बाइबल पात्र

अब्राहम का जीवन: विश्वास के पिता की कहानी

परिचय

एक बूढ़ा आदमी रात के अंधेरे में तंबू से बाहर निकलता है। उसके पीछे सोई हुई पत्नी है जिसकी कोख कभी नहीं भरी। उसके सामने आकाश है, तारों से भरा हुआ, और उसके कानों में एक वादा गूँज रहा है जो पच्चीस साल से पूरा नहीं हुआ। उसकी उम्र अस्सी के पार है। उसका देश पीछे छूट चुका है। उसका बेटा अभी पैदा नहीं हुआ। और परमेश्वर कहते हैं, "इन तारों को गिन।"

यह आदमी अब्राहम है, और बाइबल उसे "विश्वास का पिता" कहती है। लेकिन ध्यान दीजिए, उसे यह नाम इसलिए नहीं मिला कि वह कभी नहीं डिगा। वह डिगा, दो बार झूठ बोला, एक बार परमेश्वर की मदद करने की कोशिश में सब उलझा दिया। फिर भी परमेश्वर ने उसे छोड़ा नहीं।

इस पृष्ठ पर आप अब्राहम के जीवन को शुरू से अंत तक देखेंगे, उसकी बुलाहट से मोरिय्याह पर्वत तक, और पाएँगे कि उसकी कहानी असल में उसके बारे में कम और परमेश्वर की वफ़ादारी के बारे में ज़्यादा है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अब्राहम की कहानी को आमतौर पर एक नायक की कहानी की तरह सुनाया जाता है। हम इसे दूसरी तरह से पढ़ेंगे: प्रतीक्षा की पाठशाला के रूप में। अब्राहम के जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा वादे और उसकी पूर्ति के बीच के खाली मैदान में बीता, पच्चीस साल बिना बेटे के, चार सौ साल बाद देश मिलने का वादा, और एक ऐसा वंश जिसे देखने के लिए उसे कब्र से आगे देखना पड़ा। इसी खाली मैदान में उसका विश्वास बना, टूटा और फिर गढ़ा गया।

यह दृष्टिकोण मायने रखता है, क्योंकि आपका जीवन भी अधिकतर उसी खाली मैदान में बीतता है। वहीं परमेश्वर विश्वास सिखाते हैं।

बाइबल अब्राहम के जीवन के बारे में क्या कहती है?

अब्राहम की कहानी उत्पत्ति के अध्याय 11 से 25 तक फैली है, और वह ऐसे मोड़ पर शुरू होती है जहाँ मानव इतिहास बिखर चुका है। बाबेल का गुम्मट गिर चुका है, जातियाँ बँट चुकी हैं, और तब परमेश्वर पूरी दुनिया को बचाने की योजना एक अकेले, निःसंतान, मूर्तिपूजक परिवार के आदमी से शुरू करते हैं।

पहला शब्द परमेश्वर का है, और वह आराम छीन लेने वाला शब्द है। उत्पत्ति 12:1 कहता है: "यहोवा ने अब्राम से कहा, 'अपने देश, और अपनी जाति, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।'" ध्यान दीजिए कि परमेश्वर मंज़िल का नाम नहीं बताते। वे केवल दिशा देते हैं और उस दिशा का नक्शा अपने हाथ में रखते हैं। तीन चीज़ें छोड़नी थीं: देश, जाति, पिता का घर, यानी पहचान, सुरक्षा और भविष्य की सारी गारंटियाँ। बदले में एक वादा मिला, और वादा हाथ में पकड़ी हुई चीज़ नहीं होता।

इब्रानियों का लेखक इसी क्षण को विश्वास की परिभाषा बना देता है। इब्रानियों 11:8 कहता है: "विश्वास ही से अब्राहम बुलाए जाने पर आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे वह मीरास में लेनेवाला था, और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ; तौभी निकल गया।" उस "तौभी निकल गया" में पूरी बात है। विश्वास सारी जानकारी मिलने का इंतज़ार नहीं करता; वह परमेश्वर के चरित्र पर भरोसा करके पहला कदम उठा लेता है।

लेकिन अब्राहम का विश्वास सीधी चढ़ाई नहीं था। कनान पहुँचते ही अकाल पड़ा, और वह मिस्र चला गया, जहाँ अपनी जान बचाने के लिए उसने सारै को बहन बताकर उसे ख़तरे में डाल दिया। वादे का वाहक अपनी ही पत्नी को दाँव पर लगा बैठा। यह कहानी हमें बताती है कि परमेश्वर की योजना अब्राहम की परिपूर्णता पर नहीं, परमेश्वर की वफ़ादारी पर टिकी थी।

फिर आता है वह वचन जिसने बाद में सारे नए नियम की धर्मशास्त्रीय नींव रखी। तारों वाली रात के बाद उत्पत्ति 15:6 कहता है: "उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना।" यहाँ अब्राहम ने कोई मंदिर नहीं बनाया, कोई नियम पूरा नहीं किया, कोई अच्छा काम नहीं गिनाया। उसने केवल परमेश्वर के वचन पर भरोसा किया, और परमेश्वर ने उसे धर्मी घोषित कर दिया। पौलुस इसी पद को पकड़कर रोमियों 4:3 में लिखता है: "पवित्र शास्त्र क्या कहता है? यह कि 'अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिये धार्मिकता गिना गया।'" अनुग्रह की सुसमाचार-कहानी मूसा की व्यवस्था से भी पुरानी है।

तेरह साल की चुप्पी के बाद परमेश्वर लौटते हैं और उसका नाम बदल देते हैं। उत्पत्ति 17:5 कहता है: "इसलिये अब तेरा नाम अब्राम न रहेगा परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा, क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है।" निन्यानबे साल का निःसंतान बूढ़ा अब हर बार जब अपना नाम सुनता, तो उसे परमेश्वर का वादा सुनाई देता। परमेश्वर ने उसे भविष्य के हिसाब से नाम दिया, वर्तमान के हिसाब से नहीं।

परमेश्वर वादे देते हैं, फिर उन वादों में हमें रहना सिखाते हैं।

ऊर से कनान तक: बुलाहट और पहले कदम

अब्राहम कसदियों के ऊर का था, दजला और फ़रात के बीच बसा एक समृद्ध शहर, जहाँ चन्द्र-देवता की पूजा होती थी। यहोशू 24:2 बहुत ईमानदारी से बताता है कि उसका परिवार दूसरे देवताओं की सेवा करता था। यानी अब्राहम की खोज परमेश्वर से शुरू नहीं हुई; परमेश्वर की खोज अब्राहम से शुरू हुई। यह पहला सबक है और यह पूरे बाइबल के सुसमाचार का ढाँचा है: पहल हमेशा परमेश्वर की होती है।

परिवार पहले हारान तक आया और वहीं ठहर गया। तेरह की मृत्यु के बाद, पचहत्तर साल की उम्र में, अब्राहम सारै और भतीजे लूत को लेकर कनान की ओर निकला। यह उम्र ध्यान देने योग्य है। जिस उम्र में लोग सफ़र समेटते हैं, उस उम्र में उसका सफ़र शुरू हुआ। परमेश्वर की घड़ी हमारी सुविधा से नहीं चलती।

कनान में वह जगह-जगह वेदियाँ बनाता चला। शेकेम में वेदी, बेतेल और ऐ के बीच वेदी, हेब्रोन के पास मम्रे के बांज वृक्षों के पास वेदी। ध्यान दीजिए, उसने घर नहीं बनाया, वेदियाँ बनाईं। वह तंबुओं में रहा, उस देश में जो उसका होने का वादा था, मगर जिसमें उसे अपनी कब्र के लिए ज़मीन भी पैसे देकर ख़रीदनी पड़ी। यही उस खाली मैदान का स्वरूप है जिसमें उसने पूरा जीवन जिया: क़दमों के नीचे वादे की मिट्टी, और हाथों में सिर्फ़ एक तंबू की रस्सी।

लूत से अलग होने के प्रसंग में हम उसका सबसे उजला पक्ष देखते हैं। चरवाहों में झगड़ा हुआ, और अब्राहम, जो बड़ा था और जिसे पहला हक़ था, ने भतीजे को पहले चुनने दिया। लूत ने यरदन की हरी घाटी चुनी और सदोम की ओर बढ़ गया। अब्राहम ने बची हुई ज़मीन ली। जो आदमी अपने भविष्य के लिए परमेश्वर पर भरोसा करता है, वह अपने हक़ के लिए लड़ता नहीं फिरता।

और जब लूत युद्ध में बंदी बना, तो वही अब्राहम अपने तीन सौ अठारह प्रशिक्षित सेवकों के साथ निकल पड़ा और उसे छुड़ाकर लाया। लौटते समय उससे शालेम का राजा मलिकिसिदक मिला, जो "परमप्रधान परमेश्वर का याजक" था; अब्राहम ने उसे दशमांश दिया और सदोम के राजा से एक धागा भी लेने से इनकार कर दिया। यह रहस्यमय याजक बाद में भजन 110 और इब्रानियों 7 में यीशु मसीह के अनंत याजकपद की छाया बन जाता है।

प्रतीक्षा के पच्चीस साल: वाचा, गिरावट और नया नाम

उत्पत्ति 15 में परमेश्वर वाचा को औपचारिक रूप देते हैं, और जिस तरह देते हैं वह चौंकाने वाला है। पशु दो टुकड़ों में काटे जाते हैं, और उस ज़माने के रिवाज़ के अनुसार वाचा के दोनों पक्षों को उन टुकड़ों के बीच से चलना था, मानो कह रहे हों, "यदि मैं यह वाचा तोड़ूँ तो मेरा भी यही हाल हो।" लेकिन अब्राहम गहरी नींद में डाल दिया जाता है, और आग की जलती मशाल और धुआँ उठाती अँगीठी, यानी परमेश्वर स्वयं, टुकड़ों के बीच से अकेले निकलते हैं। वाचा की सारी ज़िम्मेदारी परमेश्वर ने अपने ऊपर ले ली। सोया हुआ अब्राहम इस दृश्य की सबसे सच्ची तस्वीर है: अनुग्रह की वाचा में हम प्राप्तकर्ता हैं, भागीदार नहीं।

उसी रात परमेश्वर ने यह भी बताया कि उसकी सन्तान चार सौ साल पराए देश में दास रहेगी। यानी वादे की पूर्ति उसकी अपनी आँखों से बहुत आगे थी। विश्वास का अर्थ यह मान लेना था कि परमेश्वर की योजना उसकी उम्र से बड़ी है।

फिर धैर्य टूटा। दस साल बीत गए और कोई बच्चा नहीं। सारै ने अपनी दासी हाजिरा को अब्राहम को दे दिया, और अब्राहम ने चुपचाप मान लिया। इश्माएल पैदा हुआ, और उसके साथ पैदा हुई वह कड़वाहट, जलन और घरेलू टूटन जिसकी क़ीमत निर्दोष हाजिरा और उसके बेटे ने चुकाई। यहाँ बाइबल अपने नायक को बचाती नहीं। जब हम परमेश्वर के वादे को अपनी योजना से पूरा करने निकलते हैं, तो घाव अक्सर सबसे कमज़ोर लोगों को लगते हैं। और फिर भी परमेश्वर ने जंगल में उस रोती दासी को ढूँढ़ा और उसे नाम दिया, "देखनेवाला परमेश्वर।"

तेरह साल की चुप्पी के बाद उत्पत्ति 17 आता है। परमेश्वर कहते हैं, "मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर हूँ," नाम बदलते हैं, खतना को वाचा का चिन्ह ठहराते हैं और सारै का नाम सारा कर देते हैं। जब उन्होंने कहा कि सारा से बेटा होगा, अब्राहम मुँह के बल गिरकर हँसा। उत्पत्ति 18 में मम्रे के पास सारा भी तंबू के भीतर हँसी, और परमेश्वर ने उससे वह प्रश्न पूछा जो पूरे अध्याय की धुरी है: "क्या यहोवा के लिये कोई भी काम कठिन है?" उन्होंने उस हँसी को दंडित नहीं किया; उन्होंने बेटे का नाम ही "हँसी" रख दिया, इसहाक।

इसी मुलाक़ात के बाद अब्राहम का सबसे साहसी क्षण आता है, सदोम के लिए मध्यस्थता। पचास से घटकर दस तक वह मोलभाव करता है, अपने भतीजे और उस भ्रष्ट नगर के लिए। जो आदमी परमेश्वर के अनुग्रह से जीता है, वह दूसरों के लिए अनुग्रह माँगना सीख जाता है।

और फिर, इसहाक के जन्म से ठीक पहले, अब्राहम वही पुराना पाप दोहराता है। गरार में अबीमेलेक के सामने वह फिर सारा को बहन बताता है। पच्चीस साल के अनुभव के बाद भी वही डर, वही झूठ। हमारे स्वभाव के गड्ढे इतनी आसानी से नहीं भरते। परमेश्वर ने फिर भी हस्तक्षेप किया और वादा बचा लिया। नियत समय पर, सौ साल की उम्र में, इसहाक पैदा हुआ।

मोरिय्याह पर्वत: विश्वास की चरम परीक्षा

अब कहानी वहाँ पहुँचती है जहाँ हर पाठक की साँस रुक जाती है। उत्पत्ति 22:2 कहता है: "और उसने कहा, 'अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकमात्र पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा, और वहां उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊंगा होमबलि करके चढ़ा।'"

गौर कीजिए कि परमेश्वर एक-एक शब्द से घाव गहरा करते हैं: पुत्र, एकमात्र पुत्र, इसहाक, जिससे तू प्रेम रखता है। यह वही बेटा है जिसके लिए पच्चीस साल इंतज़ार किया गया, वही बेटा जिसमें सारा वादा टिका है। परमेश्वर अब्राहम से केवल बेटा नहीं माँग रहे; वे उसका भविष्य, उसकी सुरक्षा और वादे की एकमात्र दिखाई देने वाली गारंटी माँग रहे हैं। और भाषा उत्पत्ति 12:1 जैसी ही है, "चला जा।" उसका जीवन एक विदाई से शुरू हुआ था और अब एक और विदाई पर लाया गया है।

अब्राहम सुबह जल्दी उठता है। तीन दिन का सफ़र, तीन दिन की चुप्पी। रास्ते में इसहाक पूछता है कि भेड़ कहाँ है, और पिता का उत्तर पूरी बाइबल की भविष्यवाणी बन जाता है: "हे मेरे पुत्र, परमेश्वर आप ही होमबलि की भेड़ का उपाय करेगा।" इब्रानियों 11:19 बताता है कि अब्राहम ने मान लिया था कि परमेश्वर मरे हुओं में से भी जिला सकते हैं। यह अंधी आज्ञाकारिता नहीं थी, यह पच्चीस साल की पाठशाला का नतीजा था। जिस परमेश्वर ने मुर्दा-सी कोख से जीवन निकाला था, वे उस जीवन को कब्र से भी लौटा सकते हैं।

चाकू उठा, और स्वर्ग से आवाज़ आई। झाड़ी में एक मेढ़ा अटका मिला। अब्राहम ने उस जगह का नाम रखा "यहोवा यिरे," यहोवा उपाय करेगा। और वह पर्वत? 2 इतिहास 3:1 बताता है कि सुलैमान ने यहोवा का भवन मोरिय्याह पर्वत पर बनाया, यरूशलेम में, उसी इलाक़े में जहाँ सदियों बाद एक और पिता अपने एकमात्र पुत्र को लेकर आए, और इस बार आवाज़ नहीं आई, चाकू नहीं रुका। इसहाक के लिए मेढ़ा था। हमारे लिए परमेश्वर का मेम्ना था, और उसके लिए कोई विकल्प नहीं भेजा गया।

बाक़ी जीवन शांत है। सारा की मृत्यु हुई और अब्राहम ने मकपेला की गुफ़ा चाँदी देकर ख़रीदी, पूरे वादे किए गए देश में उसकी अपनी सिर्फ़ एक कब्र थी। उसने इसहाक के लिए अपने कुल से दुल्हन मँगवाई, यह सुनिश्चित करते हुए कि वाचा की धारा आगे बहे। और एक सौ पिचहत्तर साल की उम्र में "वह वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर प्राण छोड़कर मर गया," और इसहाक तथा इश्माएल ने मिलकर उसे सारा के पास गाड़ा। दो बेटे, एक कब्र, और एक वादा जो अभी शुरू ही हुआ था।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

अब्राहम के साथ बाइबल में एक धागा शुरू होता है जो अंतिम अध्याय तक जाता है। इस्राएल ने पूरे पुराने नियम में परमेश्वर को "अब्राहम, इसहाक और याकूब का परमेश्वर" कहकर पुकारा। मिस्र की दासता में जब वे कराह रहे थे, तो निर्गमन 2:24 कहता है कि परमेश्वर ने "अपनी वाचा को स्मरण किया" जो उन्होंने अब्राहम से बाँधी थी। दासों की मुक्ति एक बूढ़े आदमी से किए गए वादे पर टिकी थी। जब मूसा सीनै पर सोने के बछड़े के बाद मध्यस्थता करता है, तो उसका सबसे मज़बूत तर्क यही है: अब्राहम को याद कीजिए। भविष्यवक्ता यशायाह निर्वासित लोगों को दिलासा देता है कि वे "अपने मूलपिता अब्राहम" की ओर देखें, क्योंकि परमेश्वर एक आदमी से एक जाति बना सकते हैं।

नया नियम इस धागे को उठाकर सीधे यीशु मसीह के हाथ में रख देता है। मत्ती अपना सुसमाचार इन शब्दों से शुरू करता है कि यीशु मसीह दाऊद की सन्तान और अब्राहम की सन्तान हैं। मरियम का गीत और जकर्याह की भविष्यवाणी दोनों कहती हैं कि परमेश्वर ने अब्राहम से की गई शपथ को याद किया है। यीशु ने स्वयं कहा, "तुम्हारा पिता अब्राहम मेरा दिन देखने की आशा से बहुत मगन था; और उसने देखा और आनन्द किया।"

पौलुस के लिए अब्राहम सुसमाचार का सबूत है। रोमियों 4 में उसका तर्क यह है कि अब्राहम खतने से पहले, व्यवस्था से चार सौ तीस साल पहले, केवल विश्वास से धर्मी ठहराया गया। इसका मतलब है कि परमेश्वर के धर्मी ठहराने का तरीक़ा कभी बदला ही नहीं। गलातियों 3:9 इसे और खोलकर कहता है: "तो जो विश्वास करनेवाले हैं, वे विश्वासी अब्राहम के साथ आशीष पाते हैं।" यानी अब्राहम का परिवार खून से नहीं, भरोसे से बनता है। और वह "सन्तान" जिसमें पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी, गलातियों 3:16 के अनुसार अंततः एक ही व्यक्ति है, मसीह।

याकूब इसी कहानी का दूसरा पहलू दिखाता है: मोरिय्याह पर अब्राहम का कर्म उसके विश्वास का सबूत था, विकल्प नहीं। असली भरोसा हमेशा पैर उठाता है।

और अंत में, इब्रानियों 11 बताती है कि अब्राहम को यह भी पता था कि कनान असली मंज़िल नहीं है; वह "उस स्थिर नींव वाले नगर की बाट जोहता था, जिसका रचनेवाला और बनानेवाला परमेश्वर है।" प्रतीक्षा की पाठशाला उसे इस अंतिम पाठ तक ले आई: परमेश्वर के वादे इस जीवन से बड़े हैं। प्रकाशितवाक्य में जब सब जातियों की भीड़ सिंहासन के सामने खड़ी होती है, तो वह उत्पत्ति 12 के उस वादे की अंतिम पूर्ति है जो एक निःसंतान आदमी से किया गया था।

उसके जीवन का सार

तीन क्षण अब्राहम के जीवन को समझने की कुंजी हैं, और तीनों में वही प्रतीक्षा-की-पाठशाला का पाठ्यक्रम दिखता है।

पहला क्षण, हारान से निकलना। पचहत्तर साल का आदमी बिना पते के निकल पड़ता है। यहाँ विश्वास का पहला रूप है: आज्ञाकारिता जो नक्शा माँगे बिना चल देती है। पर यह क्षण जितना गौरवशाली है, उतना ही अधूरा भी, क्योंकि निकलने के कुछ ही समय बाद अकाल आया और वही आदमी मिस्र में अपनी पत्नी के बारे में झूठ बोल रहा था। एक बड़ा आज्ञाकारी कदम हमें आगे के परीक्षणों से मुक्त नहीं करता। विश्वास एक बार का फ़ैसला नहीं, रोज़ का अभ्यास है।

दूसरा क्षण, तारों वाली रात। उत्पत्ति 15 में अब्राहम शिकायत करता है, "हे प्रभु यहोवा, मुझे क्या देगा? मैं तो निर्वंश हूँ।" यह शुद्ध, कच्ची निराशा है। परमेश्वर बहस नहीं करते; वे उसे बाहर ले जाते हैं और आकाश दिखा देते हैं। और उसी रात वह वाक्य लिखा जाता है जो पूरे सुसमाचार का बीज है, "उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना।" यहाँ हमें विश्वास का दूसरा रूप मिलता है: खाली हाथों का भरोसा जिसे परमेश्वर धार्मिकता में बदल देते हैं। पर याद रखिए, इसी अध्याय के अगले ही अध्याय में हाजिरा की घटना है। धर्मी ठहराया गया आदमी भी सब्र खो सकता है, और तब भी परमेश्वर उसे धर्मी ठहराए रखते हैं। इसे ही अनुग्रह कहते हैं।

तीसरा क्षण, मोरिय्याह पर्वत। यहाँ विश्वास परिपक्व हो चुका है। पच्चीस साल की प्रतीक्षा ने उसे सिखा दिया था कि परमेश्वर मुर्दा परिस्थितियों से जीवन निकालने में माहिर हैं, इसलिए अब वह अपने सबसे कीमती वादे को भी परमेश्वर के हाथ में सौंप सकता है। यही यात्रा है: नक्शे के बिना चलने से शुरू, खाली हाथ भरोसा करने के बीच से गुज़रकर, अपनी सबसे प्रिय चीज़ खोलकर देने तक।

और तीनों क्षणों के बीच में उसकी गिरावटें बिखरी हुई हैं, दो झूठ, एक हड़बड़ी, एक हँसी। बाइबल उन्हें मिटाती नहीं, क्योंकि उन्हीं की वजह से यह कहानी हमारी पहुँच में रहती है।

अब्राहम से हम क्या सीखते हैं

पहला पाठ यह है कि परमेश्वर की समय-सारणी हमारी क्षमता के ख़त्म होने पर शुरू होती है। सारा की कोख जब मुर्दा हो गई, तब इसहाक आया, ताकि कोई कह न सके कि यह हमारा किया हुआ है। यह कड़वा भी है और मीठा भी। कड़वा, क्योंकि प्रतीक्षा लंबी होती है; मीठा, क्योंकि जब पूर्ति आती है तो वह पूरी तरह अनुग्रह होती है। अगर आप आज किसी वादे और उसकी पूर्ति के बीच फँसे हैं, तो जान लें कि यह जगह बाइबल में अजनबी नहीं है। यह अब्राहम का पता था।

दूसरा पाठ यह है कि विश्वास और डर एक ही दिल में रह सकते हैं। जिस आदमी को परमेश्वर ने धर्मी गिना, उसी ने डर के मारे दो बार अपनी पत्नी की सुरक्षा दाँव पर लगाई। अगर आपकी प्रार्थना और आपका व्यवहार कभी मेल नहीं खाते, तो आप विश्वास से बाहर नहीं हुए; आप अब्राहम के परिवार के सच्चे सदस्य हैं। हमारी स्थिति परमेश्वर के सामने हमारे प्रदर्शन के ग्राफ़ से तय नहीं होती, बल्कि उन वादों से जो वे स्वयं निभाते हैं। इसीलिए उत्पत्ति 15 में वे टुकड़ों के बीच से अकेले चले थे।

तीसरा पाठ यह है कि आशीष कभी अपने पास रखने के लिए नहीं दी जाती। उत्पत्ति 12 का वादा दो हिस्सों में है: "मैं तुझे आशीष दूँगा" और "पृथ्वी के सारे कुल तेरे कारण आशीष पाएँगे।" अब्राहम को इसलिए चुना गया कि दूसरे उसके ज़रिए बचें। जब उसने सदोम के लिए विनती की, तब वह अपनी बुलाहट जी रहा था। हमारे साथ भी यही है। जो अनुग्रह आपको मिला है, वह आपके परिवार, आपके पड़ोस और आपके दफ़्तर के लिए एक द्वार बनने को दिया गया है, न कि एक तिजोरी बनने को।

दर्पण

आपके जीवन में वह जगह कौन सी है जहाँ परमेश्वर ने कुछ कहा और फिर लंबे समय तक कुछ नहीं हुआ?

शायद वह प्रार्थना है जो पंद्रह साल पुरानी हो चुकी है और अब आप उसे पूरे मन से करते भी नहीं। शायद वह शादी है जिसके लिए आप इंतज़ार कर रहे हैं, या वह बच्चा जो नहीं आया, और हर सामाजिक समारोह में कोई एक सवाल आपकी छाती में चुभ जाता है। शायद वह नौकरी है जो आपकी योग्यता से बहुत नीचे है, या वह बीमारी है जिसे लेकर आपने अभिषेक भी करवाया और चंगाई नहीं मिली। अब्राहम की कहानी इसीलिए चुभती है, क्योंकि वह बताती है कि परमेश्वर का सच्चा जन भी बरसों खाली हाथ खड़ा रह सकता है।

लेकिन वही कहानी आपसे एक और सवाल पूछती है, जो और गहरा है: आपने प्रतीक्षा के इस अरसे में कौन सी हाजिरा गढ़ ली है? वह छोटा-सा शॉर्टकट, वह जोड़-तोड़, वह झूठ जो आप अपनी सुरक्षा के लिए बोलते हैं, वह उधार जो आप छिपाकर लेते हैं, वह रिश्ता जिसे आपने अकेलेपन के डर से पकड़ लिया है। अब्राहम का पाप यह नहीं था कि उसने परमेश्वर को छोड़ दिया। उसका पाप यह था कि उसने परमेश्वर के काम को अपने हाथ से पूरा करने की कोशिश की, और उसका दर्द पीढ़ियों तक चला।

और अगर आपको लगता है कि आपने इतनी गड़बड़ियाँ कर दी हैं कि अब परमेश्वर आपके साथ वादे नहीं निभाएँगे, तो उत्पत्ति 15 की उस रात को दोबारा देखिए। अब्राहम सो रहा था। जलती मशाल अकेली चली। आपकी उद्धार की वाचा आपकी पकड़ पर नहीं, मसीह के लहू पर टिकी है, और वह पकड़ कभी ढीली नहीं होती। इसलिए आज जो भी अधूरा है, उसे तंबू के बाहर ले जाइए, आकाश की ओर देखिए और फिर एक कदम चलिए।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को अब्राहम की कहानी सुनाना आसान है, क्योंकि उसमें सफ़र है, तारे हैं, हँसी है और एक ऊँचा पहाड़ है। सबसे सरल रूप यह है: परमेश्वर ने एक आदमी से कहा कि अपना घर छोड़कर मेरे साथ चल, और मैं तुझे एक नया देश और एक बड़ा परिवार दूँगा। वह आदमी नहीं जानता था कि रास्ता कहाँ जाता है, फिर भी वह चल पड़ा, क्योंकि उसने परमेश्वर पर भरोसा किया। बहुत सालों तक उसका कोई बेटा नहीं था, और वह और उसकी पत्नी बहुत बूढ़े हो गए, पर परमेश्वर ने अपना वादा निभाया और इसहाक पैदा हुआ, जिसके नाम का अर्थ है "हँसी"।

छोटे बच्चों के लिए भरोसे की बात पर ज़ोर दें, तारों को गिनने का खेल इसमें बहुत काम आता है। बड़े बच्चों के साथ आप ईमानदारी से यह भी जोड़ सकते हैं कि अब्राहम ने गलतियाँ भी कीं, और परमेश्वर ने फिर भी उसे थामा; यह उन्हें अपने बारे में बहुत राहत देने वाली बात सिखाता है। किशोरों के साथ मोरिय्याह पर्वत खोलिए और वहाँ से सीधे यीशु मसीह के क्रूस तक रेखा खींचिए, क्योंकि वे उम्र वहाँ है जहाँ कठिन सवाल पूछने की हिम्मत आती है।

हमारी वेबसाइट पर अब्राहम की कहानी की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के स्कूली बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए। हर संस्करण में उसी उम्र के हिसाब से भाषा, प्रश्न और लागू करने के सुझाव दिए गए हैं, ताकि परिवार की आराधना या रविवार की कक्षा में आप सीधे उसे इस्तेमाल कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अब्राहम कौन थे और वे कहाँ से आए थे?

अब्राहम शेम के वंश में तेरह का बेटा था और कसदियों के ऊर का निवासी था, जो आज के दक्षिणी इराक़ में मेसोपोटामिया का एक समृद्ध नगर था। यहोशू 24:2 साफ़ बताता है कि उसका परिवार दूसरे देवताओं की सेवा करता था, इसलिए वह किसी धार्मिक खोज के बाद परमेश्वर तक नहीं पहुँचा; परमेश्वर ने उसे बुलाया। परिवार पहले हारान आया, और वहाँ से पचहत्तर साल की उम्र में वह पत्नी सारै और भतीजे लूत के साथ कनान देश की ओर निकला। उसकी कहानी उत्पत्ति 11 से 25 तक दर्ज है।

अब्राहम की उम्र कितनी थी जब परमेश्वर ने उन्हें बुलाया?

उत्पत्ति 12:4 के अनुसार जब वह हारान से निकला तब वह पचहत्तर साल का था, और इसहाक के जन्म के समय वह सौ साल का हो चुका था। यानी वादा मिलने और उसकी पूर्ति दिखने के बीच लगभग पच्चीस साल का अंतराल था। यह विवरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि परमेश्वर की बुलाहट किसी उम्र की सीमा में बंधी नहीं है और उनकी घड़ी हमारी जल्दबाज़ी से नहीं चलती। अब्राहम की मृत्यु एक सौ पिचहत्तर साल की उम्र में हुई।

अब्राहम का नाम अब्राम से अब्राहम क्यों बदल दिया गया?

उत्पत्ति 17:5 में परमेश्वर कहते हैं, "इसलिये अब तेरा नाम अब्राम न रहेगा परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा, क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है।" अब्राम का अर्थ "महान पिता" जैसा है, जबकि अब्राहम "बहुतों का पिता" की ओर इशारा करता है। सबसे मार्मिक बात यह है कि यह नाम उसे तब मिला जब वह निन्यानबे साल का निःसंतान बूढ़ा था। परमेश्वर ने उसे उसकी परिस्थिति से नहीं, अपने वादे से परिभाषित किया, और हर बार नाम पुकारे जाने पर वह वादा दोहराया जाता था।

उत्पत्ति 15:6 का असली अर्थ क्या है?

यह पद कहता है, "उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना।" यहाँ जो शब्द "गिना" के लिए है वह हिसाब-किताब की भाषा है, यानी परमेश्वर ने अब्राहम के खाते में धार्मिकता जमा कर दी, जो उसने कमाई नहीं थी। अब्राहम ने कोई काम पूरा नहीं किया, केवल परमेश्वर के वचन पर भरोसा किया। पौलुस रोमियों 4:3 में इसी पद के आधार पर सिद्ध करता है कि परमेश्वर हमेशा विश्वास के द्वारा ही धर्मी ठहराते हैं, व्यवस्था के कामों से नहीं।

क्या यह सच है कि अब्राहम ने अपनी पत्नी के बारे में झूठ बोला?

हाँ, और एक बार नहीं बल्कि दो बार। उत्पत्ति 12 में मिस्र में और उत्पत्ति 20 में गरार में उसने डर के कारण सारा को अपनी बहन बताया, जिससे उसकी पत्नी गंभीर ख़तरे में पड़ गई। बाइबल इन घटनाओं को छिपाती नहीं, और यही उसकी ईमानदारी का प्रमाण है। दूसरी घटना इसहाक के जन्म से कुछ पहले हुई, यानी बरसों के अनुभव के बाद भी वही पुराना डर लौट आया। इससे हम सीखते हैं कि परमेश्वर की योजना हमारी परिपूर्णता पर नहीं, उनकी वफ़ादारी पर टिकी है।

परमेश्वर ने अब्राहम से इसहाक की बलि क्यों माँगी?

उत्पत्ति 22:2 में यह आज्ञा परीक्षा के रूप में आती है, और उसका उद्देश्य इसहाक की मृत्यु नहीं बल्कि अब्राहम के हृदय का प्रकट होना था। परमेश्वर मानव बलि से घृणा करते हैं, यह पूरे पुराने नियम में स्पष्ट है, और उन्होंने चाकू उठने से पहले ही रोक दिया और बदले में एक मेढ़ा दिया। इस घटना का गहरा अर्थ भविष्यसूचक है: उसी मोरिय्याह के क्षेत्र में सदियों बाद परमेश्वर ने अपने एकमात्र पुत्र को दिया, और तब कोई विकल्प नहीं भेजा गया। अब्राहम का वाक्य सही निकला, परमेश्वर स्वयं उपाय करते हैं।

हाजिरा और इश्माएल की कहानी में परमेश्वर कहाँ थे?

वे उपेक्षित लोगों के साथ थे। सारै और अब्राहम की जल्दबाज़ी की क़ीमत हाजिरा ने चुकाई, पहले अपमान और फिर निकाले जाने के रूप में। लेकिन उत्पत्ति 16 में जंगल में परमेश्वर का दूत उसे ढूँढ़ता है, उसका नाम लेकर बुलाता है, और वह परमेश्वर को "देखनेवाला ईश्वर" कहकर पुकारती है; बाइबल में परमेश्वर को नाम देने वाली पहली व्यक्ति यही दासी है। बाद में उत्पत्ति 21 में परमेश्वर इश्माएल की पुकार सुनते हैं और उसके लिए भी वादा करते हैं। हमारी गलतियों के शिकार लोगों को परमेश्वर भूलते नहीं।

मलिकिसिदक कौन था और वह क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्पत्ति 14 में जब अब्राहम लूत को छुड़ाकर लौट रहा था, तब शालेम का राजा मलिकिसिदक रोटी और दाखरस लेकर उससे मिला और उसे आशीष दी; वह "परमप्रधान परमेश्वर का याजक" कहा गया है। अब्राहम ने उसे अपनी लूट का दशमांश दिया, जो उसकी श्रेष्ठता को स्वीकारना था। भजन 110 और इब्रानियों 5 से 7 इस रहस्यमय व्यक्ति को यीशु मसीह के अनंत याजकपद का चित्र बताते हैं, क्योंकि उसका याजकपद लेवी के वंश या व्यवस्था पर नहीं, सीधे परमेश्वर की नियुक्ति पर आधारित था।

अब्राहम और यीशु मसीह का क्या संबंध है?

मत्ती अपना सुसमाचार यीशु मसीह को "अब्राहम की सन्तान" कहकर शुरू करता है, और गलातियों 3:16 समझाता है कि उत्पत्ति के वादे में जिस "वंश" की बात थी, वह अंततः एक व्यक्ति, मसीह, में पूरा होता है। अब्राहम से किया गया वादा कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे, तब पूरा होता है जब हर जाति के लोग मसीह में उद्धार पाते हैं। यीशु ने स्वयं कहा कि अब्राहम उनका दिन देखने की आशा से मगन था। मोरिय्याह का मेढ़ा भी उसी मेम्ने की ओर इशारा करता है।

"विश्वास के पिता" का मतलब क्या है, और क्या मैं भी अब्राहम की सन्तान हूँ?

अब्राहम को विश्वास का पिता इसलिए कहा जाता है कि परमेश्वर के साथ चलने का रास्ता उसके जीवन में सबसे स्पष्ट रूप से खुलता है, केवल भरोसे के आधार पर धर्मी ठहरना। गलातियों 3:9 कहता है, "तो जो विश्वास करनेवाले हैं, वे विश्वासी अब्राहम के साथ आशीष पाते हैं।" इसका अर्थ यह है कि उसका परिवार खून के रिश्ते से नहीं, मसीह पर भरोसे से बनता है। यदि आप यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, तो आप उसी वाचा की आशीष के भागी हैं, चाहे आपकी जाति या पृष्ठभूमि कोई भी हो।

अब्राहम को धर्मी ठहराया गया या उसके कामों से? याकूब और पौलुस में विरोध क्यों लगता है?

पौलुस रोमियों 4 में सिद्ध करता है कि अब्राहम विश्वास से धर्मी ठहरा, खतने और व्यवस्था से पहले, इसलिए उद्धार अनुग्रह से है। याकूब 2 में कहा गया है कि अब्राहम का कर्म, यानी इसहाक को वेदी पर चढ़ाने की तैयारी, उसके विश्वास के साथ पूरा हुआ। दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं: पौलुस बता रहा है कि धार्मिकता कैसे मिलती है, और याकूब बता रहा है कि सच्चा विश्वास कैसा दिखता है। जीवित विश्वास हमेशा आज्ञाकारिता में फूटता है, पर वह आज्ञाकारिता क़ीमत नहीं, फल है।

अब्राहम की मृत्यु कैसे हुई और उसे कहाँ दफ़नाया गया?

उत्पत्ति 25 के अनुसार अब्राहम एक सौ पिचहत्तर साल की आयु में वृद्धावस्था में तृप्त होकर मरा, और उसके बेटों इसहाक और इश्माएल ने मिलकर उसे हेब्रोन के पास मकपेला की गुफ़ा में सारा के साथ दफ़नाया। यह वही ज़मीन थी जिसे उसने सारा की मृत्यु के बाद हित्ती एप्रोन से चाँदी देकर ख़रीदा था। जिस पूरे देश का वादा उसे मिला था, उसमें उसकी अपनी संपत्ति केवल एक कब्रगाह थी, जो इस सच्चाई का चिन्ह है कि वह परमेश्वर के बनाए स्थिर नगर की बाट जोह रहा था।

अंत में

अब्राहम की कहानी हमें एक ऐसा आदमी नहीं देती जिसकी नकल करके हम विश्वास के महारथी बन जाएँ। वह हमें एक ऐसा परमेश्वर देती है जो एक मूर्तिपूजक परिवार के बूढ़े आदमी को बुलाते हैं, उसे नक्शे के बिना चलाते हैं, उसकी हँसी को बेटे का नाम बना देते हैं, उसकी गिरावटों के बीच वाचा को थामे रखते हैं, और अंत में उसी पर्वत पर अपने ही पुत्र को दे देते हैं। वादे और पूर्ति के बीच का वह लंबा, सूना अरसा सज़ा नहीं था; वह पाठशाला थी, और उसका पाठ्यक्रम यही था कि परमेश्वर पर भरोसा किया जा सकता है जब हाथ खाली हों।

अगर आप आज उसी खाली मैदान में खड़े हैं, तो आगे बढ़ने के लिए उत्पत्ति 12 से 25 को इत्मीनान से, एक बैठक में पढ़िए, और फिर रोमियों 4 और इब्रानियों 11 को उसके साथ रखकर देखिए कि नया नियम इस जीवन को कैसे पढ़ता है। जो वाचा उस रात मशाल बनकर टुकड़ों के बीच से चली, वही क्रूस तक पहुँची, और वहीं आपका नाम भी लिखा गया।

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