बाइबल पात्र

शमूएल का जीवन: प्रार्थना से जन्मा भविष्यद्वक्ता और राजाओं का अभिषेक करने वाला

परिचय

शीलो के मन्दिर के द्वार पर एक स्त्री खड़ी है। उसके होंठ हिल रहे हैं, पर आवाज़ नहीं निकल रही। बूढ़ा याजक एली उसे दूर से देखता है और सोचता है कि यह औरत नशे में है। असल में वहाँ एक टूटा हुआ दिल परमेश्वर के सामने उण्डेला जा रहा है, इतनी गहराई से कि शब्द भी साथ छोड़ गए हैं। उस खामोश प्रार्थना से इस्राएल के इतिहास का एक ऐसा मोड़ निकला जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी: एक बालक, जो न्यायियों के युग का अन्तिम दीपक और भविष्यद्वक्ताओं की पंक्ति का पहला स्तम्भ बना; जिसके हाथों ने इस्राएल के पहले राजा के सिर पर तेल उँडेला, और फिर उस चरवाहे लड़के के सिर पर भी जिसके वंश से मसीह आने वाले थे।

इस पृष्ठ पर आप शमूएल के पूरे जीवन को क्रम से देखेंगे: उसका जन्म, उसकी बुलाहट, उसकी ताक़त, उसकी असफलताएँ, और वह एक धागा जो उसके पूरे जीवन को बाँधे रखता है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लेख शमूएल को "राजाओं का अभिषेक करने वाला" कहकर उसकी कहानी सुनाते हैं। हम यहाँ एक कदम पीछे हटकर देखेंगे: शमूएल की सबसे बड़ी सेवा तेल का सींग नहीं, बल्कि घुटनों पर टिका जीवन था। वह प्रार्थना से जन्मा, प्रार्थना सुनने वाले कानों से गढ़ा गया, प्रार्थना के द्वारा राष्ट्र को बचाया, और बुढ़ापे में जब लोगों ने उसे ठुकरा दिया तब भी प्रार्थना छोड़ना उसने पाप कहा। इसलिए इस पूरे पृष्ठ में हम बार-बार एक प्रश्न लौटाएँगे: परमेश्वर एक ऐसे जीवन के द्वारा क्या-क्या कर सकते हैं जो सुनना और माँगना नहीं छोड़ता?

बाइबल शमूएल के जीवन के बारे में क्या कहती है?

शमूएल की कहानी एक बाँझ स्त्री के आँसुओं से शुरू होती है। एल्काना की दो पत्नियाँ थीं, और हन्ना निःसन्तान थी। साल दर साल शीलो की यात्रा उसके लिए ताने और अपमान लेकर आती रही। आख़िरकार उसने मन्नत मानी कि यदि परमेश्वर उसे पुत्र दें, तो वह उसे जीवन भर के लिए यहोवा को सौंप देगी। परमेश्वर ने सुना, और 1 शमूएल 1:20 कहता है: "तब हन्ना गर्भवती हुई और समय पूरा होने पर उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, और उसका नाम शमूएल रखा, क्योंकि वह कहने लगी, 'मैं ने यहोवा से माँगकर इसे पाया है।'" यह नाम ही इस आदमी की पूरी पहचान है। हर बार जब कोई उसे पुकारता था, उसका नाम गवाही देता था कि परमेश्वर माँगने वालों की सुनते हैं।

दूध छुड़ाने के बाद हन्ना ने अपना इकलौता बेटा शीलो में छोड़ दिया और वह गीत गाया जो आगे चलकर मरियम के स्तुतिगान की गूँज बना: परमेश्वर दीनों को धूल में से उठाते हैं और घमण्डियों को गिराते हैं। बालक शमूएल एली के सामने सेवा करता रहा, जबकि एली के अपने बेटे होप्नी और पीनहास याजकपद को भ्रष्ट कर रहे थे। उन दिनों के बारे में बाइबल एक मार्मिक वाक्य कहती है कि यहोवा का वचन दुर्लभ था और दर्शन कम मिलते थे। ठीक उसी अंधकार में परमेश्वर ने एक बच्चे को नाम लेकर पुकारा।

तीन बार शमूएल दौड़कर एली के पास गया, और तीसरी बार बूढ़े याजक को समझ आया कि यह आवाज़ उसकी नहीं है। 1 शमूएल 3:10 में वह निर्णायक क्षण आता है: "तब यहोवा आया, और खड़ा होकर पहले के समान पुकारा, 'शमूएल, शमूएल!' शमूएल ने कहा, 'कह, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है।'" ध्यान दीजिए, परमेश्वर ने उसे किसी पद पर नियुक्त करने से पहले उसे सुनना सिखाया। अभिषेक का तेल बाद में आया; सुनने वाले कान पहले बने।

परमेश्वर की आवाज़ सुनने वाले कान, अभिषेक के तेल से बड़े हैं।

फिर एक भयानक दौर आया। पलिश्तियों ने इस्राएल को हराया, वाचा का सन्दूक छीन लिया गया, एली के दोनों बेटे मारे गए, और एली स्वयं गिरकर मर गया। बीस वर्ष तक इस्राएल कराहता रहा। तब शमूएल ने पूरी जाति को मिस्पा में बुलाया, मूर्तियाँ फिंकवाईं, और लोगों के लिए प्रार्थना की। जब पलिश्ती चढ़ाई करने आए, परमेश्वर ने आकाश से बड़ी गरज के साथ उत्तर दिया। उस जीत के बाद शमूएल ने एक पत्थर खड़ा किया, और 1 शमूएल 7:12 बताता है: "तब शमूएल ने एक पत्थर लेकर मिस्पा और शेन के बीच में खड़ा किया, और यह कहकर उसका नाम एबेनेजेर रखा, 'यहाँ तक यहोवा ने हमारी सहायता की है।'" यह पत्थर शमूएल की वीरता का स्मारक नहीं था, बल्कि परमेश्वर की सहायता का हस्ताक्षर था।

शमूएल वर्षों तक बेतेल, गिलगाल, मिस्पा और रामाह का चक्कर लगाकर न्याय करता रहा। पर बुढ़ापे में उसने अपने बेटों को न्यायी ठहराया, और वे रिश्वत लेकर न्याय बिगाड़ने लगे। इसी बहाने पुरनिये आए और बोले: हमें अन्य जातियों की तरह एक राजा दे। शमूएल को यह बुरा लगा और उसने यहोवा से प्रार्थना की। उत्तर में 1 शमूएल 8:7 कहता है: "यहोवा ने शमूएल से कहा, 'उन लोगों की सब बातें जो वे तुझ से कहें मान ले; क्योंकि उन्होंने तुझ को नहीं परन्तु मुझी को निकम्मा जाना है, कि मैं उनका राजा न रहूँ।'" यह वाक्य शमूएल के घाव पर मरहम भी था और इस्राएल के पाप का निदान भी।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

शमूएल इस्राएल के इतिहास का कब्ज़ा है, वह जोड़ जिस पर दरवाज़ा घूमता है। उससे पहले न्यायियों का अस्थिर युग था, जहाँ हर कोई अपनी दृष्टि में जो ठीक था वही करता था। उसके बाद राजाओं का युग शुरू हुआ। शमूएल दोनों युगों में खड़ा है: अन्तिम न्यायी, पहला बड़ा भविष्यद्वक्ता, और एक लेवीय जो याजकीय सेवा भी करता है। परमेश्वर ने संस्थाओं के इस बदलाव के बीच अपने लोगों को बिखरने नहीं दिया, क्योंकि एक आदमी बिना थके बीच में खड़ा होकर प्रार्थना करता रहा।

पुराने नियम में शमूएल की छाप गहरी है। यिर्मयाह 15:1 में परमेश्वर कहते हैं कि यदि मूसा और शमूएल भी उनके सामने खड़े होते, तौभी उनका मन इन लोगों की ओर न फिरता। गौर कीजिए कि यिर्मयाह के ज़माने तक, यानी सैकड़ों वर्षों बाद, शमूएल का नाम प्रार्थना के मामले में मूसा के साथ लिया जाता था। भजन 99 में भी वह उन लोगों में गिना गया है जो यहोवा को पुकारते थे और परमेश्वर उनकी सुनते थे। उसकी पहचान "राजा बनाने वाला" से ज़्यादा "मध्यस्थता करने वाला" थी।

नए नियम में भी शमूएल पीछे नहीं छूटता। प्रेरितों के काम 3:24 में पतरस कहता है कि शमूएल से लेकर उसके बाद के सब भविष्यद्वक्ताओं ने इन्हीं दिनों का सन्देश दिया, अर्थात् मसीह के आने का। प्रेरितों के काम 13:20 में पौलुस इस्राएल के इतिहास को गिनाते हुए शमूएल का उल्लेख करता है, और इब्रानियों 11:32 उसे विश्वास के नायकों की सूची में रखता है। यह आकस्मिक नहीं है: शमूएल के हाथ से जो अभिषेक दाऊद पर हुआ, उसी वंश से यीशु मसीह आए, जिन्हें "दाऊद की सन्तान" कहकर पुकारा गया।

और सबसे गहरा सूत्र यह है। हन्ना ने कहा, "मैं ने यहोवा से माँगकर इसे पाया है," और फिर उस माँगे हुए पुत्र को लौटा दिया। सदियों बाद परमेश्वर ने बिना माँगे ही अपना एकलौता पुत्र दे दिया, और वह पुत्र स्वयं को वापस नहीं लेता। बालक शमूएल के विषय में लिखा है कि वह बढ़ता गया और यहोवा तथा मनुष्यों का प्रिय होता गया; लूका 2:52 में यीशु के बचपन का वर्णन लगभग उन्हीं शब्दों की गूँज है। पर अन्तर यह है कि शमूएल को सुनना सीखना पड़ा, जबकि यीशु स्वयं वह वचन हैं जिसे सुनना है। शमूएल दूसरों के लिए प्रार्थना करता था और एक दिन मर गया; मसीह सदा जीवित हैं और इब्रानियों 7:25 के अनुसार हमारे लिए विनती करने को सर्वदा जीवित हैं। शमूएल की मध्यस्थता एक परछाईं थी, मसीह की मध्यस्थता वह शरीर है जिससे परछाईं बनी।

उसके जीवन का सार

शमूएल के पूरे जीवन को तीन निर्णायक क्षणों में पकड़ा जा सकता है, और तीनों में प्रार्थना किसी न किसी रूप में केन्द्र में है।

पहला क्षण: रात की वह आवाज़। एक ऐसे समय में जब याजकपद सड़ चुका था और परमेश्वर का वचन दुर्लभ था, एक बच्चा मन्दिर में सोया हुआ था। परमेश्वर ने संस्था को नहीं, व्यक्ति को पुकारा। और जो पहला सन्देश शमूएल को मिला, वह सुखद नहीं था: उसे अपने ही गुरु एली के घराने के विनाश की घोषणा करनी थी। सुबह वह डरता रहा कि एली को कैसे बताए, पर उसने कुछ भी नहीं छिपाया। यहीं से उसका चरित्र दिखता है: परमेश्वर की बात को नरम किए बिना कहना। इसी कारण दान से लेकर बेर्शेबा तक सब इस्राएल जान गया कि शमूएल यहोवा का भविष्यद्वक्ता ठहराया गया है।

दूसरा क्षण: मिस्पा का पश्चाताप और एबेनेजेर का पत्थर। बीस साल की हार और सन्दूक के खो जाने के बाद शमूएल ने कोई सेना नहीं खड़ी की। उसने लोगों से बिदेशी देवता फिंकवाए, पानी उण्डेला, उपवास कराया, और स्वयं एक दूध पीते मेम्ने की होमबलि चढ़ाकर इस्राएल के लिए चिल्लाकर प्रार्थना की। उस दिन जीत तलवार से नहीं, गरज से मिली। एबेनेजेर का पत्थर इसलिए अहम है क्योंकि वह भविष्य का वादा नहीं, बीते हुए रास्ते की गवाही है। "यहाँ तक" का मतलब है कि आगे का रास्ता अभी बाक़ी है, पर जिसने यहाँ तक पहुँचाया, वही आगे भी ले चलेगा।

तीसरा क्षण: ठुकराए जाने के बाद भी न छोड़ी गई प्रार्थना। जब लोगों ने राजा माँगा, शमूएल ने ईमानदारी से राजा के खर्चे गिनाए: तुम्हारे बेटे, तुम्हारी बेटियाँ, तुम्हारे खेत, तुम्हारी दसवाँ। लोगों ने फिर भी कहा, नहीं, हमें राजा ही चाहिए। गिलगाल की विदाई सभा में शमूएल ने गेहूँ कटनी के मौसम में गरज और वर्षा माँगी ताकि लोग अपनी ढिठाई समझें, और फिर वह वाक्य कहा जो उसकी समाधि का लेख होना चाहिए, 1 शमूएल 12:23: "फिर यह मुझ से दूर रहे कि मैं तुम्हारे लिये प्रार्थना करना छोड़कर यहोवा के विरुद्ध पाप करूँ; मैं तो तुम्हें अच्छा और सीधा मार्ग दिखाता रहूँगा।" जिन्होंने उसे अस्वीकार किया, उन्हीं के लिए प्रार्थना न करना उसने परमेश्वर के विरुद्ध पाप कहा। कड़वाहट का यह उपचार पूरे पुराने नियम में दुर्लभ है।

साथ ही बाइबल उसकी कमज़ोरियाँ छिपाती नहीं। उसके बेटे भ्रष्ट निकले, और एली के घराने के न्याय की घोषणा करने वाला आदमी अपने ही घर को नहीं सँभाल पाया। जब परमेश्वर ने उसे दाऊद का अभिषेक करने भेजा, तब उसने डरकर कहा कि शाऊल सुन लेगा तो मुझे मार डालेगा। और एलीआब को देखकर वह भी कद-काठी से धोखा खा गया, जब तक परमेश्वर ने उसे याद नहीं दिलाया कि वे मन को देखते हैं।

शमूएल से हम क्या सीखते हैं

पहला, परमेश्वर की सबसे बड़ी योजनाएँ अक्सर किसी की खामोश प्रार्थना से शुरू होती हैं। हन्ना को यह नहीं पता था कि उसका बेटा राष्ट्र का रुख़ बदल देगा। वह बस एक बाँझपन का बोझ उठाए हुए थी। जब आप अपनी छोटी, टूटी-फूटी, शब्दहीन प्रार्थना करते हैं, तो आप यह नहीं जानते कि परमेश्वर उस धागे से क्या बुन रहे हैं। माँगना कमज़ोरी नहीं है; यह विश्वास का सबसे ईमानदार रूप है। प्रार्थना से जन्मा, और प्रार्थना करते हुए ही बूढ़ा हुआ।

दूसरा, पहले सुनना, फिर बोलना। शमूएल का प्रशिक्षण किसी भविष्यद्वक्ता-विद्यालय में नहीं, बल्कि एक रात के उस छोटे वाक्य में हुआ: "कह, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है।" आज हमारे पास परमेश्वर की आवाज़ का ठोस रूप पवित्रशास्त्र है, और पवित्र आत्मा उसे हमारे मन में जीवित करते हैं। जो लोग बोलने से पहले सुनना नहीं सीखते, वे धर्मपरायण लगते हुए भी अपनी ही आवाज़ बाँटते रहते हैं। शमूएल ने परमेश्वर की बात सुनकर कही, इसलिए उसका एक भी वचन भूमि पर गिरने नहीं पाया।

तीसरा, अस्वीकार किए जाने पर भी सेवा करना संभव है। लोगों ने शमूएल के न्याय को ठुकराया, उसके बेटों के पाप उसके चेहरे पर पड़े, और उसकी जगह एक लम्बे-चौड़े राजा ने ले ली। ऐसे में कड़वा हो जाना स्वाभाविक होता। पर 1 शमूएल 12:23 का तर्क यह है कि प्रार्थना का आधार लोगों की योग्यता नहीं, परमेश्वर की वाचा है। जिस दिन हम यह मान लेते हैं कि जो हमें दुख देते हैं वे हमारी प्रार्थना के योग्य नहीं, उस दिन हम अपनी आत्मा को भी नुकसान पहुँचाते हैं। मसीह ने क्रूस से अपने मारने वालों के लिए क्षमा माँगी; शमूएल उस आत्मा की एक आरंभिक झलक है।

और एक चौथी, कड़वी सीख भी है: सार्वजनिक सफलता घर की लापरवाही की भरपाई नहीं करती। शमूएल ने एली के घराने के विषय में भविष्यवाणी की थी, फिर भी उसके अपने बेटे रिश्वतखोर निकले। यह हमें प्रार्थना और सावधानी दोनों की ओर बुलाता है, क्योंकि कोई भी विरासत अपने आप अगली पीढ़ी में नहीं पहुँचती।

दर्पण

आप शायद वह व्यक्ति हैं जो सालों से किसी चीज़ के लिए प्रार्थना कर रहे हैं और जवाब नहीं आया। एक सन्तान, एक नौकरी, एक रिश्ते का जुड़ना, एक बीमारी का ठीक होना। हन्ना की कहानी आपको चुभती है, क्योंकि उसे तो आख़िरकार मिल गया। मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि धीरज रखिए, सब ठीक हो जाएगा। पर मैं यह पूछूँगा: क्या आपकी प्रार्थना अब भी ईमानदार है, या आपने परमेश्वर से बात करना बन्द करके सिर्फ़ उनके बारे में शिकायत करना शुरू कर दिया है? हन्ना ने अपनी कड़वाहट परमेश्वर के सामने उण्डेल दी, लोगों के सामने नहीं।

शायद आप थके हुए माता-पिता हैं जो शमूएल के बेटों का अंश पढ़कर अन्दर से काँप उठे। आपने कलीसिया में सेवा की, पर घर में समय नहीं दे पाए। इस पृष्ठ का उद्देश्य आपको दोष के नीचे दबाना नहीं है। शमूएल का परमेश्वर उसी घर को नहीं छोड़ते जिसकी सन्तान भटक गई हो; वे अब भी सुनते हैं, और आपके पास अब भी प्रार्थना का वह अधिकार है जिसे शमूएल ने कभी नहीं छोड़ा।

और शायद आप किसी ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ आपको लगता है कि आपकी जगह किसी और ने ले ली। नया बॉस, नया अगुवा, नई पीढ़ी। शमूएल जानता था कि ठुकराया जाना कैसा लगता है, और उसने परमेश्वर से यह सुना कि असल में ठुकराए तो परमेश्वर ही गए थे। आपकी पीड़ा छोटी नहीं है, पर वह सबसे बड़ी भी नहीं है। आज आप एक पत्थर उठाकर कह सकते हैं: "यहाँ तक यहोवा ने हमारी सहायता की है।" पीछे मुड़कर देखिए और गिनिए, फिर आगे का क़दम हल्का लगेगा।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को शमूएल की कहानी सुनाना आसान है, क्योंकि यह एक बच्चे से शुरू होती है। सबसे सरल रूप यह है: एक माँ थी जिसे बहुत दुख था क्योंकि उसके कोई बच्चा नहीं था। उसने परमेश्वर से माँगा, और परमेश्वर ने उसे एक बेटा दिया। माँ ने उसका नाम शमूएल रखा, जिसका मतलब है "परमेश्वर ने सुना"। जब शमूएल बड़ा हो रहा था, एक रात परमेश्वर ने उसे नाम लेकर पुकारा, और शमूएल ने कहा, "कहिए, मैं सुन रहा हूँ।" बड़ा होकर वह परमेश्वर की बातें लोगों को बताता रहा और राजाओं को चुनने में परमेश्वर की आज्ञा मानता रहा।

बच्चों के लिए सबसे अच्छा सन्देश यही है कि परमेश्वर बच्चों की आवाज़ भी सुनते हैं और बच्चों से बात भी करते हैं। शमूएल तब बहुत छोटा था जब परमेश्वर ने उसे काम सौंपा, इसलिए किसी को यह सोचने की ज़रूरत नहीं कि "मैं तो अभी छोटा हूँ"। घर पर सोने से पहले बच्चों के साथ शमूएल वाली प्रार्थना दोहराना एक सुन्दर आदत बन सकती है: "प्रभु, बोलिए, मैं सुन रहा हूँ।"

कुछ बातें उम्र के अनुसार बदलनी पड़ती हैं। छोटे बच्चों के लिए एली के बेटों के पापों या एन्दोर की ओझा की घटना में जाना ठीक नहीं; वहाँ बस माँ की प्रार्थना और रात की आवाज़ काफ़ी है। बड़े बच्चों के लिए न्याय, आज्ञाकारिता और "मनुष्य बाहरी रूप देखता है, पर परमेश्वर मन को देखते हैं" जैसी बातें जोड़ी जा सकती हैं। किशोरों के साथ अस्वीकार किए जाने, नेतृत्व और माता-पिता की असफलता जैसे कठिन विषय खोले जा सकते हैं। इसी कारण हमारे यहाँ अलग-अलग आयु वर्गों के लिए विशेष व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह वर्ष के नन्हे बच्चों के लिए, सात से बारह वर्ष के बच्चों के लिए, और बारह वर्ष से ऊपर के किशोरों के लिए। वहाँ भाषा, उदाहरण और प्रश्न उसी उम्र के हिसाब से गढ़े गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शमूएल कौन थे और वे इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

शमूएल एल्काना और हन्ना के पुत्र थे, एक लेवीय परिवार से, जिन्होंने इस्राएल में न्यायी, याजक और भविष्यद्वक्ता तीनों भूमिकाएँ निभाईं। उनका महत्व इस बात में है कि वे दो युगों के बीच की कड़ी थे: न्यायियों के अस्थिर दौर के अन्तिम अगुवे और राजाओं के युग के पहले अभिषेक करने वाले। उन्होंने शाऊल और दाऊद दोनों का अभिषेक किया, मिस्पा में राष्ट्रीय पश्चाताप का नेतृत्व किया, और जीवन भर लोगों के लिए मध्यस्थता की। नया नियम उन्हें विश्वास के नायकों और मसीह की ओर संकेत करने वाले भविष्यद्वक्ताओं में गिनता है।

शमूएल नाम का अर्थ क्या है?

1 शमूएल 1:20 इस नाम को हन्ना की प्रार्थना से जोड़ता है: "उसका नाम शमूएल रखा, क्योंकि वह कहने लगी, 'मैं ने यहोवा से माँगकर इसे पाया है।'" इब्रानी भाषा में यह नाम "परमेश्वर ने सुना" या "परमेश्वर से माँगा गया" दोनों अर्थों से जुड़ा है। इसका व्यावहारिक पहलू यह है कि शमूएल का नाम ही एक गवाही थी; उसे पुकारने वाला हर व्यक्ति अनजाने में यह कह रहा था कि परमेश्वर प्रार्थना सुनते हैं। नाम और बुलाहट का ऐसा मेल बाइबल में बार-बार दिखाई देता है।

क्या शमूएल याजक थे, भविष्यद्वक्ता थे या न्यायी?

वास्तव में तीनों। 1 इतिहास के वंशावली विवरण के अनुसार वे लेवी के गोत्र से थे, इसलिए मन्दिर की सेवा और बलिदान चढ़ाना उनके लिए अनुचित नहीं था। 1 शमूएल 3 के बाद पूरा इस्राएल जान गया कि वे यहोवा के भविष्यद्वक्ता ठहराए गए हैं, और 1 शमूएल 7 में वे इस्राएल का न्याय करते हैं और हर वर्ष बेतेल, गिलगाल, मिस्पा और रामाह का चक्कर लगाते हैं। यह त्रिगुण सेवा उन्हें मसीह की ओर इशारा करने वाली एक दुर्लभ आकृति बनाती है, जो याजक, भविष्यद्वक्ता और राजा तीनों हैं।

शमूएल ने किन राजाओं का अभिषेक किया?

दो राजाओं का। पहले किशोन के पुत्र शाऊल का, जिसे उन्होंने एकान्त में तेल से अभिषेक किया और बाद में मिस्पा तथा गिलगाल में सार्वजनिक रूप से राजा घोषित किया। फिर, शाऊल के अनाज्ञाकारी ठहराए जाने के बाद, यिशै के सबसे छोटे पुत्र दाऊद का। 1 शमूएल 16:13 कहता है: "तब शमूएल ने तेल का सींग लेकर उसके भाइयों के बीच में उसका अभिषेक किया; और उस दिन से लेकर भविष्य को यहोवा का आत्मा दाऊद पर बल से उतरता रहा।" इसी दाऊद के वंश से यीशु मसीह आए।

एबेनेजेर पत्थर का क्या मतलब है?

1 शमूएल 7:12 में शमूएल ने पलिश्तियों पर जीत के बाद एक पत्थर खड़ा करके उसका नाम एबेनेजेर रखा, जिसका अर्थ है "सहायता का पत्थर", और कहा, "यहाँ तक यहोवा ने हमारी सहायता की है।" यह स्मारक जीत का श्रेय इस्राएल की सेना को नहीं, परमेश्वर को देता है। "यहाँ तक" शब्द ख़ास हैं: वे स्वीकार करते हैं कि यात्रा अभी बाक़ी है, पर बीते हुए रास्ते की सहायता भविष्य के लिए भरोसा बन जाती है। आज भी स्मरण के ऐसे पत्थर, यानी लिखी हुई गवाहियाँ, विश्वास को मज़बूत करते हैं।

यदि राजा माँगना परमेश्वर को ठुकराना था, तो परमेश्वर ने राजा दिया क्यों?

1 शमूएल 8:7 में परमेश्वर स्पष्ट कहते हैं कि लोगों ने शमूएल को नहीं, स्वयं उन्हें ही निकम्मा जाना है। फिर भी वे शमूएल से कहते हैं कि उनकी माँग मान ले। परमेश्वर कभी-कभी हमारी ज़िद को रोकते नहीं, बल्कि उसके परिणामों के द्वारा हमें सिखाते हैं; शमूएल ने पहले ही चेतावनी दी थी कि राजा क्या-क्या लेगा। साथ ही व्यवस्थाविवरण 17 में राजा के विषय में नियम पहले से दिए गए थे, और परमेश्वर ने इसी संस्था को आगे चलकर दाऊद की वाचा और मसीह के राज्य की ओर मोड़ दिया।

शमूएल के बेटे क्यों बिगड़ गए?

1 शमूएल 8:3 सीधे कहता है कि योएल और अबिय्याह अपने पिता की राह पर नहीं चले, बल्कि लालच के पीछे होकर रिश्वत लेते और न्याय बिगाड़ते थे। बाइबल कारण नहीं गिनाती, पर यह विडम्बना साफ़ है कि एली के घराने पर न्याय की घोषणा करने वाले शमूएल का अपना घर भी डगमगाया। यह हमें याद दिलाता है कि विश्वास विरासत में अपने आप नहीं मिलता, और सबसे समर्पित सेवक भी अपनी सन्तान की चुनावी स्वतंत्रता पर क़ब्ज़ा नहीं कर सकते। यह चेतावनी भी है और धर्मी माता-पिता के लिए सान्त्वना भी।

शमूएल और शाऊल के बीच दरार क्यों पड़ी?

दो घटनाएँ निर्णायक थीं। गिलगाल में शाऊल ने शमूएल की प्रतीक्षा न करके स्वयं होमबलि चढ़ा दी, और शमूएल ने कहा कि उसका राज्य स्थिर नहीं रहेगा। फिर अमालेकियों के विरुद्ध युद्ध में शाऊल ने परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा के विरुद्ध राजा अगाग और अच्छी लूट बचा ली, और इसे बलिदान का बहाना दिया। तभी शमूएल ने वह प्रसिद्ध बात कही कि आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है। उसके बाद शमूएल ने शाऊल से मिलना छोड़ दिया, पर उसके लिए शोक करता रहा।

क्या एन्दोर की ओझा ने सचमुच शमूएल को बुलाया था?

1 शमूएल 28 में पाठ स्वयं कहता है कि स्त्री ने शमूएल को देखा और शमूएल ने शाऊल से बात की, और वह सन्देश सच्चा निकला। अधिकतर परम्परागत व्याख्या यही मानती है कि परमेश्वर ने असाधारण रूप से शाऊल के न्याय की घोषणा के लिए ऐसा होने दिया, न कि यह कि ओझाओं के पास मरे हुओं पर अधिकार होता है। ध्यान दीजिए कि स्त्री स्वयं चिल्ला उठी थी, मानो उसे अपेक्षा से कुछ अलग दिखा हो। बाइबल मृतकों से सम्पर्क को स्पष्ट रूप से मना करती है, और यह घटना उस मनाही को तोड़ने का भयानक अंजाम दिखाती है।

1 शमूएल 3:10 का अर्थ क्या है और मैं परमेश्वर की आवाज़ कैसे पहचानूँ?

उस पद में परमेश्वर तीन बार पुकारने के बाद आकर खड़े होते हैं और शमूएल उत्तर देता है, "कह, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है।" ध्यान दीजिए कि शमूएल को पहचानना एली ने सिखाया, यानी आत्मिक मार्गदर्शन की भूमिका थी। आज परमेश्वर की आवाज़ का निश्चित और परखने योग्य रूप पवित्रशास्त्र है, जिसे पवित्र आत्मा हमारे मन में जीवित करते हैं। जो मन में आता है उसे बाइबल, मसीह के चरित्र और परिपक्व विश्वासियों की सलाह से परखिए। सुनने की शुरुआत हमेशा समर्पण के इसी छोटे वाक्य से होती है।

शमूएल का जीवन यीशु मसीह की ओर कैसे इशारा करता है?

कई तरह से। वह माँगकर पाया गया पुत्र था जिसे परमेश्वर को लौटा दिया गया, जबकि मसीह वह पुत्र हैं जिन्हें परमेश्वर ने बिना माँगे दे दिया। शमूएल याजक, भविष्यद्वक्ता और न्यायी तीनों था, और मसीह इन तीनों पदों को पूर्णता में भरते हैं। शमूएल ने तेल से अभिषेक किया, पर मसीह स्वयं अभिषिक्त जन हैं, जिन पर आत्मा बिना नाप के उतरा। और सबसे सुन्दर समानता मध्यस्थता की है: शमूएल ने प्रार्थना करना छोड़ना पाप कहा, और मसीह हमारे लिए विनती करने को सर्वदा जीवित हैं।

शमूएल की मृत्यु कब हुई और उनका क्या प्रभाव रहा?

1 शमूएल 25:1 बताता है कि शमूएल मर गया और सारे इस्राएल ने इकट्ठा होकर उसके लिए विलाप किया, और उसे रामाह में उसके घर में मिट्टी दी गई। उनकी मृत्यु दाऊद के शाऊल से भागते दिनों के बीच हुई, यानी राज्य के सबसे अस्थिर समय में। प्रभाव के रूप में उन्होंने भविष्यद्वक्ताओं की एक परम्परा छोड़ी, रामाह के पास भविष्यद्वक्ताओं की मंडली से जुड़े रहे, और दाऊद के अभिषेक के द्वारा उस वंश को स्थापित किया जिसमें से मसीह आए। यिर्मयाह 15:1 दिखाता है कि सदियों बाद भी उनका नाम प्रार्थना का पर्याय था।

अंत में

शमूएल का जीवन हमें यह सिखाने के लिए लिखा गया कि परमेश्वर के काम का सबसे शक्तिशाली औज़ार तेल का सींग नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवन है जो सुनना और माँगना नहीं छोड़ता। वह एक माँ की खामोश प्रार्थना से शुरू हुआ, रात की एक पुकार से गढ़ा गया, मिस्पा की विनती से राष्ट्र को लौटाया गया, और ठुकराए जाने के बाद भी उसने प्रार्थना छोड़ने को परमेश्वर के विरुद्ध पाप कहा। उसकी कमज़ोरियाँ भी बाइबल ने छिपाई नहीं, क्योंकि यह कहानी किसी आदर्श मनुष्य की नहीं, बल्कि सुनने वाले परमेश्वर की है।

यदि आप आगे पढ़ना चाहें, तो 1 शमूएल के पहले बारह अध्याय एक बार धीरे-धीरे, प्रार्थना के साथ पढ़िए; हन्ना के गीत को लूका 1 में मरियम के स्तुतिगान के साथ रखकर देखिए; और अपने अब तक के जीवन में परमेश्वर की सहायता के "यहाँ तक" वाले पड़ाव लिखकर गिनिए। फिर शमूएल के उसी छोटे वाक्य से अपना दिन शुरू कीजिए, जिसने इस्राएल का इतिहास बदल दिया: बोलिए, आपका दास सुन रहा है।

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अंतर्दृष्टियों की दीवार

पवित्रशास्त्र में आपको क्या स्पर्श करता है? हम किसके लिए प्रार्थना करें? हम परमेश्वर का किसके लिए धन्यवाद करें?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 कुरिन्थियों 6:9

पौलुस अपनी सेवा का ब्यौरा देते हुए कहता है, "अनजानों के समान हैं, तो भी प्रसिद्ध हैं; मरते हुओं के…

प्रार्थना संपादकीय पर मत्ती 27:2

पिता, जब आपका पुत्र बंधा हुआ, चुपचाप शासक के हाथों सौंप दिया गया, तब भी आपका प्रेम पीछे नहीं हटा।…

धन्यवाद संपादकीय पर 1 तीमुथियुस 4:2

पिता, धन्यवाद कि मेरा विवेक जलते हुए लोहे से दागा नहीं गया। जब मैं गलत राह पर बढ़ता हूँ, तो…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर भजन संहिता 130:3

हे यहोवा, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा रखता, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकता?" यह सवाल है,…

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर होशे 5:6

वे अपनी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के साथ यहोवा को ढूँढ़ने जाएँगे, परन्तु उसे न पाएँगे; वह उनसे अलग हो गया…

प्रार्थना संपादकीय पर इफिसियों 4:22

पिता, मेरे भीतर अब भी वह पुराना स्वभाव अटका है, जो धोखा देने वाली इच्छाओं से मुझे खींचता है। मुझे…

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