुत काम आती है।
पहले हफ़्ते में अध्याय एक से ग्यारह पढ़िए, और हर दिन एक ही प्रश्न लेकर बैठिए: यहाँ परमेश्वर कैसे दिखाई देते हैं और मनुष्य कैसा है? इन अध्यायों में जल्दबाज़ी में यह तय करने की कोशिश मत कीजिए कि हर वैज्ञानिक प्रश्न का उत्तर क्या है। पहले वह सुनिए जो पाठ स्वयं कहना चाहता है: कि यह संसार किसी का है, कि यह अच्छा बनाया गया था, और कि इसका बिगड़ना हमारी ग़लती है, परमेश्वर की नहीं।
दूसरे हफ़्ते में अध्याय बारह से पच्चीस, इब्राहीम की कहानी। यहाँ एक कलम लेकर हर उस जगह निशान लगाइए जहाँ परमेश्वर कोई वादा करते हैं, और हर उस जगह जहाँ इब्राहीम डगमगाता है। दोनों सूचियाँ आमने-सामने रखिए। यही विश्वास का असली चित्र है।
तीसरे हफ़्ते में अध्याय पच्चीस से छत्तीस, इसहाक और याकूब। यह हिस्सा पारिवारिक झगड़ों से भरा है, इसलिए इसे अपने परिवार को ध्यान में रखकर पढ़िए। पूछिए, परमेश्वर ने इस टेढ़े आदमी को कैसे नहीं छोड़ा?
चौथे हफ़्ते में अध्याय सैंतीस से पचास, यूसुफ की कहानी। इसे एक ही साँस में, जितना हो सके कम रुककर पढ़िए, ताकि आप उस लम्बी चुप्पी को महसूस कर सकें जिसमें परमेश्वर बोलते नहीं पर काम करते रहते हैं। अंत में उत्पत्ति 50:20 पर रुककर प्रार्थना कीजिए।
वंशावलियों को छोड़िए मत। उन्हें धीरे-धीरे पढ़िए और सोचिए कि हर नाम इस बात का प्रमाण है कि वादा उस पीढ़ी में मरा नहीं। और यदि आपके पास समय हो, तो उत्पत्ति के साथ-साथ मत्ती का पहला अध्याय, यूहन्ना का पहला अध्याय, रोमियों का चौथा अध्याय और इब्रानियों का ग्यारहवाँ अध्याय भी पढ़ते चलिए। तब आपको लगेगा कि आप एक ही किताब के दो सिरे एक साथ थामे हुए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उत्पत्ति की पुस्तक किसने लिखी?
बाइबल की परम्परा और स्वयं प्रभु यीशु के शब्दों के आधार पर लेखक मूसा माने जाते हैं, जिन्होंने पवित्र आत्मा की अगुवाई में पहले से चली आ रही मौखिक परम्पराओं, पारिवारिक वंशावलियों और परमेश्वर के प्रत्यक्ष प्रकाशन को एक पुस्तक का रूप दिया। पुस्तक अपने भीतर लेखक का नाम नहीं बताती, पर नया नियम बार-बार इसे मूसा की पुस्तकों में गिनता है। कुछ छोटे संपादकीय जोड़ बाद में हुए हो सकते हैं, जैसे मूसा की मृत्यु का विवरण व्यवस्थाविवरण के अंत में, पर इससे पुस्तक के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उत्पत्ति की पुस्तक कब लिखी गई थी?
अधिकांश परम्परागत विद्वान इसे लगभग पंद्रहवीं से तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच रखते हैं, यानी इस्राएल के मिस्र से निकलने के बाद जंगल में बिताए गए वर्षों में। पुस्तक जिन घटनाओं का वर्णन करती है वे इससे कहीं पुरानी हैं; इब्राहीम का समय लगभग दो हज़ार वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है। इसलिए उत्पत्ति लिखे जाने की तिथि और घटित होने की तिथि में सदियों का अंतर है, ठीक वैसे ही जैसे कोई परिवार अपनी सौ साल पुरानी कहानी आज लिखे।
उत्पत्ति में कितने अध्याय हैं और वह कितने समय को समेटती है?
उत्पत्ति में पचास अध्याय हैं। पहले ग्यारह अध्याय सृष्टि से लेकर बाबेल तक का एक बहुत लम्बा और अनिश्चित कालखंड समेटते हैं, और शेष उनतालीस अध्याय लगभग तीन सौ वर्षों की चार पीढ़ियों की कहानी हैं, इब्राहीम से लेकर यूसुफ की मृत्यु तक। यह असंतुलन जानबूझकर है: लेखक पूरे ब्रह्मांड से शुरू करके धीरे-धीरे कैमरा एक परिवार पर केंद्रित करता है, क्योंकि उसी परिवार के द्वारा परमेश्वर सारी जातियों को आशीष देने वाले हैं।
क्या सृष्टि के छह दिन चौबीस घंटे के दिन थे?
विश्वासयोग्य मसीहियों के बीच इस पर ईमानदार मतभेद रहा है। कुछ मानते हैं कि ये सामान्य चौबीस घंटे के दिन थे, कुछ इन्हें लम्बे युग समझते हैं, और कुछ पहले अध्याय को एक व्यवस्थित साहित्यिक ढाँचा मानते हैं जिसमें पहले तीन दिन स्थान बनाते हैं और अगले तीन उन्हें भरते हैं। जो बात सब पर बाध्यकारी है वह यह है कि परमेश्वर ने अपने वचन से, स्वतंत्र रूप से, बिना किसी संघर्ष के सब कुछ बनाया, और मनुष्य को अपने स्वरूप में विशेष रूप से रचा। इस केंद्र पर समझौता नहीं, पर दिनों की लम्बाई पर भाइयों से प्रेम बनाए रखिए।
उत्पत्ति 3:15 का क्या अर्थ है?
यह पद सर्प से कहा गया श्राप है, पर उसी में मनुष्य के लिए पहला सुसमाचार छिपा है। परमेश्वर स्त्री के वंश और सर्प के वंश के बीच स्थायी शत्रुता ठहराते हैं और घोषणा करते हैं कि वह वंश सर्प का सिर कुचल देगा जबकि सर्प केवल उसकी एड़ी डसेगा। सिर कुचलना घातक चोट है, एड़ी डसना पीड़ादायक पर जानलेवा नहीं। कलीसिया ने सदा इसमें मसीह के क्रूस और पुनरुत्थान को देखा है, जहाँ उन्होंने घायल होकर शत्रु को निर्णायक रूप से हराया।
कैन ने अपनी पत्नी कहाँ से पाई?
उत्पत्ति स्वयं बताती है कि आदम और हव्वा के और भी बेटे-बेटियाँ हुए, और उस समय की आयु सैकड़ों वर्षों की थी, इसलिए कैन ने अपनी किसी बहन या भतीजी से विवाह किया होगा। हमें यह अजीब लगता है क्योंकि हम बाद में दी गई व्यवस्था के नियमों को जानते हैं, पर वे नियम मूसा के समय में दिए गए, आरम्भ में नहीं। जब पूरी मानवजाति एक ही जोड़े से निकली हो, तो पहली पीढ़ियों में निकट संबंधियों के बीच विवाह के अलावा कोई विकल्प था ही नहीं।
जलप्रलय पूरी पृथ्वी पर आया था या केवल किसी क्षेत्र में?
पाठ की भाषा व्यापक है और आकाश के नीचे के सब ऊँचे पहाड़ों के ढकने की बात करती है, इसलिए बहुत से विश्वासी इसे विश्वव्यापी जलप्रलय मानते हैं। कुछ अन्य मानते हैं कि इब्रानी में "सारी पृथ्वी" का अर्थ उस समय की ज्ञात बसी हुई दुनिया भी हो सकता है, इसलिए यह एक विशाल क्षेत्रीय प्रलय था जिसने पूरी मानवजाति को समेटा। दोनों दृष्टिकोण पुस्तक के मुख्य संदेश को नहीं बदलते: परमेश्वर पाप का न्याय करते हैं, और वे अनुग्रह से एक बचा हुआ दल सुरक्षित रखते हैं।
उत्पत्ति की पुस्तक का मुख्य विषय क्या है?
एक वाक्य में कहें तो यह है कि जिस परमेश्वर ने सब कुछ बनाया, वही परमेश्वर टूटी हुई सृष्टि को अपने वादे और वाचा के द्वारा फिर से जोड़ने का काम शुरू करते हैं। सृष्टि, पतन, न्याय, अनुग्रह और वाचा इस पुस्तक के पाँच स्तंभ हैं, और इन सबको जोड़ने वाला धागा वह "वंश" है जिसका वादा उत्पत्ति 3:15 में किया गया और जो इब्राहीम, इसहाक, याकूब और यहूदा के द्वारा सुरक्षित रखा गया। उत्पत्ति कोई कहानी पूरी नहीं करती; वह एक ऐसी प्रतीक्षा शुरू करती है जो मसीह में पूरी होती है।
इब्राहीम की वाचा क्या है और आज हमारे लिए उसका क्या अर्थ है?
इब्राहीम की वाचा परमेश्वर की वह एकतरफ़ा प्रतिज्ञा है जिसमें उन्होंने उसे एक देश, एक वंश और एक विश्वव्यापी आशीष देने का वचन दिया। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह इब्राहीम के प्रदर्शन पर नहीं, परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर टिकी थी। नया नियम कहता है कि जो लोग विश्वास से मसीह के हैं, वे इब्राहीम की सन्तान और उसी प्रतिज्ञा के वारिस हैं। इसका अर्थ है कि आपका उद्धार आपके अच्छे दिनों पर नहीं, बल्कि उस परमेश्वर पर टिका है जो अपने वचन से पीछे नहीं हटते।
परमेश्वर ने इब्राहीम से इसहाक की बलि क्यों माँगी?
पाठ स्पष्ट कहता है कि यह एक परीक्षा थी, और परमेश्वर का उद्देश्य कभी इसहाक की मृत्यु नहीं था; उन्होंने ठीक समय पर हाथ रोक दिया और मेढ़ा प्रदान किया। यह परीक्षा इस बात को उजागर करने के लिए थी कि इब्राहीम का भरोसा वादे के परमेश्वर पर है या वादे के तोहफ़े पर। साथ ही यह घटना एक भविष्यसूचक चित्र है: एक पिता, एक इकलौता पुत्र, लकड़ी उठाए हुए, एक पहाड़ पर। सदियों बाद उसी क्षेत्र में परमेश्वर ने अपने पुत्र को नहीं बचाया, ताकि हम बचाए जा सकें।
उत्पत्ति और यूहन्ना के सुसमाचार की शुरुआत में क्या संबंध है?
यूहन्ना ने अपना सुसमाचार जानबूझकर उत्पत्ति के पहले शब्दों से शुरू किया ताकि पाठक तुरंत समझ जाए कि यीशु मसीह कोई बाद में जोड़ा गया समाधान नहीं हैं। जिस वचन के द्वारा आदि में सब कुछ बनाया गया, वही वचन देह धारण करके हमारे बीच रहा। इसलिए सृष्टि और उद्धार दो अलग परियोजनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही कहानी के दो अध्याय हैं। यही कारण है कि पौलुस मसीह में होने को "नई सृष्टि" कहते हैं; परमेश्वर वही काम फिर से कर रहे हैं, इस बार हमारे भीतर।
उत्पत्ति की पुस्तक पढ़ना कहाँ से शुरू करूँ?
यदि आप पहली बार पढ़ रहे हैं तो पहले अध्याय एक से तीन पढ़िए, फिर सीधे अध्याय बारह पर जाकर इब्राहीम की कहानी शुरू कीजिए, और उसके बाद लौटकर अध्याय चार से ग्यारह पढ़िए। इस क्रम से आपको पहले वह वादा मिल जाएगा जिसके इर्द-गिर्द पूरी पुस्तक घूमती है, और तब जलप्रलय और बाबेल का अर्थ ज़्यादा साफ़ दिखेगा। एक कलम साथ रखिए और हर बार जब परमेश्वर कोई प्रतिज्ञा करें, उसे रेखांकित कीजिए। तीस दिन बाद आपके पास अनुग्रह की एक पूरी सूची होगी।
अंत में
उत्पत्ति की पुस्तक हमें केवल यह नहीं बताती कि संसार कैसे शुरू हुआ। वह हमें एक वंशावली सौंपती है जो अदन के उजड़े हुए बगीचे से शुरू होकर मिस्र के एक ताबूत पर रुक जाती है, और चार सौ साल की चुप्पी के बाद बैतलहम की चरनी में फिर से बोल उठती है। हर नाम, हर तम्बू, हर अकाल, हर टूटा हुआ परिवार उसी एक वादे को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की कड़ी था। और वह वादा आपके लिए भी था, क्योंकि परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा था कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके वंश के कारण आशीष पाएँगी।
आप उस वादे के अंतिम छोर पर खड़े हैं।
इसलिए उत्पत्ति को दोबारा उठाइए, पर इस बार जिज्ञासु दर्शक की तरह नहीं, बल्कि उस परिवार के सदस्य की तरह जिसकी कहानी सुनाई जा रही है। धीरे पढ़िए। वादों को रेखांकित कीजिए। जहाँ मनुष्य असफल होता है वहाँ रुककर अपने भीतर झाँकिए, और जहाँ परमेश्वर बोलते हैं वहाँ रुककर धन्यवाद दीजिए। और जब आप पचासवें अध्याय के अंत तक पहुँचें, तो पन्ना पलटकर निर्गमन शुरू कीजिए, क्योंकि जिस परमेश्वर ने वादा किया, वे उसे निभाने के लिए नीचे उतरते हैं।
